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शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

सिर्फ कोहिनूर ही मुकुट में जड़े जाते हैं ...........

सिन्दूर ,बिंदिया
बिछुए , मंगलसूत्र
कितने आवरण ओढा दिए 
सिर्फ एक सच को 
ढांपने के लिए
अस्तित्व बोध ना 
होने देने  के लिए 
सात भांवरों की दुहाई 
तो कभी सात 
वचनों के पैरहन 
ओढाये जाते रहे 
और मैं बावरी 
इन्ही आवरणों में
खुद के अस्तित्व को
ढूंढती रही
गलतफहमियों के 
लिबास ओढती रही
कभी ताबीज बना
तो कभी जंजीर बना
तुम्हारे वजूद को 
जिस्म से लपेटती रही
करवाचौथ के व्रत में
अपनी मोहब्बत की उम्र की
आहुति देती रही 
नहीं जानती थी
खोखली दीवारें 
रेत के  महल
और ताश के पत्तों 
से बने पिरामिड 
ढहने के लिए ही होते हैं
जानकर या शायद 
अनजाने में 
भूल गयी थी 
इस सच्चाई को
लिबास तो बदलने
के लिए होते हैं  
सिर्फ कोहिनूर ही मुकुट में जड़े जाते हैं ...........

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

बरस सच मे नव वर्ष बन जाये


किसे दूँ कैसे दूँ 
कौन सी दूँ कामना 
जो शुभ हो जाए 
बरस सच मे 
नव वर्ष बन जाये 

यहाँ तो खाली गिलास है 
और दूध भी पास नही
प्यास कोई है नही 
तो दरिया भी पास नही 
कैसे भरे पैमाना 
जो छलक छलक जाये 
बरस सच मे 
नव वर्ष बन जाये 

यहाँ तो रुका हुआ कारवाँ है 
और साथी ना कोई साथ है 
भीड है , महफ़िल है 
मगर फिर भी 
तन्हाई का साथ है 
किसे दूँ आवाज़ 
जो गीत कोई बन जाये 
बरस सच मे 
नव वर्ष बन जाये 

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

अनोखी यात्रा ………अनोखे पल

चलिए मेरे साथ एक सफ़र पर 
अरे ये क्या 
ये पिलर ४२० बीच में कहाँ से आ गया 
कसम से टू मच हो गया ये तो 

 उफ़ ...........ब्लोगर मिलन के मारे 
बेचारे पिलर ४२० पर ही अटक गए 
 आधी ब्लोगर मीट तो नांगलोई में सिमट गयी
ब्लोगर्स की मस्ती तो यहीं शुरू हो गयी 
चाय काफी की चुस्की साथ में मौसम सुहाना
ये सफ़र तो रहा बड़ा मस्ताना

ये सांपला में कौन पधारे
देखें सारे सांपला वाले  
कोई इच्छाधारी तो नहीं आया
हाँ हाँ ..........आया न 
सारे ही तो इच्छाधारी थे .........हा हा हा 
हमने दी नहीं कोई झूठी खबर 
देख लो अंतर्राष्ट्रीय मिलन ही था
बोर्ड लगवा दिया गया
स्वागत समारोह में
ब्लोगर्स ने धमाल  किया

 अब जाट देवता संग मीट  का आनंद जो  लिया
तो धूपने भी हमारा साथ दिया 
अंतर सोहेल उर्फ़ अमित ने किया कमाल
ब्लोगर्स मिलन में किया धमाल

 अपने अपने गुट बना लिए
केवल राम और संजय को तो मौका मिल गया 
देखो तो सही कैसे बतियाते हैं
कब के बिछड़े हुए आज कहाँ आ के मिले 
सर्जना जी राकेश जी ने आकर मिलन को 
चार चाँद लगा दिया
देखो तो  ......चेहरे कैसे खिल रहे हैं
आपस में गले कैसे मिल रहे हैं  
खुशदीप जी और मुकेश 
पता नहीं कौन सी सोच ने घेरा है
चेहरे पर देखो छाया कैसा अजब अँधेरा है  
 ये है ब्लोगर्स  की मस्ती
गन्ने खाए जा रहे हैं
और छिलकों ने लगाया डेरा है 
 खाए जाओ ....खाए जाओ 
ब्लोगर मीट  के गुण गाये जाओ 
 राज भाटिया जी न जाने कौन सा वाइरस ढूंढ रहे हैं 
वैसे रस में तो कुछ मिलना नहीं
लगता है देख रहे हैं 
कहाँ से आया  इसमें इतना रस 
जो सारे खाने में लगे हैं 
 हम किसी से कम नहीं 
सब खायेंगे तो हम कैसे पीछे रहेंगे 
 दीपक बाबा आये तो सही
मगर बक बक को कान तरस गए 
 ये लो जी हास्य व्यंगकार भी आ गए
मगर मूंह पर तो जैसे टेप लगा ली 
अरे बोलो बोलो ..........कुछ तो बोलो 
 अंजू संजू ..........इतना गुस्सा ठीक नहीं यार
एक बार मुस्कुरा दो न ..................हा हा 
 वैसे ये गुस्सा नहीं .........धूप पड़ेगी तो त्योरियां तो चढ़ेंगी न 
देखा झूठ नहीं कहा न
गन्ने खाए हैं 
और ढेर वहीँ छोड़ आये हैं  
 राज जी ने कैमरे में समेटी यादें हैं 
 कैसी कैसी सोचों ने घेर लिया 
मगर संजय को न फर्क पड़ा

 इंदु जी ने भावनाओं में सबको बहा डाला
बाढ़ आई थी , सैलाब आया था
बड़ी मुश्किल से ब्लोगरों को बचाया था 
 परिचय ने अब जोर पकड़ा 
सबने अपना अपना परिचय दिया 
 अब नंबर लगा है तो  कुछ तो बोलना होगा
चाहे परिचय दो या सबको लपेट लो 

