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सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

मगर अब धारायें मोडने लगी हूँ


कोई भावुक होता है
तो कोई हँसी की आड मे
दर्द छुपा लेता है
होता है सबके साथ ऐसा भी
और मेरे साथ भी होता है
जब दर्द बहता नही
या सब बांध तोड देता है
 मगर उसे भी ज़िन्दगी का
 एक खूबसूरत हिस्सा मान लेती हूँ
 तो सुकून से जी लेती हूं
अरे अरे ……ये क्या सोचने लगे 

नही……… विदुषी नही हूँ
 साधारण हूँ……आम स्त्री
तुम्हारी तरह्………
मगर अब धारायें मोडने लगी हूँ
अब नही डूबती भंवर मे………
अब बहती हूँ प्रवाह के साथ
अब भावुकता पर मैने नारियल का कठोर आवरण ओढ लिया है
जीना आसान हो जाता है………है ना।


बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

सिर्फ एक आत्मदीप जला लिया है……350 वीं पोस्ट












उमंगों का हर दीप अब बुझा दिया है

सिर्फ एक आत्मदीप जला लिया है 


 यहाँ ना पाया कोई अपना

सब जगत है इक बुरा सपना

जिसे भी जाना हमने अपना

उसने ही दिया है हमको धोखा

अँधेरे ने पाँव यूँ फैलाए

हमें ना दिखे उजालों के साये

एक मुट्ठी में अँधियारा घना है

दूजी में उजियारा भरा है

कुछ पाने को कुछ खोना होगा

मिथ्या जगत को छोड़ना होगा

तभी आत्मदीप प्रज्ज्वलित होगा 

और वो ही सार्थक दीपोत्सव होगा

मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

सुना था होता है इक बचपन



सुना था होता है इक बचपन
जिसमे होते कुछ मस्ती के पल
पर हमने ना जाना ऐसा बचपन
कहीं ना पाया वैसा बचपन
जिसमे खेल खिलौने होते
जिसमे ख्वाब सलोने होते
यहाँ तो रात की रोटी के जुगाड़ में
दिन भर कूड़ा बीना करते हैं
तब जाकर कहीं एक वक्त की
रोटी नसीब हुआ करती है
जब किसी बच्चे को
पिता की ऊंगली पकड़
स्कूल जाते देखा करते हैं
हम भी ऐसे दृश्यों को
तरसा करते हैं
जब पार्कों में बच्चों को
कभी कबड्डी तो कभी क्रिकेट
तो कभी छिड़ी छिक्का 
खेलते देखा करते हैं
हमारे  अरमान भी उस 
पल को जीने के 
ख्वाब रचाया करते हैं

मगर जब अपनी तरफ देखा करते हैं
असलियत से वाकिफ हो जाते हैं
सब सपने सिर्फ सपने ही रह जाते हैं
कभी भिखारियों के 
हत्थे चढ़ जाते हैं
वो जबरन भीख मंगाते हैं
हमें अपंग बनाते हैं 
तो कभी धनाभाव में 
स्कूल से नाम कटाते हैं
और बचपन में ही 
ढाबों पर बर्तन धोते हैं
तो कभी गाड़ियों के शीशे 
साफ़ करते हैं
तो कभी लालबत्ती पर
सामान बेचा करते हैं

यूँ हम बचपन बचाओ 
मुहीम की धज्जियाँ उडाया करते हैं 
बाल श्रम के नारों को 
किनारा दिखाया करते हैं
पेट की आग के आगे
कुछ ना दिखाई देता है
बस उस पल तो सिर्फ
हकीकत से आँख लड़ाते हैं 
और किस्मत से लड़- लड़ जाते हैं
बचपन क्या होता है
कभी ये ना जान पाते हैं
जिम्मेदारियों के बोझ तले
बचपन को लाँघ 
कब प्रौढ़ बन जाते हैं
ये तो उम्र ढलने पर ही 
हम जान पाते हैं
सुलगती लकड़ियों की आँच पर
बचपन को भून कर खा जाते हैं
पर बचपन क्या होता है
ये ना कभी जान पाते हैं 

रविवार, 23 अक्तूबर 2011

हम तो जलती आग हथेली पर लिये चलते हैं

यूँ तो 
शिलाखंडों मे छुपे 
लावे कब किसे दिखे है
एक आग से तार्रुफ़ 
कौन करे
सबने शिलाखंडो को
सिर्फ़ पिघलते देखा
मगर किसी ने भी
ना उसको जलते देखा
देखना है
जीता जागता शिलाखंड
मगर यहाँ
अन्दर धधकती  आग
के दरीचों मे
हवाओ मे उडती 
बालू के कण 
कही तुम्हारी आँख 
की किरकिरी ना बन जाये
तुम तो बस सिर्फ़ 
एक बार बाहर की
अग्नि का ही दीदार कर लो
उसकी ज्वाला से ना 
झुलस जाओ कहीं
देखो बचकर रहना
क्योंकि
हम तो जलती आग हथेली पर लिये चलते हैं


