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बुधवार, 30 अप्रैल 2014

स्याह रुख




जीवन जीने की जिजीविषा 
व्यक्त हैं तुम्हारे चेहरे की लकीरों में 
हाथों पर पढ़ी झुर्रियाँ , झुलसी त्वचा 
स्वयं एक दस्तावेज़ है 
तुम्हारी ज़िन्दगी की जद्दोजहद की 

आशा निराशा और हताशा के झुरमुटों में भी 
सहेजी हैं तुमने उम्मीद की किरणें 
यूं ही नहीं त्वचा सँवलाई है 
आँखें प्रतीक हैं तुम्हारे पौरुष की 
जहाँ ठहरी चिंता की लकीरें 
दे देती हैं पता तुम्हारे मन की तहरीरों का 


दया करुणा की मोहताज नहीं तुम 
तुम तो हो वो स्वयंसिद्धा 
जिसके आगे नतमस्तक है 
सृष्टि का हर बंदा 
ऐसा कह उपहास नहीं कर सकती 
क्योंकि 
जानती हूँ न 
रोज कितनी आँखों में सिर्फ अपना बदन देखती हो 
तो कितने ही चेहरों में अपने लिए वितृष्णा
फिर कैसे हो सकता है हर बंदा नतमस्तक 
किन हालात से गुजरती हो 
किस नारकीय यातना को झेलती हो 
तब जाकर एक वक्त की रोटी का जुगाड़ करती हो 
सब जानती हूँ .......... क्योंकि 
आखिर हूँ तो एक औरत ही न 
और सुनो 
तुम्हारे रहन सहन के स्तर को जानने को 
नहीं है जरूरत मुझे तुम तक पहुँचने की 
तुम्हारी जीवन शैली का दर्शन करने की 
क्योंकि 
तुम अव्यक्त में भी व्यक्त हो 
यदि हो किसी के पास वो नज़र 
जो तुम्हें देह से परे  देख सके 
जो तुम्हारी उघड़ी देह का सही आकलन कर सके 
तो स्वयं जान जाएगा 
कैसे एक कपडे मे समेटा है तुमने पूरा ब्रह्माण्ड 

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

ज़िन्दगी के पन्ने एक अकथ कहानी से

बुझते चिराग की लौ सुना है ज्यादा टिमटिमाती है …………मगर यहाँ तो बिना टिमटिमाये ही लौ बुझ गयी……अब मैं हूँ और मेरी तन्हाइयाँ ………सोचती हूँ क्या बात करें हम ? ना ना ………किसी बिखरी याद को नहीं समेटना अब ………ना ही आगत का सोचना अब …………और वर्तमान में कहने को कुछ बचा नहीं …………ऐसे में अब मै हूँ और मेरी तन्हाइयाँ मुझसी ही तन्हा ……एक बिना सोच का , बिना बात का , बिना लक्ष्य का सफ़र तय करते हुये्………यूँ भी गुजरा करते हैं ज़िन्दगी के पन्ने एक अकथ कहानी से 

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

नहीं है कहीं प्रेम का अस्तित्व

नहीं , नहीं है कहीं प्रेम का अस्तित्व , जो है बस है सह -अस्तित्व . आप सोचेंगे रोज प्रेम का लाप अलापने वाली आज अचानक कैसे कह रही है प्रेम का अस्तित्व ही नहीं है  :) .............