 महिला शक्ति कब पीछे रही 
उसने भी अपना परचम  लहराया 
 देखो कैसे कैसे रंग जमाया
परिचय भी यादगार बनाया 

 मिलन में मिलन का आनंद आया
कोई क्या जाने ब्लोगिंग क्या है 
इसका महत्त्व बतलाया 
 ब्लोगिंग को बुलंदी पर पहुँचाया 
हर ब्लोगर ने ब्लोगिंग को अपनी जान बताया 
 कुछ सांपला वासियों ने भी 
ब्लोगर बनने का उत्साह दिखाया 
 फिर चाहे डॉक्टर हो या बिजनेस मैन
सबके  मन को ब्लोगिंग ने मोह लिया 
 परिचय का दौर ऐसा चला
किसी को न समय का पता मिला 

 सबके जुदा अंदाजों ने परिचय दौर को बेजोड़ बनाया 

 अति उत्साहित मन की भाषा सबने जानी
ब्लोगिंग की महिमा सबने बखानी 

सभी ब्लोगर ऐसे मिले
कोई जान न पाया 
कौन है विदेश से आया
यही तो ब्लोगिंग ने किया कमाल
दूरियों को नजदीकियों में बदल डाला

बड़ी दूर से आये हैं प्यार का तोहफा लाये हैं 


 सांपला वासीके चेहरे भी खिल गए
ब्लोगर मिलन को सार्थक  कर गए 
 अब  कविराज कैसे पीछे रहते
अपना रंग जमा गए 
ब्लोगर महफ़िल में छा गए 
 एक अनोखा अंदाज़ रहा 
डॉक्टर ने भी खुद को इंसानी डॉक्टर जब बतलाया
हंसी का था फव्वारा छाया 
 हर अंदाज़ मन भाया
यही तो ब्लोगिंग ने है सिखलाया 
 अलबेले काम करते हैं
हास्य में कमाल  करते हैं
अलबेला खत्री नाम बताते हैं
ब्लोगिंग में भी धमाल मचाते हैं 
 हम कहीं रहे सब जगह छा जाते हैं
अपना परिचय आप बन जाते हैं 
 सुपर स्टार भी आया था
ब्लोगिंग का हीरो कहाया था 
सबके मन को भाया था
लेखनी उठाने का निर्णय सुनाया था 
 हम कहीं रहे वकालत का परचम लहरायेंगे
कानून की सभी विधाएं बतलायेंगे
ब्लोगिंग को उसका मुकाम दिलाएंगे
ऐसा प्रण करके आये हैं

 जब आये हैं तो हमने भी 
बहती गंगा में हाथ धोने का निर्णय लिया
एक फोटो तो चिपका ही दिया 
लो हमें भी सबने जान लिया
ये तो एक कमाल हुआ 

तो दोस्तों
अविस्मरनीय पलों को 
हमने सहेज दिया
स्वादिष्ट  भोजन का भी
आनंद लिया 
अंतर सोहेल ने कमाल किया
अंतर्राष्ट्रीय स्टार पर 
ब्लोगिंग का परचम लहरा दिया
शाम को काव्य गोष्टी का आयोजन किया
रात के आलम का अब करो इंतज़ार
रुकने वाले रिपोर्ट दे देंगे
मगर हमने तो सबसे गले मिल
अपने घोंसलों को प्रस्थान किया
आखिर प्रवासी ठहरे 
अपने नीड़ में तो जाना होगा
अगली ब्लोगर मीट तक का 
करो इंतज़ार
और मिलन के पलों को सहेजने को
आने की कोशिश करो
कोई लखनऊ से तो कोई करनाल से 
तो कोई जर्मनी से आया
सारे  ब्लोगर्स को अपना बनाया

लो दोस्तों
अंतर्राष्ट्रीय ब्लोगर्स मीट का
आँखों देखा हाल बतलाया
मगर सांप खोजने वालों को 
वहां न कोई सांप मिला
मगर हनुमान  जी के भक्तों ने 
जाते ही सबका स्वागत किया
मगर जैसे ही ब्लोगर्स की टोली देखी
बेचारों ने भाग जाने में ही अपनी भलाई समझी
ये कहाँ से कौन परदेसी आ गए
जिनसे सरकार भी डर गयी 
फिर हमारी क्या बिसात है
ये सोच सेना कूच कर गयी 
फोटो लेना चाह तो 
उन्होंने मूंह छुपा  लिया
इसलिए फोटो लाभ से 
हमें वंचित  किया 
शायद किसी ब्लोगर के कैमरे 
ने  यदि पकड़ा होगा 
तो उनका भी आपको दर्शन  होगा 
हा हा हा हा ................

दोस्तों ..........मस्ती की बातें हैं इसलिए मस्ती में की हैं यदि किसी ब्लोगर को बुरा  लगे तो माफ़ी चाहती हूँ 




सोमवार, 19 दिसंबर 2011

मेरी नज़र से चलिये इस सफ़र पर ……




दोस्तों
अभी अभी हमारे ब्लोगर मित्र सत्यम शिवम् ने अपना पहला काव्य संग्रह "साहित्य प्रेमी संघ " के तत्वाधान में " टूटते सितारों की उड़ान " निकाला है जिसमे उन्होंने २० कवियों की कविताओं को शामिल किया है . पेशे से इंजिनियर सत्यम ने इस पुस्तक का संपादन स्वयं किया है और उम्र में तो अभी हमारे बेटे जैसा है मगर फिर भी इतनी लगन और निष्ठा से कार्य को अंजाम दिया है कि लगता ही नहीं  ये कार्य किसी नवागंतुक ने किया है . शायद तभी कहते हैं प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती. 

