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गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

बुद्ध .........कौन ? ........एक दृष्टिकोण


बुद्ध .........कौन ? ........एक दृष्टिकोण 



बुद्ध .........कौन ? 
सिर्फ एक व्यक्तित्व या उससे भी इतर कुछ और ? एक प्रश्न जिसके ना जाने कितने उत्तर सबने दिए. यूँ तो सिद्धार्थ नाम जग ने भी दिया और जिसे उन्होंने सार्थक भी किया ..........सिद्ध कर दे जो अपने होने के अर्थ को बस वो ही तो है सिद्धार्थ ..........और स्वयं को सिद्ध करना और वो भी अपने ही आईने में सबसे मुश्किल कार्य होता है मगर मुश्किल डगर पर चलने वाले ही मंजिलों को पाते हैं  और उन्होंने वो ही किया मगर इन दोनों रूपों में एकरूपता होते हुए भी भिन्नता समा ही गयी जब सिद्धार्थ खुद को सिद्ध करने को अर्धरात्रि में बिना किसी को कुछ कहे एक खोज पर चल दिए . अपनी खोज को पूर्णविराम भी दिया मगर क्या सिर्फ इतने में ही जीवन उनका सार्थक हुआ ये प्रश्न लाजिमी है . यूँ तो दुनिया को एक मार्ग दिया और स्वयं को भी पा लिया मगर उसके लिए किसी आग को मिटटी के हवाले किया , किसी की बलि देकर खुद को पूर्ण किया जिससे ना उनका अस्तित्व कभी पूर्ण हुआ .......हाँ पूर्ण होकर भी कहीं ना कहीं एक अपूर्णता तो रही जो ना ज़माने को दिखी मगर बुद्ध बने तो जान गए उस अपूर्णता को भी और नतमस्तक हुए उसके आगे क्यूँकि बिना उस बेनामी अस्तित्व के उनका अस्तित्व नाम नहीं पाता , बिना उसके त्याग के वो स्वयं को सिद्ध ना कर पाते ...........इस पूर्णता में , इस बुद्धत्व में कहीं ना कहीं एक ऐसे बीज का अस्तित्व है जो कभी पका ही नहीं , जिसमे अंकुर फूटा ही नहीं मगर फिर भी उसमे फल फूल लग ही गए सिर्फ और सिर्फ अपने कर्त्तव्य पथ  पर चलने के कारण , अपने धर्म का पालन करने के कारण ........नाम अमर हो गया उसका भी ...........हाँ .......उसी का जिसे अर्धांगिनी कहा जाता है ..........आधा अंग जब मिला पूर्ण से तब हुआ संपूर्ण ..........वो ही थी वास्तव में उनके पूर्णत्व की पहचान ............एक दृष्टिकोण ये भी है इस पूर्णता का , इस बुद्धत्व का जिसे हमेशा अनदेखा किया गया .






