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शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

बरसात के बाद शिशिर के आगमन से पहले

बरसात के बाद
जब मौसम करवट लेता है
शिशिर के आगमन से पहले
और बरसात के बाद की अवस्था
मौसम की अंगडाई का दर्शन ही तो होती है
शिशिर के स्वागत के लिए
हरा कालीन बिछ जाता है
वैसे ही
जब मोहब्बत की बरसात के बाद
जब इश्क करवट लेता है
पूर्णत्व से पहले की प्रक्रिया
मोहब्बत की सांसों को छीलकर
उसे सजाना संवारना
और पूर्णता की ओर ले जाने का उपक्रम
किसी मौसम का मोहताज नहीं होता
वहाँ मोहब्बत जब
प्रेम में तब्दील होती है
और प्रेम जब इबादत में
तब खुदाई नूर की चिलमन के उस तरफ
आगाज़ होता है एक नयी सुबह का
महबूब के दीदार से परे
उसकी रूह में उतरने का
उसके अनकहे को पढने का
उसकी चाहतों पर सजदा करने का
और मिल जाती है वहाँ
परवान चढ़ जाती है वहाँ
मोहब्बत कहो या इश्क कहो या प्रेम कहो या खुदा ............अपने वजूद से
समा जाती है मोहब्बत ..........मोहब्बत में 

बरसात के बाद शिशिर के आगमन से पहले...........…

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

"दश पुत्र समां कन्या, यस्या शीलवती: सुता "


"दश पुत्र समां कन्यायस्या शीलवतीसुता 
कितना हास्यास्पद लगता है ना 
आज के परिप्रेक्ष्य में ये कथन 
दोषी ठहराते हो धर्मग्रंथों को
अर्थ के अनर्थ तुम करते हो 
नारी को अभिशापित कहते हो
दीन हीन बतलाते हो
मगर कभी झांकना ग्रंथों की गहराइयों में
समझना उनके अर्थों को
तो समझ आ जायेगा
नारी का हर युग में किया गया सम्मान
ये तो कुछ जड़वादी सोच ने 
अपने अलग अर्थ बना दिए 
और नारी को कहो या बेटी को या पत्नी को
सिर्फ भोग्या बना डाला 
सिर्फ अपने वर्चस्व को कायम रखने को
तुमने बेटी के अधिकारों का हनन किया
जबकि इन्ही ग्रंथों ने 
एक शीलवान कन्या को 
दस पुत्रों समान बतलाया 
तो बताओ कैसे तुमने
गर्भ में ही कन्या का गला दबाया
और पुत्र की चाहत को सर्वोपरि बतलाया

पुत्र भी कुल कलंकी होते हैं
बेटियां तो दो घरों को संजोती हैं
ये सब तुम्हारा रचाया व्यूह्जाल था 
जिसमे तुमने नारी को फंसाया था
समाज मर्यादा का डर दिखलाया था 
वरना नारी कल भी पूजनीय थी
वन्दनीय थी शक्ति का स्त्रोत थी
और आज भी उसकी महत्ता कम नहीं
बस अब इस सच को तुम्हें समझना होगा
धर्मग्रंथों का फिर से विश्लेषण करना होगा
क्यूँकि तुमने इन्हें ही नारी के खिलाफ हथियार बनाया था 
एक बार फिर से सतयुग का आह्वान करना होगा
और हर कथन का वास्तविक अर्थ समझना होगा 

सोमवार, 17 सितंबर 2012

भागो भागो भूत आया ........

भागो भागो भूत आया
संग ऍफ़ डी आई को लाया
कभी कोयला तो कभी डीज़ल
कभी पेट्रोल तो कभी महंगाई

कभी बोफ़ोर्स तो कभी चारा घोटाला
कभी टेलिकॉम घोटाला
तो कभी कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला,
अच्छी सबने बिसात बिछायी
जनता तो बेचारी बाज आयी
अब ये कैसा विनिवेश आया
जो निवेश भी साथ ले जाएगा
बस भ्रष्टाचारियों के पेट भर जायेगा
और जनता का ध्यान बँट जाएगा
मगर सत्ता पर तो अंगद का पैर काबिज रहेगा
इतना भर सुकून काफी होगा
सरकार तो चैन से सोएगी
बस भूखी जनता ही बिलख बिलख रोएगी
शोषण की महामारी में
जेब ही कुलबुलाएगी
जब ना होगी फूटी कौड़ी जेब में
तो सिलेंडर की जरूरत ना नज़र आएगी
बस तुम्हें यूँ सब्सिडी मिल जाएगी
झुनझुना हाथ में तुम्हारे पकड़ा दिया
हुक्मरानों ने ये समझा दिया
जो हमें चुनाव जितवाओगे
तो यूँ ही शोषित किये जाओगे
यूँ घोटालों के शहंशाह का खिताब
देश को मिल जाएगा
और देश का नाम समूचे विश्व में
अपना परचम लहराएगा
हम तो अपनी मनमानी तुम पर थोपेंगे
सोये हुओं को जरूरत क्या होती है
खाने पीने और पहनने की
बस सोते रहना ही उनकी किस्मत होती है
अब चाहे ऍफ़ डी आई का बोलबाला हो
चाहे देश दोबारा यूँ गुलाम हो
कहो तो क्या फर्क पड़ जायेगा
गुलामी के बीज तुम्हारे लहू में पैबस्त हैं
आदत से तुम मजबूर हो
क्या हुआ जो एक बार फिर से
व्यापारियों को बुलाया जायेगा
और देश को इस बार खुद ही बेचा जायेगा
तुम्हें फर्क नहीं पड़ने वाला है
तुम बस कुम्भकर्णी नींद सोते रहना
और हमारा शासन यूँ सुचारू रूप से चल जायेगा

