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शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

खुशखबरी आपके लिये……दिवाली की सौगात

दोस्तों

आज आप सबके लिए एक खुशखबरी लेकर आई हूँ.........अब से हर महीने आपके बेशकीमती ब्लोगों पर आपके विचारों को प्रवासी भारतीयों की मैगजीन गर्भनाल पत्रिका में उतारने का मौका मुझे मिला है जिसका पहला अंक प्रकाशित हो गया है. आपके ब्लोग्स की चर्चा करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है . अपने निजी कारणों से चर्चा मंच पर चर्चा करना छोड़ा तो यहाँ पकड़ ली गयी और आदरणीय आत्माराम जी ने मुझे महीने में एक बार ब्लोग्स की चर्चा के लिए आमंत्रित किया तो न नहीं कह सकी और इतना वक्त तो निकाल ही सकती हूँ कि महीने में एक बार तो आप सबसे जुडी रहूँ और आप सबके ब्लोग्स को न केवल ब्लॉगजगत तक ही बल्कि देश- विदेश तक पहुँचाने में अपना योगदान दे सकूं जिससे और भी ज्यादा से ज्यादा लोग ब्लोगिंग की तरफ आकर्षित हो सकें और हमारी ब्लोगिंग नए- नए आयामों को छूती रहे. 

लगता है चर्चा से एक अटूट नाता जुड़ गया है जिसे अगर छोड़ना भी चाहूँ तो नहीं छोड़ सकती .

इस बार के अक्टूबर माह  की गर्भनाल पत्रिका में आप सबके ब्लोग्स का जिक्र हुआ है और जिनके रह गए हैं उनके आगामी माह में आते रहेंगे इसलिए निराश होने की जरूरत नहीं है. बस सिर्फ इतना करना है जो लिंक दे रही हूँ या तो उस पर क्लिक करके पेज १७ पर पढ़ लीजिये या फिर चाहें तो आप ये पत्रिका भी मँगा सकते हैं उसका पता भी दे रही हूँ. 

https://mail-attachment.googleusercontent.com/attachment?ui=2&ik=83ac09a125&view=att&th=132b8e47252d686f&attid=0.1&disp=inline&realattid=2959bf5d634d8e0e_0.1&safe=1&zw&saduie=AG9B_P-sqdOOtE1oq5h2pgM3cTYR&sadet=1317374484640&sads=6_z4-bB054OIVBr2oWNUSYdo3I4&sadssc=१


अगर ये लिंक न खुले तो इसे कॉपी करके अलग से एड्रेस बार में पेस्ट करके खोल लीजियेगा आराम से खुल जायेगा. या फिर कमेन्ट पर जब आप क्लिक करके खोलेंगे तो वहां से मूल पोस्ट को क्लिक करिये और वहाँ से आप लिंक कापी कर लीजिये और अलग से एड्रेस बार में पेस्ट करके खोल लीजिये ।

कुछ दोस्त शिकायत कर रहे हैं कि ये लिंक नहीं खुल रहा तो आप इसे http://garbhanal.com/ से डाउनलोड करके पढ़ सकते हैं.


ये सबसे आसान लिंक है जो आसानी से खुल जायेगा मुझे दीपक मशाल जी ने उपलब्ध करवाया है.


http://www.garbhanal.com/Garbhanal%2059.pdf

पता ये है : 
DXE23,MEENAL RESIDENCY
J . K. ROAD
BHOPAL------462023
MADHYA PRADESH
BHARAT

MOBILE: 8989015017
EMAIL: garbhnal@ymail.com

उम्मीद है आप सबका सहयोग मुझे और पत्रिका को मिलता रहेगा .

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

क्यों आज भी नारी को एक सुरक्षित जमीन की तलाश है?





क्यों है आज भी नारी को एक सुरक्षित जमीन की तलाश ? एक शाश्वत प्रश्न मुँह बाए खड़ा है आज हमारे सामने ............आखिर कब तक ऐसा होगा ? क्या नारी सच में कमजोर है या कमजोर बना दी गयी है जब तक इन प्रश्नों का हल नहीं मिलेगा तब तक नारी अपने लिए जमीन तलाशती ही रहेगी.माना सदियों से नारी को कभी पिता तो कभी भाई तो कभी पति तो कभी बेटे के आश्रित बनाया गया है . कभी स्वावलंबन की जमीन पर पाँव रखने ही नहीं दिए तो क्यूँ नहीं तलाशेगी अपने लिए सुरक्षित जमीन ?