इस  काव्य संग्रह में बीस कवियों की रचनाएँ हैं जिनमें पांच कविताएँ 

मेरे द्वारा रचित हैं जिन्हें ससम्मान स्थान प्रदान किया है और मुझे अनुग्रहित किया है ........ह्रदय से आभारी हूँ .......मेरी निम्न कवितायेँ शामिल की गयी हैं .........

 १)सोन चिरैया 
 २)नारी या भोग्या? 
३) बेनाम दहलीजों को कब नाम मिले हैं 
४)और कविता लौट गयी कभी ना मुड़ने के लिए
 ५)ज़िन्दगी पन्ने पलटती रही

बस आप सबके प्रेम और उत्साहवर्धन की आवश्यकता है ताकि हमारा लेखन नियमित चलता रहे 

मुझे समीक्षा करना तो आता नहीं और ना ही मैं समीक्षक हूँ . बस पुस्तक मिलते ही पढने बैठ गयी और जब पढना शुरू किया तो एक घंटे में ही आधी से ज्यादा पुस्तक पढ़ चुकी थी जिससे सहज ही अनुमान  लगाया जा सकता है कि विभिन्न कवियों की उत्कृष्ट रचनाओं ने कितना मन मोहा होगा.

चलिए ले चलती हूँ अपने दृष्टिकोण के साथ इस काव्य संग्रह के सफ़र पर .........


पुस्तक की शुरुआत में सत्यम के पिताजी का वक्तव्य और उनकी उत्कृष्ट कविता "दर्द का पर्वत " है जो इंसानी जीवन के पहलुओं पर प्रकाश डालती है जिनसे हर इन्सान गुजरता है मगर समझ नहीं पाता कि वक्त या नियति हमसे क्या चाहती है ? हम किसलिए आये हैं? 
अब ना तपस्वी ना साधक
ना कोई ज्ञानी आएगा
ना मैं बैठने का साधन हूँ
इसलिए मैं सागर में अपने
अनेक दर्दों के साथ विलीन हो रहा हूँ 
कोई मुझे खोजेगा तो भी नहीं मिलूंगा 

ये पंक्तियाँ मानव मन की व्यथा का जीता जागता प्रमाण हैं.

संगीता स्वरुप जी से तो हमारे सभी ब्लोगर परिचित हैं और उनका कवितायेँ कहने का अंदाज़ तो है ही सबसे जुदा जिसमे वो ऐसे रंग भरती हैं कि कई बार मन चकित हो जाता है . जीवन के परिद्रश्यों को सहजता से कह जाना ही उनके लेखन को सबसे अलग करता है . उनकी कविता  "सुगबुगाती आहट "में  उम्रदराज होते दांपत्य में कैसे साथी के प्रति समर्पण भाव होता है उसे परिलक्षित किया गया है तो दूसरी तरफ "याज्ञसेनी" कविता में ना केवल द्रोपदी  के चरित्र को और उसके बिखरे व्यक्तित्व को उभारा  है बल्कि उसके लिए एक प्रश्न भी छोड़ा है कि तुम ही रही हो कारण महाभारत के युद्ध का तो दूसरी तरफ बुद्ध को भी कटघरे में खड़ा किया है नारी होने के नाते यशोधरा के दर्द को शब्द दिए हैं.

डॉक्टर रूप चन्द्र शास्त्री जी से भी सभी परिचित हैं और उनके छंदबद्ध लेखन के कायल भी हैं . उनके लिए कुछ कहना तो शायद मेरी कलम के बस में  नहीं है. हर तरह के लेखन में उनका वर्चस्व कायम है और यही उनकी कविताओं में परिलक्षित होता है. "जाना बहुत जरूरी है" कविता में कितनी सहजता से जीवन का सार  समझा दिया कि एक दिन सबने जाना है इस धरा से तो क्यों ना कुछ ऐसा काम  करके जायें जिससे सबके मनों में बस जायें. आना हमारे बस में नहीं और जाना भी जरूर है तो आये हैं तो आने को सार्थक करना भी जरूरी है यही हैं उनकी कविता के भाव. इसके अलावा "जुबान से खुलेंगे हरफ धीरे धीरे , दिवस सुहाने आने पर" आदि कवितायेँ दिल पर  गहरा असर छोडती हैं.

मुंबई में रहने वाली दर्शन कौर धनोय जी भी ब्लॉग जगत की जानी मानी हस्ती हैं . अपनी कविता "क्यों होते हैं ये धमाके" में एक प्रश्न छोड़ रही हैं आखिर मासूमों का क्या दोष ? तो दूसरी तरफ मन के गुलदान में एक फूल सजा कर रखा था मगर शायद भूल गयीं थीं कि फूलों के संग कांटे भी होते हैं और जो चुभकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं.
इनके अलावा कभी दिलकश दिखता है चाँद तो कभी इल्तिजा करती हैं मुझे मेरा प्यार लौटा दो . सभी कवितायेँ प्रेम रस से आप्लावित हैं जो पाठक पर अपना असर छोडती हैं.

इनके बाद मेरी कविताओं को भी ससम्मान स्थान प्रदान किया है जिनमे " सोन चिरैया , नारी या भोग्या? , बेनाम दहलीजों को कब नाम मिले हैं ,और कविता लौट गयी कभी ना मुड़ने के लिए, ज़िन्दगी पन्ने पलटती रही " कविताओं को स्थान प्रदान कर मुझे अनुग्रहित किया है .

