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मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

स्वागत तो आपको करना ही पडेगा

स्वागत तो आपको करना ही पडेगा 
विगत के भय , संशयों और आशंकाओं को त्याग कर 
क्योंकि विगत की कहीं ना कहीं की गयी 
उपेक्षा ही कारण होती है 
आगत के दर्शन का 
आगत के शोक का 
आगत के भय का 
और इस बार त्यागना है उन आशंकाओं की मशालों को 
जिनसे भयभीत हम करते हैं बीजारोपण 
आने वाले कल में उन बीजों का 
जिनकी कोई शक्ल नहीं होती 
मगर हम खींच देते हैं तस्वीर 
और फिर करते हैं स्यापा ये जाने बिना 
निर्माता हैं हम खुद ही उस तस्वीर के 
जनक हैं उस शिशु के जिसका जन्म 
हमारी ही नपुंसकता से हुआ है 
और ये सिलसिला यूँ ही चलता रहा था और चलता रहेगा 
जब तक नहीं होंगे हम मुक्त 
अपनी ही आशंकाओं के बादलों से 
और नहीं करेंगे स्वागत आगत का 
हर्षमिश्रित मुस्कानों और मीठी ज़ुबानों से 
आओ करें आहवान एक खुशगवार कल का ............


नववर्ष 2014 सभी के लिये मंगलमय हो ,सुखकारी हो , आल्हादकारी हो …………

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

जाने कैसा मेरा मुझसे लिजलिजा नाता है

जाने कैसा मेरा मुझसे लिजलिजा नाता है 
बस लकीर का फ़क़ीर बनना ही मुझे आता है 
बदलाव की बयार भी मुझको चाहिए 
जादू की मानो कोई छड़ी होनी चाहिए 
जो घुमाते ही अलादीन के चिराग सी 
सारे मसले हल करनी चाहिए 
मगर सब्र की कोई ईमारत ना मैं गढ़ना चाहता हूँ 
बस मुँह से निकली बात ही पूरी करना चाहता हूँ 
खुद को आम बताता जाता हूँ 
मगर खास की श्रेणी में आना चाहता हूँ 
आम -ओ- खास की जद्दोजहद से 
ना बाहर आना चाहता हूँ 
जो है जैसा है की आदत से न उबरना चाहता हूँ 
यही मेरी कमजोरी है 
जिसका फायदा भ्रष्ट तंत्र उठाता जाता है 
और मैं आम आदमी यूं ही 
सब्जबागों में पिसा जाता हूँ 
साठ साल से खुद को छलवाने की जो आदत पड़ी 
उससे ना उबर पाता हूँ 
मगर किसी दूजे को छह साल भी 
ना दे पाता हूँ 
जो मेरे लिए लड़ने को तैयार है 
जो मेरे लिए सब करने को तैयार है 
उसे ही साथ की जमीन ना दे पाता हूँ 
फिर क्यों मैं बार बार चिल्लाता हूँ 
फिर क्यों मैं बार बार घबराता हूँ 
फिर क्यों मैं बार बार दोषारोपण करता हूँ 
जब आम होते हुए भी आम का साथ ना देता हूँ 
नयी परिपाटी को ना जन्मने देता हूँ 
ये कैसा आम आदमी का आम आदमी से नाता है 
जो आम को आम बने रहने के काम ना आता है 

इसीलिए सोचता हूँ 
जाने कैसा मेरा मुझसे लिजलिजा नाता है 
बस लकीर का फ़क़ीर बनना ही मुझे आता है

रविवार, 22 दिसंबर 2013

जानते हो मेरे इंतज़ार की इंतेहा

इश्क और इंतज़ार 
इंतज़ार और इश्क 
कौन जाने किसकी इंतेहा हुयी 
बस मेरी मोहब्बत कमली हो गयी 
और मेरे इंतज़ार के पाँव की फटी बिवाइयों में 
अब सिर्फ तेरा नाम ही दिखा करता है 
खुदा का करम इससे ज्यादा और क्या होगा 
देखूँ जब भी अपना चेहरा तेरा दिखा करता है 


