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बुधवार, 28 नवंबर 2012

लेखन के संक्रमण काल में

लेखन के संक्रमण काल में
मैं और मेरा लेखन
क्या चिरस्थायी रह पायेगा
क्या अपना वजूद बचा पायेगा
क्या एक इतिहास रच पायेगा
प्रश्नों के अथाह सागर में
डूबता उतराता
कभी भंवर में
तो कभी किनारे पर
कभी लक्ष्यहीन तो
कभी मंज़िल की तरफ़
आगे बढता हिचकोले खाता
एक अजब
कशमकश की उथल पुथल में फ़ंसे
मुसाफ़िर सा
आकाश की ओर निहारता है
तो कभी अथाह जलराशि में
अपने निशाँ ढूँढता है
जबकि मुकाम की सरहद पर
खुद से ही जंग जारी है
नहीं ………ये तो नहीं है वो देश
नहीं ………ये तो नहीं है वो दरवेश
जहाँ सज़दा करने को सिर झुकाया था
और फिर आगे बढने लगती है नौका
ना जाने कहाँ है सीमा
कौन सी है मंज़िल
अवरोधों के बीच डगमगाती
कश्ती जूझती है
अपनी बनायी हर लक्ष्मणरेखा से
पार करते करते
खुद से लडते लडते
फिर भी नही पाती कोई आधार
सोच के किनारे पर खडी
देखती है
सागर में मछलियों की बाढ को
और सोचती है
क्या लेखन के संक्रमण काल से
खुद को बचाकर
रच पायेगी एक इतिहास
जिसके झरोखों पर कोई पर्दा नहीं होगा
कोई बदसलूकी का धब्बा नहीं होगा
जहाँ ना कोई रहीम ना कोई खुदा होगा
बस होगा तो सिर्फ़ और सिर्फ़
ऐतिहासिक दस्तावेज़ अपनी मौजूदगी का
मगर ………क्या ये संभव होगा?
संक्रमण काल में फ़ैलती संक्रामकता से खुद को बचाकर रखना
भविष्य अनिश्चित है
और आशा की सूंई पर
चाहतों की कसीदाकारी पूरी ही हो ………जरूरी तो नहीं
यूँ भी भरी सर्दी में
अलाव कितने जला लो
अन्दर की आग का होना जरूरी है ………शीत के प्रकोप से बचने के लिये
तो क्या …………यही है प्रासंगिकता
भीतरी और बाहरी खोल पर फ़ैली संक्रामकता की ??????

सोमवार, 26 नवंबर 2012

"कुछ" बचा लो ………

यूँ  तो सब मिट चुका है
हर पन्ने से
स्याही से लिखे हर्फ़ों को
कब तक सहेजे कोई
एक बूँद और सब स्वाहा
मगर जानते हो
उस बूँद में लिखे हर्फ़ों को
पढने की कूवत सबमे नही होती
सुना है …………
तुमने सीखा है
अदृश्य तरंगों को पढना
फिर बूँद में छिपी लिखावट
का अपना कायदा होता है
क्या पढा है कभी उस कायदे को
किया है रियाज़ कभी तुमने
रात के अंधेरों में
तन्हाई के आलम में
सर्द हवा के झोंकों मे सिहरते हुये
या अलाव में जलते हुये
गर किया हो तो करना कोशिश पढने की
शायद तब बाँच सको
अलिखित खत की अबूझ भाषा को
और
"कुछ" बचा लो ………उम्र के दरकने से पहले



बुधवार, 21 नवंबर 2012

कसाब को अचानक फ़ांसी दे दी गयी ………आखिर क्यों?

कसाब को अचानक फ़ांसी दे दी गयी ………आखिर क्यों?
अफ़ज़ल गुरु …………2014 तक

सब राजनीति है ……सरकार जानती है चारों तरफ़ से वो घिरी हुयी है भ्रष्टाचार , मंहगाई आदि के मामलों में और बचने का कोई उपाय दिख नहीं रहा था और इधर गुजरात , हिमाचल आदि के चुनाव सिर पर हैं तो आखिरी हथियार के तौर पर कसाब भुनाया गया …………मुख्य कारण तो फ़िलहाल आनन फ़ानन मे यही दिखता है वरना जिसे जँवाई बनाकर इतने दिनों से संभाल कर रखा था, अरबों रुपया जिसकी सुरक्षा पर खर्च किया गया था उसे ऐसे कैसे जाने देते ………बस हलाल करने के मौके का ही तो इंतज़ार था।


