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शुक्रवार, 31 मई 2013

क्या आँच पहुंची वहाँ तक ?

वो एक कतरा जो भिगो कर
भेजा था अश्कों के समंदर में
उस तक कभी पहुँचा ही नहीं
या शायद उसने कभी पढ़ा ही नहीं 
फिर भी मुझे इंतज़ार रहा जवाब का 
जो उसने  कभी दिया ही नहीं 
जानती हूँ ............
वो चल दिया होगा उन रास्तों पर 
जहाँ परियां इंतजार कर रही होंगी
कदम तो जरूर बढाया होगा उसने
मगर मेरी सदायें आस पास बिखरी मिली होंगी
और एक बार फिर वो मचल गया होगा
जिन्हें हवा में उडा आया था 
उन लम्हों को फिर से कागज़ में 
लपेटना चाहा होगा
मगर जो बिखर जाती है
जो उड़ जाती है
वो खुशबू कब मुट्ठी में कैद होती है
और देखो तो सही
आज मैं यहाँ गर्म रेत को 
उसी खुशबू से सुखा रही हूँ 
जिसे तूने कभी हँसी में उड़ाया था
बता अब कौन सी कलम से लिखूं
हवा के पन्ने पर सुलगता पैगाम
कि ज़िन्दगी आज भी लकड़ी सी सुलग रही है 
ना पूरी तरह जल रही है ना बुझ रही है 
क्या आँच पहुंची वहाँ तक ?

मंगलवार, 28 मई 2013

कभी देखा है खामोश आसमाँ

कभी देखा है खामोश आसमाँ
दिनकर की उदास बिखरती प्रभाएँ
पंछियों का खामोश कलरव
सुदूर में भटकता कोई अस्तित्व
खामोश बंजर आसमाँ की
चिलमनों में हरकत लाने की कोशिश में
दिन में चाँद उगाने की चाहत को
अंजाम देने की इकलौती इच्छा को
पूरा करने की हसरत में
कभी कभी आसमाँ को अंक में
भरने को आतुर उसके नयन
खामोश शब् का श्रृंगार करते हैं
और आसमाँ की दहलीज पर रुकी
साँझ पल में बिखर जाती है
पर आसमाँ की ख़ामोशी ना तोड़ पाती है
कहीं देखा है टूटा - बिखरा हसरतों का जनाजा ढोता आसमाँ ?

शनिवार, 25 मई 2013

तपती रेत का रेगिस्तान हूँ मैं

तुम और तुम्हारे लाजिक
समझ नहीं आते कभी कभी
कितना हल्के में लेते हो 
कभी कभी चीज़ों को
खासतौर पर यदि 
वो तुमने किया हो
सिर्फ़ एक इतना भर कह देना
"क्या हुआ फिर ……ऐसे ही होता है "
मगर अपनी गलती कभी नहीं स्वीकारना
और यदि कुछ ऐसा मैने किया होता 
तो ……
क्या तब भी यही कहते ?
नहीं ……यही है तुम्हारा दोगला चरित्र 
सिर्फ़ अपने लिये जीने वाला
हुंह ………क्यों लिख रही हूँ
क्यों कह रही हूँ
फिर किसे और किसके लिये
खुद से बडबडाने की आदत गयी नहीं अब तक
जबकि जानती हूँ
तुम तक कभी नहीं पहुँचेगी मेरी आवाज़
तुम कभी नही जान पाओगे मुझे 
नहीं समझ पाओगे मेरी चाहत
क्योंकि
चाहतों के लिये बन्दगी में सिर झुकाना होता है
और ये तुम्हारे अहम को मंज़ूर नहीं होगा 
इसलिये 
अब ना गिला ना शिकवा करने का मन करता है
ना तुम पर दोषारोपण का या बहस का
हर बार विश्वास की धज्जियाँ उडाते 
तुमने कभी देखा ही नहीं
मेरा वजूद भी उसके साथ
चिंदी चिंदी बन बिखरता रहा
और आज मुझमें "मैं" बची ही नहीं
वो ही वाली "मैं" जिसका
हर शब्द, हर आस , हर विश्वास
हर दिन, हर रात , हर सुबह , हर शाम
सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम ही तुम थे 
वक्त किसी का ऐसा इम्तिहान ना ले
कश्ती हो कागज़ की और सागर पार करना हो वो भी बिना डूबे 