जानते हो मेरे इंतज़ार की इंतेहा 
सारा शहर पत्थर हो गया 
हर नदी नाला सूख गया 
हर शाख जो हरी भरी थी 
पाला पड़ी फसल सी 
ज़मींदोज़ हो गयी 
दिल की जमीन ऐसी बंजर हुयी 
बादल कितना ही बरसें 
हरी होती ही नहीं 
शिराओं में जो बहती थी लहू बनकर 
मोहब्बत वहीँ थक्कों सी जम  गयी 
देख तो इंतेहा मोहब्बत की 
अश्क जो बहते थे आँखों से 
वहाँ अब तेरे नाम की इबादतगाह बन गयी 
चप्पे चप्पे पर तेरा नाम लिखा है 
आँख से झरना नहीं तेरा नाम झरा है 
क्या तू भी कभी ताप से नहीं शीत से जला है ……मेरी तरह महबूब मेरे!!! 

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

तुम हो तो ………मेरी नज़र में

पाथेय प्रकाशन जबलपुर से प्रकाशित कवयित्री प्रतिमा अखिलेश का प्रथम काव्य संग्र "तुम हो तो " छंदमुक्त और छंदबद्ध कविताओं का एक खूबसूरत संकलन है जिसमे प्रेम की प्रधानता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अपने प्रियतम को ही " तुम हो तो " नाम देकर संकलन को समर्पित कर दिया गया है।  संग्रह की विशेषता है कि इसमें जीवन के प्रत्येक पहलू को संकलित करने की कोशिश की गयी है फिर चाहे प्रकृति हो , ईश्वर हो , दलित विमर्श हो या स्त्री विमर्श , सामजिक चेतना हो या राजनितिक विडंबनाएँ सभी विषयों को समाहित करता संकलन वैविध्य की दृष्टि से खुद को विशिष्ठ बनाता है।  

प्रेम को परिपूर्णता देना कोई कवयित्री से सीखे जिसने अपने जीवनसाथी में ही सारा प्रेम का ब्रह्माण्ड खोज लिया तभी तो वो कहती हैं 

"जीवनसाथी /तुम हो तो/ ईंगुर/ कुमकुम/ कजरे की धार/ श्रृंगार/ महावर/ पायल / बाजूबन्द हैं /तुम हो तो / प्रकृति/ सृष्टि/ ईश्वर/किस्मत / सौभाग्य / समय / सब मेरे संग हैं /तुम्हीं से मेरे जीवन का /धर्म कर्म / अनुबंध है "

इसी तरह जीवन यात्रा को साहित्यिक रूप बहुत ही खूबसूरती से दे दिया जहाँ चंद शब्दों में पूरे जीवन की यात्रा को चित्रित कर दिया :

"जीवन / एक साहित्यिक यात्रा रहा / काव्यानुभूति से शुरू हुआ बचपन/ यौवन की / पद्यात्मक अनुभूति पार करता / प्रौढ़ हो चला है / गद्यात्मक एवं व्यंग्यात्मक शैली में / और अब कहानी बन / प्रतीक्षारत है / उपसंहार की और "

तो दूसरी तरफ एक गरीब लाचार माँ की पीड़ा से पीड़ित मन ईश्वर के अस्तित्व को भी झंझोड़ देता है और एक प्रश्न उसकी तरफ भी उछाल देता है जिसमे एक माँ की वेदना अपने चरम पर होती है :

" हे बाल गोपाल / क्षमाप्रार्थी हूँ कि / मैं उखाड़ फेंका तुम्हारे चित्र को / दीवार से / खूँटी से क्योंकि मेरी ममता तार तार हो रही थी / मैं नहीं सह पा रही थी / मेरे बच्चों का / चूल्हे के पास बैठकर / रूखी सूखी खाना / और लालायित आँखों से / तुम्हारी मटकी से बहता / दूध दही / मुख पर लिप्त / मक्खन देखना / मेरा ह्रदय दो भागों में बाँट जाता है / जब नन्हा कहता है / बड़े मनुहार से / माँ तू कब मक्खन देगी/ सूखी रोटी गले में अटकती है " 

