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मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जायें हम दोनों

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जायें हम दोनों
कहना कितना आसान लगता है ना
मगर क्या वास्तव मे ये संभव है
कैसे खुरच कर निकालोगे उन यादों के ढेर को
जो कहीं हीरे - जवाहरात सा
तो कहीं कूडे - कचरे सा
जमा होगा दिल के कोने - कोने में
कहीं यादों की कडवाहट
तो कहीं किलकारियाँ भरती जगमगाहटें
कहीं दर्द के फ़ानूस लटके होंगे
तो कहीं मोहब्बत के दीये जले मिलेंगे
जो कदम - कदम पर अपनी
उपस्थिति का भान कराते रहेंगे
जो कभी डराते रहेंगे
तो कभी उलझाते रहेंगे
और परिस्थिति वो ही दुरूह सी हो जायेगी
क्या आसान है अजनबी हो जाना
एक दूसरे को करीब से इतना जानने के बाद
क्या मुमकिन है एक नयी शुरुआत करना
फिर से अजनबियत का नकाब ओढ कर
जहाँ जानने को अब कुछ बचा ही ना हो
ये सिर्फ़ कहने में ही अच्छा लग सकता है
हकीकत में तो शुरुआत हमेशा शून्य से ही हुआ करती है ………

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

डायलाग की एक शाम बेटियों के नाम

दोस्तों



23 फ़रवरी की शाम एक यादगार शाम बन गयी जब मिथिलेश श्रीवास्तव जी ने बेटियों के प्रति बढ रही असंवेदनशीलता के प्रति एक जागरुकता का आहवान किया और एकेडमी आफ़ लिटरेचर एंड फ़ाइन आर्टस के अंतर्गत "डायलाग" के माध्यम से सुप्रसिद्ध कवि और आल इंडिया रेडियो के निदेशक श्री लीलाधर मंडलोई जी , श्री लक्ष्मी शंकर वाजपेयी जी , अंजू शर्मा जी के साथ लगभग 25 कवियों को इस आहवान में शामिल किया और बेटियों के प्रति कौन क्या महसूसता है उन भावनाओं को व्यक्त करने को मंच प्रदान किया । 



इस कार्यक्रम के अंतर्गत सुधा उपाध्याय के द्वारा संचालित मंच पर महाकवि निराला की कविता 'सरोज-स्मृति' का पाठ कवि लीलाधर मंडलोई जी ने किया।कात्यायनी की कविता 'हॉकी खेलती लडकियां' का पाठ करेंगे लक्ष्मी शंकर वाजपेयी और चंद्रकांत देवताले की कविता 'दो लड़कियों का पिता होने से' का पाठ अंजू शर्मा ने किया जिसमें वहाँ उपस्थित हर श्रोता और वक्ता डूब गया।

उसके बाद वहाँ उपस्थित सभी कवियों ने अपनी अपनी वाणी के माध्यम से अपने उदगार प्रस्तुत किये जिसमें शामिल थे ………भावना चौहान,शारिक असिर , शोभा मित्तल, शोभा मिश्रा, राजेश्वर वशिष्ठ, उमा शंकर, शशि श्रीवास्तव, सुधा उपाध्याय, अंजू शर्मा, मिथिलेश श्रीवास्तव, ममता किरन, अजय अज्ञात, उपेन्द्र कुमार, विभा शर्मा, भरत तिवारी,विनोद कुमार, अर्चना त्रिपाठी ,विपिन चौधरी, रूपा सिंह ,ओमलता,अर्चना गुप्ता, संगीता शर्मा और मैं यानि वन्दना गुप्ता सहित काफ़ी कवियों ने कविता पाठ के माध्यम से अपने अपने विचार व्यक्त किये। कुछ नाम याद ना रहने की वजह से छूट रहे हैं उसके लिये माफ़ी चाहती हूँ और काफ़ी लोग आये भी नही थे जिनके नाम शामिल थे । इस प्रकार एक यादगार शाम ने ये सोचने को मजबूर कर दिया कि बेटियों का हमारे जीवन मे क्या महत्व है और आम जन बेटियों के प्रति कितना संवेदनशील है और इस तरह के आयोजन समाज की जागरुकता के लिये होते रहना एक स्वस्थ संकेत हैं ।ना जाने कैसे ये कह दिया गया कि लेखक समाज दामिनी के प्रति हुई क्रूरता के प्रति अपनी संवेदनायें प्रकट करने इंडिया गेट आदि जगहों पर नहीं पहुँचा । शायद उन्होने फ़ेसबुक और ब्लोग आदि पर नज़र नहीं डाली जहाँ दिन रात सिर्फ़ और सिर्फ़ दामिनी के प्रति हुयी क्रूरता पर आक्रोश उबल रहा था और यहाँ तक कि किसी ने नववर्ष की शुभकामनायें भी देना उचित नहीं समझा तो कैसे कह दें बेटियों के प्रति असंवेदनशील है ये समाज या इस समाज का लेखक । यदि उसकी एक झलक देखनी होती तो कल का ये कार्यक्रम अपने आप में पूर्ण विवरण प्रस्तुत करता है और समाज मे एक संदेश भी प्रसारित करता है। 