सच्चाई तो यही है मगर हम जान ही नहीं पाते उम्र भर और एक अनजानी प्यास के पीछे उम्र तमाम करते फिरते हैं . साथ रहते हैं हम समाज में , परिवार में तो एक दूसरे  की आदत हो जाती है , एक  दूसरे  की जरूरत बन जाते हैं हम और उसे दे बैठते हैं प्यार का नाम , प्रेम का नाम जबकि वो होता है अपनापन जो एक दूसरे की जरूरतों से उपजा होता है . आप जब तक किसी के काम के हैं तभी तक याद रखती है दुनिया , तभी तक आपको पूजती है दुनिया जिस दिन आप असहाय हो गए , जिस दिन आप उनके काम के नहीं रहे तब कहाँ चला जाता है वो प्रेम ? अगर कहा जाता है कि दुनिया में प्यार ही प्यार है और उसी पर ये धरती टिकी है तो आज इतने असहाय , बेबस न होते लोग , रिश्तों के नाम पर एक  दूसरे  को विवशता मे ना ढोते लोग . क्या प्रेम सिर्फ क्षणिक होता है जबकि सुना है प्रेम तो सारी  कायनात में विद्यमान है और वो सब पर बराबर लुटाती है और ये सच भी है क्योंकि प्रकृति किसी से भेदभाव नहीं करती क्या छोटा क्या बड़ा , क्या अपना क्या पराया ,क्या बच्चा क्या बड़ा सब पर अपना बराबर का स्नेह लुटाती है तो उसे तो फिर भी प्रेम कह सकते हैं क्योंकि किसी से कोई भेदभाव नहीं और साथ में निस्वार्थता का भाव मगर हम मनुष्य नाम के प्राणी कहाँ ऐसा कर पाते हैं . 

कोई भी रिश्ता प्रकृति सा अटूट नहीं है हमारे पास , हम अपनों को ही नहीं सह पाते एक उम्र तक आते आते तो कैसे कहते हैं कि प्रेम की तपिश है हमारे अन्दर , जब अपनों की दयनीय दशा देखकर भी हम नहीं पिघलते , उन्हें बुरा भला कहने से नहीं चूकते यहाँ तक कि अपने मुनाफे के लिए उन्हें धोखा तक दे देते हैं तो कैसे कहते हैं प्रेम का अस्तित्व है इस जहाँ में ? आज जब बच्चे हों या बडे सभी एक दूसरे को भला बुरा यहाँ तक कि अपमान भी छोटी चीज़ है कत्ल तक कर देते हैं तो कैसे कहें प्रेम का अस्तित्व है , प्रेम तो एक विलक्षण स्थिति का नाम है जहाँ तक कोई नहीं पहुँचता सिर्फ़ साथ रहना और एक दूसरे की जरूरत में काम आना प्रेम नहीं सह अस्तित्व है वरना तो आज बीमार यदि कोई ऐसा पड जाए जिसकी उम्र भर सेवा करनी पडे तो उसे भी घर निकाला दे दिया जाता है तो कहाँ जाता है वो प्रेम यदि था तो ? कैसे भूल जाता है मानव रिश्ते की ऊष्मा को ? 

मुझे तो कहीं नहीं दिखता प्रेम का अस्तित्व. हर रिश्ता झूठा दिखता है या वक्त की नोक पर मजबूरी के अहाते में खड़ा बरसात रुकने की इंतज़ार में दिखता है . जो है बस सह अस्तित्व ही है जहाँ एक  दूसरे की जरूरत भर हम एक दूजे का साथ निभा कर अपने कर्त्तव्य को प्रेम का नाम देकर भावनाओं से खेलते भर हैं मगर वास्तव में प्रेम के वृहद् अर्थ को तो कभी समझ ही नहीं पाए गर समझा होता तो आज अपनों की , बुजुर्गों की इतनी दयनीय दशा न होती .........वो अकेलेपन का शिकार न होते , वो ज़माने पर बोझ न होते . 

वैसे भी देखा जाए कोई आज मरे तो कल नया सवेरा दिखता है , दो दिन याद किया और फिर भूल गए यही है हमारी फितरत ............क्या वास्तव में प्रेम हो तो क्या कभी हम भूल सकते हैं या उसके बिना जी सकते हैं ..........प्रेम , प्रेम कहना आसान होता है मगर निभाना बहुत मुश्किल ............वास्तव में तो हमने सिर्फ सह अस्तित्व के साथ जीना सीखा है और कुछ पल के साथियों को प्रेम नाम की माला दी है जपने को ताकि जीवन भ्रम में ही सही , चलता रहे .............