उत्तर प्रदेश में रहने वाले प्रशासनिक अधिकारी श्री अशोक कुमार शुक्ला जी की कवितायेँ यथार्थ बोध कराती हैं ."इक्कीसवां बसंत" कविता में कवि ने बताया कि कैसे युवावस्था में मानव स्वप्नों के महल खड़े करता है और जैसे ही यथार्थ के कठोर धरातल पर कदम रखता है तब पता चलता है कि वास्तव में जीवन खालिस स्वप्न नहीं . "कैसा घर" कविता व्यवस्था पर गहरा कटाक्ष है .तो दूसरी तरफ "गुमशुदा" कविता में रिश्तों की गर्माहट ढूँढ रहे हैं जो आज कंक्रीट के जंगलों में किसी नींव में दब कर रह गयी है .इनके अलावा तुम, दूरियां , परिक्रमा ,बिल्लियाँ आदि कवितायेँ हर दृश्य को शब्द देती प्रतीत होती हैं यहाँ तक कि बिल्लियों के माध्यम से नारी के अस्तित्व  पर कैसा शिकंजा कसा जाता है उसे बहुत ही संवेदनशील तरीके से दर्शाया है........
चिड़ियों के पंख आज बिखरे हैं फर्श पर 
और गुमसुम चिड़ियों को देखकर सोचता हूँ 
मैं कि आखिर इस पिंजरे के अन्दर 
कितना उडा जा सकता है
आखिर क्यों नहीं सहा जाता
अपने पिंजरे में रहकर भी
खुश रहने वाली
चिड़ियों का चहचहाना 
तो दूसरी तरफ "वेताल" सरीखी कविता हर जीवन का अटल सत्य है . हर कविता के माध्यम से कुछ ना कुछ कहने का प्रयास किया है जो उनके लेखन और सोच की उत्कृष्टता को दर्शाता है .

मध्य प्रदेश के सतना में वी आई टी एस में पढ़ा रहे गौरव सुमन जी की रचनाएं सभी उम्दा लेखन का परिचायक हैं . मैं हूँ कहाँ , मेरी अभिलाषा,प्रेरणा , माँ तुमसे दूर रहकर मैंने कितना सीखा , बचपना , एक छात्र की व्यथा और लो वोल्टेज आदि कवितायेँ अपना प्रभाव छोडती हैं.

पेशे से इंजिनियर बबन पांडे जी की कवितायेँ मखमली आलिंगन में श्रृंगार रस की प्रधानता है तो दूसरी ओर वो इश्क का पता पूछ रहे हैं और देख रहे हैं कभी तो बियर बार में तो कभी खंडहरों में और ढूँढ रहे हैं सच्चे इश्क को जो ना घर में मिला ना बाहर . तो दूसरी तरफ व्यंग्य के माध्यम से  ईश्वर को बता रहे हैं कि व्यापारी बन जाता तो कितना हिट हो जाता . कहीं उनका कवि मन छात्रों द्वारा आत्महत्याओं से व्यथित है जिसे वो अपनी कविता दिल पे मत ले यार के माध्यम से पहुँचा रहे हैं . 
माँ की परिभाषा, कुछ नया सोचो , प्रकृति के रिश्ते आदि कवितायेँ उनके लेखन की विविधता को दर्शाते हैं.

श्रीमती महेश्वरी कनेरी जी से भी हमारे सभी ब्लोगर बंधु  परिचित हैं. इम्तिहान लेती है ज़िन्दगी , कुछ सांस बची है जीने की प्यार बेटी , मेरे सपनो का संसार आदि कवितायेँ दिल में गहरे उतरती हैं. और मन की दुविधा को "कौन हूँ मैं " कविता के माध्यम से अभिव्यक्त करती हैं जब उम्र के एक पड़ाव पर आकर महसूस होता है कि जीवन तो यूँ ही बीत गया कर्तव्यों को निभाते मगर जाना ही नहीं अपने बारे में तो दूसरी तरफ "पगडण्डी"  कविता में एक शोषित नारी की व्यथा को चित्रित किया है जो मन को विचलित करती हैं.

बहुराष्ट्रीय कंपनी में पेशे से अभियंता नीरज द्विवेदी जी की रचनायें एक अलग ही दृष्टिकोण कायम करती हैं . "क्यूँ लिख दूं मैं कविता" में रोजमर्रा के जीवन जीते इन्सान की मनोदशा का चित्रण है . कैसे कैसे सारा दिन किन हालातों से गुजरता इन्सान दिन के आखिर में क्या लिख सकता है और क्यूँ लिखे किसके लिए क्यूँकि सभी तो मृतप्राय हैं आज ज़िन्दा कौन है ? सिर्फ सांसें चलने से ही तो कोई ज़िन्दा नहीं होता ना .........."चाहत इनमे भी है" कविता में उन अनाथ छोटे बच्चों के मन को शब्दों में बांधा है जिनका कोई नहीं मगर उन्हें कोई साया नसीब नहीं होता वरना उनमे भी ना जाने कितने ऐसे अनमोल हीरे होते हैं जिन्हें यदि तराशा जाये तो देश का नाम उज्जवल कर सकते हैं.
जागो, फिर आँखों में पानी है , बोला सुभाष आदि कवितायेँ एक से बढ़कर एक हैं और उनके भावुक  ह्रदय में उठती देशप्रेम की लहर को रेखांकित करती हैं . 

लक्ष्मी नारायण  लहरे उर्फ़ साहिल युवा साहित्यकार , समीक्षक और पत्रकार हैं. मन में उपजे असंतोष और व्यथित ह्रदय की विकलता को समीक्षक की दृष्टि से और कवि के दृष्टि दोनों से ही बहुत खूबसूरती से कविताओं में पिरोया है. "आजकल" कविता में कैसे हर इन्सान सुबह से शाम तक जीता है उस भाव को  चित्रित किया है तो नारी की ज्वलंत व्यथा में नारी की व्यथा ही उकेरी है . साहित्य की बहस, मेरा अतीत, वो भोली गांवली आदि कविताओं में विभिन्न परिदृश्यों का समावेश किया है. "भावनाओं में बह गया था" कविता में एक मीठा  कटाक्ष है जो दिल को आंदोलित करता है . कैसे भूल पाऊँ , अब ऐसा क्या लिखूं में एक दर्द उभर कर आता है जिसमे इन्सान हालात के आगे कैसे मजबूर हो जाता है.