वेदना की पराकाष्ठा को छूती पंक्तियाँ यूँ प्रतीत होती हैं मानो निकट से गुजरीं हों उस तकलीफ से 


" कोई तो रोक ले " कविता में बाल मजदूरी के प्रति कवयित्री का मन समाज के असंवेदनशील होते मन से एक प्रश्न कर रहा है अगर ऐसा होता रहा तो कल देश का भविष्य कैसा होगा ?

"ईश्वर" कविता में समाज में फैली दरिंदगी के लिए कवयित्री ईश्वर को भी कटघरे में खड़ा कर देती है कि अगर तुम हो तो निसहाय बच्चियों के साथ अमानवीय अत्याचार बलात्कार के रूप में क्यों हो रहा है तुम्हें सिद्ध करना होगा अपने अस्तित्व को नहीं तो नकारती है कवयित्री की संवेदना ईश्वर के अस्तित्व को जो दर्शाता है व्यथा जब हद से पार हो जाती है तो किस चरम पर पहुँच जाती है। 

जो हमारे लिए बेकार है , जो टूट चुका  है , जो फट चुका  है , जो रद्दी है और फेंक दिया जाता है कूड़े के ढेर में वो भी किसी के जीवन को खुशियां दे सकता है , वो भी किसी का खिलौना बन सकता है , वो भी किसी के लिए काम का बायस बन सकता है इस भाव को दर्शाया है "खिलौने " कविता में कवयित्री ने कैसे कूड़े के ढेर से बीने गए टूटे फूटे खिलौने , पन्नियां, नेल पोलिश की शीशियां , साईकिल की  चेन ,काले नीली आड़े तिरछे पत्थर बन जाते हैं उनके खिलौने जिसमे पा लेते हैं वो सारे जहाँ की खुशियां मानो कारूँ का खज़ाना मिल गया हो और इस बीच उनकी माएं निपटा लेती हैं घर के सारे काम ……… एक दूरदृष्टि को दर्शाती कवयित्री की सोच कितना गहरे उतर जाती है इसको दर्शाती रचना  पाठक को भावुक कर जाती है। 

"माँ/ मैं कैसे बन पाऊंगी / वीरांगना / तू तो लड़ने ही नही देती / नुराइयों से / बेड़ियों से / अत्याचारियों से / अन्यायियों से / आवाज़ नहीं उठाने देती / पापियों / नरसंहारों / दुष्टों के विरुद्ध / बस चुप कराके दुबका देती है बिछौने में "

"वीरांगना "कविता में एक बच्ची का अपने जन्म से लेकर शुरू हुए संघर्ष को एक दिशा देती बेटी की पुकार है जहाँ वो पुरुष प्रधान समाज की कमजोरियों को इंगित करती है और माँ के माध्यम से एक सन्देश देती है कि अब नारी को खुद उठना होगा और उसकी हुंकार से ना केवल दिशाएं विचलित होंगी बल्कि सोच में भी बदलाव करना होगा। 

" अछूत " कविता किसी जाति , धर्म या व्यक्ति पर नहीं बल्कि इंसानी मानसिकता पर एक प्रहार है कि छोटी सोच के कारण ही ये समाज बीमार है क्योंकि कर्मों की उच्चता ही श्रेष्ठता को सिद्ध करती है ना कि जाति या धर्म की दीवार। 

