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शनिवार, 29 मई 2010

धागा हूँ मैं

धागा हूँ मैं
मुझे माला बना
प्रीत के मनके पिरो
नेह की गाँठें लगा
खुद को सुमरनी
का मोती बना
मेरे किनारों को
स्वयं से मिला
कुछ इस तरह
धागे को माला बना
अस्तित्व धागे का
माला बने
माला की सम्पूर्णता
में सजे
जहाँ धागा माला में
विलीन हो जाये
अस्तित्व दोनों के
एकाकार हो जायें

मंगलवार, 18 मई 2010

खुद से निगाह मिला ना पाया

सुनो
उदासी का
लहराता साया
क्या तूने नहीं देखा?
जिसे कभी तू
कँवल कहा करता था
उस रुखसार पर
डला ख़ामोशी का
नकाब
हटाया तो होता
हर तरफ टूटी -बिखरी
निराशा में डूबी
आहें और ख्वाबों
को ही पाया होता
हर पग पर सिर्फ
ज़ख्मो के ही निशाँ
टिमटिमाये होते
हर तरफ तबाही का
मंजर ही पाया होता
और हर तबाही के लिए
खुद को ही कसूरवार
ठहराया होता
शायद इसीलिए
नकाब हटा ना पाया
सत्य के आईने में
खुद से निगाह
मिला ना पाया

सोमवार, 17 मई 2010

महिला ब्लॉगर्स का सन्देश जलजला जी के नाम

कोई मिस्टर जलजला एकाध दिन से स्वयम्भू चुनावाधिकारी बनकर.श्रेष्ठ महिला ब्लोगर के लिए, कुछ महिलाओं के नाम प्रस्तावित कर रहें हैं. (उनके द्वारा दिया गया शब्द, उच्चारित करना भी हमें स्वीकार्य नहीं है) पर ये मिस्टर जलजला एक बरसाती बुलबुला से ज्यादा कुछ नहीं हैं, पर हैं तो  कोई छद्मनाम धारी ब्लोगर ही ,जिन्हें हम बताना चाहते हैं कि हम  इस तरह के किसी चुनाव की सम्भावना से ही इनकार करते हैं.

ब्लॉग जगत में सबने इसलिए कदम रखा था कि न यहाँ किसी की स्वीकृति की जरूरत है और न प्रशंसा की.  सब कुछ बड़े चैन से चल रहा था कि अचानक खतरे की घंटी बजी कि अब इसमें भी दीवारें खड़ी होने वाली हैं. जैसे प्रदेशों को बांटकर दो खण्ड किए जा रहें हैं, हम सबको श्रेष्ट और कमतर की श्रेणी में रखा जाने वाला है. यहाँ तो अनुभूति, संवेदनशीलता और अभिव्यक्ति से अपना घर सजाये हुए हैं . किसी का बहुत अच्छा लेकिन किसी का कम, फिर भी हमारा घर हैं न. अब तीसरा आकर कहे कि नहीं तुम नहीं वो श्रेष्ठ है तो यहाँ पूछा किसने है और निर्णय कौन मांग रहा है? 
हम सब कल भी एक दूसरे  के लिए सम्मान रखते थे और आज भी रखते हैं ..
                            
 अब ये गन्दी चुनाव की राजनीति ने भावों और विचारों पर भी डाका डालने की सोची है. हमसे पूछा भी नहीं और नामांकन भी हो गया. अरे प्रत्याशी के लिए हम तैयार हैं या नहीं, इस चुनाव में हमें भाग लेना भी या नहीं , इससे हम सहमत भी हैं या नहीं बस फरमान जारी हो गया. ब्लॉग अपने सम्प्रेषण का माध्यम है,इसमें कोई प्रतिस्पर्धा कैसी? अरे कहीं तो ऐसा होना चाहिए जहाँ कोई प्रतियोगिता  न हो, जहाँ स्तरीय और सामान्य, बड़े और छोटों  के बीच दीवार खड़ी न करें.  इस लेखन और ब्लॉग को इस चुनावी राजनीति से दूर ही रहने दें तो बेहतर होगा. हम खुश हैं और हमारे जैसे बहुत से लोग अपने लेखन से खुश हैं, सभी तो महादेवी, महाश्वेता देवी, शिवानी और अमृता प्रीतम तो नहीं हो सकतीं . इसलिए सब अपने अपने जगह सम्मान के योग्य हैं. हमें किसी नेता या नेतृत्व की जरूरत नहीं है.
 
इस विषय पर किसी  तरह की चर्चा ही निरर्थक है.फिर भी हम इन मिस्टर जलजला कुमार से जिनका असली नाम पता नहीं क्या है, निवेदन करते हैं  कि हमारा अमूल्य समय नष्ट करने की कोशिश ना करें.आपकी तरह ना हमारा दिमाग खाली है जो,शैतान का घर बने,ना अथाह समय, जिसे हम इन फ़िज़ूल बातों में नष्ट करें...हमलोग रचनात्मक लेखन में संलग्न रहने  के आदी हैं. अब आपकी इस तरह की टिप्पणी जहाँ भी देखी जाएगी..डिलीट कर दी जाएगी.