आखिर ओबामा के पदचिन्हों  पर चलकर कुछ तो सीखा ……अचानक इसलिये घटित हुआ क्योंकि समय कम था और काम बडा ………जैसे ओबामा ने किया वैसा ही अब ये सरकार कर रही है गुपचुप तरीके से देश के दुश्मन का खात्मा करो और जनता का रुख अपनी तरफ़ मोड लो फिर चाहे पाँच साल तक जनता का दोहन करो । अब ये जनता पर है कि वो अपनी कुम्भकर्णी नींद से जागती है या नहीं और सरकार की कारगुजारियों को समझती है या नहीं ।


दूसरी बारी अफ़ज़ल गुरु की ……बस इंतज़ार करिये 2014 का ………कारण सिर्फ़ एक होगा………सत्ता पर काबिज़ रहना ……येन केन प्रकारेण ………

गुरुवार, 15 नवंबर 2012

भावों का रेला

 1)

शब्दों की बयार पर दौडी चली आती थी 
घन घन मेघ सी छा जाती थी 
ये सोच पर कैसा पडा पाला है 
उमंगो पर भी लगा भावों का ताला है 
वक्त की जो ना बन पायी थाती है 
ये कैसी ज़िन्दगी की परिपाटी है 
चिकनी सपाट सडकों पर भी 
ज़िन्दगी क्यों उलझ उलझ जाती है

यूँ ही नही हर मोड पर अंधी ,खामोश और गहरी खाई है



2)
शब्दों की बारात कहाँ से लाऊँ 
वो सुनहरा साथ कहाँ से लाऊँ 
जो उमड पडता था भीतर से 
वो जज़्बात कहाँ से लाऊँ 

शायद तभी उजडे दयारों मे महफ़िलें नही जमा करतीं………
 

3)

मै इक पहर सी गुजर जाती 
जो तेरी चाहत मे बंध जाती
यूँ तो मोहब्बत का कोई पहर नही होता 
फिर भी हर पहर के लम्हों मे याद बन सिमट जाती


भूले से भी ना छूना उन तहरीरों को 
जिन पर अक्स चस्पाँ होते हैं
बेशक नज़र नही आते मगर
हर हर्फ़ मे आईने गुमाँ होते हैं


4)

कभी कभी खामोशियाँ भी दस्तक नही देतीं 
लम्हों की इससे बडी सज़ा क्या होगी


5)
काश! ज़िन्दगी जवाब दे पाती 
जीने का कोई तरीका बतला पाती 
शायद उसकी भी कोई हसरत निकल आती 

बेजुबान ज़िन्दगी का खामोश सच्……है ना



6)

प्रीत जब कस्तूरी हुई मेरी 
दीवानगी की ना कोई हद रही 
सांवरिया……
अब बिगडी बनाओ या संवारो तुम्हारी मर्ज़ी 
मैने तो जीवन नौका तेरे हवाले कर दी


7)

भावशून्यता शब्दहीनता इकट्ठे हो जायें 
वो पल कहो फिर कैसे कट पायें..........

जैसे रसहीन गंधहीन रंगहीन गुलाब कोई अपने वजूद पर हँस रहा हो……
 

8)

दिल की कडियों के बीच खालीपन यूँ ही नही पसरा होगा 
कोई लम्हा जरूर सुलगती हवा- सा बीच से गुजरा होगा


9)
दर्द यूँ ही नही उतरता लफ़्ज़ों मे
दर्द भी कसक जाता है तब शब्द बन कर ढलता है 
मगर दर्द कभी भी ना पूरा बयान होता है 
इक अधूरा अबूझा आख्यान होता है

10)

दिल की तपिश पर इक अंगार रख चला गया कोई
ये उजडे दयार मे फिर सुलगती चिता छोड गया कोई
अब और क्या बचा जुनून मरने का ओ मेरे मौला
मेरी कब्र पर मुझसे ही गुलाब चढवा गया कोई


11)

फिर कोई नाखुदा मुझे खुदा से मिला दे
रात और दिन का हर फ़र्क मिटा दे
सिलवटों की सिहरनों से आज़ाद करा दे
ओ मौला मेरे, जिस्म को जाँ से मिला दे



12)

कोई एक आह होती तो
सिसकती भी .......निकलती भी
यहाँ तो आहों का बाज़ार लगा है
किस किस का हिसाब रखे कोई
सुकून मिलता है साए में इनके ही
अब किसी ख़ुशी की कोई चाह नहीं
दर्द का कोई नक्शा नहीं होता ना
शायद इसीलिए बिन नक़्शे वाली
दर्द की इबारतों पर मकान नहीं बनते ......