"अंतर " एक करारा प्रहार मानव की मानसिकता पर।  कैसी छोटी सोच के साथ हम जीते हैं जहाँ हमें नहीं दिखता उम्र का अंतर और वो होती है हमारी असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा जब एक ही उम्र के दो बच्चों में हम भेदभाव करते हैं क्योंकि एक अपना बेटा है और दूसरा कामवाली बाई का बेटा …… छोटी छोटी घटनाओं या रोजमर्रा की ज़िन्दगी में घटित होती आम ज़िन्दगी में गुजरती विसंगतियों -की ओर कवयित्री ईशारा करती है और सोचने को विवश कि आखिर कैसे हम फर्क कर जाते हैं अपने और पराये में और यही तो दूरदृष्टि है। 

सफलता , ज़िन्दगी और वक्त को "हम चाहते थे " कविता के माध्यम से बखूबी दर्शाया है।  और सफलता , ज़िन्दगी और वक्त तीनो चीजें ऐसी हैं जिन्हे हर इंसान चाहता है और ज़िन्दगी के एक बार पाना उसका मकसद होता है मगर सबको मिलती कहाँ हैं गागर में सागर भरती रचना दिल को तो छूती ही है साथ में हर दिल की आवाज़ सी भी लगती है 

"लिखना चाहते थे / एक कविता उसके रूप सौंदर्य पर / परन्तु उसने नहीं उठाया पर्दा / अपने चेहरे से / नहीं  कभी सामने /' वह सफलता थी ' "


"सुनो मेरी करूँ पुकार " एक छंदबद्ध कविता अजन्मी बच्ची की पुकार है तो "बचपन सतरंगी संसारों का " बचपन की मिठास को दर्शाता है कैसे उन्मुक्त जीवन होता है सभी व्यवधानों , पीड़ाओं से दूर।  
"चाह तेरी पूरी हो " , नन्ही काली आई रे , मेरी बेटियां बेटी को समर्पित कवितायेँ सभी छंदबद्ध होने के साथ साथ मन को छूती हैं। 

 कवयित्री की पूरी पकड़ है छंदबद्ध और छंदमुक्त कविताओं में जिसमे उसने अपने भावों का सुनहरा संसार बसाया है , जहाँ वो जो भी विसंगति देखती है तो कलमबद्ध करने मो मचल उठती है।  सरल सहज भाषा प्रवाहमयी होने के कारण आत्मसात होती हैं और खुद से भी कभी कभी प्रश्न करती हैं आखिर मुझे क्यों नहीं दिखा वो अंधकार जो समाज में व्याप्त है।  सामाजिक सरोकारों पर कलम बखूबी चलती है तो प्रेम , समर्पण और विश्वास से भरपूर कवितायेँ अपनी जीवंतता को भी दर्शाती हैं।  यथार्थ के चित्रों को उकेरती कलम कभी व्यंग्य के माध्यम से तो कभी प्रभावी और सशक्त शब्दों के माध्यम से अपनी बात रखती है जो पाठक को संतुष्ट करती है।  छोटी छोटी रचनाएँ सटीक शब्दों में अपनी बात कहने में सक्षम हैं जो एक बड़ी बात है , शब्दों का दुरूपयोग ना करके सदुपयोग करते हुए अपनी बात कह देना ही लेखन की कसौटी है जिसमे कवयित्री पूर्णतया सक्षम है।  कवयित्री को पहले संग्रह के लिए हार्दिक शुभकामनाओं के साथ उसके उज्जवल भविष्य की कामना करती हूँ।  

यदि आप ये किताब पढ़ना चाहते हैं तो निम्न पतों पर संपर्क कर सकते हैं :

प्रतिमा अखिलेश 
संपर्क सूत्र सिवनी 
द्वारा , दादू निवेन्द्र नाथ सिंह 
वल्लब भाई पटेल वार्ड 
दादू मोहल्ला 
सिवनी ( मध्य प्रदेश ) 
फ़ोन : 07692-220105

संपर्क सूत्र जबलपुर 
द्वारा , श्री एम् के श्रीवास्तव 
एन - २ १ , कचनार क्लब के पास 
कचनार सिटी , विजयनगर 
जबलपुर ( मध्य प्रदेश )
मो : 94251-75861

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

पानी का भी कोई आकार होता है क्या ?