बुधवार, 19 अक्तूबर 2011

यूँ ही डिग्रियां नहीं मिलतीं मोहब्बत की

मत खुलना कभी
किताब की तरह
तुम्हें पन्ने दर पन्ने
सुलझाना 
एक पहेली की तरह
अच्छा लगता है
आखिर कुछ तो हो
जिसकी तलाश में 
जूनून कायम रहे
यूँ पढ़ तो लिया है 
हर हर्फ़ तुम्हारी 
खामोश निगाहों में
मगर अभी उसकी
व्याख्या बाकी है
आखिर समीक्षक 
भी तो होना चाहिए
हर लफ्ज़ में घुटे
चीत्कार करते 
अहसासों को 
तर्क की कसौटी 
पर कसकर फिर 
उसके सन्दर्भ 
पर शोध भी तो 
करना होगा 
आखिर यूँ ही थोड़े 
किसी लफ्ज़ 
किसी भाव
या किसी चाहत को तुम्हारी
सरसरी तौर पर पढ़ा है
शोध की दिशा में
गहन अध्ययन आवश्यक होता है
यूँ ही डिग्रियां नहीं मिलतीं मोहब्बत की 

शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

करवाचौथ पर दो ख्याल





सबने कहा आज चाँद 
आस्मां  मे देखना 
तभी व्रत का पारण करना
मगर किसी ने ये तो
बताया ही नही
वो आस्माँ है किधर
जिसमे चांद का दीदार हो
मेरा चांद तो हर पल
मेरे आस्माँ पर चमकता है
अब बताये कोई 
कौन से चाँद का दीदार करूँ 
किसे देख व्रत का पारण करूँ 
उसे जो घटता बढता रहता है
या उसे जो पूर्णता से मुझमे रहता है
कौन सा अर्घ्य दूं
अक्षत मिश्रित जल का 
या प्रेम सिंचित नेह का 
यहाँ तो रोज ही 
अर्घ्य देती हूँ
व्रत रखती हूँ
और चाँद का दीदार करती हूँ
फिर कैसे उसे एक दिन के
बंधनों में जकड दूं 
मैने तो सुना है मोहब्बत का पारण कभी नही होता







एक उम्र गुजर गयी
कभी मिटटी का तेल लगाया 
तो कभी चूना लगाया
तो कभी विक्स लगायी
तो कभी लोंग की भाप देती रही
कृत्रिम तरीके आजमाती रही 
और खुद को बहलाती रही
और अपने पर इतराती रही
मगर इतना ना समझ पाई
जबकि हर बार हाथों में लगी
फीकी मेहँदी यही समझाती रही
कब तक खुद को बहलाओगी 
कब इतना समझ पाओगी
ज़बरदस्ती के रंग कब ठहरे हैं 
पोलिश कभी तो उतरती ही है
मगर यहाँ तो पोलिश भी नहीं 


शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

सात जन्मों के सातों वचन मेरे सजना अब बदलने पड़ेंगे

सात जन्मों के सातों वचन
मेरे सजना अब बदलने पड़ेंगे
पंडितों को वचनों के नियम
मेरे सजना बदलने पड़ेंगे

अब वचनों की नियमवाली में
पहला वचन ये रखना पड़ेगा
कभी मेरी कमाई पर तुम
अपना कोई हक़ न रखोगे

दूसरा वचन ये भरना पड़ेगा
मेरे माता पिता को भी
वो ही सम्मान देना पड़ेगा
उन्हें भी जरूरत पर 
साथ अपने रखना पड़ेगा
अपने माता पिता सम
सम्मान वो ही देना पड़ेगा
इसमें न आनाकानी करोगे
कभी यूँ न मनमानी करोगे

तीसरा वचन ये उठाना पड़ेगा
मेरी कमाई का हिस्सा 
चाहे हो पूरा या अधूरा
मैं अपने पालनकर्ता को दूँ तो
उसमे न आपत्ति  करोगे
बल्कि उनकी जरूरत में 
एक हिस्सा अपना भी लगाओगे

चौथे वचन में पिया जी
घर के हर काम में 
बराबर का हाथ बंटाओगे

पांचवें वचन में सैयां जी
बच्चों के दायित्वों को
ऑफिस से छुट्टी लेने को 
न मुझ पर ही बोझ रखोगे
जरूरत के मुताबिक सजना जी
तुम भी एडजस्टमैंट  करोगे

छटे वचन में सैयां जी 
इधर उधर न तांक- झांक करोगे
कभी बीवी पर शक न करोगे
उसे दहेज़ के लिए तंग न करोगे
बल्कि सुहाग चिन्हों को तुम भी
मेरी तरह धारण करोगे
करवा चौथ पर सैयां जी
तुम भी व्रत धारण करोगे
जो आज तक पत्नियाँ करती आयीं
वो सब अब तुम भी करोगे