पूर्णत्व की पहचान हो तुम 




यधोधरा
तुम सोचोगी
क्यो नही तुम्हे 
बता कर गया
क्यो नही तुम्हे 
अपने निर्णय से 
अवगत कराया
शायद तुम ना 
मुझे रोकतीं तब
अश्रुओं की दुहाई भी
ना देतीं तब
जानता हूँ
बहुत सहनशीलता है तुममे
मगर शायद 
मुझमे ही 
वो साहस ना था
शायद मै ही
कहीं कमजोर पडा था
शायद मै ही तुम्हारे
दृढ निश्चय के आगे
टिक नही पाता
तुम्हारी आँखो मे
देख नही पाता 
वो सच 
कि देखो 
स्त्री हूँ
सहधर्मिणी हूँ
मगर पथबाधा नही
और उस दम्भ से 
आलोकित तुम्हारी मुखाकृति
मेरा पथ प्रशस्त तो करती
मगर कहीं दिल मे  वो 
शूल सी चुभती रहती
क्योंकि 
अगर मै तुम्हारी जगह होता
तो शायद ऐसा ना कर पाता
यशोधरा 
तुम्हे मै जाने से रोक लेता
मगर तुम्हारा सा साहस ना कहीं पाता
धन्य हो तुम देवी
जो तुमने ऐसे अप्रतिम 
साहस का परिचय दिया
और मुझमे बुद्धत्व जगा दिया
मेरी जीवत्व से बुद्धत्व तक की राह में 
तुम्हारा बलिदान अतुलनीय है 
गर तुम मुझे खोजते पीछे आ गयीं होतीं
तो यूँ ना जन कल्याण होता 
ना ही धर्म उत्थान होता 
हे देवी !मेरे बुद्धत्व की राह का
तुम वो लौह स्तम्भ हो 
जिस पर जीवों का कल्याण हुआ 
और मुझसे पहले पूर्णत्व तो तुमने पा लिया 
क्योंकि बुद्ध होने से पहले पूर्ण होना जरूरी होता है
और तुम्हारे बुद्धत्व में पूर्णत्व को पाता सच 
या पूर्णत्व में समाहित तेजोमय ओजस्वी बुद्धत्व
तुम्हारी मुखाकृति पर झलकता 
सौम्य शांत तेजपूर्ण ओज ही तुम्हारी 
वो पहचान है जिसे गर मैं
तुम्हारी जगह होता 
तो कभी ना पा सकता था 
हाँ यशोधरा ! नमन है तुम्हें देवी 
धैर्य और संयम की बेमिसाल मिसाल हो तुम 
स्त्री पुरुष के फर्क की पहचान हो तुम 
वास्तव में तो मेरे बुद्धत्व का ओजपूर्ण गौरव हो तुम 
नारी शक्ति का प्रतिमान हो तुम 
बुद्ध की असली पहचान हो तुम ........सिर्फ तुम 

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

बस नववधू द्वार से ही वापस मुड जाती है




अभी रात गयी नहीं है
अभी सुबह हुई नहीं है
बस दोनों के 
आगमन और निर्गमन 
के मध्य का वो 
अद्भुत दृश्य 
शीतल पुरवाई 
शांत सुरम्य मनमोहक वातावरण
प्रकृति अपना घूंघट घोलने से पहले
ज्यों सकुचाई सी पल्लू की ओट से 
निरीक्षण कर रही हो दिवस का 
ठिठकी खडी हो ज्यों 
कोई परदेसी कुछ देर रुका हो 
किसी अनजानी राह पर 
प्रभात ध्वनियाँ गुंजारित हो रही हों
कहीं से अजान तो कहीं गुरुग्रंथ जी का पाठ 
तो कहीं मंदिर में बजती घंटियाँ
तो कहीं आरती के स्वर 
हर आते जाते के मुख से 
जय सिया राम की ध्वनि का निकलना
भक्तिमय सुरम्य वातावरण 
और भोर का तारा भी 
यूँ झिलमिलाता हो 
ज्यों आतिशबाजी कहीं चलती हो 
कहीं मुर्गे की बांग 
तो कही चिड़ियों का कलरव
तो कहीं झुण्ड में उड़ते पंछियों का 
आसमाँ के सीने पर पंख फ़डफ़डाना
ज्यों बच्चा कोई पिता के सीने पर 
किलकारियां भरता हो 
मंद मंद बहती शीतल स्वच्छ समीर
साँसों के साथ जैसे 
पूनम की चाँदनी मन में उतरती हो 
सारी कायनात यूँ न्योछावर होती है 
ज्यों नववधू का स्वागत करती हो 
आहा ! सुदूर में खिलती लालिमा 
ज्यों नववधू की मांग का सिन्दूर झिलमिलाता हो 
दिनकर भी नववधू के माथे की बिंदिया सा टिमटिमाता हो 
एक आल्हादित करने वाला रोमांचक 
भोर का वो सुरम्य मनमोहक संगीत 
ओ मनुज ! अब कहाँ से पाऊँ मैं ?
जो आत्मा में आज भी 
सात सुरों की सरगम बन 
दिव्य राग सुनाता हो 
मन मयूर जहाँ नाच जाता हो 
ऊंची अट्टालिकाओं, ह्रदयहीन मानव 
मशीनी ज़िन्दगी के बीच 
सिमटती ज़िन्दगी के चौराहे पर
मेरी रूह कुचली मसली पड़ी है 
उस दृश्य के लिए मचलती है ........
जो आज भी मेरे गाँव में बिखरा मिलता है
ये कैसा शहरीकरण का प्रकोप मुझे दिखता है 
जिसमे ना कहीं कोई स्पंदन दिखता है
जहाँ भोर भी आने से डरती है 
जहाँ ना कोई उसके स्वागत को उत्सुक दिखता है
बस नववधू द्वार से ही वापस मुड जाती है 
पर घूंघट उठाने की हिम्मत ना करती है 
बस प्रकृति यही सवाल करती है
आह ! कब मैं पुनः अपना स्वरुप वापस पाऊंगी 
हर आँगन में नृत्य करती देखी जाऊंगी 
बता सकते हो ......ओ मनुज !
इस अंधे गहरे कुएं में मेरी वापसी का भी कोई द्वार बनाया है क्या ??????