तपती रेत का रेगिस्तान हूँ मैं
ज़रा एक अलाव और जला दो ………सुकूँ से जीने के लिये

मंगलवार, 21 मई 2013

"बेबाक महिला "

सुनो 
मत खाना तरस मुझ पर 
नहीं करना मेरे हक़ की बात 
न चाहिए कोई आरक्षण 
नहीं चाहिए कोई सीट बस ,ट्रेन या सफ़र में 
मैंने तुमसे कब ये सब माँगा ?
जानते हो क्यों नहीं माँगा 
क्योंकि 
तुम कभी नहीं कर सकते मेरी बराबरी 
तुम कभी नहीं पहुँच सकते मेरी ऊँचाईयों पर 
तुम कभी नहीं छू सकते शिखर हिमालय का 
तो कैसे कहते हो 
औरत मांगती है अपना हिस्सा बराबरी का 
अरे रे रे ..............
फ़िलहाल तो 
तुम डरते हो अन्दर से 
ये जानती हूँ मैं 
इसलिए आरक्षण , कोटे की लोलीपोप देकर 
अपने कर्त्तव्य की इतिश्री करते हो 
जबकि मैं जानती हूँ 
तुम मेरे बराबर हो ही नहीं सकते 
क्योंकि 
हूँ मैं ओत-प्रोत मातृत्व की महक से 
जनती हूँ जीवन को ......जननी हूँ मैं 
और जानते हो 
सिर्फ जनते समय की पीड़ा का 
क्षणांश भी तुम सह नहीं सकते 
जबकि जनने से पहले 
नौ महीने किसी तपते रेगिस्तान में 
नंगे पाँव चलती मैं स्त्री 
कभी दिखती हूँ तुम्हें थकान भरी 
ओज होता है तब भी मेरे मुख पर 
और सुनो ये ओज न केवल उस गर्भिणी 
गृहणी के बल्कि नौकरीपेशा के भी 
कामवाली बाई के भी 
वो सड़क पर कड़ी धूप  में 
वाहनों को दिशा देती स्त्री में भी 
वो सड़क पर पत्थर तोडती 
एक बच्चे को गोद में समेटती 
और दूजे को कोख में समेटती स्त्री में भी होता है 
और सुनना ज़रा 
उस आसमान में उड़ने वाली 
सबकी आवभगत करने वाली में भी होता है 
अच्छा न केवल इतने पर ही 
उसके इम्तहान ख़त्म नहीं होते 
इसके साथ निभाती है वो 
घर परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी भी 
पूरी निष्ठां और ईमानदारी से 
जरूरी तो नहीं न 
हर किसी को उपलब्ध हों वो सहूलियतें 
जो एक संपन्न घर में रहने वाली को होती हैं 
कितनी तो रोज बस ट्रेन की धक्कामुक्की में  सफ़र कर 
अपने गंतव्य पर पहुँचती हैं 
कोई सब्जी बेचती है तो कोई होटल में 
काम करती है तो कोई 
दफ्तर में तो कोई कारपोरेट ऑफिस में 
जहाँ उसे हर वक्त मुस्तैद भी रहना पड़ता है 
और फिर वहां से निकलते ही 
घर परिवार की जिम्मेदारियों में 
उलझना होता है 
जहाँ कोई अपने बुजुर्गों की सेवा में संलग्न होती है 
तो कोई अपने निखट्टू पति की शराब का 
प्रबंध कर रही होती है 
तो कोई अपने बच्चों के अगले दिन की 
तैयारियों में उलझी होती है 
और इस तरह अपने नौ महीने का 
सफ़र पूरा करती है 
माँ बनना आसान नहीं होता 
माँ बनने के बाद संपूर्ण नारी बनना आसान नहीं होता 
तो सोचना ज़रा 
कैसे कर सकते हो तुम मेरी बराबरी 
कैसे दे सकते हो तुम मुझे आरक्षण 
कैसे दे सकते हो कोटे में कुछ सीटें 
और कर सकते हो इतिश्री अपने कर्त्तव्य की 
जबकि तुम्हारा मेरा तो कोई मेल हो ही नहीं सकता 
मैंने तुमसे कभी ये सब नहीं चाहा 
चाहा तो बस इतना 
मुझे भी समझा जाए इंसान 
मुझे भी जीने दिया जाए 
अपनी इच्छाओं आकांक्षाओं के साथ 
बराबरी करनी हो तो 
आना मेरी ऊँचाई तक 
मेरी जीवटता तक 
मेरी कर्मठता तक 
मेरी धारण करने की क्षमता तक 
जब कर सको इतना 
तब कहना बराबर का दर्जा है हमारा 
जानना हो तो इतना जान लो 
स्त्री हूँ .........कठपुतली नहीं 
जो तुम्हारे इशारों पर नाचती जाऊं 
और तुम्हारी दी हुयी भीख को स्वीकारती जाऊं 
आप्लावित हूँ अपने ओज से , दर्प से 
इसलिए नही स्वीकारती दी हुयी भीख अब कटोरे में 
जीती हूँ अब सिर्फ अपनी शर्तों पर
और उजागर कर देती हूँ स्त्री के सब रहस्य बेबाकी से 
फिर चाहे वो समाजिक हों या शारीरिक संरचना के 
तोड देती हूँ सारे बंधन तुम्हारी बाँधी
वर्जनाओं के , सीमाओं के 
और कर देती हूँ तुम्हें बेनकाब
इसलिय नवाजी जाती हूँ "बेबाक महिला " के खिताब से 
और यदि इसे तुम मेरी बेबाकी समझते हो तो 
गर्व है मुझे अपनी बेबाकी पर 
क्योंकि 
ये क्षमता सिर्फ मुझमे ही है 
जो कर्तव्यपथ पर चलते हुए 
दसों दिशाओं को अपने ओज से नहला सके 
और अपना अस्तित्व रुपी कँवल भी खिला सके 