घोटालों का इतिहास देश के नाम लिख जायेगा
यूँ देश का एक और स्वर्णिम इतिहास बन जायेगा
मगर जनता का दोष
ना जनता को नज़र आएगा
जब तक क्रिमिनलों को सत्ता पर
काबिज होने का मौका मिलता रहेगा
देश का ऐसे ही बंटाधार होता रहेगा
जब तक ना हर हिन्दुस्तानी जागेगा
अपने लिए ना आवाज़ उठाएगा
खुद ना सड़क से संसद तक जाएगा
तब तक तो यूँ ही शोषित किया जायेगा
कभी ऍफ़ डी आई के तो कभी मंहगाई के
तो कभी घोटालों के भूतों से डराया जायेगा
फिर आने वाली पीढ़ी के लिए
ये नया गाना बन जायेगा
भागो भागो भूत आया ........संग नए नए घोटाले लाया

शनिवार, 15 सितंबर 2012

और सुना है……… तुम बच्चे नही हो !



न जाने
जुदा राहियों को मिलवाता है क्यों
फिर उम्र भर लडवाता है क्यों
क्या मज़ा आता है मोहन
यूँ बादशाहत जताने मे
मानती हूँ मानती हूँ
यूँ अपनी राह चलाता है तू
मोह माया के बंधनों से छुडवाता है यूँ
मगर प्रश्न फिर भी वहीं खडा रहता है
आखिर ऐसा करता है क्यूँ?
जब अलग ही करना होता है
फिर क्यों मिलवाना, लडवाना
और फिर छुटवाना
बेहतर होता जो सबको
नारद बना दिया होता
पैदा होते ही हाथ मे 
वीणा पकडा दी होती
कम से कम तुम्हारी भी
यूँ रुसवाई ना होती
कोई तुम पर यूँ 
उँगली तो ना उठाता ना
तुम्हारे अस्तित्व पर 
प्रश्नचिन्ह यूँ लगाता तो ना
जानते हो कभी कभी
तुम्हारी रहस्यमयी मुस्कान भी
संदेह के घेरे मे आ जाती है
कि जैसे कह रहे हों
मेरे पिंजरे की मैना हो
कहाँ जाओगे
कितना उडोगे
वापस यहीं आना है
है ना माधव ! एक रूप तुम्हारी
व्यंग्यकारी मुस्कान का ये भी
फिर भी कहती हूँ 
कभी विचारना इस पर
सोचना , गंभीर 
मनन चिन्तन करना
क्या फ़ायदा यूँ खिलौनो को जोडने और तोडने से 

और सुना है……… तुम बच्चे नही हो ! 
 

बुधवार, 12 सितंबर 2012

ये है कस्तूरी का सफ़र ………450 वीं पोस्ट

दोस्तों

इस बार तबियत सही नही होने के कारण इतनी देर हो गयी और अब जाकर पूरी तरह कस्तूरी को पढ पायी और अपने विचार लिख पायी । सभी इंतज़ार मे थे और पूछ रहे थे कि आप कब लिखेंगी मगर सर्वाइकल की वजह से ज्यादा देर कम्प्यूटर पर काम नही कर पाती सिर्फ़ पढती ज्यादा हूँ आजकल और लिखती कम हूँ इसलिये सबकी पोस्ट पढ लेती हूँ मगर कमेंट कम ही करती हूँ जितना सम्भव हो पाता है उम्मीद है आप सब निराश नही होंगे अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश की है अपने विचारों से आप सबको अवगत कराने की ………तो चलिये मेरे साथ कस्तूरी के सफ़र पर …………








मैं कस्तूरी हूँ ..........कस्तूरी वो ही जो अपनी सुगंध से सारे वातावरण को महकाती है , जिसे मृग अपनी कुंडली में लिए खोजता फिरता है मगर हाथ नहीं आती . मेरी सुगंध से मदहोश होती फिजा ना जाने कितने ही रूप अपने में समेट लेती है और फिर एक एक करके अपने आँचल से बाहर निकालती रहती है और एक मनमोहक सुरम्य वातावरण हर पल ह्रदयों को उल्लसित प्रफुल्लित करता रहता है तभी तो देखो मेरे आँगन की पहली फुहार में कौन भीग रहा है ........

ये हैं अजय देवगिरे जो प्रेम की बयार में ऐसे बह गए हैं कि उन्हें चारों तरफ सिर्फ तू ही तू है नज़र आती , तो कभी जाने वो किधर है ढूंढते फिरते हैं ये आलम तभी होता है इन्सान के साथ जब वो स्वयं को भूल जाता है तभी तो अजय कहते हैं अपना होना छोड़ दिया मैंने  एक इश्क की खुमारी तारी  है तभी तो अगर तुम होते , तुझमे खो जाऊँ सरीखी दुनिया ना बसाते, ये मोहब्बत के फलसफे यूँ ही ना गढ़ते , जिसने प्रीत का पानी पीया हो उसे भला क्या भूख ,प्यास , नींद लग सकती है वो तो अपनी मोहब्बत की कस्तूरी में ही डूबा रहता है .