साधना वैद जी से तो हम सभी परिचित हैं. अपनी कविता "तुम्हें आना ही होगा" में प्रभु से गुहार लगा रही हैं कि देखो आज फिर अधर्म का साम्राज्य है , कितनी अबलाओं की लाज लुट रही है , गौ हत्याएं हो रहीं हैं.........अब और कितना अन्याय होना बाकी है हे मोहन अब तो आ जाओ और अपने वचन को सार्थक करो तो दूसरी तरफ "झील के किनारे" कविता में मन को वहीँ चलने को कह रही हैं जहाँ उसे देख सकें और ये तभी संभव है जहाँ  पानी साफ़ हो और ठहरा हुआ हो .............बेहद गहन भावों को कितनी खूबसूरती से पिरोया है कि मन में बस जाते हैं. "मेरे मौन को तुम मत कुरे"दो में कैसे नारी के भावों को पोषित किया है और सच कहा है कि मत कुरेदो क्यूँकि अगर मौन मुखर हुआ तो शायद तुम सह ना पाओ और उस विशाल प्रचंड आवेग में बह जाओ और कल रात ख्वाब में कविता में तो जैसे प्रेम को उसका मुकाम ही दिला दिया . प्रेम का दिव्य रूप दिखला दिया . सभी कवितायेँ बेहद खूबसूरत भावों का बेजोड़ संकलन हैं.

पेशे से इंजिनियर दिव्येंद्र कुमार रसिक जी की कवितायेँ दीवाना , तेरी उम्मीद , भंवरा खेल आदि सभी बहुत सुन्दर भाव संप्रेक्षण करती हैं. प्रेम पथिक कविता आगे बढ़ने को और हौसला ना हारने को प्रेरित करती है. "शुरुआत" कविता में एक नयी शुरुआत करने को कह रहे हैं जिसमे अभिनय ऐसा हो कि जीवंत हो जाये . ना कोई पुरानी याद हो ना दर्द हो ना लफ्ज़ ना कोई ज़िन्दगी की कडवाहट और अपने रिश्ते को एक नए रूप में फिर से जीवन में गढ़ें ताकि यूँ लगे जैसे बने ही एक दूजे के लिए हों.श्यामा, काव्य, विवशता आदि सभी कवितायेँ भिन्न भिन्न  भावों को प्रस्तुत करती हैं.

पेशे से पत्रकार विभोर गुप्ता ने सबसे पहले सरस्वती वन्दना की है और उसके बाद शहीदों को नमन किया है कविता के माध्यम से . उसके बाद उनकी कविता "नाबालिग और सिगरेट" सोचने को विवश करती है कि आज़ाद देश का नागरिक होने के हमने क्या -क्या मतलब निकाल लिए हैं बिना कोई दुष्परिणाम जाने एक बेहद गहन चिंतन की माँग रखती कविता दिल को छूती है. "अब भारत की बारी" एक व्यंग्यात्मक  कविता है जो सोये देश के नागरिकों को जगाने का प्रयास करती है तो दूसरी ओर "आत्महत्या का अधिकार" कविता मन को उद्वेलित करती है . आज का गरीब, किसान , या मजदूर कोई भी हो जो दो वक्त की रोटी ढंग से नहीं खा पाता , अपने परिवार का भरण पोषण नहीं कर पाता वो परिस्थितियों से विवश होकर कैसे आत्महत्या की ओर अग्रसित होता है उसके मन के भीषण हाहाकार को कवि ने ऐसे उंडेला है कि पाठक बाहर नहीं आ पाता .भूमि अधिग्रहण , जशन - ए- आज़ादी , राखी  की कीमत आदि कवितायेँ सभी सामाजिक  परिवेश से जुडी एक संवेदनशील मन को झकझोरने के लिएकाफी हैं.

ग्रामीण अंचल में सक्रिय पेशे से पत्रकार नीलकमल वैष्णव उर्फ़ अनिश ने अपनी पहली ही कविता में सबसे पहले हिंदी की महिमा का बखान कर उसे नमन किया है. उसके बाद इंतज़ार कविता में इंतज़ार शब्द को व्याख्यातित किया है कैसे इंतज़ार का पल -पल युगों के बराबर हो जाता है तो दूसरी ओर ऐसा देश है मेरा में जोरदार व्यंग्य किया है कि कैसा देश है मेरा जिसमे चोर, डाकू लुटेरे राज करते हैं और एक सीधा सच्चा इन्सान डर- डर कर जीता है , भ्रष्टाचार , बेईमानी का बोलबाला है . यादें , माँ की अहमियत, दूर तक, सह ना अन्याय , समाजमे सुधार क्रांति की नवजोत जलाएं आदि सभी कवितायेँ आज की सामाजिक स्थिति को चित्रित करती हैं . 


सुषमा आहुति जी हमारी जानी- मानी ब्लोगर हैं जिनसे सभी परिचित हैं . अपनी पहली ही कविता में वो कहती हैं यूँ तो मैंने सभी पर लिख दिया प्यार मोहब्बत , मिलाना -बिछड़ना  मगर फिर भी कुछ बचा है जिस पर अभी लिखा नहीं और वो क्या है जानने के लिए तो कविता पढनी ही पड़ेगी ना .मेरे साथ चलकर देखना कविता में प्रेम का अनुराग फूट रहा है मगर साथ ही सब कहने के बावजूद कहती हैं यूँ तो बहुत बातें कर लीं मगर अभी बाकी है और वो क्या बाकी है तो इसके लिए पढ़िए उनकी कविता .............सारी कवितायेँ मोहब्बत के कोमल अहसासों को पिरोये हुए हैं. समझ तुम भी ना पाए, शब्दों में पिरो दिया मैंने,तुमसे प्यार करना चाहती हूँ मैं आदि सभी कवितायेँ प्रेम के रस में सराबोर कर देंगी .