शुक्रवार, 17 मई 2013

" मन पखेरू उड़ चला फिर "………आखिर कैसे ये कमाल हुआ



जीवन एक कविता ही तो है बस जरूरत है तो उसे गुनगुनाने की , जीवन एक प्रेमगीत ही तो है बस जरूरत है तो उसमें रच बस जाने की और इन सब भेदों को जीवन्त किया सुनीता शानू ने अपने काव्य संग्रह " मन पखेरू उड़ चला फिर " के माध्यम से जो हिन्द युग द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह है .

मन की गति अबाध होती है  . कौन कौन से ब्रह्मांडों की सैर पर निकल जाती है कोई सोच भी नहीं सकता मगर सुनीता के पैर धरती पर ही हैं बस मन है जो हिरन सा कुलांचे भरता अपने लक्ष्य की और दौड़ रहा है . कभी प्रेम बनकर तो कभी विरह बनकर , कभी मानवीय सरोकारों से जूझता तो कभी जीने की जिजीविषा का गान बनकर एक ऐसा संगीत बनकर जो प्रकृति सा निस्सृत बह रहा है और पाठक उसके संग डूब उतर रहा है . 
कवि मन कितनी सादगी से मन के उद्गारों को प्रकट करता है कि लगता है जैसे हम ये ही तो सोच रहे थे 

मोहब्बत की बातें होठों पर होती नहीं हैं 
आँखें खुद बताती हैं छुपाकर सोती नहीं है 

तो कहीं यादों के झुरमुट में खोजते वो क्षण हैं जो ज़ेहन  कि धरोहर बने रहते हैं ताउम्र 


बचपन के उस घरौंदे की कसम तुमको 
अब आ ही जाओ 
कच्ची इमली की कसम तुमको 
आह भी वो 
नीम पीपल बर्गाफ्द बुलाते हैं 
तन्हाई में 
हमें अक्सर वाही तो याद आते हैं 

कितनी कोमलता है भावों में तो एक कसक , एक मिठास भी तारी है जो मन को भिगोता है .