इधर अमित आनंद पाण्डेय ने अपनी कस्तूरी से सबके कान खड़े कर दिए हैं और अपने बंद तभी तो कह रहे हैं मुझे तो  सुनना भी नहीं आता जब ना सुनकर इतना सुन लेते हैं तो गर सुनना आता तो क्या करते ? माँ की ममता की कस्तूरी में देखो तो कैसे भीग गए हैं कि यादों के सावन बिन मौसम बरस गए हैं तभी तो ठण्ड आने वाली है और आज की बारिश में छुपे डर ने ख्यालों पर धुंध का साया फहरा दिया है तभी तो उस शाम के धुंधलके में यादों की मिटटी सिर्फ महक रही है मगर रीते हाथों में क्योंकि नया मेहमान अपने साथ लेकर आ रहा है वो ही पीढ़ियों की दी हुई परिपाटी जो अपना रंग कभी नहीं बदलती और देहरादून से लौटते हुए एक कसक आज भी छटपटा रही है ना जाने किस खोज में कस्तूरी मृग बनी हुई है .

देख लो मेरी कस्तूरी के रंगमच पर आनंद द्विवेदी की हमारी दुनिया कैसे अपने रंग बिखेर रही है तभी तो नाटक के पात्र स्वयं को जीवंत करने के लिए उत्सुक हैं प्रेम की परिधि में कैद होकर और प्रेम की सुवासित महक में जब हरसिंगार की महक अपना रंग उँडेलती है तो वजूद समाधिस्थ हो जाते हैं और प्रेम खुदा तभी तो प्रेम की आखिर कैद की मुन्तजिर हो जाती है रूह जहाँ दो का अस्तित्व एक में समाहित हो जाता है और उसी के इंतज़ार की शाम को कैद करने की कवायद कब कस्तूरी बन होशोहवास पर छा जाती है और प्रेम की यात्रा अन्दर की तरफ शुरू पता ही नहीं चलता .

मेरी  कस्तूरी से सुवासित कुमार राहुल तिवारी भी हैं तभी तो आनंद विभोर हैं ये सोचकर कि सिर्फ मेरे बन कर मेरे घर कृष्ण आये इस सोच में सराबोर राहुल को चिंता नहीं है कल की तभी तो आज में जी रहे हैं और कह रहे हैं कल हो ना हो क्योंकि पुराने पेड़ पर नए पत्ते तो आने ही हैं फिर चिंता कैसी ये तो प्रकृति का अटूट नियम है तो इससे भागना कैसा ? जो आज नया है कल पुराना होना ही है इस तथ्य को रेखांकित करते प्रकृति से तारतम्य बैठा रहे हैं और प्रकृति और हम की परिभाषा समझा रहे हैं कि क्यों नहीं हम जीना सीखते अपने आस पास बिखरे प्रकृति के सौंदर्य से कितना फर्क है उनमे और हम में और उनकी यही कोशिश दे रही है जीने को ऊर्जा , एक संबल , एक राह तभी तो चाँद ने पूछा बादल से रात के बाद क्या होगा और उस क्या का उत्तर खोजता राहुल का मन कस्तूरीमृग बन गया जो खोज रहा है निरंतर अपने अन्दर बहती कस्तूरी को ..

इधर गुंजन अग्रवाल प्रेम की कस्तूरी में भीगी प्रेम के अंतर को समझने का अथक प्रयास कर रही हैं और इस सवाल में उलझी हैं कि उसके और हमारे प्रेम में ये अंतर कैसा ? बात तो सही है प्रेम ना जाने जात बिरादरी उसके तो बस चाहत होती है , एक गूँज होती है , एक पुकार होती है तभी तो शब्द शब्द हो तुम (मैं और मेरा मन ) कहते कहते कब मन की वीणा गुनगुनाने लगी और ये गीत गाने लगी सुन पगली , कब्बी इश्क ना करना क्योंकि इश्क की गलियों में तबस्सुम नहीं खिला करते ज़िन्दगी धुआं धुंआ होने लगती है तभी तो कभी कभी प्रेमी मन कह उठता है सुनो कई दिन से मन है , एक चरस वाली सिगरेट पीने का तो कभी बिल्कुल बच्चा बन जाता है मन और कहता है मन है आज फिर , नन्हे पंखों वाली बच्ची बन जाने का जिसमे छुपी है एक भीगी सी तस्वीर जो मोहब्बत की ताबीर गढ़ रही है , इंतज़ार के बोनसाई बुन रही है क्योंकि कदम्ब होना आसान नहीं होता तभी तो मैं बोनसाई हूँ , कदम्ब नहीं कहते कहते कब अपनी सखी की पीड़ा ने व्यथित कर दिया और लिख डाली एक पाती पांचाली के नाम और भिगो दिया सारा आलम अपनी कस्तूरी में जो बस मन के हर कोने को सुवासित करती है मगर मिलती नहीं

गुरमीत सिंह अपनी कस्तूरी की भीनी भीनी सुगंध बिखेरते दिल पर ही चोट कर बैठे तभी तो कह रहे हैं यादों को कितना ही सहेज लो मगर कागज़ के टुकड़ों के दिल नहीं होते और दिल है कि मानता नहीं तभी तो मरीचिका में भटक रहे हैं अजनबी बन और आइनों से डरने लगे हैं क्योंकि कभी कभी कुछ ख्याल ही दिल को छू जाते हैं काश इससे आगे जहाँ और भी होता जहाँ बंदगी होती , दुआ कबूल होती फिर चाहे दो लम्हे में ही कुछ बातें होतीं मगर दिल की एक हसरत तो निकल जाती .