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

"मेरे बाद " ………एक शुरुआत





पेशे से युवा इंजिनियर सत्यम शिवम् अब ब्लॉग जगत में किसी परिचय के मोहताज नहीं . अपने लेखन और कार्यशैली से उन्होंने हर दिल में जगह बनाई है . सत्यम की रचनायें सीधे दिल को छूती हैं क्योंकि उनमे मानवीय संवेदनाएं रची बसी होती हैं आम इन्सान का दर्द होता है तो कहीं भक्ति का पथ जो सीधे प्रभु से नाता जोड़ता है .

हाल में प्रकाशित सत्यम का खुद का पहला काव्य संग्रह  "मेरे बाद "  उनकी उत्कृष्ट सोच का परिचायक है . उम्र और तजुर्बे में कम होते हुए भी इतनी गहनता और विविधता का होना ही उन्हें सबसे अलग करता है जो उनके लेखन में झलकता है .

इस काव्य संग्रह में प्रकाशित उनकी कवितायेँ बहुत धीरे से मगर अन्दर गहरे तक प्रवेश कर जाती हैं जो उनके विलक्षण व्यक्तित्व को दर्शाती हैं और ये बताती हैं कि जरूर इस पर माँ सरस्वती की असीम कृपा है वरना धर्म के गूढ़ रहस्य वो भी इतनी कम उम्र में उकेरना हर किसी के बस की बात नहीं होती जिसका अवलोकन उनकी इस कविता से किया जा सकता है 

हे देव 

ये जानती हूँ देव ! तुम मेरे नहीं हो 
तुम तो उस राधा के हो ना 
जिसके साथ तुम अक्सर रासलीला किया करते हो

जब तुम उस मीरा के नहीं हो सकते
जो तुम्हारी खातिर विष भी पी लेटी है
तो भला मेरे कैसे हो सकते हो 

मैं जानती हूँ तुम बाल कौतुहल करते करते
यमुना में भी चले आते हो 
कभी आओ ना मेरी इस यमुना में मेरे माधव

कोई नहीं है इस यमुना के किनाय्रे वंशी बजने वाला
हे वंशीधर समा जाओ ना मेरी नज़रों में

की हर ओर बस तुम ही दिखो , तुम ही .............

कितनी कातर पुकार है  साथ ही कितना अद्भुत प्रेम का विस्तार है और ये यूँ ही संभव नहीं होता जब तक कोई अलौकिक कृपा ना बरसे किसी का वरद हस्त ना हो सिर पर ............और उनकी ज्यादातर रचनाएं जीवन और उसके बाद की परिस्थितयों का आईना हैं .

"आखिरी पल का अकेला
गीत तुमको ढूँढता है
रुक ना जाए श्वांस वेला
मीत तुमको ढूँढता है 

एक बेहद गहनता लिए शाश्वत सत्य को दर्शाती रचना है . आखिरी पल में जीवन के प्रति मोह का त्याग और पिय से मिलन की आतुरता को बहुत खूबसूरती से संजोया है तो दूसरी तरफ "तुझको पा लिया " कविता में प्रभु प्रेम और उनसे मिलन का अद्भुत संगम है जो यूँ ही प्रस्फुटित नहीं हो सकता जब तक कोई इस आनंद सागर में डुबकी ना लगा ले जिसकी बानगी देखिये तो उनके ही लफ़्ज़ों में 

मन के घनघोर बादलों पे
जैसे छाई हो रात की लालिमा 
वैसे ही मैं तुझमे समा के
खुद को करूँगा लालिमा
मेरी आत्मा परमात्मा से 
मिल के जो सुख पायेगी
मैं कैसे कहूं क्या नाम दूं
शब्दों में कैसे व्यक्त करूँ
उस मधुर मिलन की कामना

