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शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

घुलनशील पदार्थ




अपने आने जाने के क्रम में
कितनी ही उठापटक कर लें
मगर हश्र अंततः मिटना ही है
फिर वो कोई भी हो
चिंताएं , ज़िन्दगी या इन्सान

तिल तिल कर जलने से नहीं मिटा करतीं
जबरन चाहतों पर फूल नहीं चढवाये जा सकते
चिंताओं की अनगिनत लकीरों में
उम्र के तकाज़े फीके पड़ने लगते हैं

तमाम पोशीदा राज़ मानो
उघड़ने को आतुर हो उठते हों
मगर
नफीरियों के बजने से ही तो
नहीं होता इल्म बारात का
वक्त की नज़ाकतें ही
तजवीजें उपलब्ध कराती हैं
मुक्ति की

ये एक आत्मघाती हमला है
बचाव का कोई साधन नहीं
फिर भी
जाने क्यों ढोई जाती हैं चिता तक
जबकि जानते हैं सब
घुलनशील पदार्थ सी तो होती हैं चिंताएं

शनिवार, 23 जनवरी 2016

दस्तकें

तुम्हारे आश्वासनों की दहलीज पर
बैठी रही आस मेरी ताकते हुए
दरवाज़ा खुला रखा था मैंने

तुमने नहीं आना था
तुम नहीं आये
और अब
आस की गुलाबी दहलीज पर
सन्नाटों के शहर में
लगी आग से
कौतुहल में मत पड़ना
रिवाज़ है अपने अपने शहर का
रस्मों को जिंदा रखने का

हाँ , रस्म है ये भी
आस के बिलबिलाते पंछी को सांत्वना देने की
कर लो तुम भी दरवाज़ा बंद
कि
पहर पिछले हों या अगले
दस्तकें , बंद दरवाज़ों पर ही हुआ करती हैं

सोमवार, 18 जनवरी 2016

पहला समीक्षा संग्रह

मित्रों
१२ जनवरी २०१६ को विश्व पुस्तक मेले में लेखक मंच पर मेरे द्वारा लिखे ‪#‎पहलेसमीक्षासंग्रह‬ ' सुधा ओम ढींगरा : रचनात्मकता की दिशाएं ' का पुस्तक मेले में विमोचन हुआ जो शिवना प्रकाशन से प्रकाशित है . उस अवसर की कुछ झलकियाँ आपके समक्ष :


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