13)
अफ़साने अफ़साने रहे
जिसमे ना "मै" "तुम" रहे

आक के पत्तों का अर्क भी कभी पिया जाता है





रविवार, 11 नवंबर 2012

क्या है दिवाली का औचित्य?


सृजक पत्रिका के प्रथम संस्करण में प्रकाशित मेरा ये आलेख


यूँ   तो हर साल हम दिवाली  का त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाते हैं और खुश होते हैं जैसे कितना बड़ा किला फतह कर लिया हो . जैसे सच में हमने रावण  का अंत कर दिया हो , जैसे सच में अँधेरे पर रौशनी की जीत हो गयी हो मगर क्या सच में ऐसा होता है ? क्या हम इस सच से अन्जान  हैं कि  आज भी अँधेरे का साम्राज्य चहूँ ओर  छाया हुआ है , आज भी रावण का राज्य उसी तरह विस्तार पा  रहा है जैसे तब था , आज भी सीता का हरण हो रहा है , आज भी  ईमानदार  और सत्यवादी का ही शोषण हो  रहा है , वो आज भी सत्य की कसौटी पर खरा उतने की कोशिश में बार बार मूंह की खा रहा है सिर्फ इसी कारण  कि  हम में ही कहीं न कहीं वो रावण  छुपा है जो आज भी राम की विश्वास रुपी सीता का हरण कर रहा है तभी तो ये देश , ये समाज कैसे गर्त में जा रहा है जिससे लगता है रावन राज्य  का कभी अंत हुआ ही नहीं .

सिर्फ फूलझड़ियाँ जला लेना , पटाखे चला लेना , दिए जला लेना ,घर आँगन बुहार लेना और पकवान बना लेना ही दिवाली मनाना  नहीं होता .अपने घर की सुख शांति के लिए लक्ष्मी गणेश की पूजा कर लेना , उनसे वैभव रिद्दी सिद्धि मांग लेना ही दिवाली मनाना नहीं होता .

सदियों से हम दिवाली को प्रतीक  के रूप में मनाते  आये मगर कभी  उसके महत्त्व को अपने जीवन में उतरना नहीं चाहा , कभी उसका महत्त्व समझना नहीं चाहा  तभी हमारा ये हाल है . चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार, घोटालों, बेईमानी ,हिंसा , यौन उत्पीडन , बलात्कार आदि का ही बोलबाला है और हम मूकदर्शक बने खड़े हैं ये सोच ऐसा हमारे साथ तो नहीं हुआ इसलिए हम क्यों आगे बढें , क्यों दूसरे  के फटे में टाँग  अडायें , अरे भाई हमें तो अपनी गृहस्थी संभालनी है और हम मूँह  फेर लेते हैं ऐसी विभीषिकाओं से जो एक दिन हमें अपने चंगुल में लपेट लेती हैं और उसके बाद कोई रास्ता खुला नहीं दिखता  तो हम बिलबिलाते हैं , कसमसाते हैं मगर तब भी ये नहीं समझ पाते हैं कि  हमने ही तो ये फसल बोई थी तो आज  काटनी  भी पड़ेगी . जबकि हम सभी जानते हैं कि  राम ने कभी असत्य , हिंसा , , झूठ कपट का रास्ता नहीं अपनाया उन्होंने हमेशा मर्यादित जीवन जिया मगर हम सिर्फ उनके जीवन को एक खेल तमाशा बनाकर मनोरंजन करते हैं , 10 दिन रामलीला की छुट्टियां मनाते हैं और फिर अपने काम पर लग जाते हैं मगर उनके जीवन के एक भी आदर्श को जीवन में नहीं उतारते तो भला ऐसे दिवाली का त्यौहार मनाने का क्या औचित्य ?