उदय वीर सिंह जी हमारे ब्लोगर किसी परिचय के मोहताज नहीं . हमारे गाँव भी एक सेडान आई है कविता बेजोड़ है कितनी सहजता से व्यवस्था पर कटाक्ष है कि मन भारी हो जाता है हालात देखकर . औचित्य , प्रवास , मूल्य, प्रेम प्रत्यंचा,,भूल गए तो पाठ   आदि कवितायेँ सोचने को विवश करती हैं तो दूसरी तरफ वो उन्हें नमन कर रहे हैं जो लौट कर नहीं आये.........सभी कवितायेँ एक उत्कृष्ट खज़ाना हैं.

हमारे अन्य ब्लोगर दोस्त प्रदीप कुमार साहनी जी कि कविता "मैं कौन" एक प्रश्न चिन्ह छोडती है तो साथ ही राह को उज्जवल भी बनाने के लिए कृत संकल्प दिखती है .माँ , कवि ह्रदय मेरा, अवतार --नन्ही सी देवी का , एक प्रश्न आदि सभी कवितायेँ बेहद उम्दा लेखन को दर्शाती हैं. "फूलों की तरह हंसो" कविता जीवन का संचार करतीहै . 

मनीष कुमार नीलू जी अपनी  कविता ज़िन्दगी एक पहेली को सुलझाने की कोशिश में लगे हैं जो जितना सुलझाओ उतनी उलझती है तड़पते रिश्ते , एक अलग अहसास, उन्हें ढूँढ रही आँखें ,अपना गाँव, अमावास की काली रात , अमन का राग आदि कवितायेँ उनके भावों का आईना हैं. मोहब्बत की शुरुआत कविता वाकई मोहब्बत की शुरुआत कैसे होती है उसका दर्शन कराती है .


और अब आखिर में सत्यम शिवम् की कवितायेँ हैं जिनके अथक प्रयासों ने सभी अनमोल कृतियों को एक माला में पिरोया है . पहली कविता "टूटते सितारों की उड़ान" शीर्षक से ही है और जो अपने नाम को सार्थक सिद्ध कर रही है . जो बता रही है कोई कमजोर नहीं बस एक बार आगे बढ़ने की सोच ले तो राहें खुद मचलने लगती हैं."कान्हा जब तेरी याद आती है" कविता में सत्यम के अध्यात्मिक मन के दर्शन होते हैं जहां गोपी भाव भी समाहित हो जाता है .तो दूसरी तरफ "मैं सांवला क्यों हूँ" में माँ से प्रश्न कर रहे हैं अब चाहे कान्हा हों या कोई और ये प्रश्न तो जायज है.
इसके अलावा साहसी है कौन, मैं वही हूँ आदि कवितायेँ उनके उत्कृष्ट लेखन को दर्शाती  हैं. 

दोस्तों ये मेरे निजी भाव हैं जो मैंने इस काव्य संग्रह को पढ़कर महसूस किये . अगर आप में से कोई भी इस काव्य संग्रह को पढना चाहता है तो सत्यम से कहकर मंगवा सकते हैं  इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं ..........9934405997 


शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

‘‘पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त इस तरह के माध्यमों पर क्या आंशिक और पूर्णतः प्रतिबन्ध आवश्यक है?’’ -




ई-बरिस्ता पर वंदना गुप्ता का आलेख = "सोशल साईट पर प्रतिबन्ध नहीं, उनकी उपयोगिता समझाने की आवश्यकता है"


ebaristaa.blogspot.com




इस बार का विषय है >> ‘‘पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त इस तरह के माध्यमों पर क्या आंशिक और पूर्णतः प्रतिबन्ध आवश्यक है?’’ और इस विषय पर पहला आलेख प्रस्तुत है प्रसिद्द ब्लॉगर वंदना गुप्ता जी का और इस आलेख का शीर्षक है "सोशल साईट पर प्रतिबन्ध नहीं उनकी उपयोगिता समझाने की आवश्यकता है"


इस लिंक को ओपन करके पढ़ सकते हैं 

http://ebaristaa.blogspot.com/2011/12/blog-post_16.html?showComment=1324010911646#क५०३६५८३६७९५५६६०७१२४


जो इस प्रकार है ............







आज वैचारिक क्रांति को सोशल साइट्स ने एक ऐसा मंच प्रदान किया है जिसने बौद्धिक जगत में एक तहलका मचा दिया है. कोई इन्सानकोई क्षेत्र इससे अछूता नहीं है. सूचना और संचार का एक ऐसा साधन बन गया है जिसमे कहीं कोई प्रतीक्षा नहीं मिनटों में समाचार सारी दुनिया में इस तरह फैलता है कि हर खास-ओ-आम इससे जुड़ना चाहता है.

फेसबुकट्विटर, ऑरकुट या ब्लॉग सभी ने अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है और अपना खास योगदान दिया है. आज जब इन सोशल साइट्स का दबदबा इतना बढ़ गया है तब हमारी सरकार इन पर प्रतिबन्ध लगाना चाहती है. ये तो इंसान के मौलिक अधिकारों का हनन है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबन्ध लगाना तो गलत है ये तो ऐसा हुआ जैसे स्वतंत्रता को हथकड़ी पहना कर कटघरे में खड़ा करना. आखिर क्योंये प्रश्न उठना जायज है. इस सन्दर्भ में हमें इसके पक्ष और विपक्ष के दोनों पहलू देखने होंगे तभी हम सही आकलन कर पाएंगे.

