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शुक्रवार, 30 मई 2014

वो कोई भी हो सकती है ……



त्याग ममत्व सहनशीलता की मूरत 
तप कर कुंदन बन 
जब पक जाता है उसका रंग 
कृशकाय हो जाती है त्वचा 
चेहरे की सिलवटों में 
उभर आते हैं जब संघर्ष 
आँखों के घेरों में 
दिखने लगता  है 
जीवन के अंधियारे पक्ष का 
जब विराम चिन्ह 
बुदबुदाते होठों की लकीरें 
जब बाँचती हैं 
उम्र की रामायण में दर्ज 
सीता के जीवित दफ़न होने की दास्ताँ 
बेतरतीब पहनी धोती में 
जब ध्यान नहीं जाता पल्लू के सरकने पर 
गठिया के दर्द का कहर भी 
जब नहीं छू पाता अंतर संघर्ष के कहर को भी 
तब वो कोई भी हो सकती है 
किसी की माँ पत्नी बहन या  बेटी 
क्या फर्क पड़ता है  
क्योंकि 
संघर्षों की आंच पर 
जलने पिघलने और नए आकार में 
ढलने के बाद भी जो बचती है 
उस स्त्री का कोई चेहरा नहीं होता 
वो कोई भी हो सकती है ……


फ़ोटो साभार : Vijendra Kriti Oar 

बुधवार, 28 मई 2014

बिंदिया में

दोस्तों 
जून माह की बिंदिया पत्रिका में छपा मेरा व्यंग्य आपकी नज़र ………बिंदिया पत्रिका में ही सविता सिंह के लेख में हम नवागंतुकों को लेखिका का दर्जा मिलना ………बेहद सुखद लगा ………पढिये उनका आलेख और डालिए एक नज़र हम पर भी और तीसरी उपलब्धि ……मेरी बुक " बदलती सोच के नए अर्थ " की समीक्षा बिंदिया पत्रिका में …………#गीताश्री# का किन लफ़्ज़ों में शुक्रिया अदा करूँ समझ नहीं आ रहा ……एक ही पत्रिका में तीन जगह चर्चा कर दी ………निशब्द कर दिया मुझे :) 




शुक्रवार, 23 मई 2014

खबर में बने रहने के लिए

बहुत दिन हुए 
हंगामा नहीं बरपा 
बहुत दिन हुए 
किसी ने हाल नहीं पूछा 
बहुत दिन हुए 
कहीं कोई शोला नहीं भड़का 
और मैं अपने दड़बे में 
महज कैदी सा बन रह गया 

न कहीं आलोचना 
न कोई प्रसिद्धि 
न कोई मेरा नामलेवा रहा 
सब अपने अपने खेमों में मशगूल 
उफ़ ! इतनी ख़ामोशी ठीक नहीं 
इतना सन्नाटा तो 
मुझे ही लील जाएगा 
जब तक एक झन्नाटेदार तमाचा 
न पड़े और आवाज़ न हो 
कैसे संभव है शोर मचना 
मेरा नाम ले ले आंदोलन होना 
मेरे नाम की तख्ती का 
हर गली हर मोड़ पर लगे होना 
जरूरी है अपनी पहचान बनाये रखने को 
हंगामों की फेहरिस्त में खुद को शामिल रखना 

यूँ भी ज़माने की याददाश्त बहुत कमज़ोर है 
और मुझे याद बन रहना है 
एक कील बन चुभते रहना है 
ज़ेहन की दीवारों में 
एक सोच बन करवाने हैं 
क्रांतिकारी  आंदोलन 
मसीहा बनने से क्रांतियाँ नहीं हुआ करतीं 
ये जानते हुए 
ख़बरों में बने रहने के लिए 
जरूरी है मेरा आलोचनाओं से सम्बन्ध 
फिर वो चाहे पक्ष में हों या विपक्ष में 

ज़माने की आँख और सोच में 
घुन बन लगे रहना है 
क्योंकि 
मेरी शिराओं में लहू की जगह बहती है ईर्ष्या 
मेरे शरीर में अस्थि माँस मज्जा की जगह 
ले रखी  है प्रसिद्धि ने 
और खाल ओढ़ ली है भेड़िये सी आत्मसंतुष्टि की 
ऐसे में कैसे संभव है मेरा बचा रहना 
सन्निपात की कोई दवा नहीं हुआ करती 
और मैं घिरा हूँ आत्मप्रशंसा , आत्मवंचना की 
झूठी फरेबी बेड़ियों के मोहजाल में 
क्योंकि 
मेरा जीवन है यही 
मेरी सांस , मेरी आस , मेरा विश्वास है 
सिर्फ यही 
कि 
खबर में बने रहने के लिए जरूरी होता है 
कभी कभी 
खुद पर खुद ही प्रहार 
या आलोचनाओं का गर्म बाज़ार 
फिर चाहे कोई कहे 
सब जानते भी क्यों भ्रमजाल में उलझे हो 
तो प्रिय 
ये ही तो शगूफे होते हैं आत्मप्रसिद्धि के 
जो हर बार हवा का रुख मोड़ दिया करते हैं 
और मैं कोई अलग  कौम का वासी नहीं हूँ 
उन्हीं में से हूँ ,  तुम्हीं में से हूँ 
अब चाहे तुम उन्हें कोई नाम दो 
राजनीतिज्ञ ,कलाकार या साहित्यकार 
मेरा पेशा है 
खबर में बने रहने के लिए 
हर हथकंडे अपना अपने लिए जगह बनाए रखना 