जैस्बी गुरजीत सिंह इंतज़ार की पांखों पर सपने सजाये तेरे साथ गुजारे पल की फेहरिस्त बनाये मोहब्बत के हिसाब में मशगूल ना जाने कब और कैसे मैंने पाला है इक गम शायद भूल गए थे मोहब्बत का दूसरा नाम गम ही तो है , दर्द ही तो है तो फिर इश्क का घूँट पीने से डर कैसा कुछ कतरे तो समेटने ही होंगे करनी होगी इबादत तभी तो कोई समझेगा मेरी मजबूरियां और इन मजबूरियों की अधूरी दास्ताँ और फिर वो एक ख्वाब बन सज जाना चाहती है आँखों के झुरमुटों में ताकि ताकि सुबह सवेरे तेरे सिरहाने सिर्फ उसके बन कर आऊँ और ठहर जाऊँ मैं , तेरे अनलिखे ख़त सा तेरी यादों की चिलमन में और मेरी मोहब्बत की कस्तूरी फिर ना ढूंढें कोई कोना रीता सा ।

इच्छा और शक्ति के संघर्ष में रत वंदना सिंह का स्वगत प्रलाप  मौन की वेदना को परिलक्षित करता मन को दिशा दे रहा है और कह रहा है सम्हल रे मन सम्हल  क्योंकि निज स्वार्थ से बढ़कर और कोई तम नहीं फिर अपने मन में छुपाये तूफानों का सागर कब जीवन में उफान ला दे पता नहीं चलता तभी तो अकेली राह पर जाता आदमी कब लौटने लगे अपने विषादों , अवसादो के साथ इसलिए तू बन श्रेष्ठ कृति मानव ताकि जन मानस के पटल पर तेरी स्मृति हमेशा याद आये और तू ख्वाब नहीं हकीकत बन जाये शायद यूँ माँ का क़र्ज़ उतर जाए .

नीलिमा शर्मा नई नवेली के इंतज़ार की कस्तूरी को महकाती संबोधन पर आकर रुक जाती हैं और सोचती हैं कि आखिर उन्हें संबोधन किया दिया जाये आप, तुम , तू या फिर औपचारिकता से परे निभाया जाये रिश्तों को क्योंकि ये हमारी ज़िन्दगी है इसे कैसे व्यतीत करना है ये हम पर निर्भर करता है . यथार्थ और पलायन में से कौन सी दिशा अपनानी हैं , किस राह पर चलना है क्योंकि किसी राह चलो लोग कहते हैं अपनी अपनी बातें मगर तय हमें करना है मैं देखूं किसे और कैसे तभी तो मिलेगी नयी दिशा और दशा और होगा कविता का जन्म तो फिर अब इंतज़ार किस बात का ..........बढ़ चलो मंजिल दूर नहीं कदम दर कदम ।

नीलम पुरी का प्यासा मन कैसे हिलोर ले रहा है और कह रहा है अब रोऊँ जार जार तो चुप होने के लिए मुझसे मत कहना क्योंकि मेरा तो जो भी कदम है वो तेरी राह में है मेरी सांस , मेरी धड़कन , मेरे लफ्ज़ सब तुम्हारे लिए ही तो हैं ऐसे में कुछ अनकही बातें कहने का मन है जिसे गर तुम पढ़ लो तो तुम्हारी रूठी रूठी सी प्रियतमा मान जाए और दिल की हर हसरत निकल जाए . ना रहें हम लफ़्ज़ों के मोहताज़ क्योंकि मोहब्बत लफ़्ज़ों की मोहताज नहीं होती जहाँ दिल की बातें सिर्फ दिल से हो जाती हैं वो चाहे मेरी हों या तुम्हारी क्योंकि प्यार में डूबे पंछियों के परवाज़ को कौन रोक पाया है वहाँ तो सिर्फ निगाहों में ही कमाल समाया है फिर भी कभी कभी इज़हार के लिए शब्द कहाँ से लाते हो ये मन पूछ ही लेता है अगर हो कोई जवाब तो देना ......

सत्य की बलि वेदी पर सिंकती पल्लवी सक्सेना की आस्था और कर्त्तव्य प्यार पर अधिकार को तरजीह देता है तभी तो सत्यम शिवम् सुन्दरम अपना महत्त्व रखता है क्योंकि जीवन रुपी अग्नि में होम तो होना है सब कुछ मगर कुछ बचना है तो उसके लिए भावनाओं की राख को भी गर समेट लिया जाए तो अस्तित्व प्रश्न चिन्ह बनकर नहीं रह जाता और उन यादों में भीगा मन अपने रेगिस्तान में चश्मा तलाश कर ही लेता है तृप्ति के लिए क्योंकि सागर एक , रूप अनेक हों फिर भी अपनी ख़ामोशी के सागर में कुछ तो मोती मिल ही जाते हैं जो आन्तरिक कोलाहल में एक मचलती लहर की भांति अपना वजूद स्थापित कर जाते हैं ख़ामोशी के साथ फिर चाहे उसे दुनिया बेवफाई नाम ही क्यों ना दे दे