वैसे प्रेम की धारणा बहुत पुरानी है । युग ढोते रहे हैं और ढोते रहेंगे मगर जान कहाँ पाते हैं प्रेम के सूक्ष्म अणुओं और परमाणुओं को जहाँ अपेक्षा का सिद्धांत लागू ही नहीं होता और देयता और त्याग के सिद्धांत पर ही ज़िन्दगी बसर होती है और वो प्रेम आज के दौर में कहाँ संभव है ? 

मानविक प्रेम ही संभव नहीं हो पाता तो आत्मिक या दैविक प्रेम तो सिर्फ़ सोच और ख्यालों की बस ताबीर भर हैं और इसी छदम खेल में घिरे हम गुजार जाते हैं ज़िन्दगी , जी जाते हैं ज़िन्दगी और खो जाते हैं समय के गर्त में किसी सागर की बूँद सम मगर कभी नहीं जान पाते फ़र्क निस्वार्थ प्रेम और सह - अस्तित्व में । 

देखा जाये तो मूल धारणा तो यही है जीवन की इस पृथ्वी पर "नहीं है कहीं प्रेम का अस्तित्व , जो है बस है सह -अस्तित्व" बस हमने उसे तरह तरह के नाम और उपनाम देकर जीने का माध्यम भर बनाया है वरना क्षणभंगुरता ही शाश्वत है जब तब प्रेम अक्षुण्ण कैसे ? 

कपोल कल्पित कहानी के पात्रों को माध्यम बनाकर जीवन गुजारने का साधन मात्र है प्रेम की अवधारणा वरना तो जीवन चलता ही है सिर्फ़ सह - अस्तित्व की अवधारणा पर क्योंकि हम समाजिक प्राणी हैं और हमें जीने को एक साथ की जरूरत होती है, अपनेपन के अहसास की जरूरत होती है और उस जरूरत को हम प्रेम या प्यार का नाम दे देते हैं और एक जीवन जी लेते हैं मगर अंतिम पडाव पर जब ठगे से खडे होते हैं तब करते हैं विश्लेषण तब पाते हैं निष्कर्ष में यही कि जो था सिर्फ़ सह - अस्तित्व भर था , प्रेम तो किसी विषपात्र की तरह दुबका सहमा सिमटा सा वक्त के गर्त में कब का ज़मींदोज़ हो चुका था , गर वो प्रेम था तो !!!

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

प्रेम एक अराधना

रात की लहरों पर चढती उतरती कोई अरदास 
प्रेम तो मानो तेरे मेरे होठों की कोई अबूझी प्यास 

दिन की नर्तन करती परछाइयों का कोई शहर 
प्रेम तो मानो तेरे मेरे प्रेम की कोई भटकी लहर 

भीगी रुत का कोई अनकहा गुनगुना अहसास 
प्रेम तो मानो आषाढ़ में बसंत का आभास 

रूप रंग से परे किसी खुदा का दीदार करता कोई दरवेश 
प्रेम तो मानो किसी मस्जिद से आती सुबह की पहली अजान 

जैसे खुश्बू को मुट्ठी में बाँधने की कोई जिद 
प्रेम तो मानो बच्चे की चाँद को पकड़ने की कोशिश 

रेशम के तागों से बुना इक ख्याल का कोई भरोसा 
प्रेम तो मानो तेरे मेरे अरमानों का कोई बोसा 

जलती आग की परछाइयों में हंसने का सुरूर 
प्रेम तो मानो तेरी मेरी मोहब्बत का कोई गुरूर 