क्या हम खुद को धोखा नहीं दे रहे ? क्या हम अपनी आगे आने वाली पीढ़ी को आँख मूंदने वाले संस्कार नहीं दे रहे? और हमारे  ऐसे कृत्यों से किसका भला होगा ? क्या देश का, क्या समाज का , क्या हमारे बच्चों का ? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर समय रहते नहीं खोजा गया तो आने वाली पीढियां गूंगी , बहरी और अंधी  होंगी और उसके जिम्मेदार हम होंगे जो उनमे संस्कारों और मर्यादाओं के बीज न रोप सके और हमारे इस देश का नाम जो आज भी गौरव की बात है , सम्मान से लिया जाता है उसमे हमारी नपुंसकता का एक काला  अध्याय और जुड़ जायेगा जिसे किसी भी स्याही से न मिटाया जा सकेगा इसलिए जरूरी है वो वक्त आने से पहले हम चेत जायें और दिवाली के महत्त्व को समझें और समझायें और उसे जीवन में उतारें न केवल अपने बल्कि हर इंसान के दिल में एक दिवाली का दीया जलायें  तभी उसके  प्रकाश से हम , हमारा समाज और हमारा देश आलोकित होंगे  और यही तो दिवाली मनाने का  वास्तविक सन्देश है ..........हर घर आँगन आलोकित हो सत्य, अहिंसा,  ईमानदारी  और सदाचार के आलोक से .

बुधवार, 7 नवंबर 2012

क्रांति के बीज यूँ ही नहीं पोषित होते हैं

जिसने भी लीक से हटकर लिखा

परम्पराओं मान्यताओं को तोडा

पहले तो उसका दोहन ही हुआ

हर पग पर वो तिरस्कृत ही हुआ

उसके दृष्टिकोण को ना कभी समझा गया

नहीं जानना चाहा क्यूँ वो ऐसा करता है

क्यूँ नहीं मानता वो किसी अनदेखे वजूद को

क्यूँ करता है वो विद्रोह

परम्पराओं का

धार्मिक ग्रंथों का

या सामाजिक मान्यताओं का

कौन सा कीड़ा कुलबुला रहा है

उसके ज़ेहन में

किस बिच्छू के दंश से

वो पीड़ित है

कौन सी सामाजिक कुरीति

से वो त्रस्त है

किस आडम्बर ने उसका

व्यक्तित्व बदला

किस ढोंग ने उसे

प्रतिकार को विवश किया

यूँ ही कोई नहीं उठाता

तलवार हाथ में

यूँ नहीं करता कोई वार

किसी पर

यूँ ही नहीं चलती कलम

किसी के विरोध में

यूँ ही प्रतिशोध नहीं

सुलगता किसी भी ह्रदय में

ये समाज  में

रीतियों के नाम पर

होते ढकोसलों ने ही

उसे बनाया विद्रोही

आखिर कब तक

मूक दर्शक बन

भावनाओं का बलात्कार होने दे

आखिर कब तक नहीं वो

खोखली वर्जनाओं को तोड़े

जिसे देखा नहीं

जिसे जाना नहीं

कैसे उसके अस्तित्व को स्वीकारे

और यदि स्वीकार भी ले

तो क्या जरूरी है जैसा कहा गया है

वैसा मान भी ले

उसे अपने विवेक की तराजू पर ना तोले

कैसे रूढ़िवादी कुरीतियों के नाम पर

समाज को , उसके अंगों को

होम होने दे

किसी को तो जागना होगा

किसी को तो विष पीना होगा

यूँ ही कोई शंकर नहीं बनता

किसी को तो कलम उठानी होगी

फिर चाहे वार तलवार से भी गहरा क्यूँ ना हो

समय की मांग बनना होगा

हर वर्जना को बदलना होगा

आज के परिवेश को समझना होगा

चाहे इसके लिए उसे

खुद को ही क्यूँ ना भस्मीभूत करना पड़े

क्यूँ ना विद्रोह की आग लगानी पड़े

क्यूँ ना एक बीज बोना पड़े

जन चेतना , जन जाग्रति का

ताकि आने वाली पीढियां ना

रूढ़ियों का शिकार बने

बेशक आज उसके शब्दों को

कोई ना समझे

बेशक आज ना उसे कोई

मान मिले

क्यूँकि जानता है वो

जाने के बाद ही दुनिया याद करती है

और उसके लिखे के

अपने अपने अर्थ गढ़ती है

नयी नयी समीक्षाएं होती हैं

नए दृष्टिकोण उभरते हैं

क्रांति के बीज यूँ ही नहीं पोषित होते हैं

मिटकर ही इतिहास बना करते हैं

सोमवार, 5 नवंबर 2012

क्षणिका………एक दृष्टिकोण



क्षण क्षण भावों का रेला
कैसे रूप बदलता है
तभी तो प्रतिपल
क्षणिका का ढांचा बनता है