जीने को क्या चाहिए सिर्फ इक मुट्ठी आसमान और उसी की चाहत यहाँ जज़्ब है 

लोग 
कहते हैं मसीहा 
सरे जग को 
देने वाले ज्यादा नहीं पर थोडा सा ही 
 मुझको तेरा प्यार दे दे 
जी सकें जिसमें तनिक , इक 
छोटा सा संसार दे दे 

भावों की गरिमा ग़ज़ल में माध्यम से दिल तक पहुँचती है 

लगे हैं फूलों के मेले शाखों पर ऐसे 
की जैसे  परिंदा नया कोई आया है 

काग भी बोल रहा था मुंडेर पर कब से 
घर पे तुम्हारे ये मेहमान कौन आया है 


ये ही नहीं कवि मन अपनी संस्कृति को भी नहीं भूलता है बल्कि उसमे तो उसका मन और हिलोरें लेने लगता है तभी तो होली का खूबसूरत चित्रण कर पाता है 

दूर कहीं कलरव करती 
चली परिंदों की बरात 
कहीं बजी बांस में शहनाई 
और महकती बह चली 
रंगीन पुरवाई 
 कि आज होली रे ..........................


मन पखेरू से बतियाती सुनीता उस असमंजस को बयां करती है जिससे हर कोई गुजरता है और मन को बाँधने के जतन  करता है 

रे नीडक , तू चंचल क्यूं है 
कहीं तेरा छोर न पाता  है 
कभी इधर तो कभी उधर 
इक डाल  पे टिक नहीं पाता है 

रे पाखी अब मान भी जा टू 
क्यूं अपमानित हुआ जाता है
 ये सच है  कि सुबह का भूला 
लौट शाम घर आता है 
आ तनिक विश्राम भी कर ले 
ठहर क्यों नहीं पाता है 


"पंछी तुम कैसे गाते हो "कविता के माध्यम से जीवन की जिजीविषा का बहुत ही सफल वर्णन किया है साथ ही एक सीख भी मिलती है  कि जीवन जीना कैसे चाहिए .


एक तरफ " इंतज़ार" के मुहाने पर खड़ा प्रेम है तो दूसरी तरफ " प्यार का सितारा" कहीं टूट जाता है क्योंकि गागर में भी सागर समाया है 

फेंक कर पत्थर जो मर 
तड़प उठीं मौन लहरें 
डूबने से डर रहे तुम 
शांत मन की झील में 

शायद झील से भी ज्यादा गहरा है यहाँ प्रेम का अस्तित्व 


छोटी छोटी क्षणिकाएं बहुत गहरी बात कह रही हैं 

मौत ने ज़िन्दगी पर 
जब किये हस्ताक्षर 
वह था एक और ज़िन्दगी के 
जन्म लेने का पहला दिन 


तुम तनहा कहाँ हो 
लिपटी हुयी तुमसे 
मैं जो रहती हूँ सदैव 
कहती है तन्हाई मुझसे 


उसकी आँखों से हकीकत बयां होती है 
हर घडी एक नया इम्तिहान होती है 
घूरने लगती हैं दुनिया  कि नज़र उसको 
जब किसी गरीब की बेटी जवान होती है 


बहुत देर के बाद कहा 
तुमने मुझे अपना 
लेकिन अब मैं 
किसी और की हो चुकी हूँ 


अंतर्मन जब बेचैन हो उठता है , कहीं कोई ठौर न उसे दीखता है तब पुकार उठता है उस असीम को और जोड़ लेता है उसी से " दर्द का रिश्ता " क्योंकि एक वो ही तो है जहाँ जाकर दर्द भी चैन पाता है 

एक कोने में बैठा 
निर्विकार 
सौम्य 
अपलक निहारता मुझे 
और बा्ट जोहता की 
मैं 
पुकारूं तेरा नाम 


" अतीत के दंश " नाम ही काफी है सब कुछ बयां करने को जिसे कुछ यूं बयां किया है 

कभी कभी आत्मा के गर्भ में 
रहा जाते हैं कुछ अंश 
दुखदायी अतीत के 
जो उम्र के साथ साथ 
फलते फूलते 
लिपटे रहते हैं 
अमर बेल की मानिंद 


तो दूसरी तरफ भावुक मन समाज में फैले कोढ़ पर भी दृष्टिपात किये बिना नहीं रहता जिसे उन्होंने मासूमियत के माध्यम से उकेरा है 