वहीँ दूसरी तरफ उनका कवि मन कवि के मन की बात को भी कितनी संजीदगी से संजोता है जिसकी बानगी इन लफ़्ज़ों में देखिये

जुबान रखकर भी बेजुबान हूँ मैं
लेखनी के बिना
तो मैं कविता से अन्जान हूँ
मीलों की दूरी
कविता से कवि की हो जाती है
जब लेखनी सही वक्त पर 
साथ नहीं निभाती है


अर्जुन का धर्मसंकट नामक कविता के माध्यम से अर्जुन के डांवाडोल मन की स्थिति का और उसके प्रश्नों को खूबसूरती से सहेजा है और साथ में समाधान भी दिया है और यही कविता की उच्चता है इसका एक अंश देखिये

हे तात तुम्हारी पीड़ा का
ना कभी अंत ही होगा
जब तक ना लड़ोगे अधिकार को
तब तक ना तुम्हारा यश अमर होगा
जब पांचाली का चीरहरण
भारी सभा में सबने देखा था
सारे तुम्हारे अपनी ही तो थे
फिर क्यों ना इस अधर्म को रोका था

तर्क और वितर्क के माध्यम से अर्जुन को कैसे प्रभु उबारते हैं उसे सही ढंग से प्रस्तुत करके अपनी काव्य प्रतिभा का परिचय तो दिया ही साथ ही बता दिया की यूँ ही नहीं आसमा बुलंद होते कुछ तो हौसलों में परवाज़ होती ही है .

वहीँ दूसरी तरफ श्रृंगार रस से ओत - प्रोत कविता है "सौन्दर्यता की देवी" जो उनके कवि मन की श्रृंगारिकता को दर्शाती है .

"दर्पण से परिचय " कविता अपने आप में बेमिसाल है 

आज मुझसे पूछ बैठा
दर्पण ही मेरा परिचय
कहने लगा मैं जनता हूँ
उम्र का जो फासला किया तूने तय
मेरे नयन में तेरी छवि
है बसी बड़ी पुरानी
दर्पण को परिचय देना
तो है तेरी नादानी

दुनिया को होगी जरूरत
तेरे पहचान की
दर्पण से परिचय तो है
ठेस मेरे सम्मान की
तेरा और मेरा तो
साया तन सा साथ है
दोनों में हो कोई पहचान
परिचय को
बताओ ये कैसी बात है .........

आ गयी थी चिड़िया जो ,विचारों का घर ,आत्मा सौंप रहा हूँ ,तन का अवसान , सफ़र में ठोकर , प्रलय पुरुष उनकी बेजोड़ कृतियाँ हैं जिनमे जीवन के विविध रंग समाये हैं और साथ में अध्यात्मिक मनन भी है और वो ही उनके लेखन की शक्ति है जो इस काव्य संग्रह से दिखाई देता है . 

यूँ तो सारी पुस्तक ही बेजोड़ है मगर सबके बारे में तो नहीं लिख सकती इसलिए कुछ कवितायेँ चुन कर उनके माध्यम से सत्यम के व्यक्तित्व और लेखन पर प्रकाश डालने की कोशिश भर की है . 


दुआ करती हूँ उनके लेखन और जीवन पर प्रभु का वरद हस्त हमेशा कायम रहे और वो ज़िन्दगी में उन्नति और सफलता के शिखर छूते रहें. 



अगर कोई पढना चाहे तो सत्यम से मोबाइल या मेल पर संपर्क कर सकता है उसके लिंक दे रही हूँ

