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शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

सुरेन्द्र कुमार सिंह की नज़र में 'बदलती सोच के नए अर्थ '




जिस तरह कहा जाता है इंसान का कहा शब्द कभी ख़त्म नहीं होता , ब्रह्माण्ड में घूमता रहता है शायद उसी तरह इंसान का लिखा भी . अभी १ अप्रैल को सुबह सुबह मेरे पास फ़ोन आता है , मैं सुरेन्द्र कुमार सिंह बोल रहा हूँ आज़मगढ़ से और मेरे हाथों में आपकी किताब है , सुन लगा कि वो मेरे उपन्यास की बात कर रहे हैं , तभी बोले आपका  कविता संग्रह 'बदलती सोच के नए अर्थ' मुझे समीक्षा हेतु प्रदान किया गया और जैसे ही पहली कविता पढ़ी लगा कुछ बात है , कुछ अलग तेवर है और मैं आपका पूरा संग्रह पढ़ गया और जल्दी ही समीक्षा लिखने वाला हूँ जो आपको भी भेजूंगा . ये एक पत्रिका में आएगी . सुनकर ख़ुशी से अभिभूत हो गयी क्योंकि एक अनजान शख्स जिसे मैं जानती भी नहीं यदि वो खुद से फ़ोन करे और फिर आज समीक्षा लिखकर भेज भी दे तो ये किसी भी लेखक या कवि के लिए सबसे ख़ुशी की बात है क्योंकि एक लेखक/कवि की प्रतिक्रिया ही खुराक होती है. 

आज से दो साल पहले मेरा ये पहला कविता संग्रह आया था जो पहले पहले प्यार की तरह था और उनकी बात सुन मैं सोच में पड़ गयी आखिर कौन सी यात्रा तय करते हुए संग्रह उस हाथ में पहुंचा होगा . मुझे नहीं पता किस पत्रिका में आएगी और कब और किसने उन तक पहुँचाया लेकिन सुखद अनुभूति हुई .

आज विश्वास हो गया कि लिखा हुआ कहीं न कहीं जरूर पहुँचता है और खासतौर से उन तक जहाँ आपके लेखन को सार्थकता मिले बेशक देर से ही सही ...

अब उनकी लिखी प्रतिक्रिया जैसी  भेजी  है  बिल्कुल  वैसी  ही  यहाँ  लगा रही हूँ साथ में स्क्रीनशॉट भी  क्योंकि मुझे मेल पर भेजी है उन्होंने और फेसबुक या ब्लॉग पर वो सक्रिय नहीं :

एक नजरिया
बन्दना गुप्ता के काब्य सन्ग्रह
बदलती सोच के नये अर्थ पर
सुरेन्द् कुमार सिंह चांसO
खुद ही में है
बदलती सोच के नए अर्थ
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...
यकीं नही था ऐसा होगा
चैन सपना प्रेम भी सपना होगा
जी हाँ मनुष्यता के अभाव मेँ उत्तपन्न हुयी बेचैनियों से ब्याकुल मनुष्य का कवि शाँति और सन्तुलन के प्रयास में जो पाता है उसे कविता के रूप में हमे उपलब्ध कराता है।बन्दना गुप्ता की कविताएँ कुछ इसी प्रकार की प्राप्तियां हैं हमारे लिये।

बदलती सोच के नये अर्थ उनके काब्य सन्ग्रह के बीच से गुजरते हुए उनके वैचारिक संसार का स्वाद लिया जा सकता है।सकारात्मकता से आबद्ध मनुष्यता का एक आवेग है उनके अंदर।यूँ तो कविताओं को प्रेम,स्त्री विषयक,सामाजिक और दर्शन जैसे शीर्षक से वर्गीकृत किया गया है लेकिन कविताओ के अंदर जाइये तो सारे वर्गीकरण टूटकर एक भाव दृष्टि से निबद्ध हैं।मैं यह नही कह सकता कि कुछ नया है इनमे लेकिन मानव सभ्यता के क्षरण होते परिवेश में,भावनातमक संवेग की तेज आँधी में अपने को बचाये रख पाना और औरों को बचाये रखने की कामना रखना मानवीय जिजीविषा का एक दस्तावेज तो हैं उनकी कविताएँ।

काब्य सन्ग्रह के प्रवेश द्वार पर ही उनकी आवाज कि देखो मुझे मुहब्बत के हरकारे ने आवाज दी है,एक आकर्षण पैदा करती है उनके प्रति और यह आकर्षण पुरे काब्य सन्ग्रह में न सिर्फ अस्तित्व में है अपितु सक्रिय है।अनजान से प्रेममय एहसास की कितनी प्यारी सी मुश्किल है
न मैं कोई रूह/शायद मेरी चाहत की कोई अनगढ़ी सी तस्वीर हो तुम।शायद रूह की होती होगी कोई दुनिया लेकिन जिस्म से मिलकर रूह ने बनायी है ये दुनिया।यह है दुनिया जिसमे बन्दना गुप्ता तलाशती है अपने प्रजाति का अस्तित्व।मनुष्यता से सम्पुरित खोज है उनकी जिसके अभाव में संशय के जंगल में तब्दील हो गयी है ये दुनिया।

एक विश्वास है उनके अंदर।जब हम लोग अराजकता पर धर्म के चढ़ाये जा रहे रंग पर प्रतिक्रया दे रहे होते है जब हम लोग परमात्मा के नाम पर खुद भटकते हुए पूरे समाज को भटकाने की कोशिश कर रहे होते हैं जब हम लोग निष्प्रयोजयता के आकर्षण में अपना सब कुछ बन्धक रखकर जीवन यात्रा कर रहे होते है बन्दना गुप्ता अपने लिये जीवन का आवशयक सामान ढूंढ लेती हैं और कहती हैं तुम तो मेरी प्रकृति का लिखित हसताक्षर हो/सर्वदा साथ साथ रहने वाली।सुना है इंसान सब कुछ बदल सकता है लेकिन प्रकृति नही...स्वाभविक होती है। यहीं ठहरकर वो जीवन के कुरुक्षेत्र में प्रवेश करती हैं जहां लगता है वो कविता लिख रही हैं लेकिन वस्तुतः वो ब्यक्त हो रही हैं।हम इस सच को प्रणाम करते है कि एक मुकम्मल हो गयी जिंदगी से पूरा अमानवीय परिवेश सिहर उठता है।वो हमारी श्रापित मुहब्बत का मुक्त द्वार खोलती हैं।जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ब्याप्त जड़ता को बहुत सहजता से तोड़ देती हैं।भारतीय समाज के सबसे दुरूह और विवादित सन्दर्भ सेक्स के पार इतनी सहजता से चली जाती हैं कि लगता ही नही कि सेक्स कोई विवादित या अमर्यादित सन्दर्भ है।प्रेम का अंतिम लक्ष्य क्या है....सेक्स ।जब हमे सेक्स प्रेम का पर्याय लगता है वो सेक्स के आगे प्रेम तक जाती हैं।सेक्स सीढ़ी हो सकता है शारीरिक सम्मिलन का लेकिन प्रेम तो अपने को जान लेने में है।अपने को जान लेने की प्रक्रिया में सेक्स एक आकर्षक त्याज्य या आवशयक विषय मात्र है।जब कि प्रेम हमेशा एक ताजगी लिए होता है।

अगर बदलती हयी सोच के नये अर्थ में बन्दना गुप्ता को देखा जाये तो वो अपने को ब्यक्त करती हुयी हमसे सम्बाद करती हैं।हम यानि पाठक स्त्री भी पुरुष भी।स्त्री के सन्दर्भ में उनकी कविताये खासकर अघाई औरतें,इतना विरोध का स्वर,मुझे साक्षत्कार देने नही आता,मैं नही जानती अपने अंदर की उस लड़की को और मीरा बनना आसान नही है जिस समय में लिखी गयीं है उस समय की अपनी विशिष्टता है।कवि और लेखक बनने का जूनून हैं।बेस्ट सेलर बुक लाने की महत्वाकांक्षा है।बौद्धिक बहसों का पैदा किया गया ब्यवसायिक आकर्षण है।प्रतिरोध है।मानसिक गुलामी का आकर्षण है और लीक से अलग हटकर लिखने का क्रेज है।विषयगत गुटबाजियां है और यह सब का सब एक संस्थगत ढांचे की तरह है।बन्दना गुप्ता इस ढांचे का ही प्रतिरोध करती हैं और अपनी ओर वापस आने की।कोशिश करती हैं।


स्त्री विषयक अपने समय के लोकप्रिय सन्दर्भों से अलग स्त्री सशक्तिकरण की आयातित विचारधारा से बाहर निकलने की उनकी अपनी मौलिक कोशिश है।अपनी तरफ वापस आने में आ रहे परतिरोध पर अगर प्रतिक्रिया दिया जाय तो ऊर्जा का अनावशयक उपयोग है ये।यह एक बाधा जरूर है उनके सामने।

भारत में स्त्री शक्ति स्वरूप् है और बदलती हुयी सोच के नए अर्थ में उसको नए रूप में देखा जा सकता है।सचमुच दुनिया की सबसे सुंदर और शक्तिशाली स्त्री हमारे अंदर है हमे उसे अपनी जरूरत के रूप में देखने की दृष्टि विकसित करनी होगी।विश्वास करना होगा उसकी शक्ति में।हम जानते है पुरुष का प्रतिरोध एक लेखकीय फैशन है और ऐसा करने वाली लेखिकाएँ एक काल्पनिक ही सही अपनी जरूरत का पुरुष चरित्र गढ़ने में अक्षम हैं।इसकी एक मात्र वजह है कि उन्हें अपनी ही शक्ति में विश्वास नही है और वो खुद को जानने की प्रक्रिया से बाहर चली गयी हैं।एक आयातित विचारधारा की धुनि में धुनि मिलाकर वाहवाही लूटने में मशगूल हैं।

सामाजिक और दर्शन के अंतर्गत उनकी कविताएँ अपने परिवेश को देखने की उनकी अपनी दृष्टि हैं।इंसान और उसकी अभिब्यक्ति में जो आदमी तमाम झंझावातों के बीच अपनी मनुष्यता अथवा अपना गुणधर्म बचाये रखता है वो शब्दों के जंगल में अजनवी सा लगता है लेकिन वो है और इसलिए कि वो अपने में है।

सम्भोग से समाधि बहुत विवादित और चर्चित सन्दर्भ है यूँ तो सेक्स हमारी उतपत्ति का आधार है लेकिन सम्भोग सेक्स नही है ।ये हमारी उतपत्ति का पुर्व है पृथ्वीं पर मनुष्य के प्रथम आगमन का क्रिया बाजार है।
ध्यानी ज्ञानी अथवा बैज्ञानिक न तो इस क्रिया के द्रष्टा है न जानने के राही।कोई कल्पना कर सकता है क्या कि पृथ्वी पर पहला आदमी कैसे आ गया।

बहुत बहुत धन्यबाद बन्दना गुप्ता जी को उनकी किताब बदलती सोच के नए अर्थ के लिए और इस विश्वास के लिए कि जबमै खुद से मिल लुंगी तो सारे प्रश्नो के उत्तर मिल जायेंगे अभी तो उत्तरों के समुन्दर में प्रश्न उछल रहे हैं।