इन सबके अलावा काफ़ी मित्रगण भी वहाँ उपस्थित थे जैसे अमित आनन्द पाण्डेय, निरुपमा सिंह, सुशील क्रिश्नेट, विनोद पाराशर जी , जितेन्द्र कुमार पाण्डेय आदि और भी बहुत से मित्रगण जिन्होने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर ये साबित किया कि कितने जागरुक हैं आज के सरोकारों के प्रति।

इस कार्यक्रम की सबसे बडी उपलब्धि ये है कि इसे मीडिया कवरेज भी मिला और आज के हिन्दुस्तान के पेज पाँच पर पूरा एक आर्टिकल चित्र के साथ उपस्थित है जो दर्शा रहा है कि 

पहुँचती है आवाज़ स्वरभेदी दीवारों के पार भी

गर प्यार से दस्तक तो दे कोई 




अंत में अपने अध्यक्षीय भाषण से लीलाधर मंडलोई जी ने कविता कैसे लिखी जाये , कैसे आत्मसात की जाये और फिर कैसे पढी जाये ताकि सामने वाले के दिल में सीधे उतर जाये के बारे में वहाँ उपस्थित सभी कवियों और श्रोताओं  का ज्ञानवर्धन किया और बेटियों के प्रति हो रही असंवेदनशीलता पर अपनी कविता सुनाकर कार्यक्रम को समापन की ओर ले गये। उसके बाद जलपान करके सबने आपस मे एक दूसरे को अपना परिचय दिया और इस प्रकार एक सौहार्दपूर्ण वातावरण में एक यादगार शाम का समापन हुआ ।



ये है हिन्दुस्तान मे छपी तस्वीर


सुधा उपाध्याय कार्यक्रम का संचालन करती हुई 


लीलाधर मंडलोई जी कविता पाठ करते हुये 


श्रोता सुनते हुये 
लक्ष्मी शंकर वाजपेयी जी कविता पाठ करते हुये 

विभा जी
अंजू शर्मा चन्द्रकांत देवताले की कविता का पाठ करती हुई

रूपा सिंह वक्तव्य के साथ कविता पाठ करती हुई
मिथिलेश श्रीवास्तव कविता पाठ करते हुये 

शोभा मिश्रा कविता पाठ करते हुये 



हमें भी मौका मिला तो हमने भी अपनी बात कह ही दी …………पहचान मे आने की गारंटी नहीं………अरे भाई उम्र का तकाज़ा है …………फ़ोंट छोटे थे तो पढने को आँखों पर आँखें चढानी पडीं 

पहचान तो लिया ना :)






विपिन चौधरी कविता पाठ करती हुई








अर्चना त्रिपाठी जी कविता पाठ करती हुयी
शोभा मित्तल कविता पाठ करते हुये 



अर्चना

श्रोता सुनते हुये 

संगीता श्रीवास्तव जी 

मौका था तो कैसे चूकते इसलिये बहती गंगा में हमने भी हाथ धो लिये और एक फ़ोटो लीलाधर मंडलोई जी के साथ खिंचवा ली ………यादों की धरोहर बनाकर 
ये देखिये अंदाज़ खाने पीने का शोभा मिश्रा और निरुपमा का :) 

और ये शाम की आखिरी याद कैमरे मे समेट ली 


जिनके नाम याद नहीं उनके नही दिये और कुछ फ़ोटो सही नहीं आये तो वो नहीं लगाये इसलिये कुछ लोग छूट गये हैं :) …………अगली पोस्ट मे उस कविता का जिक्र करेंगे जो कविता पाठ हमने किया था ……झेलने को तैयार रहियेगा 

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

लफ़्ज़ों को ओढना और बिछाना ही मोहब्बत नहीं होती.............

