भुंजे तीतर सा मेरा मन
वक्त की सलीब चढ़ता ही नहीं
कोई आमरस जिह्वा पर
स्वाद अंकित करता ही नहीं
ये किन पैरहनों के मौसम हैं
जिनमे कोई झरना अब झरता ही नहीं
मैं उम्र की फसल काटती रही
मगर ब्याज है कि चुकता ही नहीं
खुद से लडती हूँ बेवजह रोज ही
मगर सुलह का कोई दर दिखता ही नहीं
बहुत बढिया वंदना झी.
जवाब देंहटाएंआपने लिखा....
जवाब देंहटाएंहमने पढ़ा....
और लोग भी पढ़ें;
इसलिए बुधवार 17/07/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in ....पर लिंक की जाएगी.
आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
लिंक में आपका स्वागत है .
धन्यवाद!
खुद से लड़ने पर हार तो अपने ही हिस्से में आएगी..सो खुद से लड़ना नहीं है मित्रता करनी है...
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति..
जवाब देंहटाएंआपकी यह रचना कल मंगलवार (16-07-2013) को ब्लॉग प्रसारण : नारी विशेष पर लिंक की गई है कृपया पधारें.
जवाब देंहटाएंआपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार१६ /७ /१३ को चर्चामंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है
जवाब देंहटाएंबढिया, बहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंbade achhe bhaav hain ....
जवाब देंहटाएंbade achhhe bhaav hain .....
जवाब देंहटाएंbahut badia....
जवाब देंहटाएंवाह ...एक नया सा प्रयोग
जवाब देंहटाएंBhut sunder
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जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर भाव !
अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
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बहुत सुन्दर अभिवक्ति वंदना जी
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर रचना ................
जवाब देंहटाएंbahut hi badhiya .....uttam
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