ख्वाब को हकीकत का जामा पहनाने के लिए 
महज चुप्पी के खोल में सिमट नहीं खेली जातीं गोटियाँ 

जीतने और प्रसिद्धि पाने के भी अपने ही शऊर हुआ करते हैं …… 

बुधवार, 14 मई 2014

शायद किसी बुद्ध का फिर जन्म हो

मौन का स्वर ही नहीं शोर भी होता है ………क्या कभी पहुँचा तुम तक?
स्वर तो अब दस्तक ही नहीं देते …………
मौन के शोर ने अपना अखाडा लगाया हुआ है 
हर तरफ़ देखो 
मौन का झंझावात कैसे चल रहा है 
दसों दिशाओं की हवायें भी कुम्हला गयी हैं 
सूरज अपने ताप से आकुल है 
क्योंकि वो मौन के ताप को सहने को अभिशप्त है
और तुम हो अभी स्वर पर ही रुके हो 
यहाँ तो वजूद का भी पता नहीं 
सिर्फ़ और सिर्फ़ मौन के शोर में आकुल 
मेरी देह के बीज मेरे मन के बीजों को मथ रहे हैं …………शायद किसी बुद्ध का फिर जन्म हो 


रविवार, 11 मई 2014

मेरी माँ नहीं जानती क्या होता है मदर्स डे


मेरी माँ नहीं जानती क्या होता है मदर्स डे 
क्योंकि 
वो तो हर पल हर दिन है 
सिर्फ़ और सिर्फ़ 
अपने बच्चों की माँ 
क्या जाने नयी संस्कृति के नए चलन 
उसने तो जाना सिर्फ़ हर दिन हर पल 
अपने बच्चों के लिए जीना 
अपने बच्चों के मुख पर मुस्कान देखने को 
अपना सब कुछ कुर्बान करना 
अपने बच्चों के मुख पर दुख की स्याही देख 
खुद दुखी हो जाना 
वो क्या जाने क्या होता है मदर्स डे 
उसने तो जाना है सिर्फ़ इतना 
बच्चों से ही है जीवन उसका 
फिर कैसे उसे विश करूँ 
जो है जीती हर पल हर दिन मेरे लिए 
गर पूछ बैठी 
क्या सिर्फ़ आज के दिन ही हूँ मैं तेरी माँ 
तो क्या जवाब दूँगी 
इसलिये नहीं चाहती उसे और उसकी तपस्या और स्नेह को 
सिर्फ़ एक दिन में ही समेटना 
और चुप रह करती हूँ मन ही मन वन्दन अभिनन्दन उसका 
क्योंकि 
मेरी माँ नहीं जानती क्या होता है मदर्स डे 

गुरुवार, 8 मई 2014

रखती हूँ मैं भी आम स्त्री का बुत खुद में

अभी बाकि हैं मुझमे 
समस्याएं , इच्छाएं , आकांक्षाएं 
थोड़ी बहुत ईर्ष्या , जलन और नफरत  
क्योंकि 
रखती हूँ मैं भी आम स्त्री का बुत खुद में 

जो झगड़ती भी है 
सिसकती भी हैं 
झंझोड़ती भी है 
जो रूखी भी है 
तो प्रेम से भरपूर भी है 
जो आम मानवीय संवेदनाओं से भरपूर भी है 
जो खास नहीं है इसलिए मजबूर भी है 
कसमसाती हैं उसमे भी इच्छाएं 
उड़ान भरने की आकांक्षाएं 
फलक को छूने की सम्भावनाएं 
करती हैं उसे भी कुंठित 
क्योंकि 
रखती हूँ मैं भी आम स्त्री का बुत खुद में 

करती हूँ सबकी तरह मैं भी आह्वान 
कभी स्त्री मुक्ति का 
तो कभी स्त्री की जड़ सोच का 
कभी रखती हूँ निगाह 
देश और समाज की समस्या पर 
तो फूटता है मेरा भी गुस्सा 
समाज में व्याप्त बेचैनियों पर 
क्योंकि 
रखती हूँ मैं भी आम स्त्री का बुत खुद में 

होती हैं मुझसे भी गलतियां 
होता है मुझमे भी स्फुरण 
होते हैं मुझमे भी  इच्छाओं के अंकुरण 
कभी दबा भी लेती हूँ 
तो कभी उछाल भी देती हूँ 
कभी मूक रहकर जज़्ब करती हूँ 
तो कभी मुखर होकर 
सारे भेद खोल देती हूँ 
क्योंकि 
रखती हूँ मैं भी आम स्त्री का बुत खुद में 