मासूम अबोध आँखों को घेरे 
स्याह गड्ढों ने भी शायद 
वक्त से पहले ही 
समझा दिया था उसे 
 कि सबको खिलाने वाले 
उसके ये हाथ 
जरूरी नहीं कि भरपेट खि्ला पायेंगे 
उसी को 

" मलाल " शायद ज़िन्दगी की हकीकत को बयां करती रचना है जहाँ जरूरी होता है दोनों पक्षों का खुश रहना जो कभी संभव ही नहीं हो पाता और एक मलाल दोनों के दिलों को ता- ज़िन्दगी कचोटता रहता है 

तुम्हें शायद 
यकीं न हो किन्तु यही सच है 
तुम ही कहो 
क्या कभी कोई किसी को 
रखा पाया है खुश 
पूरी तरह से ?

एक बेटी के मन की पीड़ा को गहनता से महसूसता दिल उसके दर्द को कुछ इस तरह बयां करता है 

कहा था एक दिन तुमने 
पराई अमानत है 
ये बच्ची 
तभी से आज तक माँ 
मैं अपना घर ढूंढती हूँ 


" कामवाली " कविता जीवन के कटु यथार्थों को बेलिबास करती वो रचना है जो सच कहने से नहीं हिचकिचाती  कि लाइफ लाइन हैं ये कामवालियां आज लेकिन किन हालात में और कैसे काम करती हैं खुद को भुलाकर ये एक सोचने का विषय है 

घरवाली के सौन्दय का ख्याल रख तुम्हें 
बने रहना है पूर्ववत 
कामवाली तुम्हें बस काम से मतलब रखना है 
तुम्हारा पति 
तुम्हारे बच्चे 
तुम्हारा सजना संवारना 
शाम होने और दिन निकलने के 
बीच का मामला है 
तुम जानती हो 

कुंठित सोच पर तुषारापात करती है कविता .....कामवाली 

किस पर करूँ विश्वास , ख़ामोशी , श्रृंखला , एक शाम , कन्यादान , माँ आदि सभी कवितायेँ जीवन के पहलुओं से ओतप्रोत रचनायें हैं जो रोज हम सबके जीवन में घटित होती हैं मगर सब कोई उन्हें शब्दों में बांध नहीं पाता और ये तो रोजमर्रा का काम है सोच कोई भी ध्यान नहीं देता जबकि ये ही तो जीवन की हरित क्रांति का एक हिस्सा हैं जिनके बिना जीवन अधूरा दीखता है और जिन्हें यदि शब्दों की मेड लगा कर बांध दिया जाए तो एक जीवन दर्शन होता है .

 सुनीता की सभी कवितायेँ जीवन के प्रत्येक क्षण की गवाह रही हैं फिर चाहे वो " चिन्ह " हो या " डोर " या " फिर जीना चाहती थी मैं " हो . हर कविता सहजता से अपनी बात कह जाती है जहाँ पाठक को जोर नहीं लगाना पड़ता बस डूबता जाता है उन पलों में जो उसके जीवन के करीब होते हैं , जहाँ वो खुद को जैसे एक आईने के सम्मुख पाता है और अपने जीवन का दर्शन करता है . 

एक ऐसा काव्य संग्रह है " मन पखेरू उड़ चला फिर " जिसमे मन ही तो बतिया रहा है ,मन ही उड़ान भर रहा है कभी दिशा में तो कभी दिशाहीन होता मगर मन तो आखिर मन है , चंचल है , किसी जगह नीड़ कब बनाता है और उसी चंचलता ने हमें इस काव्य संग्रह के रूप में एक हम सबके जीवन का आईना दिया है जिसमे कुछ देर बैठकर हम खुद को निहार सकें , खुद से बतिया सकें और यही किसी भी लेखक के लेखन की सफलता है जहाँ पाठक खुद को उन क्षणों का हिस्सा समझे और उसमे जिए .

सुनीता को अपनी हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए कामना करती हूँ वो इसी तरह आगे बढती जाएँ और हम सब को अपनी प्रतिभा से रु-ब -रु कराती रहे . 