पहले इसके कारण ढूँढने होंगे . क्या हमने ही तो नहीं उनके पाँव में दासता की जंजीर नहीं डाली? क्यूँ उसे हमेशा ये अहसास कराया जाता रहा कि वो पुरुष से कम है या कमजोर है जबकि कमजोरी हमारी थी हमने उसकी शक्ति को जाना ही नही . जो नारी आज एक देश चला सकती है , बड़े- बड़े ओहदों पर बड़े- बड़े डिसीजन ले सकती है , किसी भी कंपनी की सी इ ओ बन सकती है , जॉब के साथ- साथ घर- बार बच्चों की देखभाल सही ढंग से कर सकती है तो कैसे कह सकते हैं कि नारी किसी भी मायने में पुरुष से कम है लेकिन हमारी पीढ़ियों ने कभी उसे इस दासता से आज़ाद होने ही नहीं दिया . माना शारीरिक रूप से थोड़ी कमजोर हो मगर तब भी उसके बुलंद हौसले आज उसे अन्तरिक्ष तक ले गए फिर चाहे विमान उड़ाना हो या अन्तरिक्ष में जाना हो ..........जब ये सब का कर सकती है तो कैसे कह सकते है कि वो अक्षम है . किसी से कम है . फिर क्यूँ तलाशती है वो अपने लिए सुरक्षा की जमीन ? क्या आकाश को मापने वाली में इतनी सामर्थ्य नहीं कि वो अपनी सुरक्षा खुद कर सके ?


ये सब सिर्फ उसकी जड़ सोच के कारण होता है और वो पीढ़ियों की रूढ़ियों में दबी अपने को तिल- तिल कर मरती रहती है मगर हौसला नहीं कर पाती आगे बढ़ने का , लड़ने का .जिन्होंने ऐसा हौसला किया आज उन्होंने एक मुकाम पाया है और दुनिया को दिखा दिया है कि वो किसी से किसी बात में कम नहीं हैं .आज यदि हम उसे सही तरीके से जीने का ढंग सिखाएं तो कोई कारण नहीं कि वो अपने लिए किसी जमीन की तलाश में भटकती फिरे .जरूरत है तो सिर्फ सही दिशा देने की .........उसको उड़ान भरने देने की ............और सबसे ऊपर अपने पर विश्वास करने की और अपने निर्णय खुद लेने की ..............फिर कोई कारण नहीं कि वो आज भी सुरक्षित जमीन के लिए भटके बल्कि दूसरों को सुरक्षित जमीन मुहैया करवाने का दम रखे.



दोस्तों 
दैनिक भास्कर में एक परिचर्चा की गयी कि "नारी को आज भी सुरक्षित जमीन की तलाश है " तो मेरे मन में प्रश्न उठा कि क्यों है ? क्यों न हम उसके कारण ढूँढें और उसका निवारण करने की कोशिश करें . बस उस सन्दर्भ में जो विचार उभरे आपके समक्ष हैं. 

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

बे-दिल हूँ मैं……………

आज भी मुझमे
वसन्त अंगडाइयाँ लेता है
सावन मन को भिगोता है
शिशिर का झोंका
आज भी तन के साथ
मन को ठिठुरा जाता है
मौसम का हर रंग
आज भी अपने
रंगो मे भिगोता है
मै तो आज भी
नही बदली
फिर कैसे कहता है कोई
वक्त की परछाइयां लम्बी हो गयी हैं

आज भी मुझमे
इंद्रधनुष का हर रंग
अपने रंग बिखेरता है
दिल की बस्ती पर
धानी चूनर आज
भी सजती है
शोखियों मे
आज भी हर
रंग खिलखिलाता है
फिर कैसे कहता है कोई
वक्त निशाँ छोड गया है

मै तो आज भी
यौवन की दहलीज़ की
उस लक्ष्मण रेखा को
पार नही कर पायी
लाज हया की देहरी पर
आज भी वो कोरा
दिल रखती हूँ
फिर कैसे कहता है कोई
मुझमे तो दिल ही नहीं

बे-दिल हूँ मैं……………

सोमवार, 19 सितंबर 2011

भरम कायम रखने के लिये चश्मो मे नमी तो होनी चाहिये…………

यूँ तो अलग हो जाती है धारायें
किसी ना किसी मोड पर
कभी ना कभी ये मोड
देते है दस्तक हर ज़िन्दगी मे
पर अलगाववाद की सीमाओं पर
ये अहम के पहरेदार
आखिर कब तक ? 
अलगाववाद की सीमा पर शायद
तभी दस्तक नही होती
क्योंकि भरम की दीवारों मे
रौशनी नही होती

भरम कायम रखने के लिये
चश्मो मे नमी तो होनी चाहिये…………


गुरुवार, 15 सितंबर 2011

मैं चाँद को आँखों में उगाये रखता हूँ ............