आज जागरूकता के क्षेत्र में इन साइट्स ने एक ऐसा स्थान हासिल किया है जिसे नकारा नहीं जा सकता. और इसका ताज़ा उदाहरण मिस्र हो या लीबिया या फिर हमारा देश भारत सब जगह क्रांति को परवान चढाने में इन साइट्स का खास योगदान रहा. सबने अपनी अपनी तरह से बदलाव लाने के लिए योगदान दिया. आज जैसे ही कोई भी नयी जानकारी हो या कोई राजनैतिक या सामाजिक हलचल उसके बारे में सबसे पहले यहाँ सूचना मिल जाती है. यहाँ तक कि कोई भी क्षेत्र हो चाहे सरकारी या गैर सरकारी सब इनसे जुड़े हैं इसका ताज़ा उदाहरण देखिये हमारी सरकार ने ही ट्रैफिक पुलिस द्वारा किये चालान हों या किसी ने कोई नियम भंग किया हो उसके बारे में ताज़ा अपडेट्स यहाँ डाले हैं ताकि कोई भी हो चाहे नेता,मंत्री या संत्री सबको एक समान आँका जाये और उनके खिलाफ उचित कार्यवाही की जा सके और इसका असर भी देखने को मिला. पुलिस ने भी अपनी साईट बनाई है जिस पर जब चाहे कोई भी अपनी शिकायत दर्ज करवा सकता है तो जब ये ऐसे उचित माध्यम हैं कि सबकी हर जरूरत को पूरा करते हैं तो फिर क्यों चाहती है सरकार कि इन पर प्रतिबन्ध लगे ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है.

इसके लिए हमें ये देखना होगा कि बेशक इन साइट्स ने लोकप्रियता हासिल कर ली है और खरी भी उतर रही हैं मगर जिस तरह सिक्के के हमेशा दो पहलू होते हैं उसी तरह यहाँ भी हैं. हर अच्छाई के साथ बुराई का चोली दामन का साथ होता है. ऐसे में यहाँ कई बार अश्लील सामग्री मिल जाती है जिससे ख़राब असर होता है या कई बार कुछ नेताओं के बारे में आपत्ति जनक तथ्य डाल दिए जाते हैं या उन्हें अपमानित कर दिया जाता है तो इससे सरकार घबरा गयी है क्योंकि उनके खिलाफ इसका प्रयोग इस तरह हो गया कि ऐसा तो उन्होंने सोचा भी नहीं था तो जब कोई और हल नहीं दिखा तो इन पर ही प्रतिबन्ध लगने का सोचने लगी. इसके अलावा एंटी सोशल एलिमंट्स सक्रिय हो जाते हैं जिससे सूचनाओं का गलत प्रयोग हो जाता है तब घबराहट बढ़ने लगती है मगर जब अंतरजाल के अथाह सागर में आप उतरे हैं तो छोटे- मोटे हिलोर तो आयेंगे ही और उनसे घबरा कर वापस मुड़ना एक तैराक के लिए तो संभव नहीं है वो तो हर हाल में उसे पार करना चाहेगा बस उसे अपना ध्यान अपने लक्ष्य की तरफ रखना होगा.

सरकार चाहती है अश्लीलता पर प्रतिबन्ध लगे ........ये बेशक सही बात है मगर क्या इतना करने से सब सही हो जायेगाअंतर्जाल की दुनिया तो इन सबसे भरी पड़ी है और कहाँ तक आप किस किस को बचायेंगे और कैसेसब काम ये साइट्स तो नहीं कर सकती ना. जिसने ऐसी साइट्स पर जाना होगा वो अंतर्जाल के माध्यम से जायेगा और जो कहना होगा वो कहेगा भी तो क्या फायदा सिर्फ इन साइट्स पर ही प्रतिबन्ध लगाने का. उचित है कि हम खुद में बदलाव लायें और समझें कि इन साइट्स की क्या उपयोगिता है और उन्हें सकारात्मक उद्देश्य से प्रयोग करें और अपने बच्चों और जानकारों को इनकी उपयोगिता के बारे में समझाएं ना कि इस तरह के प्रतिबन्ध लगायें क्यूँकि आने वाला वक्त इसी का है जहाँ ना जाने इससे आगे का कितना जहान बिखरा पड़ा है तो आखिर कब तक और कहाँ तक रोक लगायी जा सकेगी ........सामना तो करना ही पड़ेगा. वैसे भी इन साइट्स के संचालकों का कहना सही है यदि हमारे पास कोई सूचना आती है तो हम उस खाते को बंद कर देते हैं मगर पूरी तरह निगरानी करना तो संभव नहीं है. सोचिये जरा जब हम अपने २-३ बच्चों पर निगरानी नहीं रख पाते और उन्हें ऐसी साइट्स देखने से रोक नहीं पाते तो कैसे संभव है कि इस महासागर में कौन क्या लिख रहा है या क्या लगा रहा है कैसे पता लगाना संभव है?

आपसी समझ और सही दिशाबोध करके ही हम एक स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकते हैं. मगर आंशिक या पूर्ण प्रतिबन्ध लगाना किसी भी तरह उचित नहीं है क्यूँकि आने वाला कल इन्ही उपयोगिताओं का है जिनसे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता. बदलाव को स्वीकारना ही होगा मगर एक स्वस्थ सोच के साथ. आत्म-नियंत्रण और स्वस्थ मानसिकता ही एक स्वस्थ और उज्ज्वल समाज को बनाने में सहायक हो सकती है ना की आंशिक या पूर्ण प्रतिबन्ध.


सोमवार, 12 दिसंबर 2011

कुछ चिताएं उम्रभर जलकर भी नहीं बुझतीं



दर्द ऐसे भी कभी छीजता है
ना टपकता है 
ना निकलता है
ना ठहरता है
बस अलाव सा सुलगता है

देखो उम्र की चिता सुलग रही है
और धुंआ भी दमघोटू बन गया है

याद रखना ………बुझी राख भी जला देती है
ठंडे शोले ही छाले बना देते हैं 
फिर चाहे हाथ पर पड़ें या रूह पर 
कभी देखा है जीवित चिता का मृत्यु पूर्व सुलगता तांडव
देख लो आज जी भर के
कुछ चिताएं उम्रभर जलकर भी नहीं बुझतीं 

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

मगर ओ पुरुष ! तू नहीं अब बच पायेगा



दोस्तों इस रचना का जन्म मायामृग जी की फेसबुक  पर लिखी चंद पंक्तियों के कारण हुआ जो इस प्रकार थीं ...........
........
उसने कहा, स्‍त्री ! तुम्‍हारी आंखों में मदिरा है...तुम मुस्‍कुरा दीं। 

उसने कहा, स्‍त्री ! तुम्‍हारे चलने में नागिन का बोध होता है...तुम्‍हें नाज़ 

हुआ खुद पर....। 

अब वह कहता है तुम एक नशीली आदत और ज़हरीली नागिन के सिवा 

कुछ नहीं....। 

(ओह..इसका यह भी तो अर्थ होता है)

.....तुम्‍हें पहले सोचना था स्‍त्री...उसकी तारीफ पर सहमति देने से 

पहले....


ये थे उनके शब्द और अब ये हैं मेरे उदगार ............







क्या हुआ जो गर दे दी सहमति
क्या हुआ जो गर दे दिया उसके पौरुष को सम्बल
जानती हूँ …………उसके जुल्म की इंतेहा 
और अपने दीर्घ फ़ैले व्यास
कहाँ जायेगा और कब तक भोग पायेगा
कब तक मोहपाश से बच पायेगा
जहाज का पंछी है 
लौट्कर वापिस जरूर आयेगा
तब ना उसका दंभ ठहर पायेगा
ना उसका पौरुष कहीं आयाम पायेगा
तब ना नागिन कह पायेगा 
ना मदिरापान कर पायेगा
उस दिन उसे नारीशक्ति की अहमियत का
स्वयं पता चल जायेगा
तब वो ना हँस पायेगा
ना रो पायेगा
गर है आदत नशीली तो क्या हुआ
गर है नागिन ज़हरीली तो क्या हुआ
बचकर ओ पुरुष ! तू किधर जाएगा
जो भी तूने बनाया ........बन गयी
अब बता खुद से नज़र कैसे चुराएगा
क्या नारी जैसा धैर्य और साहस 
फिर कहीं पायेगा
जो खुद से खुद को छलवाती है 
तेरे हर छल को जानते हुए 
तेरी झूठी तारीफों के पुलों की
तेरे हर सब्जबाग की 
नस - नस पहचानती है 
ये सब जानते हुए भी 
जो खुद बन जाये तेरी चाहतों की तस्वीर
और फिर इतना करने पर भी 
 ना तू कहीं चैन पाए
उसका मुस्कुराता खिलखिलाता चेहरा देख
तेरा पौरुष आहत हो जाए
आखिर कब तक बेड़ियाँ पहनायेगा
देखना एक दिन इस मकडजाल में
तू खुद ही फँस जाएगा
अपने चक्रव्यूह में तू खुद को ही घिरा पायेगा 
मगर ओ पुरुष ! तू नहीं अब बच पायेगा 

रविवार, 4 दिसंबर 2011

यूँ भी हर किसी के ख्वाबगाह युगों तक सुलगते नहीं रहते


एक ख्वाबगाह से हकीकत तक का सफ़र
फिर किसी ख्वाबगाह के 
मोड पर आकर रुक गया 
ज्यों लम्हा गिरा किसी तबस्सुम पर 
और लफ़्ज़ कोई लरज़ गया 
ये आने जाने के सफ़र मे 
युग देखो बदल गया
क्या आज भी तुम्हारे सिरहाने पर 
धूप दस्तक देती है
क्या आज भी ओस की पहली बूँद 
तुम्हारे रुखसार पर गिरती है
क्या आज भी दिनकर 
तुम्हारे दीदार के बाद ही सफ़र शुरु करता है
देखो ना …………
मै तो कैद हूँ तुम्हारी ख्वाबगाह मे
बताना तो तुम्हे ही पडेगा ………
बदलते मौसम के मिज़ाज़ को
अरे रे रे ..........ये क्या 
तुम तो अभी तक मोड़ मुड़े ही नहीं 
तो क्या युग परिवर्तन के साथ
तुम्हारे असीम निस्सीम प्रेम की 
धारा ने भी प्रवाह बदला है 
या प्रेम का बुलबुला उसी मोड़ पर 
लम्हे के हाथों कैद हुआ खड़ा है 
देखा कैद करने का हश्र ..........
ना सिर्फ कैदी बल्कि करने वाला भी 
स्वयं कैद हो जाता है निगेहबानी करते करते 
बताओ अब ............
क्या कभी जी पाए एक भी लम्हा मेरे बिन 
जब तुम्हारी ख्वाबगाह का आतिथ्य 
मैंने स्वीकार कर ही लिया था
तो फिर क्या जरूरत थी तुम्हें रुकने की
मोड़ से ना मुड़ने की
क्या जरूरत थी लम्हों को कैद करने की
यहाँ तो देखो वक्त ने सीढियां चढ़ी ही नहीं
और तुमने भी वक्त के केशों को उलझा दिया
ना खुद की कोई सुबह हुई
ना मेरी कोई शाम हुई
ये ख्वाबगाह  के सफ़र से 
ख्वाबगाह के मोड़ तक ही
उम्र तमाम हुई .............
भूले बिसरे लम्हे आज भी
आसमाँ के आँचल में बिखरे पड़े हैं
हिम्मत हो तो कभी
कोई तारा तोड़ कर देखना ..............
शायद किसी रूह को पनाह मिल जाए 
और उसकी मोहब्बत 
लम्हों की कैद से आज़ाद हो जाये ...............
यूँ भी हर किसी के ख्वाबगाह युगों तक सुलगते नहीं रहते