इक साँस से निकलती आस की कोई आवाज़ 
प्रेम तो मानो सप्त सुरों पर बजता कोई साज 

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

देह के परे भी

स्त्रियाँ जीती हैं सम्पूर्ण सत्य 
अपनी उपस्थिति के साथ 
सिर्फ़ चौके चूल्हे तक ही 
नही है उनका आवास 
सुलझा लिए हैं उसने जीवन के गणित 
नहीं छोड़ती अब पदचिन्ह परछाइयों के 
जो सपनो की किवड़ियां खटखटाएं 
करती हैं विमर्श खुद से 
अपनी उपस्थिति से 
और भर लेती हैं 
रीतेपन के हर घड़े को 
अपनी सम्पूर्णता से 
अपनी उपस्थिति के अहसास से 
इसलिए नहीं रीतती अब एक स्त्री उनमे से 
भ्रम पैदा करने वाली स्थितियों से 
बचना जानती हैं 
देह के गणित पहचानती हैं 
छटपटाहट के नीले सिक्कों पर तोलती हैं 
वो अपने विश्वास और जब पा लेती हैं खुद का भास 
तब करती हैं सम्पूर्ण समर्पण 
तब लिखती हैं इक नया इतिहास 
आज स्त्रियाँ नहीं रह गयी हैं 
बस एक परिहास , उपहास, जीवन का त्रास 

क्योंकि जानती हैं 
इस बार उड़ान महज पिंजरे की वापसी तक नहीं है 

सभी वर्जनाओं को नकारते हुए 
देह के परे भी है अब  उनका एक आकाश 

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

प्रश्न आदिकाल से दौड़ रहा है ……मुक्ति की खोज में

धन्य हो गया देश मेरा 
धन्य हो गयी जनता 
जो ऐसे नेताओं के 
पाँव पलोटा करती है 
जो स्त्री पुरुष के अस्तित्व में 
भेद किया करते हैं 

कैसे इन हुक्मरानों को 
तख़्त मिला करते हैं 
क्यों नहीं बाकी दलों को 
ये सच दिखा करते हैं 
जो गठजोड़ के लिए 
बलात्कारी मानसिकता को 
पोषण दिया करते हैं 
जिनके लिए स्त्री का अस्तित्व 
महज खिलौना भर हुआ करता है 
जो उस कोख को गाली देते हैं 
जिससे जन्म लिया करते हैं 
क्या महज कुर्सी के लिए 
सभी आँख बंद किया करते हैं 
क्या इसी बूते पर ये 
शासन करने का दम्भ भरा करते हैं 
क्या इसी बूते ये 
एक सुशासन देने का वादा किया करते हैं 
जाने किस मिटटी के बने होते हैं 
जो अपनी बहन बेटियों सा न 
हर स्त्री को समझा करते हैं 

सुना है यादवों के कुल के कहलाते हो 
सुना है इसी में कृष्ण ने जन्म लिया था 
सुना है उसी कृष्ण ने भरी सभा में 
द्रौपदी की लाज बचाने को वस्त्रवतार लिया था 
फिर कहाँ वो बीज लुप्त हुए 
जो तुम इतने संवेदनहीन हुए 
जिसके लिए स्त्री का न कोई महत्त्व हुआ 
बस बलात्कार तो महज एक खेल हुआ 
किस मानसिकता को पोषित कर रहे हो 
क्यों यादव कुल को भी कलंकित कर रहे हो 

कैसे कहें बदल गया ज़माना 
कैसे कहें मुक्त हो गया समाज परंपरागत रूढ़ियों से 
क्या यही नारी मुक्ति है 
क्या यही स्त्री विमर्श का नतीजा है 
जो आज भी स्त्री को महज 
प्राप्तव्य भोग्या ही समझा गया 
जहाँ बलात्कारियों को पोषण मिलता हो 
वो कैसे सभ्य समाज गिना जाएगा 
कैसे कह सकते हैं आज 
जो इतिहास पर काला धब्बा है 
उससे मुक्त हो गए हम 
कैसे कह सकते हैं हम 
आज नहीं दुर्योधन जन्म लिया करते हैं 
जब शासक ही गलत परम्पराओं को 
पोषण दिया करते हैं 
युग बदलने से नहीं बदला करतीं पैठी हुयी मान्यताएं 
वो चली आती हैं पीढ़ी दर पीढ़ी 
एक नपुंसक पीढ़ी को जन्म देती 
जिसके पास होता है तो सिर्फ दम्भ और व्यभिचार 
भला ऐसे समाज में कहो तो 
कहाँ है स्त्री सुरक्षित ?