satyamshivam95@gmail.com

M: 9934405997,9031197811

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

बस यूँ ही कभी कभी




बस यूँ ही कभी कभी
तुम ख्यालों में उतर जाते हो
हे ........कैसे आ जाते हो
और सारी कायनात धड़का जाते हो 
जबकि जानते हो 
मैंने तुम्हें कभी बुलाया नहीं
कभी आवाज़ नहीं दी
कभी चाहा भी नहीं
फिर भी ना जाने कैसे
तुम गाहे बगाहे अपनी 
उपस्थिति दर्शा जाते हो
हवाओं के पंखों पर 
पैगाम भेजने का रिवाज़ 
कभी मैंने निभाया नहीं
तुम्हारी नशीली नीली आँखों में 
तैरता गुलाबी ख्वाब 
कभी आकार ले पाया नहीं 
वो देवदार के तले 
तुमने भी कभी 
कोई गीत गया नहीं
और मेरी छत की मुंडेर पर भी 
कभी मेरा दुपट्टा लहराया नहीं
जो तुम्हें इशारा दे देता
फिर बताओ तो ज़रा 
कैसे तुम बिना दस्तक के 
ख्वाबों की तस्वीर बन जाते हो
कैसे तुम इन्द्रधनुषी रंगों सा 
मेरी आँखों में उतर जाते हो
और सारे जहान को तुम्हारे होने का 
आभास करा जाते हो .............
ये आँखों का दर्पण झूठ क्यों नहीं बोलता ...........कभी कभी बस यूँ ही 

रविवार, 15 अप्रैल 2012

ये जलते हुए आस्माँ का टुकड़ा उसके शहर में ही क्यों गिरा ?????

बारिश मे भीगने का उसका शौक
ज्यों अंजुलि की पांखुरी मे 
भर दिये हों सात आस्माँ किसी ने
ये भीगते मौसम की शरारतें और हर आस्माँ पर 
अपना नाम लिखने की चाहत 
ट्प टप करती हर बूंद के साथ बहती हर हसरत 
इक मासूम सी तितली बन उड़ने की ख्वाहिश 
इन्द्रधनुष के हर रंग में डूबने की निश्छल चाहत
चलो आज कुछ बारिशों को गुनगुना लें 
शायद कोई बूँद भिगो जाये मन का आँगन 
बरसों बीते यहाँ आसमाँ को बरसे हुए 
आह ! एक दिवास्वपन ! एक भ्रम तो नहीं 
नहीं ,नहीं ..........सत्य है , मगर 
बचपन और अल्हड़ता के बीच के लम्हे सिरे कब छोड़ते हैं 
चाहे डोरियाँ लाख रेशम की बनवा लो छूटे हुए सिरे फिर कहाँ मिलते हैं 
या खुदा !!!! सिर्फ एक सवाल का जवाब दे दे 
चाहत कोई बड़ी तो न थी फिर 
ये जलते हुए आस्माँ  का टुकड़ा उसके शहर में ही क्यों गिरा ??????

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

कहो फिर कौन कहाँ खोजें सृष्टि


शब्द कागज़ कलम ही काफी नहीं होता
भावों के बीजों का होना भी तो जरूरी है 


विचारों भावों का हो जाये लोप
शब्द भी हो जाएँ अलोप
निर्मिमेष दृष्टि त्राटक समाधि
फिर ना कोई व्यापे व्याधि 
कालखंड का ना रहे ज्ञान
मैं तू का भी ना रहे भान
आसक्ति का भी हो जाये त्याग 
एक अलौकिक हो ब्रह्माण्ड
आत्मानंद में समा जाये अंड
फिर हो जाए 
निर्विकार निर्द्वंद निर्लेप अंतर्दृष्टि 
कहो फिर कौन कहाँ खोजें सृष्टि 

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

आज तुम्हारा अस्तित्व प्रश्नचिन्ह बन गया है ?




कभी कभी लगता है 
तुम भी एक छलावा हो -कान्हा 
नहीं है तुम्हारा कोई अस्तित्व 
ये सिर्फ हमने ही तुम्हें
एक रूप दिया है
तुम्हारा एक वर्चस्व कायम किया है
वरना तो सभी प्रकृतिजन्य है 
न तुम हो न तुम्हारा अस्तित्व 
गर होता कोई अस्तित्व 
तो ऐसा न करते
कम से कम उनके साथ 
तो बिलकुल नहीं
जिन्होंने अपना सर्वस्व 
तुम्हें ही माना
अपना सर्वस्व 
तुम्हें ही अर्पण किया 
सिर्फ एक प्रीत जिन्होंने
तुम संग जोड़ी
उन्ही से तुमने 
क्यों निगाह मोड़ी

शायद नहीं पक्का 
तुम कहीं नहीं हो
ये तो सिर्फ आस्था
और डर न ही हमें
पंगु बना दिया
वरना क्या कहीं 
देखा है ऐसा
वैद्य जो स्वयं
रोगी को मौत का सामान
मुहैया करा दे
या नाविक स्वयं
अपनी नाव डूबा दे 
नहीं श्याम, तुम नहीं हो 
ये तो सिर्फ हमारे बनाये
उपालंभ हैं 
जिसमे हम तुम्हें देखते हैं
तुम कहीं नहीं हो
नहीं हो .....नहीं हो
तुम सिर्फ दृष्टिभ्रम हो