कुछ तस्व्वुर सिर्फ़ ख्यालों की धरोहर ही होते हैं

आकार पाते ही नहीं......
............
लफ़्ज़ भी बेमानी हो जाते हैं वहाँ 

और तुम परे हो इन सबसे 

ना लफ़्ज़ , ना आकार , ना रूप , ना रंग

मगर फिर भी हो तुम यहीं कहीं 

मेरे हर पल मे, हर सांस मे, हर धडकन मे 

बताओ तो ज़रा बिना तस्व्वुर की मोहब्बत का हश्र 

पानी का भी कोई आकार होता है क्या ?

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

कौन कहता है हँसते हुए चेहरे ग़मज़दा नहीं होते

ज़िन्दगी सिर्फ सीधी सरल पगडण्डी नहीं होती 
वृक्ष की कौन सी ऐसी शाख है जो टेढ़ी नहीं होती 

हर बचपन के हाथ में सिर्फ खिलौने नहीं होते 
कौन कहता है हँसते हुए चेहरे ग़मज़दा नहीं होते 

सिर्फ बड़े होने पर ही कोई बड़ा नहीं होता 
हर शख्स यहाँ हँसता हुआ पैदा नहीं होता 

हर खुरदुरे चेहरे में छुपी सिर्फ इक तलाश नहीं होती 
वक्त की तपिश में कौन सी शय है जो खाक नहीं होती 

हर उड़ती सोन चिरैया में सिर्फ परवाज़ नहीं होती 
कौन सा ऐसा चूल्हा है जिसमे आग नहीं होती 

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

फ़सल लहलहाने को तैयार है



अरुण शर्मा  अनंत ने बड़े प्यार और मान सम्मान से जब सन्निधि में एक गुलमोहर का फूल मेरे हाथ में दिया तो उसकी खुश्बू में सराबोर हुए  बिना कैसे रहा जा सकता था और मैं भी भीग गयी उस की खुश्बू में और जब बाहर निकली तो ये प्रतिक्रिया उभरी :

"गुलमोहर" नाम ही काफी है ना महकाने को मन का कोना कोना और फिर जब पुष्प गुच्छ सिर्फ गुलमोहर का ही बना हो तो खुश्बू का चहूँ ओर फैलना लाज़िमी है।  ३० कवि और सभी के अहसासों को एक सूत्र में पिरो  कर इस तरह पेश करना कि लगे वो मुक्त भी है और साथ भी।  गहरी संवेदनाओं का पानी जब हिलोर भरता है तभी वहाँ कहीं न कहीं कोई गुलमोहर खिलता है , महकता है , सुवासित करता है।  सभी कवियों का अपना आकाश है , अपने पंख हैं , अपनी उड़ान है।  सभी स्पंदित हैं भावों की झंकार से तभी तो कहीं प्रेम तो कहीं पीड़ा दृष्टिगोचर हो रही है।  कहीं आस की भोर है तो कहीं विषाद की सांझ , कहीं उम्र की सिमटती लकीर है तो कहीं एक मुट्ठी में सारा आसमान। जिनकी महक, पीड़ा और संवेदना आपको इन पंक्तियों में देखने को मिलेंगी : 

"ये हव्वा की बतियाना हैं 
बुनती रहती हैं एक श्रृंखला अनंत 
"वंश" तो एक "पुल्लिंग" शब्द है 
मैं नहीं मानती !मैं नहीं मानती !मैं नहीं मानती "

चंद पंक्तियाँ और पीढियों की वेदना का स्वर प्रस्फ़ुटित कर देना ही तो कवि के काव्य की विद्वता है ।

"क्या मन का मेटाबोलिज्म इतना कमज़ोर है ?"