हर स्त्री के गुनहगार हो तुम …… ओ पुरुष समाज 
जिस कोख से जन्मते हो 
जब उसी को लांछित करते हो 
तब कैसे आँख मिला लेते हो 
कैसे साँस भर लेते हो 
कैसे सुकून से जी लेते हो 
समझ नहीं आता है 
जाने कैसा भयावह समय फिर आया है 
क्या किस कलुषता का साया है 
आज फिर सारा समाज मौन है 
क्या फिर किसी धर्मयुद्ध का आह्वान है 
या एक बार फिर इसी सड़ी गली राजनीति की 
भेंट चढ़ना होगा 
स्त्री को न उसका स्वर्णिम किसी युग में मिलेगा 

प्रश्न आदिकाल से दौड़ रहा है ……मुक्ति की खोज में 

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

' अब इधर जाऊँ या उधर जाऊँ '

मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ किसके चरणों की धूल बन जाऊँ जो माथे पर तिलक सा सज जाऊँ या कहूँ मैं देखूँ जिस ओर सखि री सामने मेरे सांवरिया कुछ ऐसा ही तो हाल हो रहा है अब मेरा । एक तरफ़ कुंआ एक तरफ़ खाई और बीच में पुल भी डांवाडोल अब गिरा कि तब गिरा बताओ तो भला अब जायें तो जायें कहाँ समझेगा कौन यहाँ दर्द भरे दिल की दास्ताँ । सोच रहे होंगे पगला गया है तो भाई पगलाने का मौसम आ गया आखिर जब वो हमें पागल समझते हैं तो हम पागल ही अच्छे हैं कहलवा क्यों ने उन्हें खुश होने दें । वैसे ये पगलाने के भी मौसम अजीब हुआ करते हैं तुम आगे आगे वो तुम्हारे पीछे पीछे , तुम्हारी खुशामद करते , तुम्हारे आगे झुकते , तुम्हारी सेवा में अपना सर्वस्व अर्पण करने को आतुर तो कैसे न पगलाया जाये आखिर कभी कभी तो मौका मिलता है और फिर जब कोई आपको आपकी कीमत बता दे तो थोडा तो पगलाना जायज है, थोडा तो अपनी अहमियत दिखाना जायज है , थोडा भाव खाना जायज है । जब उन्हें सब जायज होता है तो एक बार हमें भी तो मौका मिलता है तो भइये चूकें कैसे ? चूके तो गये बारह के भाव फिर क्या मोल रहेगा अब धूप का मज़ा या कहो सेंक तो सर्दी में ही सुहाती है न तो कैसे चूक सकते हैं । अब मौसम है कब बदल जाये क्या पता वैसे भी इतनी मुश्किल से तो मौका मिलता है इस मौसम में अपनी वेणियों में फ़ूल गुंथवाने का , अपने आँगन में झाडू लगवाने का , अपनी मिजाजपुर्सी करवाने का तो हम भी चढ ही गए इस बार रामगढ मे बनी पानी की टंकी पर धरमिंदर की तरह  अब चढ तो गए मगर इस बार फ़ँस गए क्योंकि सारी जमातें हमारे पीछे और हम आगे आगे थे सो भांप न सके किस किस शहर के कौन से खिलाडी मैदान मे उतरे हैं फिर भी अब जब फ़ँस ही गये तो सोचा जो होगा देखा जायेगा इस बार पागलपना ही काम आयेगा सो सभी की हाँ में इस बार हमने भी हाँ मिलायी और बाजी जीत ली अपने सारे मंसूबे पूरे कर लिये सिर्फ़ एक हाँ  के माध्यम से क्योंकि पता है इसके बाद तो कटना सिर्फ़ हमें ही है तो कम से कम एक दिन के बादशाह तो बन कर देख ही लें सो देख लिया , अपनी हर इच्छा अभिलाषा को पूर्ण कर इतराता हूँ बेशक थोडे वक्त के लिये ही सही मैं खुश हो जाता हूँ कि हाँ , इस बार मेरा पागलपन काम आया मगर अब सोचता हूँ किधर जाऊँ इधर या उधर क्योंकि यहाँ तो हमाम में सभी नंगे हैं मैं किसके जिस्म पर टावेल लपेटूँ या किसे अंगवस्त्र दे ढकूँ इसी पशोपेश में फ़ँस गया । जब कुछ न सूझा तो सिक्का उछाला कि हेड आया तो संतरा टेल आया तो नारंगी  मगर सिक्के ने भी इस बार रंग दिखा दिया साला खडा ही हो गया तो हम क्या किसी से कम थे समझ गये इस बार बाजी उलटनी ही पडेगी सो चल दिये अपने भाग्य को आजमाने अपने हाथ का दम दिखाने अपनी किस्मत आजमाने और दबा दिया मशीन का वो  बटन जिसे न कोई अनुभव था मगर बंदा सिद्धांतवादी , राष्ट्रभक्त था तो बोलो क्या गलत किया आजमाने का दौर है एक बार नए को भी आजमा लिया जाए सोच खुद को ' अब इधर जाऊँ या उधर जाऊँ ' की उहापोह से मुक्त कर लिया ………मिलते हैं अगले पाँंच साल के बाद इस उम्मीद में कि मेरे दबाये बटन की खुदा लाज रखे बिना किसी जोड तोड के नयी सरकार चले वरना यदि बीच में ही लुटिया डूबी तो मैं तो हूँ ना एक बार फिर पगलाने को तैयार ……