बुधवार, 12 मई 2010

प्रश्नचिन्ह?

हर शख्स
एक प्रश्नचिन्ह सा 
नज़र आता है
ना जाने 
कितने सवालों
से जूझता 
हल की तलाश
में निकला 
प्रश्नों के 
व्यूह्जाल में
उलझता जाता है
और प्रश्नों के 
जवाब में
प्रश्नों से ही
टकराता है 
और फिर
प्रश्नों के 
मकडजाल में
फँसा खुद
एक दिन 
प्रश्नचिन्ह
बन जाता है

रविवार, 9 मई 2010

मातृ ऋण से कुछ तो खुद को उॠण कर लेना

मत करो
मेरा वंदन 
अभिनन्दन
मत करो
याद तुम
सिर्फ एक दिन 
मत दो 
सम्मान अभी
फर्क नहीं पड़ता 
अभी तो मैं
अपना बोझ 
उठा लूँगी
तुम पर 
जान न्यौछावर
कर दूंगी 
अपनी दुआओं में 
सिर्फ तुम्हारा
ही नाम लूँगी
अभी तो शक्ति
है मुझमें 
अभी तो 
सहने की 
क्षमता है मुझमें
पर उस दिन 
जब मैं
असहाय जो जाऊँ
निर्बल , निरीह 
हो जाऊं
सहारे बिन ना
चल पाऊँ
आँखों की ज्योति
कम हो जाये
शरीर  भी
निर्बल हो जाये
यादें भी 
धूमिल पड़ जायें
एक बात को 
बार -बार 
 मैं दोहराऊँ
उस दिन तुम
झुँझला मत जाना
खाना खाते वक्त
मूँह से निकलती
आवाजों से
तुम शरमा
मत जाना
इन बिखरी 
टूटी  हड्डियों को
तुम कोठरी में
सुखा मत देना 
अपनी बेबस 
पुरातन माँ में
नए ज़माने की
हवा भरने की ना
कोशिश करना
जब तुमसे मिलने 
को आतुर माँ
तरसती हो
तुम्हारे सानिध्य 
को तड़पती हो
दो बोल 
मीठे बोल देना
कड़वाहट का 
ज़हर ना
शब्दों में भरना
वक़्त की कमी
की ना 
दुहाई  देना
एक आखिरी
घडी गिनती
बेबस माँ को
तुम ना बेबस
कर देना
वरना
मौत से पहले
मर जाएगी
तुम्हें स्नेह 
करने वाली
दोबारा फिर 
नहीं आएगी
निश्छल ,निर्मल
स्नेहमयी माँ
फिर ना कभी
मिल पायेगी
मरते -मरते भी
दुआएँ तुम्हें
दे जाएगी
ये सौगात 
फिर ना कभी
मिल पाएगी 
इस अमूल्य
धरोहर को
शीश पर धारण
कर लेना
बस उस दिन 
जब उसे तुम्हारी 
जरूरत हो
याद उसे तुम 
कर लेना
मातृ ऋण  से 
कुछ तो खुद 
को उॠण
कर लेना

बुधवार, 5 मई 2010

नारी या भोग्या ?

नारी 
तुम्हारा 
अस्तित्व 
क्या है?
हर युग में
जन -जन के 
अंतस में व्याप्त 
तुम्हारी भोग्या
की छवि  से 
कब मुक्त
हो पाई हो
हर युग में ही
कुचली गयीं
मसली गयीं
तोड़ी गयीं
फेंकी गयीं
कब तुम्हारे 
अस्तित्व को 
स्वीकारा गया 
कब देह से पार 
तुम्हारे अस्तित्व
को जाना गया
तप भंग करना हो
या अग्निपरीक्षा देनी हो
तुम्हें ही बलि वेदी पर
चढ़ाया गया
देवी हो या माँ
हर रूप में 
तुम्हारी अस्मिता का
ही होम किया गया
तुम्हें ही छला गया 
हर युग में
तुम्हारे ' भोग्या ' शब्द 
को ही सार्थक किया गया
प्रदर्शन की विषय- वस्तु
बनाया गया आज भी 
आज भी तुम
पुरुष की सोच की
मात्र कठपुतली हो
कब तुममें माँ ,बेटी 
बहन , पत्नी की
छवि को निहारा गया
सिर्फ स्वार्थों की 
पूर्ति के लिए ही
इन उपनामों से
नवाज़ा गया 
नारी देह से तो 
मुक्त हो भी जाओगी
पर पुरुष की सोच से
भोग्या की तस्वीर 
ना हटा पाओगी
नारी तुम किसी 
भी युग में
'भोग्या' के दंश से 
ना बच पाओगी
अपने अस्तित्व को
काम-पिपासुओं के
चंगुल से ना 
बचा पाओगी
इनकी विकृत
मानसिकता से 
ना मुक्त हो पाओगी
फिर कैसे अपने 
अस्तित्व को
जान पाओगी?
नारी तुम 
कब नारी 
बन पाओगी?