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रविवार, 31 अगस्त 2014

बेबसी के कांटे

बेबसी के कांटे जब आँचल से उलझते हैं 
हम और उन पर पाँव रख रख के चलते हैं 
जुबाँ पर रख के तल्खियों के स्वाद 
अजनबियत का ओढ लिबास संग संग चलते हैं 

जाने किसे दगा देते हैं जाने किससे दगा खाते हैं 
हम बन के इक नकाब जब चेहरों पे पडते हैं 
खानाबदोशी के इकट्ठे करके सब सामान 
उनकी अजनबियत को झुक झुक सलाम करते हैं 

कैफियत दिल की न पूछ अब जालिम
रोज सिज़दे में सिर झुका जहाँ इबादत करते हैं
 खुदा न बनाया न बुत ही कोई सजाया 
यूँ उनकी याद के ताजमहल को गले लगाया करते हैं 

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

मुस्कुराहटों पर से दर्द के लिबास ही उतार दे

कहकहों के सफ़र की जमीन ना पूछ 
दलदली मिट्टी मे धंसे पाँव कब आगे बढे हैं 
मै ना बढा ना सही मगर 
उदासियों के कम्बल तू भी ना ओढ 
हो सके तो इतना कर 
मेरे पाँव के नीचे से ये दलदल निकाल दे 
दे दे मुझे जमीन का एक टुकडा ही 
जिस पर खडे हो आसमाँ निहार सकूँ
कुछ देर मुस्कुरा सकूँ 
कर्ज़ उतारने के लिये 
एक करम इतना ही कर दे .....ओ खुदा 
मुस्कुराहटों पर से दर्द के लिबास ही उतार दे 

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

क्या दिखी तुम्हें ?

नेपाल से निकलने वाली पत्रिका ' शब्द संयोजन ' के अक्टूबर २०१५ अंक में प्रकाशित मेरी कविता :






सूख गए हैं स्रोत गोमुख के 
तक्षशिलाओं  मुहानों पर बैठे  हैं दल्ले 
भोगवादी प्रवृत्ति ने उपजाई हैं कंटकाकीर्ण फसलें 
फिर कैसे संभव है 
अंगूर के मौसम में आम उगाना 
विपरीतार्थक शब्दों को समुच्चय में बाँधना 
रक्ताभ मार्गों में नीलाभ आभा बिखेरना 

जब समय के तंतु बिखर चुके हों 
पहाड़ों के दुःख पहाड़ से हो गए हों 
ग्रह नक्षत्रों की युति 
कालसर्प दोष को  इंगित कर रही हो 
ऐसे समय में 
कैसे संभव है 
पहाड़ का सीना चीर 
दूध की नदिया बहाना 
या मौसमों के बदलने से 
मनः स्थिति का बदलना 
जब चूल्हों की जगह 
कहीं पेट की तो 
कहीं शरीर की भूख की 
लपटें पसरी हों 
और सिंक  रही हो 
मानवता की रोटियां जली फुँकी 

हृदय विहीन समय के 
नपुंसक समाज में 
जीने के शाप से शापित 
समाज का कोढ़ है 
 इंसानियत की बेवा का करुण विलाप 

नैराश्य के घनघोर 
अंधियारे में घिरे 
पुकारते पूर्वजों की चीखें 
बंद कानों पर नहीं गिरा करतीं 
सिर्फ टंकारें 
जो तोड़ती हैं 
वो ही सुनाई देती हैं 
एक ऐसे समय में 
जीने को अभिशप्त मानव 
कहाँ से लाये पारसमणि 
जो जिला दे 
मृत आत्माओं की 
संवेदनाओं को 

व्यग्र माँ पुनरुत्थान को 
कातर निगाहों से 
भविष्य की ओर 
ताक रही है .......... क्या दिखी तुम्हें ?

सोमवार, 11 अगस्त 2014

कुछ सूखे ठूंठ किसी भी सावन में हरे नहीं होते ............

लगता है
सूख चुके सारे स्पंदन
हर स्रोत
हर दरिया
जो कभी बहता था
शिराओं में मोहब्बत बनकर
क्योंकि
अब बांसुरी कोई बजती ही नहीं
जिस की धुन सुन राधा मतवाली हो जाये
मन की मिटटी कभी भीजती ही नहीं
जो कोई अंकुर फूट जाए
शब्दों की वेदियों पर
अब मोहब्बत की दस्तानों का
फलसफा कोई लिखता ही नहीं
जो  एक आहुति दे
हवन पूरा कर लूं
अग्नि प्रज्वलित ही नहीं होती
क्योंकि
सीली लकड़ियाँ आँच पकडती ही नहीं
फिर समिधा हो या अग्नि की उपस्थिति
देवताओं का आह्वान या नवग्रह की पूजा
सब निरर्थक ही लगता है
क्योंकि
दरिया सूख जाये कोई बात नहीं
मगर स्रोत ही विलुप्त हो जायें
स्पंदन ज़मींदोज़ हो गए हों
तो कोई कैसे पहाड़ियों का सीना चीर दरिया बहाए
कुछ सूखे ठूंठ किसी भी सावन में हरे नहीं होते ............

बुधवार, 6 अगस्त 2014

क्योंकि आवाज़ की पगडंडियों के पाँव नहीं होते …………

पगडंडी के
इस  छोर पर मैं
उस छोर पर तुम
बीच में माध्यम
सिर्फ आवाजें
ध्वनि विध्वंस हो
उससे पहले
तुम पुकार लो .............

किसी भी राह से चलो
किसी पगडण्डी तक पहुँचो
माध्यम तो तुम्हें चुनना ही होगा

पुकारने के लिए ..............

इंतज़ार को मुकम्मलता प्रदान करने के लिए ..............
एक अमिट  इतिहास रचने के लिए ................

आओ करें सार्थक अपना होना
आवाज़ की पगडण्डी पर ..............


क्योंकि आवाज़ की पगडंडियों के पाँव नहीं होते …………