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गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

पर्दा हटा दिया.........

इक 
पर्दा लगाया 
आज तेरी 
यादों को 
ओट में 
रखने को
जब जी 
चाहे चली 
आती थीं
और हर 
ज़ख्म को
ताज़ा कर 
जाती थीं
मगर बेरहम
हवा ने 
यादो का ही
साथ दिया
जैसे ही 
आई यादें 
पर्दा 
हटा दिया
और
एक बार
फिर
हर ज़ख्म 
को झुलसा दिया

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

जब चाँद जमीं पर उतर आया हो

जब आसमाँ के चाँद से पहले
मेरा चाँद आ जाता है फिर
और क्या हसरत रही बाकी

हर हसरत को पंख मिल जाते हैं
परवाज़ बेलगाम हो जाती है
जब मोहब्बत रुहानी होती है
तब बिना कहे बात होती है
मेरा चाँद बिना बोले सब सुनता है
और एक बोसा रूह पर रखता है


उसकी प्रीत दीवानी सहेज लेती है
उसके प्रेम की तपिश को आगोश मे
उसके प्रेम की चाँदनी मे नहा लेती है
और प्रेम के हर रंग को पा लेती है
बताओ
अब कौन सी हसरत रही बाकी?
जब चाँद जमीं पर उतर आया हो
मेरा चाँद मुझमे ही नज़र आया हो

सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

किसका दायित्व ?

वेदना का चित्रण
नैनों का दायित्व 
नैनों का चित्रण
अश्रुओं का दायित्व 
मगर
अश्रुओं का चित्रण 
किसका दायित्व ?

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

ये कौन से शहर का है आदमी

ये कौन से शहर का है आदमी 
जो रात भर सोता नहीं

खिलौनों  और रोटी  के लिए 
अब यहाँ का बच्चा रोता नहीं 

गुदड़ी में ही बड़ा हो जाता है जो 
बचपन उस पर कभी आता नहीं 


रात भर दौड़ती हैं  सडकें जहाँ
सुना है शहरों में अब दिन होता नहीं 

रौशनी से चकाचौंध हैं रातें 
अब दिन किसी को लुभाते नहीं


इंसानियत की बात कोई कर जाए 
ऐसा इस जहाँ में अब होता नहीं 


बिन पंखों के आकाश नापा करते हैं
पंख वालों को यहाँ कोई पूछता नहीं 


चाँद की चाँदनी से भी जलने लगें
ऐसे हुस्न अब यहाँ होते नहीं


कागज़ के फूलों से खुश होने वालों को
असली फूलों के रंग अब भाते नहीं 


वो  सुबह  कभी  तो  आएगी
इस आस में आदमी अब जीता नहीं 


हालात को नसीब का खेल मान  
 रंजो- गम के घूँट अब पीता नहीं 

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

हाँ , अब आसमाँ को नहीं तकती हूँ

सितारों को 
नहीं देखती 
मेरी किस्मत 
का सितारा 
वहाँ आसमाँ 
में नहीं टंगा 
खुदा ने
कोई सितारा
बनाया ही नहीं
फिर कैसे 
खोजूँ उसे
आसमाँ में 

अब अपने 
सितारे आप
बनाती हूँ 
दिल के 
बगीचे में
सितारों के 
फूल उगाती हूँ
जो खुदा ना 
कर पाया 
किस्मत के
उसी सितारे को
बुलंद करती हूँ
 हाँ , अब 
आसमाँ को 
नहीं तकती हूँ

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

कौन रुकता है किसी के लिये

जाओ 
कौन रुकता है 
किसी के लिए
बहता पानी 
कब ठहरा है
किसी के लिए
प्रवाह कब रुके हैं
किसी के लिए
फिर चाहे 
संवेदनाओं के हों 
या आवेगों के
भावनाओं के हों
या संवेगों के
हर कोई 
बह रहा है
फिर चाहे 
वक्त ही
क्यूँ ना हो 
कब किसके 
लिए ठहरा है
तो फिर
कैसे तुमसे 
उम्मीद करूँ
एक आस धरूँ
कि तुम 
रुकोगे 
मेरे लिए

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

बहुत कठिन है डगर पनघट की

अभी तुम्हारी 
चाह ख़त्म 
नहीं हुई
अभी तुम्हारा
प्रेम पूर्णता 
ना पा सका
जब हर चाह
मिट जाएगी तेरी
प्रेम में भी
पूर्णता आ जाएगी
प्रेम में 
शर्त होती नहीं
प्रेम में तो
सिर्फ प्रेमी की 
गति ही 
अपनी गति 
होती है
प्रेम स्वीकारने
का नहीं
महसूस करने का
नाम है
क्यूँ प्रेम को 
स्वीकारने की
चाह रखते हो
इस चाह को भी
तुम्हें मिटाना होगा
जिस दिन 
तेरी हर चाह
मिट जाएगी
तेरी प्रेम की प्यास
भी बुझ जाएगी
फिर प्रेम रस में 
भीग तू  
खुद प्रेम ही 
बन जायेगा 