195 रूपये मूल्य वाल इस काव्य संग्रह को जो भी पाठक प्राप्त करना चाहते हैं वो हिन्दयुग्म से संपर्क कर सकते हैं 

हिन्द युग्म 
1 , जिया सराय , हौज खास 
नई दिल्ली ---110016

मोबाइल --
9873734046
9968755908

प्यारी सखी सुनीता की कल इस किताब का विमोचन कांस्टीट्यूशन क्लब में होगा और मेरी तरफ़ से उन्हें ये प्यार भरा तुच्छ तोहफ़ा मैं भेंट कर रही हूँ ह्रदय के उदगारों के रूप में जो मैने उनकी किताब पढकर महसूस किये ………उम्मीद है स्वीकार्य होगा 

शुक्रवार, 10 मई 2013

तो क्या लिख सकूंगी कभी खुद को ऐसा ख़त ...................?

कहाँ से शुरू करूँ
क्या संबोधन दूं
और क्या लिखूं
कुछ ख्याल टकरा रहे हैं
मगर आकार पाने से पहले
एक जिद कर रहे हैं
सभी ने कुछ न कुछ लिखा
अपने प्रिय को
मगर नहीं मिला कोई ऐसा
जिसने खुद को कोई ख़त लिखा हो
चलो लिखो आज तुम
अपने नाम एक ख़त
मगर ईमानदारी से
जिसमे जिक्र हो तुम्हारी
उन अधूरी हसरतों का
उन अनकही चाहतों का
उन मिटटी में दबे जज्बातों का 

जिन्हें ना कभी आकार मिला हो
उन सुबहों का जिनमे
कोई इठलाता सपना
सरगोशी  करता हो
उन रातों का जब
एक एक पहर में
न जाने कितने
इन्द्रधनुष खिल उठे हों
या किसी रात को
जब तकिये पर सिर्फ निशाँ
ही बाकी रह गए हों
और अश्क सूख गए हों
उस तन्हाई का जिसमे तुम
किसी के साथ होते हुए भी
अकेली रह गयी हों ………

या उस मुस्कुराहट का 
जब दर्द के असंख्य बिच्छू 
डंक मार रहे हों
और तुम मुस्कुरा रही हो
क्या लिख सकोगी
पूरी ईमानदारी से खुद को ख़त
जो किसी ने पढ़ा न हो
और तुम्हारी ज़िन्दगी का
सशक्त हस्ताक्षर बन गया हो 


और मैं ....................
अब सोच में हूँ
क्या लिख सकूंगी कभी खुद को ऐसा ख़त
जिसमे रूह में जज़्ब कीलें
एक - एक कर निकालनी होंगी
और आहों की पारदर्शी स्याही से
किसी अनाम पन्ने पर
वो इबारत लिखनी होगी
जिसे पढने की ज़हमत तो खुदा भी न कर सके
क्योंकि ..........जानती हूँ
ज़मींदोज़ रूहों की मजारों पर दिए नहीं जला  करते

तो क्या लिख सकूंगी कभी खुद को ऐसा ख़त ...................?

मंगलवार, 7 मई 2013

यूँ भी फ़ना होने के हर शहर के अपने रिवाज़ होते हैं …………


बिना आँच के भट्टी सा सुलगता दर्द 
रूह पर फ़फ़ोले छोड गया 
आओ सहेजें 
इन फ़फ़ोलों में ठहरे पानी को रिसने से …………
कम से कम 
निशानियों की पहरेदारी में ही 
उम्र फ़ना हो जाये 
तो तुझ संग जीने की तलब 
शायद मिट जाये 
क्योंकि ………
साथ के लिये जरूरी नहीं 
चांद तारों का आसमान की धरती पर साथ साथ टहलना

यूँ भी फ़ना होने के हर शहर के अपने रिवाज़ होते हैं …………

शुक्रवार, 3 मई 2013

ये मौन के ज्वालामुखी किस टंकार के इंतज़ार में हैं ???