माँ बेटी के रिश्ते को परिभाषित करती बोधमिता की कस्तूरी कैसे मनो को सुवासित कर रही है तभी तो माँ को सृजनकर्ता नाम मिला और उसकी ममता का ना कहीं कोई ओर छोर मिला तभी तो बिटिया को माँ का ही स्वरुप मिला अपनी आकांक्षाओं को कितनी संजीदगी से कह रही है बेटी और फिर माँ से बोली बेटी मुझे चाहे कोई खुदा मिले ना मिले मैंने तो खुदा तुम में देख लिया माँ अब और क्या चाहिए . तो दूसरी तरफ आज के युवावर्ग की चिंता से ग्रसित बोधमिता युवा के जीवन को परिलक्षित कर रही हैं , उसकी उलझन और चाहतों की कहानी कह रही हैं तो दूसरी तरफ एक बीवी के दर्द को बयां कर रही हैं जो कुछ नहीं चाहती सिवाय इतने कि उसे हो गर्व  उसकी ब्याहता होने पर ........विविध रंगों से सजी रंगोली में कस्तूरी की महक कितनी सुवासित कर रही है इसे तो महकने वाला ही बता सकता है

मीनाक्षी मिश्रा तिवारी ने जीवन में मुस्कराहट के पलाश कुछ ऐसे खिलाये की प्रेम की पंखुडियां खिलने लगीं मगर आखिर कब तक क्योंकि गर प्रेम होगा तो विरह का अंकुर भी जरूर फूटेगा और करेगा जीवन के गणित का समाकलन , वो एक दिन तो कस्तूरी महकेगी ही .

मुकेश गिरी गोस्वामी की कस्तूरी देखिये तो कैसे उन्हें जीने के रंग सिखाती है तभी तो कह रहे हैं वो  मुझे जीना सिखाती हो तुम और डूब जाते हैं फिर आत्मचिंतन में कि कहाँ से कहाँ पहुँच गए हम कहीं से तो शुरुआत करें क्योंकि जाने क्यों वीरानी सी लगती है ये दुनिया उन्हें कोई तो कारण होंगा यूँ ही तो नहीं असमंजस में होंगे . आत्मसंतुष्टि के लिए श्रृंगार से सजी मेरी कविता होती  अगर तुम होंतीं जीवन में क्योंकि अब तलक तेरी खुशबू आती है तभी तो तुमसे कभी रोया ना गया कहते कहते मुकेश अपनी कस्तूरी बिखरा रहे हैं .

रजत श्रीवास्तव मौन के  गह्वर में संवाद की परंपरा को निभाते बस यूँ ही ऐसे ही यादों की खुरचन खुरच रहे हैं
क्योंकि तुम्हारे रहते , मैं तुमसे अलग नहीं, देख ले कहते कहते अपने प्रेम की कस्तूरी अपनी प्रियतमा को भेंट कर रहे हैं .

कस्तूरी है तो बिखरेगी ही फिजाओं में और महकाएगी हर कोना तभी तो रश्मि प्रभा जी के देखने का अंदाज़ ही जुदा है सबसे जो सोचती हैं परेशानियाँ तो दरअसल समझदारी में हैं जो जीवन को एक नयी सोच देती है साथ ही हरिनाम को भी नहीं भूलीं हैं फिर चाहे कितना ही मुश्किल है सिद्धांतों आदर्शों की गली में चलना क्योंकि नरभक्षियों के जमघट से बाहर निकलना आसान नहीं होता और कुछ तो मन में ही छुपे होते हैं उनसे निजात कोई कैसे पाए तभी तो प्रश्न दाग दिया ए तुम ! एक नाम के सिवा क्या कुछ और बन पाए अपने अहम् से उठ पाए हम का जामा पहन पाए क्योंकि एक उम्र बीत गयी लड़ते लड़ते , चलते चलते और हर बार क्यूं करूँ मैं ही समझौते एक बार तुम भी तो गुजर कर देखो उस आग से ......

राहुल सिंह अपनी कस्तूरी को भारत दर्शन करते बिखरा रहे हैं मगर अब भी कुछ बाकी है जिसकी फिक्र में फिक्रमंद हैं क्योंकि दासता से मुक्ति आज भी कहाँ मिली हैं तभी तो जो लक्ष्य है वो अधूरा है और असफल कार्य को कौन नमन करता है जब तक कि ना ऐसा दिन आता है जहाँ जीने की मर्यादा हो सम्मान के साथ क्योंकि अब नहीं चाहिए किसी की दया अपना हक़ चाहिए अपना सम्मान चाहिए बस ऐसा वरदान मिले यही तो है वो इच्छा जहाँ मोक्ष की भी चाह नहीं क्योंकि रिश्तों की पीड़ा दुनिया नहीं समझती तभी तो व्याकुल मन का भंवर  इंतज़ार में हैं कब आएगी शाम सुनहरी  तो कैसे ना कस्तूरी का सिन्दूरी रंग बिखरेगा जन मानस के पटल पर .

 ख़ामोशी को सुना मैंने आखिर कैसे इश्क के पंखों पर सवार होकर रिया ने सुन ली ख़ामोशी की आवाज़ क्योंकि वो हाथों का मिलना ही सब कुछ कह गया शायद लिख ना पाऊंगी क्योंकि कुछ बातें शब्दों से परे  जो होती हैं तो दूसरी तरफ ये मन की गलियाँ कितनी गहन होती हैं जो पीड़ा का दिग्दर्शन यूँ करती हैं कि वृद्धावस्था अभिशाप या बीमारी क्या है इसी चिंतन में डूब गयी हैं .