 

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

टुकडियां

अपने साये से भी घबरा जाते हैं
अब भीड बर्दाश्त नही होती

 

मौसमी बुखार सा
तेरी मोहब्बत
गुबार छोड
जाती है
और हम
...उस गुबार मे
अपने अस्तित्व
को ढूँढते
रह जाते हैं

 

उफ़ ये खामोशी तडपा गयी
रैन बीती भी ना थी
कि तेरी याद आ गयी

 

उदासी को भी हसीन बना दिया
कुछ इस तरह मेरे यार ने
मौत को भी जश्न बना दिया

 

 

सोच के तकियों में
चुभते यादों के नश्तर
तमाशबीन बना जाते हैं

शायद हवायें बहक गयी हैं

 

 

अपना रकीब इन्साँ खुद होता है
बाकी गैर मे इतनी जुर्रत कहाँ

 

 

मेरे गरल पीने पर
खुश था ज़माना
गरल पीकर ज़िन्दा
रहने पर क्यूँ
बरपा दिया हंगामा

 

 

 मिलन का ये अन्दाज़ भी रास आया

मुझे "मै" तेरे ख्यालों मे मिली

 

 

 

दिल के छालों का
बीमा करा लेना
कहीं कोई आकर
नश्तर ना चुभा जाये

 

 

ये बेरुखी का आलम

ये तन्हाइयाँ

तूफ़ान आना लाज़िमी है

 

 

ज़िन्दगी सब कुछ सिखा देती है
कैसे गुलकंद को नीम बना देती है

 

 

किसी भी मोड से गुजरो

हादसे इंतज़ार मे होते हैं

 

 

कभी कभी लफ़्ज़ों की बनावट
चेहरा बन जाती है
और कभी
लफ़्ज़ चेहरे पर उतर आते हैं

 

 


 

 

 

 

बुधवार, 29 सितंबर 2010

क्या यही इंतज़ार है?

आये
बैठे
उसके दर पर
कुछ देर
माथा टेक आये
...उसकी गली का
फ़ेरा लगा आये
और फिर
चल दिये

क्या यही इंतज़ार है

या फिर
दीदार की हसरत
सीने मे कैद
किये
खामोश चल दिये

क्या यही इंतज़ार है

या फिर
मिलकर भी
जो मिले ना
सामने होकर भी
अपना बने ना
फिर भी
मुस्कुरा कर
चल दे कोई

क्या यही इंतज़ार है

सोमवार, 27 सितंबर 2010

या खुदा ...........

या खुदा ,

तू दिल बनाता क्यूँ है
दिल दिया तो
इश्क जगाता क्यूँ है

प्रेम के सब्जबाग

दिखाता क्यूँ है
जब मिलाना ही ना था
तो अहसास
जगाता क्यूँ है

इश्क कराया तो

इश्क को रुसवा
कराता क्यूँ है

 

 

 

 

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

क्षितिज पर एक बार फिर................

मैं 
दरिया हूँ 
ना बाँधो 
मुझको 
बहने दो
अपने किनारों से 
लगते - लगते
मत तानो 
बंदिशों के 
बाँध 
मत बाँधो
पंखों की 
परवाज़ को
मत लगाओ 
मेरे आसमानों पर
हवाओं के पहरे 
एक बार
उड़ान 
भरने तो दो
एक बार 
बंदिशें तोड़
बहने तो दो
एक बार
खुले आसमान में 
विचरने तो दो
फिर देखो 
मेरी परवाज़ को
मेरी उडान को
धरती आसमां में
सिमट जाएगी 
आसमां धरती सा
हो जायेगा 
और शायद 
क्षितिज  पर 
एक बार फिर
मिलन हो जायेगा 

सोमवार, 20 सितंबर 2010

एक मिनट

जब कोई 
कहता है 
रुकना  ज़रा
एक मिनट !
आह - सी 
निकल जाती है
ये एक मिनट
कितने सितम
ढाता  है 
ज़रा पूछो उससे 
जो इंतजार 
के पल 
बिताता है
इस एक 
मिनट में
वो कितने 
जन्म जी 
जाता है 