क्यों फिर मैं देवी बनूँ 
क्यों सिर्फ मैं ही पत्तों सी झरूँ 
क्यों सिर्फ मैं ही रात्रि का सफ़र अकेले ही तय करूँ 
क्यों न मैं हुंकार भरूँ 
क्यों न मैं भी रुदन करूँ 
क्योंकि 
जन्मती हैं मुझमे भी इच्छाएं 
जो हमेशा सुपाच्य हों जरूरी तो नहीं 
लेती हैं आकार मुझमें भी समस्याएं 
जो हमेशा मेरा ही शोषण करें जरूरी तो नहीं 
टँगी होती हैं दिल की कील पर मेरी भी आकांक्षाएं 
जो हमेशा धूप में ही सूखती रहे जरूरी तो नही 
क्योंकि 
रखती हूँ मैं भी आम स्त्री का बुत खुद में 


सर्वगुण संपन्न होना 
और खुद को रिक्त करते हुए 
सब कुछ सह लेना ही मेरा वजूद नहीं 
अपनी जलन ईर्ष्या या नफरत को 
खुद ही पीते हुए 
खुद की तिलांजलि देकर 
जीते रहना ही मेरी नियति नहीं 
उससे इतर भी कुछ हूँ 
बस कभी ये भी याद रखा करो 
कभी मुझे भी इंसान समझा करो 

कभी तो बोलने का हक़ मुझे भी दो 

जरूरी नहीं होता हर बार 
मुखौटा लगाए खुद को बेदखल करना 
वास्तविकता से आँख मिलाकर जीने के लिए 
हटा देती हूँ नकाब चरित्र के रुख से भी 
क्योंकि 
नहीं चाहिए कोई तमगा भलमनसाहत का 
क्योंकि
जीना चाहती हूँ मैं भी 
अपनी आकांक्षाओं , इच्छाओं और चाहतों के साथ 
किसी को आगे बढते देख जलन से ईर्ष्याग्रस्त होना 
और अपनी उपेक्षा पर हताशा के सागर में डूबना 
संजोना चाहती हूँ हर लम्हात को 
अपनी गुनगुनाहट अपनी मुस्कुराहट के साथ 
इसलिये जीने दो मुझे 
मेरे स्त्री सुलभ सौंदर्य के साथ
मुझमें छुपी मेरी कुंठाओं , व्यंग्य बाणों , चपलताओं के साथ 
जब जब जिस रूप में चाहूँ 
कर सकूँ खुद को व्यक्त अपनी सम्पूर्णता के साथ 
क्योंकि 
रखती हूँ मैं भी आम स्त्री का बुत खुद में 


क्योंकि 
जरूरी नहीं होता 
महानता का आदमकद बुत बन 
किसी चौराहे पर खडा होना नितांत एकाकी होकर 



सोमवार, 5 मई 2014

मेरे सपनों की दुनिया का अंत

मेरे सपनों की दुनिया का अंत 
शायद यही है 
बिना व्यक्त किये दफ़न कर दूं 
कुछ आतिशी ख़्वाबों को 
कुछ चाहत के गुलाबों को 
जो मीर की ग़ज़ल से मुझमे 
पला करते थे 
जो भरी बज़्म में हरसिंगार से 
खिला करते थे 
जो मिटटी की सौंधी महक से 
साँसों में रमा  करते थे 
जो पलकों के पर्दों में नयी नवेली दुल्हन से 
छुपे रहा करते थे 
करना  होगा अब अंत 
क्योंकि 
शुरुआत को कुछ बचा ही नहीं 
आँचल को रोज झाडती हूँ 
मन के आँगन को रोज बुहारती हूँ 
मगर 
कोई आस की पत्ती झडती ही नहीं 
और आडम्बर से भरी इस दुनिया में 
मुखौटा कोई बदलता नहीं 
जब दूर तक सिर्फ और सिर्फ 
स्याह रातें हों 
धूप कभी निकलती न हो 
समय का सूरज अपना रुख बदलता ही न हो 
किस धान के खेत में रोपूँ सपनों के संसार को 
जिसका बीज पाले की मार से पहले ही नेस्तनाबूद हो गया हो 
बस बहुत हो चुका तसल्लियों का सिलसिला 
विश्वास और आस का मनोहारी नृत्य 
अब और नहीं ............अब और नहीं 
तुम्हें दफ़न होना ही है 
मेरे अन्दर ........मेरे साथ 
क्योंकि 
अब नहीं चाहिए मुझे आश्वासनों की हरित क्रांति 
उम्मीद के जागरण की महादेवी 
इसलिए 
शिखा पर गाँठ बाँध ली है मैंने स्वप्न विहीन जीने की कसम के साथ