और सातवें वचन में सजन जी
वचन ये भरना पड़ेगा
बेटी हो या बेटा 
बराबर का समझना पड़ेगा
दोनों में न भेदभाव करोगे

गर इतना कर पाओ तो 
स्वीकार करूंगी तुमको
अब तो तुम्हें भी सैयां जी
रिश्तों का सम्मान करना पड़ेगा
बराबर का दर्जा देना पड़ेगा
किसी भेदभाव का शिकार 
न बनने देना होगा
ऐसा कर पाओगे तभी 
मेरे दायें अंग में तुम आ सकोगे 

कहो पिया जी
वचनों की नियमावली स्वीकार करोगे
पंडितों को भी नियम 
बदलने को तैयार करोगे
गर ऐसा मानों तो 
सात वचनों के सातों नियम
सात जन्मों तक भी निभ सकेंगे
वरना एक जनम भी 
साथ न तुम रह सकोगे
ये साथ रहने के 
नए फ़ॉर्मूले अपनाने पड़ेंगे
तभी तुम मेरे 
और मैं तुम्हारी बनूंगी
गृहस्थी की गाड़ी भी
पटरी पर साथ ही दौड़ेगी
जब पटरियां समांनातर चलेंगी

चलो आओ सैयां जी
ये नयी जीवन गणना करें हम 
हर किसी के जीवन को 
एक नया सन्देश अब दें हम
जिसका आधार समानता हो
जिसमे न कोई विषमता हो
प्रेम प्यार मोहब्बत के 
सब रंगों का जिसमे इन्द्रधनुष हो
कोई न छोटा बड़ा हो
बस मोहब्बत से घर वो भरा हो
कहो सैयां जी
मेरे साथ ऐसा कर सकोगे
जिस पर अब तक चली मैं 
खुद को भी तुम 
उसी कसौटी पर कस सकोगे

सात जन्मों के सातों वचन
मेरे सजना अब बदलने पड़ेंगे
पंडितों को वचनों के नियम
मेरे सजना बदलने पड़ेंगे

शनिवार, 8 अक्तूबर 2011

बताओ कभी किया है तुमने ऐसा विषमयी अमृतपान ..............

मैं पी नहीं पाती
सच कहती हूँ
अब जी नहीं पाती
अमृत पीने की आदत जो नहीं
उम्र गुजर गयी
गरल पीते- पीते
बताओ जिसने सिर्फ
विष ही पीया हो
जिसके रोम रोम में
सिर्फ विष का
ज्वर ही चढ़ा हो
जिसने ना कभी
अमृत का स्वाद चखा हो
जिसे छूने वाला भी
खुद विषबेल बन गया हो
बताओ तो ज़रा
उसे कैसे अमृत भायेगा
क्या वो भी विष ना बन जायेगा
एक ऐसा अमृतमय विष
जिसे जितना पियो
उतना ही विषमय होता जायेगा
बताओ कोई अब कैसे मरे?
अमर होने के लिए
जरूरी नहीं अमृत का होना
विष भी अमृत बन जाता है
जब कोई मीरा बन जाता है
जिसे कृष्ण विष में भी दिख जाता है
बताओ कभी किया है तुमने ऐसा विषमयी अमृतपान ..............
जीने के लिए साँसों का होना ही काफी होता है

मंगलवार, 4 अक्तूबर 2011

दे दो मां बस यही वरदान




शैलपुत्री चाहे कहलावे
ब्रह्मचारिणी चाहे बन जावे
चंद्रघंटा नाम रखावे
कूष्मांडा सुख की खान
असकंधा माता मन को भावे
कात्यायिनी रूप सबको भावे
कालरात्रि का कर श्रंगार
महागौरी का लिया अवतार
सिद्धिदात्री बन कर कल्याण
नवरुपो मे मां ने लिया अवतार
 शक्ति का किया संचार
मानव का किया कल्याण
यूँ ही माँ नही कहाई
हर शिशु पर है ममता लुटाई
दे दर्शन कृपा बरसाई
हर संकट मे बनी है सहाई
ज्योति रूप मे जब जब प्रगटी
तब तब माँ की महिमा बढती
करो मैया सबका कल्याण
तेरी महिमा का करें गुणगान
सिर्फ़ नवरूपो मे ही ना ध्यायें
हर कन्या मे तुमको पायें
करें ना कोई ऐसा काम
अपनी नज़रो मे लज्जित हो जायें
कन्या जन्म पर भी सब
गाये तेरा गुणगान
इस बार माँ दो ये वरदान
हर आँगन तुमसे भर जाये
तुम्हारे आगमन पर खुशियाँ मनायें
ऐसे अपना जीवन सफ़ल बनायें
माँ इस बार दो बस यही वरदान
दे दो मां बस यही वरदान