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

क्योंकि भीड़ में भी अकेली हूँ मैं

सोचती हूँ 
गुम हो जाऊँ भीड़ में 
समेट लूँ वैसे ही 
जैसे कछुआ समेटता है 
अपने अंगों को अपने अन्दर 
और ऊपर रह जाती है 
एक सपाट खुरदुरी शिला सी 
क्योंकि 
फर्क सिर्फ खुद को पड़ता है 
खुद के होने या न होने का 
दूसरों के लिए तो हम सदा ही 
एक जरूरत भर की वक्ती पहचान रहे 
ऐसे में सिर्फ खुद के लिए जब 
एक आकाश बनाओ या नहीं 
किसी पर फर्क नहीं पड़ना 
सिर्फ स्वयं की संतुष्टि का आकाश 
और उसमे विचरण करता खुद का वजूद 
कौन सा आकाश पर अपने नक्स छोड़ पाता है 
जो प्रयत्न के रेशों पर लिखी जाए इबारत ज़िन्दगी की 
पहले भी तो गुमनाम था मज़ार मेरा 
कौन था जो जलाता था दीया यहाँ आशिकी का 
फिर अब कौन सा फर्क पड़  जाना है 
कम से कम खुद की खुद से होती जद्दोजहद से तो निजात पा लूँगी 
और कर दूँगी प्रमाणित ...........
जो दूर तक रौशनी दे वो दीप नहीं हूँ मैं 
आँधियों में भी न बुझे वो दीप नहीं हूँ मैं 
क्योंकि 
भीड़ में भी अकेली हूँ मैं 
फिर अकेलेपन में ही जब जीना है तो 
क्यों दुर्गम किलों को भेदूँ 
क्यों न अपने अस्तित्व की देगची में स्वयं को खोजूँ मैं ...