क्षणिक अभिव्यक्ति
क्षणिक आवेग
क्षणिक संवेग
क्षणिक है जीवन की प्रतिछाया
तभी तो क्षणिका के क्षण क्षण मे
जीवन का हर रंग समाया




क्षण क्षण मे क्षण घट रहा
नया रूप ले रहा
वंचित भावों का उदगम स्थल
त्वरित विचारों का जाल
क्षणिका का रूप बन रहा


दोस्तों ,


क्षणों का हमारे जीवन मे कितना महत्त्व है ये उस वक्त पता लगा जब सरस्वती सुमन पत्रिका का त्रैमासिक क्षणिका विशेषांक (अक्टूबर - दिसम्बर 2012)  मिला तो ख़ुशी का पारावार न रहा . इतनी बड़ी पत्रिका में एक नाम हमारा भी जुड़ गया . ह्रदय से आभारी हूँ हरकीरत हीर जी की और जीतेन्द्र जौहर जी की जो उन्होंने हमें इस लायक समझा और इतने वरिष्ठ कवियो और  रचनाकारों के बीच एक स्थान हमें भी दिया .

क्षणिका विशेषांक पढना अपने आप में एक सुखद अनुभूति है . सबसे जरूरी होता है उस विशेषांक का महत्त्व दर्शाना और उसकी विशेषता बताना , उसकी बारीकियों पर रौशनी डालना और ये काम आदरणीय जीतेन्द्र जौहर जी ने बखूबी किया है .पहले तो सबकी क्षणिकाएं आमंत्रित करना उसके बाद 179 रचनाकारों को छांटकर उन की क्षणिकाओं को स्थान देना कोई आसान कार्य नहीं था जिसे हरकीरत जी ने बखूबी निभाया . तक़रीबन एक साल से वो इसके संपादन में जुडी थीं ....नमन है उनकी उर्जा और कटिबद्धता को .

सरस्वती सुमन का क्षणिका विशेषांक यूं लगता है जैसे किसी माली ने  उपवन के एक- एक फूल पर अपना प्यार लुटाया हो . कुछ भी व्यर्थ या अनपेक्षित नहीं ........सब क्रमवार . संयोजित और संतुलित ढंग से सहेजना ही कुशल संपादन का प्रतीक है . शुभदा पाण्डेय जी द्वारा " क्षणिका क्या है " की व्याख्या करना क्षणिका के महत्त्व को द्विगुणित करता है . क्षणिका के शिल्प और संवेदना पर प्रोफेसर सुन्दर लाल कथूरिया जी का आलेख क्षणिका के प्रति गंभीरता का दर्शन कराता है तो दूसरी तरफ डॉक्टर उमेश महादोषी ने क्षणिका के सामर्थ्य पर एक बेहद सारगर्भित आलेख प्रस्तुत किया है जो क्षणिका की बारीकियों के साथ कैसे क्षणिकाएं लिखी जाएँ उस पर रौशनी डालता है और कम से कम नवोदितों को एक बार इस विशेषांक को जरूर पढना चाहिए क्योंकि ये विशेषांक अपने आप में क्षणिकाओं का एक महासागर है जिसमे वो सब कुछ है जो किसी को भी लिखने से पहले पढना जरूरी है . बलराम अग्रवाल जी द्वारा क्षणिका के रचना विधान को समझाया गया है कि  काव्य से क्षणिका किस तरह भिन्न है और उसे कैसे प्रयोग करना चाहिए , कैसे लिखना चाहिए हर विधा को बेहद सरलता और सूक्ष्मता  से समझाया गया है .

पूरा विशेषांक एक उम्दा , बेजोड़ , पठनीय और संग्रहनीय संस्करण है और यदि ये संस्करण किसी के पास नहीं है तो वो एक अनमोल धरोहर से वंचित है . सब रचनाकारों के विषय में कहना तो कठिन है क्योंकि सभी बेजोड़ हैं . हर क्षणिका अपने में एक कहानी समेटे हुए हैं . सोच के दायरे को विस्तार देती अपने होने का अहसास कराती है जो किसी भी पत्रिका का अहम् अंग होता है . क्षणिका विशेषांक निकलना अपने आप में पहला और अनूठा प्रयास है जो पूरी तरह सफल है जिसकी सफलता में सभी संयोजकों और संपादकों की निष्ठा और लगन का हाथ है जिसके लिए सभी रचनाकार कृतज्ञ हैं।

अंत में आनंद सिंह सुमन जी का हार्दिक आभार जो अपनी पत्नी की याद में ये पत्रिका निकालते हैं अगर कोई संपर्क करना चाहे तो इस मेल या पते पर कर सकता है

सारस्वतम
1---छिब्बर मार्ग (आर्यनगर) देहरादून --- 248001

mail id ...... saraswatisuman@rediffmail.com

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

एक चुटकी सिंदूर की कीमत……………



एक चुटकी सिंदूर की कीमत……………करवाचौथ का व्रत
कुछ ज्यादा तो नहीं
जो पतिदेव ने दोहराया
सुन पत्नी रानी ने फ़रमाया
प्यारे पिया
मुझे एक डायमंड नेकलैस
हाथों में सोने की चूडियाँ
एक डिज़ाइनर साडी
किसी फ़ाइव स्टार मे भोजन
करवा देना
कौन सा कुछ अपने लिये करती हूँ
तुम्हारी लंबी उम्र की कामना करती हूँ
तुम्हारे लिये ही तो व्रत रखती हूँ
अब इतना सब करने पर
ये सब पाना  तो
एक सुहागिन का
अधिकार बनता है
इसमें कौन सा तुम्हारा
बजट बिगडता है
तुम ही तो फ़लोगे फ़ूलोगे
खुशियों के फ़ूल चुनोगे
लंबा जीवन जीयोगे
और मुझे दुआयें दोगे

सुनो पतिदेव
मौके का फ़ायदा उठाओ
ऐसा पैकेज़ ना रोज-रो्ज मिलता है
गर इतना कर सको तो बता देना
फिर चाहे रोज़ ऐसे व्रत रखवा लेना

जो पति ने सुना
पसीने से लथपथ हो
धडाम से बिस्तर से गिरा
बुरे स्वप्न की नींद से जगा
और असलियत का जायज़ा लिया
गर सच मे ऐसा होने लगे तो???
प्रश्न पर आकर बुद्धि उसकी अटक गयी

हो किसी पर जवाब तो बता देना
बेचारे की पहेली सुलझा देना …………:)

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

मेहंदी लगे हाथ



पता नहीं क्यों
अब मेहंदी लगे हाथों
का आकर्षण
नहीं लुभाता मुझे
और तुम जानते हो
कभी वो वक्त था
जब मेहंदी
मेरी रूह में बसती थी
जब मेहँदी का रंग
मेरी सांसों संग
महकता था
जब मेहंदी के लिए
मैं रात रात भर जागा करती थी
तीलियों से मेहँदी लगाना
कहाँ सुगम था
आज कल जैसे थोड़े ही
कि कीप बनाओ और झट लगा दो
वो वक्त और था
जब मेहंदी एक परंपरा होती थी
जब मेहंदी सिर्फ मेहंदी नहीं होती थी
उसमे साजन का प्यार घुला होता था
मेहंदी लगे हाथ देख
अन्दर ही अन्दर
एक शोखी सी अंगडाई लेती थी
तभी तो सुबह उठकर
सबसे पहले उसके रंग पर
निगाह जाती थी
रंग .......हाँ , मेहंदी का रंग
बस उसी पर तो सारा
दारोमदार होता था
जो कहीं ना कहीं
मन के किसी चोर को
हकीकत बयां कर जाती थी
जितना गाढ़ा रंग होता था
उतनी ही हया की लाली
सुर्ख हो जाती थी कपोलों पर
और इतराने लगती थी खुद पर
मगर ना जाने
वक्त का कैसा उल्टा पहिया घूमा
मेहंदी ने मुझसे नाता सा ही तोड़ लिया
चाह तो आज भी परवान चढ़ती है
मगर फिर सब अवांछित सा लगता है
क्योंकि
प्रेम कब मेहंदी के रंग का मोहताज रहा है
ये बात शायद अब समझ आ गयी है
तभी जो मेहंदी तुमने अपने प्रेम के रंगों से घोली है
वो ही तो मेरी आत्मा पर लगी है
और उसका सुर्ख रंग
नहीं छूटेगा जन्म जन्मान्तरों तक
फिर बताओ तो ज़रा
इन दिखावे के रिवाजों की कर्ज़दार मैं क्यों बनूँ ........है ना साजन !!!!!!!!!!