अपने गलत को भी तुमने

सदा सही माना

मेरी सच्चाई को भी तुमने

सदा ही नकारा

तुम तो अपनी कहकर

सदा पलट जाते हो

कभी मुड कर ना

हकीकत जान पाते हो

और अपने किये को

अपना प्यार बताते हो

मगर मेरे किये पर

सदा तोहमत लगाते हो

प्यार का अच्छा हश्र किया है

और इसे तुमने प्यार नाम दिया है

आह ! कितना आसान है ना

इलज़ाम लगाना

कितना आसान है ना

मोहब्बत के पर कुचलना

मोहब्बत करने वाले तो

मोहब्बत का दिया

विष भी अमृत समझ पीते हैं

मोहब्बत में ना शिकवे होते हैं

सिर्फ प्यारे की चाह में ही

अपनी चाह होती है

और मैंने तो ऐसी ही मोहब्बत की है

मगर तुम ये नहीं समझोगे

तुम्हारे लिए मोहब्बत

चंद अल्फाजों के सिवा कुछ नहीं

तुम्हारे लिए मोहब्बत

सिर्फ तुम्हारी चाहतों के सिवा कुछ नहीं

तुम्हारे लिए मोहब्बत

सिर्फ एक लफ्ज़ के सिवा कुछ नहीं

मोहब्बत कहना और मोहब्बत करने में फर्क होता है

शायद ये तुम कभी नहीं समझोगे

मोहब्बत तो वो जलती चिता है जानां

जिसे पार करने के लिए

मोम के घोड़े पर सवार होना पड़ता है

और तलवार की धार पर चलते

उस पार उतरना होता है

वो भी मोम के बिना पिघले

क्या की है तुमने ऐसी मोहब्बत ?

लफ़्ज़ों को ओढना और बिछाना ही मोहब्बत नहीं होती.............

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

25 वर्षों का सफ़र एक स्वप्न-सा



ज़िन्दगी सफ़र है सुहाना
 कहीं काँटों भरी राह 
कहीं फ़ूलों का है खज़ाना 
साथी बस ऐसे ही साथ निभाना 
कभी रूठना कभी मनाना 
बस प्रेम की ताल पर मधुर राग गाना 

हमारे जीवन के 25 वर्षों का सफ़र एक स्वप्न-सा आज अपने पहले पडाव पर पहुँच गया ……

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

आखिरी लम्हों की मीठी यादों का सफ़र ………2013

आज हिन्द युग्म से प्रकाशित रश्मि प्रभा जी के संपादन में हमारी एक और किताब "नारी विमर्श के अर्थ " का विमोचन कवि उदभ्रांत जी के हाथों सम्पन्न हुआ जिस अवसर पर नारी शक्ति के रूप में ……मैं , अंजू चौधरी, रंजू भाटिया और सरस दरबारी मौजूद थे जिसने इस पल को सार्थक कर दिया और नारी विमर्श के वास्तविक अर्थ को साकार किया। कवि उदभ्रांत जी का हार्दिक आभार जो मुझे अचानक वहाँ मिले और सिर्फ़ एक बार कहने पर ही विमोचन के लिये तैयार हो गये और वक्त पर पहुँच भी गये । इतनी सौम्यता और अपनापन पाकर मैं तो अभिभूत हुयी जबकि उनसे पहली बार मिलना हुआ था । यूँ तो सात तारीख को "शब्दों की चहलकदमी" का विमोचन भी उन्हीं के हाथों सम्पन्न हुआ था मगर उस वक्त मैं उपस्थित नहीं रह सकी तो वो कमी भी आज पूरी हो गयी।






 ना जाने कितने दोस्तो से मु्लाकात हुयी जिन्हें हम उनके ब्लोग से तो जानते थे मगर रु-ब-रु कभी नहीं हुये थे आज पुस्तक मेले में गो संयोग भी बन गया । मेरे साथ खडे हैं कैलाश शर्मा जी, गीता पंडित जी, मोहिन्दर कुमार जी अपनी पत्नी के साथ …………जिनसे अब तक मिलना हुआ ही नहीं था




 राजीव तनेजा जी, गिरीश पंकज जी , शैलेश भारतवासी , गीता पंडित , और मनीष कुमार



अंजू और मुकेश कुमार सिन्हा के पुस्तक विमोचन में तो सबसे मिलना हो गया । सरस दरबारी , गुंजन श्रीवास्तव, महेन्द्र श्रीवास्तव, हरि शर्मा, रेखा श्री वास्तव, महफ़ूज़, सुनीता शानू, मीनाक्षी पंत, मीनाक्षी मिश्रा तिवारी, राघवेन्द्र श्रीवास्तव, नीता कोटेचा , नी्ता पोरवाल, अनुपमा त्रिपाठी,खुशदीप सहगल सपरिवार ना जाने कितने फ़ेसबुक और ब्लोग जगत के दोस्तों से मिलना हुआ जो अपने आप मे एक सु्खद अनुभव था जो हमारे सबके ज़ेहन मे हमेशा एक याद बनकर रहेगा