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शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

देश बदल रहा है ..........

चलिए
देश बदल गया
विकास हो गया
अब और क्या चाहिए भला ?

जो जो आप सबने चाहा
उन्होंने दिया
अब जो भी विरोध करे
देशद्रोही गद्दार की श्रेणी का रुख करे

आइये गुणगान करें
क्योंकि
अच्छे दिन की यही है परिभाषा

आँख पर लगा काला चश्मा प्रतीक है
हमारी निष्ठा और समर्पण का

शुभ है
लाभ है
उसके बाद जो कहा
सब बकवास है

नतमस्तक होना आदत है हमारी
फिर चाहे हर बार रेती जाए गर्दन ही हमारी

चलो
खुश रहो
और उन्हें भी रहने दो
देश बदल रहा है ...........अब मान भी लो 
 
ज़िन्दगी और मौत का खेल तो नियति है

बुधवार, 2 नवंबर 2016

आ जाओ या बुला लो

आ जाओ या बुला लो
इन्ही रूई के फाहों सम
कि
पिघल न जाऊँ
गुजरे वक्त के साथ
फिर तुम आवाज़ दो तो भी आ न सकूँ


कि
यादों के आगोश में
इक बर्फ अब भी पिघलती है
क्या नम नहीं हुईं तुम्हारी हथेलियाँ


यूँ कि ये
बर्फ के गिरने का समय है
या
तुम्हारी यादों का कहर
गोया अनजान तो नहीं होंगी तुम
जानता हूँ मैं


आ जाओ या बुला लो
वक्त के फिसलने से पहले ...


पहली पंक्ति विजय सपत्ति से साभार