मैं रोज तुम्हारी आँखों में
चाँद को उगते देखती हूँ
फिर चाहे रात अमावस
की ही क्यों ना हो
तुम कैसे दिन में भी
चाँद को आँखों में उतार लाते हो
कैसे अपनी शीतलता से
झुलसी हुई दोपहर को
पुचकारते हो
जानती हूँ दिन में भी
चाँद उगा होता है
फिर चाहे वो आसमाँ में हो
या तुम्हारे दिल में
मगर ये तो बताओ
कब तक तुम
सूरज की गर्मी से
खुद को झुलसाओगे
और हर आँगन को
चाँदनी में नहलाओगे
कब तक तुम
आँखों की नमी को
चाँद के दाग में छुपाओगे
आखिर कह क्यूँ नहीं देते
हाँ ..........जीता हूँ तुम्हारे लिए
दिन के उजालों में भी
और रात के अंधेरों में भी
गर्मी की झुलसती लूओं में भी
शीत की चुभती शीतलहर में भी
हर पल , हर लम्हा सिर्फ
तुम्हारी खातिर
तुम्हारी मुस्कान की खातिर
मैं चाँद को आँखों में उगाये रखता हूँ ............

रविवार, 11 सितंबर 2011

महफिलें अलग ज़माने लगे हैं वो

 महफिलें अलग ज़माने लगे हैं वो
सुना है  हम से ही कतराने लगे हैं वो

आशियाना नया बनाने लगे हैं वो
सुना है दहलीज को सजाने लगे हैं वो

चौखट पर तेल चुआने लगे हैं वो
शायद नयी रौशनी लाने लगे हैं वो

गृहप्रवेश की रस्में निभाने लगे हैं वो

सुना है गैर के घर जाने लगे हैं वो

नए तरन्नुम में गाने लगे हैं वो
सुना है मौसम को बहलाने लगे हैं वो

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

रीते बर्तनों की आवाज़ें कौन सुनता है?

आज सुबह से 

देखना क्या हो गया है

ना मै मुझे मिलती हूँ 
 
और ना ही कोई ख्याल
 
देखना ज़रा......... 
तुम्हारे पहलू मे तो

आराम नही फ़रमा रहा

मुआ सारा खज़ाना

चुराकर ले गया

रीते बर्तनों की आवाज़ें कौन सुनता है?

सोमवार, 5 सितंबर 2011

राधा जू ने जन्म लियो है



राधाष्टमी की हार्दिक बधाईयाँ

राधा जू ने जन्म लियो है
बरसाने में धूम मचो है
भक्तों के ह्रदय हुलस रह्यो है
बृषभानु आँगन दमक रह्यो है
बृजनारी मंगल गा रही हैं
आओ मनावे सखी मंगल आज
राधा बिना तो कृष्ण भी आधा
प्रेम रस ने जनम लियो है
प्रेम की नयी प्रीत गढ्यो है
बजने लगे बधावे आज
वंशी की धुन प्रगट भई आज
कृष्ण को पूर्ण करने आई किशोरी आज
देखो प्रेम रंग उमड रह्यो है
बृज आँगन कैसे हुलस रह्यो है
शंख ध्वनि गूंज रही है
दुंदुभी भी बाज रही है
देवता स्तुति कर रहे हैं
राधा जू को नमन कर रहे हैं
अद्भुत दृश्य छा गया है
राधे का चमत्कार छा गया है
मुखकमल सभी खिल गये हैं
राधे राधे जप रहे हैं
प्रेम की वर्षा मे भीग रहे हैं
राधे कृपा दृष्टि को तरस रहे हैं
चरण रज पाने को भटक रहे हैं
जन्मो की प्यास बुझा रहे है
एकटक दर्शन कर रहे हैं

राधा रंग बरस रह्यो है

राधा रंग बरस रह्यो है…………