कभी कभी अजब स्थिति आ जाती है …………हम कुछ कहना चाहते हैं और कुछ और ही कहा जाता है ………कल ऐसा ही हुआ …………सबसे पहले उपसंहार कहा …………उसके बाद आरंभ …………मगर चैन नहीं मिला लगा जैसे कुछ छूट रहा है कहना ……………तो तभी फिर एक दस्तक हुई और जो बच रहा था उपसंहार और आरंभ के बीच का दरिया जिसे बहना था मगर अपने तटों में बंधा था आखिर तोड ही दिया उसने बाँध ………बह निकला अपनी मंज़िल की तरफ़ ……………और इस प्रकार हुआ इस रचना का जन्म :

छिज रही हूँ अन्दर ही अन्दर 
कोई चीरे और बताये 
कुछ बचा भी है या 
भुरभुरा चुकी है 
अस्थि मॉस मज्जा के साथ 
जज़्बात , संवेदनाएं , अहसास के साथ ......रूह भी 

देखो न फर्क ही नहीं पड़ रहा 
चारों तरफ शोर है 
संवेदनाएं हैं
जज़्बात हैं 
आन्दोलन हैं 
हक़ की लड़ाई है 
और एक मैं हूँ 
जिस पर असर ही नहीं हो रहा 
फिर चाहे बच्ची से बलात्कार हुआ हो 
या नारी की अस्मिता का सवाल हो 
या सरबजीत मर गया हो 
या न्याय के नाम पर अन्याय का आन्दोलन हो 
या देश हाहाकार कर रहा हो 
मेरा अन्तस्थ सूखे ठूंठ सा मौन खड़ा है 

शायद जान गयी हूँ 
कुछ नहीं होने वाला 
कुछ नहीं बदलने वाला 
क्योंकि 
ये तस्वीर तो रोज का सच है 
जिसे रोज अख़बार के पन्ने सा पलटते हैं हम 
और फिर अगली खबर के आने तक 
उसे भूल जाते हैं 
कमजोर याददाश्त की कमजोर इंसान जो हूँ मैं 
इसलिए मृत संवेदनाओं की लाश को ढोती मैं 
जिंदा भी हूँ या नहीं ...........इसी पशोपेश में उलझी हूँ 

तभी एक उद्घोषणा होती है :
फिर भी कुछ है 
जो 
सुलग रहा है 
मगर फ़ट नहीं रहा 

बस तभी से इसी सोच में हूँ 
ये मौन के ज्वालामुखी किस टंकार के इंतज़ार में हैं ???

बुधवार, 1 मई 2013

पता नहीं वो सच था या ये सच है

एक अरसा हुआ तुमसे बिछड़े
कितने अजनबी हो गए
साथ रहते हुए भी .......है ना
कितना नागवार गुजरने लगा है
एक दूजे का साथ ना
साथ चल भी रहे हैं
मगर साथ नहीं हैं
कल जिस  साथ को
जन्म जन्म का बनाने की चाहत थी
आज एक जन्म भी निभाना
कितना मुश्किल लगने लगा है
है ना................
ना जाने कब
अजनबियत की दरार उभरी
और इतनी गहराती गयी
कि पाटनी मुमकिन ना रही
और आज इतनी गहरा गयी है
कि अगर उसमे झांको तो
कुछ दिखाई नहीं देता
सिवाय गहरे बियाबान अंधेरों के
कोई अक्स भी गलती से यदि
उभरता दिखता है तो वो भी
भयावह शक्ल अख्तियार कर लेता है
तब लगता है
कैसे इतना सफ़र तय हो गया
कैसे वादा किया हमने साथ रहने का
जबकि आज लफ़्ज़ों में भी
तेजाब उफनता है
कैसे अजनबी एक हुए
और फिर अजनबी बन गए
या शायद एक तो कभी होते ही नहीं
सिर्फ समझौते पर समझौते करते
हमारे वजूद सहने की सीमा से आगे
झुकने को मजबूर नहीं होते
बेशक टूट क्यों ना जाए
शायद तभी हम ये सोचने को
मजबूर हो जाते हैं
क्या कभी हम साथ चले थे
क्या कभी हमने एक दूजे को चाहा था
पता नहीं वो सच था
या ये सच है
जब अभी तो ज़िन्दगी का
सिर्फ एक पड़ाव ही तय किया है
किनारे तक पहुँचने के लिए तो
ना जाने कितनी अग्निपरीक्षायें
मूंह बाये खडी हैं
बताओ ना फिर ...................
क्या इसी तरह तय कर पाओगे
अजनबियत का सफ़र
क्यूँकि जानते हो ना
जो तारे आसमाँ से टूट जाते हैं वो फिर नहीं जुडा करते!!!