सब कुछ करके देख लिया
पर तुम्हें नहीं पाया
न अपना बना सके 
न तुम्हें ही पाया
अगर कोई अस्तित्व होता 
तो बना पाते न अक्स
मिल पाते तुमसे कहीं 
किसी पते पर
किसी ठिकाने पर
और अगर तुम होते
और तुमने हमें
अपना माना होता 
क्या भुला पाते तुम?
क्या रह सकते थे
तुम भी हमारे बिन?
क्या तुम्हें मिलने की 
चाह न होती?
क्या तुम्हारी प्रीत न भटकती?
कुछ तो असर हुआ होता न
कुछ तो आहें तुम तक भी पहुँचती न
मगर नहीं हुआ ऐसा 

क्योंकि 
निश्चिन्त थी सर्वस्व समर्पण कर
सब कुछ तुमको अर्पण कर 
क्या ऐसे ही 
योगक्षेम वहाम्यहम का 
नारा बुलंद किया 
नहीं ये तो तुम्हारा 
ढोंग प्रपंच हुआ 
छलने की आदत रही 
न सदा तुम्हारी
ओ छलिया ........
लो आज तुमने फिर से छल लिया 

दुनिया के छल से घबराये 
तेरी शरण हम आये 
तूने भी छल लिया गिरधर
बता अब हम किधर जाएँ ?

आज तुम्हारा अस्तित्व प्रश्नचिन्ह बन गया है ?

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

क्या मिलोगे कभी तुम मुझे भी ?

मोहब्बत की बरसी नहीं होती 
क्योंकि 
मोहब्बत कभी मरती जो नहीं 
सुना है ऐसा 
क्या सच में ?
मिलोगे तुम मुझे भी 
कभी ,कहीं ,किसी जहान में 
कर सकोगे ऐसी मोहब्बत
मेरे नाम से शुरू हो
मेरे नाम पर ख़त्म हो 
हर लफ्ज़ में बस मेरा ही नाम हो 
तुम्हारी हर सांस पर 
धडकता सिर्फ मेरा नाम हो  
जिस्म में मोहब्बत लहू बनकर बहती हो 
जहाँ से भी काटो ...........
लहू के कतरे की जगह
सिर्फ मोहब्बत ही बहती हो
कर सकोगे ऐसी मोहब्बत .........मेरे जाने के बाद भी मुझसे

मिल सकोगे कभी
जीवन की सांझ में 
किसी मंदिर की सीढी पर 
मोहब्बत की आराधना करते 
एक दिया मोहब्बत के नाम का जलाते 
उसमे अपने प्रेम का घृत डालते हुए 
एक बाती यादों की जलाते हुए

मिलोगे क्या ..........किसी आखिरी मोड़ पर 
आखिरी सांस पर 
आखिरी धड़कन पर
आखिरी नज़र पर ...........रुके हुए 
मेरी मोहब्बत की दास्ताँ पढ़ते 
जाते हुए मुसाफिर को विदाई गीत सुनाते 
रब का नाम नहीं यारा 
मोहब्बत करने वालों का रब मोहब्बत ही होती है.........जानते हो ना
बस आखिरी विदा में 
मोहब्बत का कलमा पढ़ देना ............
और रुखसती का रिवाज़ निभा देना 
देखो दूसरा जन्म मैं नहीं जानती 
आखिरी तमन्नाएं कहीं आखिरी ना रह जाएँ 
और रूह कपडा बदल जाये 
वो वक्त आने से पहले 
ओ अनदेखे मोहब्बत के परिंदे .........क्या मिलोगे कभी तुम मुझे भी 
मेरी आखिरी हसरत को परवाज़ देते
मेरी प्यासी रूह पर दो बूँद उंडेलते ..........अपनी मोहब्बत के अमृत की 

यूँ ही नहीं मोहब्बत की कब्रें बना करती हैं
यूँ ही नहीं फ़रिश्ते वहाँ सजदे किया करते हैं
यूँ ही नहीं आसमाँ उस दर पर झुका करते हैं 
मोहब्बत का खुदा बनने से पहले मोहब्बत के इम्तिहान हुआ करते हैं ...........जानते हो ना !!!!!!