ज़िन्दगी में सारी पीडा सिर्फ़ मन की तो होती है और उसे बहुत ही संजीदगी से पेश किया गया है इस कविता में 

"कानून और पुलिस पर आस्था ! / कैसा मज़ाक करते हैं ? / दरिंदगी का यह नंगा नाच / डर / क्या यही नियति रह जायेगी ? "

इस सत्य को कैसे नकार सकते हैं जिससे रोज दो चार होते हैं ।


"दिए नारी को दर्द इतने / हिसाब नहीं / या खुदाया तेरा जवाब नहीं "

कितना दर्द से लबरेज़ हुयी होगी तभी तो ये आह दिल से निकली होगी जो खुदा को भी कटघरे में खडा करना पडा होगा ।

"अभिभावक कर्जे की किश्तों  में पीस रहा / पर उनके लख्ते जिगर बेखबर हैं / यौवन के नशे में डूबे हुए को / क्या मैं " ईदगाह " पढ़वाऊँ मुंशी जी "

ओह! सत्य के जैसे किसी ने कपडे उतार दिये हों और भरे बाज़ार वस्त्रहीन कर दिया हो , समाजिक स्थिति , विडंबनाओं का सम्पूर्ण चित्रण है ये कविता 

"बुजुर्ग ऐसा सोना , जो अपनी अहमियत / वक्त पड़ने पर बताता है / पर कितना निर्मम है ना ? "

हम जानते भी हैं पर जाने क्यों मानना नहीं चाहते जाने कैसी और किस भागदौड में उलझे हैं उसी पर कुठाराघात करती है ये कविता 
"श्वेत आत्मा सा श्वेत दुपट्टा / और / उस पर पक्का रंग "

सोच के उच्च स्तर को प्रमाणित करती पंक्तियाँ साथ ही ज़िन्दगी को परिभाषित कर देना ही काव्य की पहली शर्त होती है जिसमें कवि सफ़ल हुये हैं 

"लगे न नज़र ज़माने की तुमको / घूंघट को थोडा सा सरकाए रखना "

"प्यार का दर्द है मीठा मीठा प्यारा प्यारा" जैसा अहसास समाया है जहाँ मोहब्बत तो झलक ही रही है साथ ही एक परंपरा को भी स्थान मिला है 

"शायद प्यार।/ अँधा नहीं , मौन होता है "

प्यार की इससे बेहतर और क्या परिभाषा होगी एक नया अर्थ दे दिया कवि ने प्रेम को यही तो प्रेम की ऊँचाइयाँ हैं जो सत्य है जब आप प्रेम की पराकाष्ठा पर पहुँचते हो तो मौन हो जाते हो और प्रेम रस मे छके होने पर सिर्फ़ मौन के सागर में हिलोरे लेते हो मगर वाणी शब्दहीन हो जाती है ……आहा! ये है आल्हादिक प्रेम जिसके लिये कवि प्रशंसा के पात्र हैं ।

"एक लड़की के लिए प्रेम पत्र / किसी देवता से कम नहीं होता "

कहीं से भी नहीं लगता कि कवितायें परिपक्व नहीं , हर कवि की अपनी सोच और अपने विचार जब ह्रदय के चूल्हे पर पके तो देखिये कितनी खूबसूरती से उभरे कि पाठक को अपने साथ बहा ले गये । 

"कब्रिस्तान में / सबसे अलग तरह की कब्र / हिजड़ों की होती है "

ये है दूरदृष्टि , एक परिपक्व सोच की सशक्त पहचान , जिसे हम देखकर भी अनदेखा करते हैं ,जहाँ अंत है वहीं से शुरुआत की है कविता ने और ये है कवि के भावों का रेला जो बहा ले जाता है अपने साथ और सोचने को मजबूर कर दे तो समझिये लेखन सफ़ल हुआ जिसमें कवि सफ़ल हुये हैं ।

"भाई की बिटिया के मुताबिक़ / चौराहा अब बड़ा हो गया है / कहती है , मैं भी बड़ी हो गयी हूँ "

चौराहे से बेटी के बडे होने का बिम्ब अपने आप में बेजोड है जो गहरी सोच को इंगित करता है।

"एक और नारी / एक और अपना / एक और रेप / वहशी यह समाज / कौन बचाये "

 रिश्तों की दहलीज पर कडा प्रहार करती कविता एक कटु सत्य को उजागर करती है और प्रश्नचिन्ह भी खडा करती है कि क्या अब पुनर्मूल्यांकन का समय आ गया है ?