इसी क्रम में मेरी कस्तूरी ने भी अपने पाँव पसारे हैं जहाँ इंतज़ार की सिलाई नहीं होती क्योंकि आस के पंछी ने अब ओसारे पर दाना चुगना बंद कर दिया है तभी तो यूँ ही डिग्रियां नहीं मिलतीं मोहब्बत की एक आग से गुज़रना पड़ता है , अध्ययन और शोधों के ग्रन्थ लिखने और पढने के बाद ही माँ !मुझे तुझमे इक बच्चा नज़र आता है शायद तभी बूढा और बच्चा बराबर गिना जाता है मगर इसमें भी सबका अपना दृष्टिकोण होता है क्योंकि अच्छाई या बुराई तो देखने वाले की नज़र पर निर्भर करती हैं फिर हर चीज की कीमत होती है चाहे वो सफलता के प्रतिमान ही क्यों ना हों चुकाने तो पड़ते ही हैं फिर भी कुछ ना कुछ बच ही जाता है  जो बचता है शून्यता के बाद भी उसी को समेटना होगा नहीं तो अछूत हूँ मैं आज ये बात जान लेना क्योंकि वक्त ने बदल दिया है मेरा मिजाज़ .

वाणी शर्मा की कस्तूरी के रंग में सबसे पहले दस्तक दे दी पतझड़ के पहरेदार ने क्योंकि प्रेम के स्पंदनों ने हमें जितना पोषित किया उतने ही हम शोषित हुए और कोई है जो नहीं चाहता कि हम पोषित रहें तभी तो कतरा कतरा प्रेम खुरचा जा रहा है आक्रोश और विद्रोह , कुंठित सोच हावी हो रही है तभी तो गर्भ हत्या का अपराधबोध ग्रसित नहीं करता फिर चाहे उसके लिए किसी की भी बलि दे दी जाए चाहे माँ हो ये बेटी और इस दर्द को एक बेटी ही समझ सकती है जो माँ के अस्तित्व को अपनी आँखों में संजोती है जहाँ उसे माँ में ही पिता का अस्तित्व नज़र आता है और कह उठती है मैं और क्या कर सकती हूँ माँ अपनी विवशता से दो चार होती बेटी के भावों को संजीदगी से संजोना भी काफी है क्योंकि लिख रहा है कहीं कोई प्रेम पत्र जो सुवासित करेगा मन के आँगन को जिसकी महक से महकेगा हर आँगन क्योंकि मेरे घर की खुली खिड़की से फिजाओं में बिखर जाएगी उसकी खुशबू इतनी तो उम्मीद जरूर है .

मेरी कस्तूरी में केवल गड्ढे भावनाओं के ही नहीं हैं क्योंकि उम्र गुज़र गई इन्हें भरते भरते कह रही हैं शिखा वार्ष्णेय जी अब मोहब्बत को टांग दिया है खूँटी पर  पुरानी कमीज की तरह और सहेज लिया है प्रेम अपने अंतस में क्योंकि  इस धुआं धुआं ज़िन्दगी का क्या भरोसा कब द्वन्द में फँसा दे और जब मौन प्रखर हो तब फिर एक नयी सौगात रख दे कसौटी की और मैं ढूंढूं अपने उस अस्तित्व को जो आज बेजान सा निरी सा पड़ा है उस कोने में जहाँ भावनाएं अब नहीं सहेजतीं उसे, बन गया है रद्दी पन्ना क्योंकि तू और मैं हमेशा तू और मैं ही रहे कभी हम ना बन सके .

हरविंदर  सिंह सलूजा आज भी जी रहे हैं कुछ पन्ने ज़िन्दगी के जिनमे अहसास उसकी खुशबू का समेटा हुआ  है तभी तो गहरा लाल रंग गुलाब का प्रेम का प्रतीक बना है ऐसे में कोई कैसे कोई प्रेम कहानी लिख सकता है तभी तो वो कह रहे हैं कैसे उसे मैं दीवानी लिखूं क्योंकि मोहब्बत में कोई भी तुझसा नहीं देखा और तुझे पाने के जूनून में ज़िन्दगी को खो दिया बस यही तो चाहा ज़िन्दगी - तेरे साथ गुजरे फिर चाहे एक पल के लिए भी क्यों ना हो क्योंकि मोहब्बत में डूबी आशनाई इस इंतजार में नहीं रहती जाने कौन परी पास आएगी उसे तो मोहब्बत ही खुदा नज़र आएगी अब चाहे कोई प्यार को कितना बनते कम नहीं होता कुछ ना कुछ तो बच ही जाता है क्योंकि सबके हिस्से में कुछ आ जाये इसी आस में गुजर जाती हैं ज़िन्दगी की घड़ियाँ .


अंजू चौधरी की कस्तूरी में बुरा वक् ९९ वें पे ख़त्म हो शून्य से फिर शुरू हो जाता है जीवन चक्र यही तो होता है क्योंकि स्वार्थमय है ये संसार कोई किसी  के लिए नहीं सोचता  और पुरुष  तो बिल्कुल  नहीं तभी तो सब  ही नारी  को समेट  लेना  चाहते  हैं सिर्फ  अपने लिए कोई उसके  लिए कुछ क्यों नहीं करता  प्रतिध्वनि मुखरित क्यों नहीं होती,  ये  उम्र से बड़ी  एक लम्बी  ख़ामोशी  कितना कचोटती  है कि नींद  भी पायताने  करवट  बदलती  रहती है फिर भी जीने  की जिजीविषा  कहने  को उद्यत  हो जाती है कि अभी बहुत कुछ है बाकी शायद मेरा तमाशा , मेरा ही दर्द जिसे सिर्फ प्रयोग किया गया मगर महसूसा नहीं गया फिर कैसे कस्तूरी के रंगों को समेटूं ?

मुकेश कुमार सिन्हा की स्मृतियाँ कभी डराती हैं तो कभी दुलराती हैं और जीवन को दिशा दे जाती हैं फिर भी पता नहीं क्यूँ हम खुद से ईमानदारी नहीं बरतते और नहीं पहचान पाते खुद को अपने ही आईने में फिर भी कोशिश जारी रहती है क्योंकि यूटोपिया यूँ ही नहीं मिला करता सब अंतस में ही तो सिमटा है  बस देखने वाली नज़र की जरूरत होती है मगर कुछ चीजें हमने नज़रंदाज़ करनी सीख ली हैं तभी तो जो है सिर्फ कागज़ी हैं हकीकत में तो हम सभी पढ़ रहे हैं एक नदी का मरसिया खुद को दिखाने के लिए खैरख्वाह मगर क्या वास्तव में हैं ऐसा ? क्या हमने सीखा अमन-ओ-चैन से रहना ? क्या वास्तव में हम ऐसा ही चाहते हैं ? ये हैं हमारे दोगले चरित्र जिसका असर सब तरफ पड़ रहा है तभी तो नहीं देख पाते हम आतंकवाद का राजनितिक चेहरा और नहीं पढ़ पाते राजनितिक भाषा का आतंकवाद .

तो दोस्तों ये थी कस्तूरी के २४ मृग जो खोज रहे है अपनी अपनी कस्तूरी को मगर शायद नहीं जानते इनकी कस्तूरी तो इनकी कलम में बसी है बस एक बार अपने प्रवाह को अपने अन्दर की  तरफ मोड़ना है फिर तो कस्तूरी में खुद को ही भीगा पाएंगे. ये जो लाल रंग में लिखा है वो सभी कवियों की कविताओं के शीर्षक हैं और बाकी मेरे विचार . एक सहेजने लायक किताब जिसे अंजू  चौधरी और मुकेश कुमार सिन्हा ने सम्पादित किया है जो उनका पहला प्रयास है उस लिहाज से काफी बढ़िया काम किया गया है .  अगर आप सब भी इस कस्तूरी में भीगना चाहते हैं हिंद युग्म से संपर्क कर सकते हैं या फ्लिप्कार्ट से मँगा सकते हैं और इस कस्तूरी की महक को अपने आँगन में सहेज सकते हैं . चलिए दोस्तों मैं चलती हूँ फिर किसी कस्तूरी मृग को ढूँढने तब तक के लिए आप सबको इस कस्तूरी में भीगने के लिए छोड़े जा रही हूँ.

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शनिवार, 8 सितंबर 2012

यादों की जंजीरों में जकड़े वजूदों की नज़रें नहीं उतरा करतीं

जब भी मेरी यादों की दुल्हन सँवरती है 

तो इन्हीं उलझनों मे उलझती है
 
क्या आज भी तू उसकी मांग में 

मेरे नाम का सिन्दूर भरता है 

क्या आज भी तू उसके गले में

कुछ काले मोती मेरी मोहब्बत के 

धागे में पिरोकर पहनाता है

क्या आज भी तेरे अक्स में


मेरा वो ही अक्स उभरता है


जिसमे तूने मुझे कैद कर रखा है


देख तो सही .......

..........
पिंजरे में बंद मैना का तड़पना


लगता है नहीं करोगे मुक्त कभी


तभी मेरे पंखों में इतनी


मिचलाहट हो रही है


दर्द तुझे होता है तो


पंख मेरा झड़ता है


ओह ! नहीं जानती थी ...

........
यादों की जंजीरों में जकड़े वजूदों की नज़रें नहीं उतरा करतीं

बुधवार, 5 सितंबर 2012

अज्ञात की श्रेणी मे हूँ ……क्या ढूँढ सकोगे मुझे?

अज्ञात की श्रेणी मे हूँ
क्या ढूँढ सकोगे मुझे?
मै कोई दरो-दीवार नही
कोई इश्तिहार नही
कोई कागज़ की नाव नहीं
ना अन्दर ना बाहर
कोई नही हूँ
कोई पता नहीं
कोई दफ़्तर नही
कोई सूचना नहीं
कोई रपट नहीं
ऐसा किरदार हूँ
क्या ढूँढ सकोगे मुझे?
पता , नि्शानी, ठिकाना
कुछ नही है
कोई चिन्ह नहीं
पह्चान पत्र नहीं
आदम और हव्वा का
मानचित्र नहीं
कोई परिंदा नही
कोई चरित्र नहीं
कोई दरवेश नही
कोई असाब नहीं
कुछ नही मिलेगी सूचना
कहीं नहीं मिलेगी
क्या तब भी ढूँढ सकोगे मुझे?
तू भी नही
मै भी नही
हम भी नही
कोई व्याकरण नही
कोई वर्ण नहीं
कोई उच्चारण नहीं
हाव भाव नही
शब्द प्रकार नहीं
कोई सम्पूर्ण या मिश्रित अंश नही
मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं
मगर फिर भी हूँ ……कहीं ना कहीं
तभी तो अज्ञात हूँ
क्या कर सकोगे ज्ञात मुझे
क्या ढूँढ सकोगे मुझे ?
कौन हूँ मै?
एक छाया चित्र
ना ना ………कोई शक्ति नही
कोई भक्ति नही
कोई तीर्थ नही
कोई स्थल नही
फिर भी हूँ ……कहीं ना कहीं

अज्ञात की श्रेणी मे हूँ
क्या ढूँढ सकोगे मुझे?
नही ना ………
खोज खुद ही करनी होगी
बताती हूँ ………


जिसका स्वरूप नही होता
जिसकी पहचान नही होती
जिसका अस्तित्व प्रमाणिक नही होता
मगर फिर भी होता है ……कहीं ना कहीं
लो बता दिया ………
एक बोध हूँ ………शायद
क्या अब भी
ढूँढ सकोगे मुझे?

क्योंकि
अज्ञात की श्रेणी मे हूँ
………

रविवार, 2 सितंबर 2012

पसन्द आयें तो भी वाह वाह ना आयें तो भी वाह वाह :))))))))))


रश्मि जी ने इस लिंक पर ( http://paricharcha-rashmiprabha.blogspot.in/2012/09/blog-post.html)
ये परिचर्चा लगाई । सब जगह हम भी पढ ही रहे हैं कि क्या हो रहा है और सब पढ रहे हैं कोई व्यथित है तो कोई खुश , किसी को भडास निकालने का मौका मिल रहा है तो किसी को पंगे लेने का तो किसी को आत्मप्रचार का …………सभी तरह के लोग सभी तरह की बातें ………ये तो होगा ही मगर ये परिचर्चा पढकर मुझे जो लगा वो मैने इस प्रकार लिख दिया……


 आयोजन हो या लेखन आलोचना का तो चोली दामन का साथ रहा है और रहेगा इससे बचा नही जा सकता ।जब निज़ी जीवन मे हम बच नही पाते तो फिर यहाँ तो वैसे भी राजनीति होती है सभी जानते हैं बेशक लेखन उम्दा हो तब भी सम्मानित नही हो पाता और कहीं सिर्फ़ जुगाड ही सम्मान पा जाता है उसी तरह आयोजनों का हाल होता है  तो ये सब चलता रहा है और चलता रहेगा क्योंकि लोग ना कल परिपक्व थे ना आज हैं और ना ही आगे होंगे । मैने तो इसीलिये जब रविन्द्र जी ने इस आयोजन के बारे मे पोस्ट लगाई थी तभी एक कविता लगा दी थी क्योंकि पहले भी यही सब हुआ और आज भी मगर उसमे भी लोगों को लगा जैसे गलत कह दिया जबकि जो यहाँ की रीत है वो ही लिखी और देखिये वो ही होता रहा और हो रहा है ………(अब मुझे अन्तर्यामी मत कह देना ) :)

हर चीज़ के दो पहलू होते हैं अच्छे भी बुरे भी फिर हर किसी का नज़रिया भी अलग होता है तो हम किसी को कुछ कहने के हकदार नही क्योंकि जो एक की नज़र मे अच्छा है वो दूसरे की नज़र मे नही है …………फिर क्या जरूरी है जिस नज़र से हम देखें उसी नज़र से सारी दुनिया देखे ? इसलिये जो हो रहा है होने दीजिये और मस्त रहिये दुनिया ऐसे ही चलती है कुछ के लिये दुनिया सम्मान पर ही टिकी है तो कुछ के लिये अपमान पर तो कुछ के लिये सिर्फ़ लेखन पर …………अलग अलग नज़रिये और अलग अलग सोच …………आखिर कब तक बहस होगी और क्या हल निकलेगा ? इन बातों का ना ओर है ना छोर और ना ही हल । 


सोचने वाली बात सिर्फ़ इतनी है कि क्या सम्मान पाने से ही इंसान बडा कहलाता है जो इतना हल्ला मचाया जाये ? 
या इस तरह के आयोजन कोई बदलाव लाते हैं ज़िन्दगी मे ?
क्या इस तरह प्राप्त सम्मान से ही प्रशंसक बढते हैं ?
अरे जो आपको पसन्द करते हैं वो हमेशा ही करेंगे और जो नही करते वो नही करेंगे तो बेकार मे वक्त की बर्बादी क्यों की जाये?

तो निष्कर्ष सिर्फ़ यही है ………
मस्तराम मस्ती मे आग लगे बस्ती मे इस तरह अपने कर्म मे लगे रहो
और दुनिया को अपने हिसाब से जीने दो ………ये दुनिया ना बदली है ना बदलेगी तो क्यों हम खामख्वाह मे अपना वक्त बर्बाद करें और अपने कर्म से च्युत हों । अपने समय का सदुपयोग ही वास्तव मे सबसे बडा धन संचय है और अपने पाठकों का प्रेम सबसे बडा सम्मान यदि ये बात सब समझ लें तो सारी बहसें निर्रथक हो जायें ।






ये सिर्फ़ मेरे विचार हैं इनका किसी से कोई लेना देना नही है ना ही किसी पर कोई कटाक्ष है ना ही बहस ………पसन्द आयें तो भी वाह वाह ना आयें तो भी वाह वाह :))))))))))