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

हाय रे वो श्याम क्यूँ ना आये




हाय रे वो श्याम क्यूँ ना आये
रो रो बीतीं रतियाँ सारी
उम्र भी हो गयी आज बंजारिन
हाय रे वो श्याम क्यूँ ना आये

प्रीत की रीत निभानी छोड़ी
मेरी बारी क्यूँ रीत है तोड़ी
बावरी हो गयी प्रीत निगोड़ी
हाय रे वो श्याम क्यूँ ना आये

दरस बिन अँखियाँ तरस गयीं
बिन बदरा के बरस गयीं
श्याम छवि में अटक गयीं 
हाय रे वो श्याम क्यूँ ना आये

श्याम को लिखती रोज हूँ पाती
बिन पते के वापस आ जाती 
कित ढूंढूं मै तुमको मोहन 
अब तो दे दो मुझको दर्शन
हाय रे वो श्याम क्यूँ ना आये

रविवार, 1 अप्रैल 2012

सूली पर सिर्फ और सिर्फ तुम्हें ही चढ़ना है ............






राम तुम्हारा चरित्र
तुम्हारा जीवन
तुम्हारा दर्शन
आज का मानव 
समझ ना पाया
आदर्शवादिता को
अपना ना पाया
इसलिए तुम पर भी
लांछन लगाया
मर्यादित जीवन जीना
मर्यादा के लिए 
स्वयं को भी होम कर देना
फिर चाहे सीता को दिया 
बनवास ही क्यों ना हो 
अपने आचरण से 
शत्रु पर भी विजय प्राप्त कर लेना
फिर चाहे वो रावण ही क्यों ना हो 
बड़े छोटे में ना भेद करना
सबको गले लगाना
कहीं कोई जातीयता ना का अभिमान करना
ना ही उंच नीच का भेदभाव होना
फिर चाहे वो निषादराज हो या केवट 
और खुद को दुःख पहुँचाने वाले को भी 
सम्मानित करना 
फिर चाहे वो माँ केकई ही क्यों ना हो
तब भी उसे माँ ही कहना और 
बराबर का सम्मान देना 
किसी पीड़ित पापी को भी 
प्रायश्चित करने पर माफ़ कर देना
फिर चाहे वो अहिल्या ही क्यों ना हो 
ऐसा सिर्फ तुम ही कर सकते थे 
और आज कलिकाल में 
तुम्हारी मर्यादाएँ हर मोड़ पर
हर गली में 
हर आंगन में 
खंडित हो रही हैं 
आज तो राम 
माँ , बहन की मर्यादाएँ भी मिट रही हैं 
अनीति, अनाचार, व्यभिचार, भ्रष्टाचार से
सारी दुनिया त्रस्त हो रही है
मगर सिर्फ तुम्हारे बताये रास्ते का 
ना अनुसरण कर रही है
कहो राम ! कैसे फिर राम राज्य की स्थापना हो
कैसे फिर तुम्हारा पुनर्जन्म हो
क्या सिर्फ रामनवमी पर 
तुम्हारा अभिषेक करने से
राम जन्म हो जायेगा
क्या इतने से ही मर्यादाएँ 
स्थापित हो जाएँगी
क्या राम ! तुम्हारा मन नहीं दुखता 
क्या राम ! ये मानव की दोगली नीति से 
तुम व्यथित नहीं होते 
क्या इस झूठे आडम्बर से 
तुम वास्तव में प्रसन्न होते हो ?
कहो राम ! क्या खोखली परम्पराओं पर 
जब तुम्हारी भेंट चढ़ती है 
तब क्या तुम्हें नहीं लगता 
जैसे तुम्हारे नाम पर तुम्हें एक बार फिर बनवास मिला है 
अनंत काल के लिए ...........जहाँ से वापसी संभव ही नहीं 
या शायद यही त्रासदी है मर्यादित इंसान होने की
या कहो भगवान होने की 
सूली पर सिर्फ और सिर्फ तुम्हें ही चढ़ना है ............हर युग में 
सत्य को शायद ऐसे ही परिभाषित होना है ........यही इसकी नियति है ..........है ना राम !!!!!!!