"और मेरा दर्द, मेरे भीतर / हाथ पाँव मरने को बाध्य है "

दर्द की इंतेहा का इससे सटीक चित्रण और क्या होगा भला जहाँ शब्द सब चुकता हो जायें और सोच वहीं उसी चौखट पर बैठ जाये कि अब किधर जाऊँ अन्दर या बाहर ।

और अब अरुण की रचनाओं पर एक नज़र :

छंदबद्ध रचनायें लिखना अरुण के लेखन का सौंदर्य है जो उसकी सभी रचनाओं में छलकता है फिर चाहे शायरी हो , दोहे , गीत या ग़ज़ल।  चंद शब्दों में मारक शब्दों का समावेश उसकी विशेषता है।  गहन भाव गहन अर्थ समेटे रचनायें मन को छू जाती हैं  जिसकी बानगी देखते ही बनती है कुछ इस तरह :

माँ तेरी महिमा अगम , कैसे करूँ बखान 
सम्भव परिभाषा नहीं , सम्भव नहीं विधान 

कोमलता भीतर नहीं , नहीं जिगर में पीर 
बहुत दुश्शासन हैं यहाँ , इक नहीं अर्जुन वीर 

ठग बैठा पोषक में , बना महात्मा संत 
अपनी झोली भर रहा , कर दूजे का अंत 

कभी सच्ची मोहब्बत को, दीवाने दिल नहीं पाते 
यहाँ पत्थर बहुत रोया , वहाँ आंसू नहीं आते 

तालियों की गड़गड़ाहट , संग बजीं सीटियां 
देश का नेता हमारा , यूं शहर बदल गया 


दोस्तों मेरी भी एक सीमा है इसलिये सबकी सब रचनायें तो उद्धृत कर नहीं सकती थी बस कुछ रचनाओं की कुछ पंक्तियाँ लेकर अपने भावों को समन्वित किया है लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि बाकी रचनाओं में कोई  कमी है । सभी रचनाकार एक से बढकर एक हैं जिनकी रचनायें ह्रदय को छूती हैं ।


हिन्द युग्म से प्रकाशित इस काव्य संग्रह को संपादक द्वय अंजू चौधरी और मुकेश कुमार सिन्हा ने अपने संपादन में निकाला  है जिसमे ३० कवियों को सम्मिलित किया गया है।  सभी की रचनायें ज़िन्दगी के अनुभवों , पीड़ा और वेदना का सम्मिश्रण हैं।  गुलमोहर के सभी कवियों को मेरी शुभकामनाएँ कि गुलमोहर सा उनका लेखन महकता रहे और अपनी सुरभि से सभी को सुवासित करता रहे।  

नवोदितों को लेकर संग्रह निकालना साथ ही उनकी प्रतिभा का सही आकलन कर उन्हें एक जमीन प्रदान करना एक सराहनीय कदम है जिसमें संपादक द्वय सफ़ल रहे हैं । गुलमोहर के विमोचन पर जब नवोदितों की खुशी से दमकता चेहरा देखा तो उस प्रसन्नता का आकलन शब्दों में करना संभव ही नहीं इसलिये बस यही कह सकती हूँ " संभावनाओं की जमीन पर फ़सल लहलहाने को तैयार है बस जरूरत है तो सिर्फ़ उनके प्रयास को सराहने और बढावा देने की ।" जो भी ये पुस्तक पढने के इच्छुक हों तो यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं :