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रविवार, 29 जनवरी 2012

परिपाटियों को बदलने के लिए छलनी का होना भी जरूरी होता है ना ............


आखिर कब तक सब पर दोषारोपण करूँ
तालाब की हर मछली तो ख़राब नहीं ना
फिर भी हर पल हर जगह 
जब भी मौका मिला
मैंने तुम्हारी पूरी जाति को 
कटघरे में खड़ा किया
जबकि जानती हूँ और मानती भी हूँ
पाँचों उँगलियाँ एक सी नहीं होतीं
मगर शायद बचपन से 
यही मेरे संस्कारों में रोपा गया
एक डर के साथ 
मेरे आत्मविश्वास को छला गया
मुझे निरीह प्राणी समझा गया
और मुझे अपने अस्तित्व की पहचान से
वंचित रखा गया
ये पीढ़ी दर पीढ़ी रोपित 
एक छलावा ही शायद 
हमेशा तुम्हारी पूरी जाति से 
नफरत करता रहा
हर तरफ सिर्फ और सिर्फ
अंधियारों में फैले स्याह साए ही 
मेरे डर को पुख्ता करते रहे
जबकि ऐसा हर जगह तो नहीं था ना
नहीं तो शायद ये संसार 
ढोर डंगर से ज्यादा कुछ ना होता
पशुओं सा जीवन जी रहे होते सभी
जिसमे कोई रिश्ता नहीं होता
कोई मर्यादा नहीं होती
मगर ऐसा भी तो नहीं है ना
आज अवलोकन करने बैठी 
तो लगा ये भी तो एक अन्याय ही है ना
क्योंकि जिसे हम हमेशा नकारते आये
जिसको हिकारत से देखते रहे
उसने ही तो पहल की ना हमारे उत्थान की
वो ही लड़ा सारे जहान से हमारे लिए
माना गिने चुने वजूदों ने ही 
धरा का दामन अपवित्र किया 
मगर उससे लड़ने का हमने भी तो 
ना दुस्साहस किया
बल्कि उसके कृत्य से डर
अपने को अपनी शिराओं में 
और समेट लिया
और शायद इसी संकुचन ने
हमें परावलम्बी बनाया 
फिर उस दोज़ख से भी तो 
तुम्ही ने बाहर निकालने की कवायद की
मेरे हौसलों को परवाज़ दी
एक नया आसमान दिखाया उड़ने के लिए
फिर कैसे सिर्फ तुम्हें ही 
दोषी मान सजा दूं
कुछ वीभत्स मानसिकता वाले वजूदों के लिए
संपूर्ण जाति तो दोषी नहीं हो सकती ना
फिर कैसे हर कुकृत्य के लिए 
सिर्फ तुम पर ही दोषारोपण करूँ ........ओ पुरुष !
कंकड़ पत्थरों को अलग करने के लिए
परिपाटियों को बदलने के लिए छलनी का होना भी जरूरी होता है ना ............

बुधवार, 25 जनवरी 2012

अनायास ही उमड़ आतीं हैं क्यूँ - कुछ स्मृतियाँ



दोस्तों 



कल प्रतुल मिश्र जी ने दो पंक्ति दीं और उस पर कुछ लिखने को 


कहा तो उस वक्त जो भाव उमडे आपके समक्ष रख रही हूँ 




ये थे उनके शब्द : 




"Pratul Misra Vandana Gupta ji ...............अनायास ही उमड़ 


आतीं हैं क्यूँ - कुछ स्मृतियाँ..

इस पर आपकी अभिव्यक्तियाँ का हम इन्तजार करेंगे यदि संभव हो सके



 तो....................."


और ये रहे मेरे भाव :…………







अनायास ही उमड़ 


आतीं हैं क्यूँ - कुछ स्मृतियाँ

बिना कारण तो 

कुछ नहीं होता

जरूर किसी ने दखल दिया होगा

तभी स्मृति की लौ जगमगाई होगी

वरना राखों के ढेर में सीप नहीं पला करते



अनायास ही उमड़ 

आती हैं क्यूँ -कुछ स्मृतियाँ

शायद आहटों ने दस्तक दी होगी

या सन्नाटा खुद से घबरा गया होगा

वरना बिखरे अस्तित्व यूँ ही नहीं जुदा करते




अनायास ही  उमड़

आती हैं क्यूँ -कुछ स्मृतियाँ 

ओह! शायद उसी युग की 

कोई भूली बिसरी याद बाकी है

जिसमे तुमने वादा लिया था 

इंतज़ार की चौखट पर खड़े- खड़े 

और आज वादा पूरा करने का 

मुझे मुझसे चुराने का 

सिर्फ तुम्हारी हो जाने का 

वक्त आ गया है ........है ना 

मुसाफिर ! जो वक्त चला जाता है

वो कब लौट कर आया है

कल का सच तुम थे

आज का सच मैं हूँ

हाँ .........मैं किसी की विवाहिता 

बताओ कैसे तुम्हारे इंतज़ार पर

पूर्णता की मोहर लगा दूं 

स्मृतियों पर मैंने ताले लगाये थे

लगता है जमींदोज़ करनी होंगी 

स्वप्न और हकीकत में बस 

यही फर्क होता है 

कल आज नहीं हो सकता

और आज कल नहीं बन सकता

ये अब तुम्हें भी समझना होगा

और यूँ  मेरी स्मृतियों में आकर ना दस्तक  देना होगा 



ज़िन्दगी ना भूतकाल में होती है ना भविष्य में

वर्तमान में जीना अब तुम्हें  भी सीख लेना चाहिए 


एक इम्तिहान ये भी देकर देख लेना .........मुसाफिर !

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

अपनी उम्र को तो शायद तूने तिजोरी में बंद कर रखा है ...........






ये कैसा चलन आया ज़माने का
सुनता है घुटती हुई चीखें 
फिर भी सांस लेता है
दो शब्द अपनेपन के कहकर
कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है 
काश ! उसने भी ऐसा किया होता
तेरी पहली ही चीख को 
ना सुना होता
बल्कि अनसुना कर दबा दिया होता
फिर कैसे तेरा वजूद आज
सांस ले रहा होता
मगर इक उसने ही 
वो दिल पाया है
जिसमे सिर्फ प्यार ही प्यार
समाया है
जिसने ना कभी 
अपनी ममता का 
मोल लगाया है
सिर्फ तुझे हंसाने की खातिर
अपना लहू बहाया है
अपनी साँस देकर
तेरा जीवन महकाया है
जन्म मृत्यु के द्वार तक जाकर
तुझको जीवनदान दिया है
ये तू भूल सकता है 
बेटा है ना ............
मगर वो माँ है ............
पारदर्शी शीशों के पीछे 
सिसकती ममता 
सिर्फ आशीर्वाद रुपी 
अमृत ही बरसाती है 
जिसे देखकर भी तू
अनदेखा किया करता है 
जिसे जानकर भी तू 
अन्जान बना करता है
सिर्फ उसके बारे में
दो शब्द बोलकर 
अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़ सकता है 
ऐसा तो बेटा सिर्फ 
तू ही कर सकता है ............
क्योंकि 
अपनी उम्र को तो शायद तूने तिजोरी में बंद कर रखा है ...........

सोमवार, 16 जनवरी 2012

शायद तभी पक्के सौदे घाटे के नही होते……


उम्र की दराज खोलकर जो देखी
उम्र ही वहाँ जमींदोज़ मिली
सिर्फ़ एक लम्हा था रुका हुआ
जिसके सीने मे था कैद
ज़िन्दगी का वो सफ़ा 
जहाँ मोहब्बत ने मोहब्बत को 
जीया था कुछ लम्हा
उसके बाद ना उसके पहले
उम्र का ना कोई निशाँ मिला
ये हुआ सौदा उम्र का मोहब्बत से
जिसमे उम्र रुकी भी तो
सिर्फ़ मोहब्बत की दहलीज तक
शायद तभी पक्के सौदे घाटे के नही होते……

शनिवार, 14 जनवरी 2012

हँसता गाता मेरा बचपन






निश्छल मधुर सरस बचपन
अब कहाँ से तुझे पाऊँ मैं बचपन
ढूँढ रहा था कब से तुझको
भटक रहा था पाने को कबसे
बेफिक्री के तार कोई फिर से जोड़े
खाएं खेलें हम और सब कुछ भूलें
चिंताओं का अम्बार ना जहाँ हो
भूली बिसरी याद ना जहाँ हो
मस्ती का सारा आलम हो
गर्मी सर्दी की परवाह नहीं हो
बीमारी में भी जोश ना कम हो
बचपन की वो हुल्लड़ बाजी मचाऊँ 
कभी कुछ तोडूं कभी छुप जाऊँ
पर किसी के हाथ ना आऊँ 
कैसे वो ही बचपन लौटा लाऊँ
उम्र भर जुगत भिड़ाता रहा
आज वो बचपन मुझे 
वापस मिल गया 
पचपन में इक आस जगी है
मेरे मन की प्यास  बुझी है 
हँसता गाता बचपन लौट आया है
नाती पोतों की हँसी में खिलखिलाया है 
शैतानियाँ सारी लौट आई हैं
नाती पोतों संग टोली बनाई है
हर फिक्र चिंता फूंक से उड़ाई है 
हर पल पर फिर से जैसे 
निश्छल मुस्कान उभर आई है 
तोतली बातें मन को भायी हैं
अपने पराये की मिटी सीमाएं हैं 
भाव भंगिमाएं भा रही हैं
खेल चाहे बदल गए हैं
कंचे ,गुल्ली डंडे की जगह
कंप्यूटर, क्रिकेट ने ले लिए हैं
पर इनमे भी आनंद समाया है
जो मेरे मन को भाया है 
लडाई झगडे वैसे ही हम करते हैं
जैसे बचपन में करते थे
कभी कट्टी तो कभी अब्बा करते हैं
बचपन के वो ही मधुर रंग सब मिलते हैं 
जो मेरी सोच में पलते हैं 
तभी तो बचपन को दोबारा जीता हूँ
देख देख उसे हर्षित होता हूँ
जब मैं खुद बच्चा बन जाता हूँ
तब बचपन को फिर से पा जाता हूँ 
हाँ मैंने तुझको पा लिया है
बचपन को फिर से जी लिया है
लौट आया वो मेरा बचपन
प्यारा प्यारा मनमोहक बचपन 
निश्छल मधुर सरस बचपन
हँसता गाता मेरा बचपन 

सोमवार, 9 जनवरी 2012

शायद इसीलिये किसी भी क्षितिज़ पर समानान्तर रेखायें नही मिलतीं



ये कौन सी वक्त ने साज़िश की
देखो साजन
तुम्हारी सजनी
ना तुम्हारी रही
कभी नख से शिख तक
श्रृंगार मे
तुम्हारा ही अक्स
प्रतिबिम्बित होता था
तुम्हारे लिये ही
सजती संवरती थी
हर सांस
हर आहट
हर धडकन
सब तुम्हारे लिये ही
महकते थे
हर पल के
चाहे कितने ही
टुकडे करो
उनमे भी
तुम ही समाये थे
ये प्रीत के
सोपान गढे थे
मगर ना जाने
कैसी साज़िश हुई
वक्त की
सारे राज़ खुलते गये
जिसे समझा था
सीने की धडकन
वो ही धड्कने छीन ले गया
तुम तो कभी
साजन बने ही नही
एक फ़ासले से
साथ चलते रहे
शायद तभी
देहांगन और ह्रदयांगन
एक हुये ही नही
और देखो आज भी
साजन तुम्हारी सजनी ने
मन से , तन से
तुम्हारा त्याग कर दिया
और शायद
तुमने भी उसका
सिर्फ़ ज़रूरतों की जरुरतों ने ही
दोनो को बांधा हुआ है
क्योंकि चाहतें
पूर्ण समर्पण चाहती हैं
और वो भी दोतरफ़ा
एक तरफ़ा प्रेम और समर्पण तो
सिर्फ़ दिव्य होता है
इंसानी चाहतो मे
दोतरफ़ा प्रेम की चाहत
ही ज़िन्दगी को
अर्थ देती है
शायद इसीलिये
किसी भी क्षितिज़ पर
समानान्तर रेखायें नही मिलतीं

शनिवार, 7 जनवरी 2012

मेरे सफ़र पर ज़रा चलिये मेरे साथ


बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह मे मेरी कवितायें भी 

सम्मिलित हैं::::





बोधि प्रकाशन का प्रतीक्षित स्‍त्री विषयक काव्‍य संग्रह तैयार होकर आ 

गया है। एक झलक यहां प्रस्‍तुत है। संग्रह का शीर्षक है "स्‍त्री होकर 

सवाल करती है....!" संपादन किया है डॉ. लक्ष्‍मी शर्मा ने, आवरण 

छायाचित्र श्री अभिषेक गोस्‍वामी का है। 


"स्‍त्री होकर सवाल करती है....!"/फेसबुक पर मौजूद 127 रचनाकारों की 

स्‍त्री विषयक कविताओं का संग्रह/संपादक डॉ लक्ष्‍मी शर्मा/पेपरबैक/

संस्‍करण जनवरी 2012/पृष्‍ठ 384/मूल्‍य 100 रुपये मात्र (डाक से 

मंगाने पर पैकेजिंग एवं रजिस्‍टर्ड बुकपोस्‍ट के 50 रुपये अतिरिक्‍त)/

बोधि प्रकाशन, एफ 77, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, 

जयपुर 302006 राजस्‍थान। 



संपर्क दूरभाष : 099503 30101, 08290034632 (अशोक)
 




गुरुवार, 5 जनवरी 2012

विकलांगता तन की नहीं मन की होती है



विकलांगता तन की नहीं मन की होती है
यूँ ही नहीं हौसलों में परवाज़ होती है
घुट्टी में घोट कर पिलाया नहीं था माँ ने दूध
उसने तो हर बूँद में पिलाई थी हौसलों की गूँज
ये उड़ान नहीं किसी दर्द की पहचान है
ये तो आज हमारी बैसाखियों की पहचान है
बैसाखियाँ तन को बेशक देती हों सहारा
मन ने तो नहीं कभी हिम्मत को हारा
बेशक छूट जाएँ राह में बैसाखियाँ
बेशक टूट जाए कोई भी सुहाना स्वप्न
पर ना छूटेगा कभी ये मन में बैठा 
हौसलों  का लहराता परचम 
हमने यूँ ही नहीं पाई है ये सफलता
ठोकरों ने ही दी है हमें ये सफलता 
अब कोशिश में हैं आसमान छूने की
गर कर सकते हो तो इतना करो
मत राह की हमारी रुकावट बनो
मत अपंगता का अहसास कराओ
एक बार हम पर भी अपना विश्वास दिखाओ
फिर देखोगे तुम आसमाँ में 
चमकते सितारों में बढ़ते सितारे
एक नाम हमारा भी बुलंद होगा
चाँद की रौशनी में दमकता 
सितारों का एक नया घर होगा 

सोमवार, 2 जनवरी 2012

बता सकते हो………

आज भी
मोहब्बत को
दुल्हन बनाते हो क्या?
आज भी
चाहत की
माँग सज़ाते हो क्या ?
नेह के सिंदूरी रंग से
मेरी तस्वीर सजाते हो क्या?
नज़र ना लग जाये
इस डर से आज भी
नज़र का टीका
अपने अधरों से लगाते हो क्या?
ख्वाब काँच से
नाज़ुक होते हैं
और ख्वाब से भी
नाज़ुक हो तुम
इन अल्फ़ाज़ों को
आज भी दोहराते हो क्या?
गर दोहराते हो
तो सच सच बताना
जवाब जरूर देना
क्यों छोडा फिर
तुमने मुझे?
क्यों तन्हाई को मेरा
अक्स सौंपा
क्यों मेरे वज़ूद को
टुकडेटुकडे किया
बता सकते हो
वो सच था
या
ये सच है?