ये एक मिनट
किसी के लिए
एक युग बन 
जाता है 
और उस युग में
दिल ना जाने
कितने जन्म 
जी जाता है 
और हर जन्म 
किसी के 
 इंतज़ार में
गुज़र जाता है 
मगर वो 
एक मिनट
वहीं रुक 
जाता है

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

गर होती कोई कशिश हम में

किसी के 
ख्वाबों में 
पले होते
किसी के 
दिल की 
धडकनों की
आवाज़ होते
किसी के
सुरों की
सरगम होते
किसी के 
छंदों का
अलंकार होते
किसी के
दिल के
उदगार होते
किसी के लिए
ऊषा की
पहली किरण होते
किसी के 
अरमानों में
सांझ की 
दुल्हन से 
सजे होते
किसी के 
गीतों में
प्यार बन
ढले होते
किसी कवि की
कल्पना होते
मगर यूं ना
ठुकराए जाते 
गर होती 
कोई कशिश 
हम में

रविवार, 12 सितंबर 2010

टुकडे मोहब्बत के

परछाइयों में छुपे जितने साये हैं
सब मोहब्बत के निशाँ उभर आये हैं  




भीड़ के दामन में छुपे साए हैं
मोहब्बत के दर्द यूँ ही नहीं उभर आये हैं 




सब दामन बचा  के निकल गए
किसी ने मोहब्बत को छुआ ही नहीं 




अपने साये से भी घबरा जाते हैं
अब भीड़ बर्दाश्त नहीं होती


इतनी ख़ामोशी अच्छी नहीं लगती
तेरे रुखसार पर मायूसी अच्छी नहीं लगती 




कुछ खनक तो होती
गर चोट लगी होती



कुछ गम तेरी यादों के
कुछ गम मेरी आहों के
कुछ सितम तेरी निगाहों के
बस गुजर रही है ज़िन्दगी
ठीक- ठाक सी




कातिल निगाहों से
गर मर गए होते
तो यूँ दर -दर
ना भटक रहे होते




उन रिश्तों के लिये अश्क न बहा
जिन्हें लिबास मिले ही नही
उस जगह माथा न रगड
जहाँ देवता हैं ही नही
उस शख्स को आवाज़ न दे
जो तुम्हारा है ही नही

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

शायद तब ही .................

जो दीन ईमान से 
ऊपर उठ जाये 
जो जिस्म के 
तूफ़ान से
ऊपर उठ जाए 
दीवानगी 
पागलपन जैसे
शब्दों की महत्ता
ख़त्म हो जाए

हर चाहत 
हर अहसास
के स्रोत 
लुप्त होने लगें 


जहाँ विरह 
श्रृंगार भी 
गौण हो जायें
जब सारे शब्द 
विलुप्त हो जायें



जहाँ दुनिया भी

सजदा करने लगे 
जहाँ खुदा भी 
छोटा लगने लगे


जब रूहों का 
मिलन होने लगे
जब बिना कहे ही
दूजे की आवाज़ 
सुनने लगें
तरंगों पर ही 
भावों का 
आदान- प्रदान 
होने लगे


इक दूजे में ही
प्राण बसने लगे
जहाँ ज़िन्दगी 
और मौत की भी
परवाह ना हो
सिर्फ आत्मिक 
मिलन का ही 
आधिपत्य हो
आग का दरिया
मोम के घोड़े 
पर सवार हो
जब बिना 
पिघले पार
कर जाए
तब जानना
मोहब्बत हुई है
या 
यही मोहब्बत 
होती है
या 
शायद तब ही 
मोहब्बत होती है

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

लिखना मुझे कब आता है

 लिखना मुझे 
कब आता है
बस आपके दर्द
आपकी नज़र

करती हूँ
दर्द की चादर

ओढकर
जब तुम सोते हो
मै चुपके से

आ जाती हूँ
तुम्हारे दर्द के

कुछ  क्षणों
को तुमसे

चुरा ले जाती हूँ
फिर उन अहसासों
को जीती हूँ
तुम्हारे दर्द 
को पीती हूँ
और फिर इक 
नज़्म लिखती हूँ
 मगर फिर भी 
अधूरा रहता है
शायद तुम्हारे 
दर्द को
पूरी तरह ना
पकड पाती हूँ
उस वेदना 
की अथाह
गहराई मे ना 
उतर पाती हूँ
तभी हर बार
पूरी तरह
ना उतार पाती हूँ
शायद इसिलिये
बार -बार 
मैं लिखती हूँ
तुम्हारे अधूरे - बिखरे
दर्द -भरे पलो को
 तुम्हारी नज़र 
 ही करती हूँ

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

राधे राधे
तुम बिन 
कैसे बीते 
दिवस हमारे 

तन मथुरा था 
मन बृज में था 
निस दिन 
रोवत नयन हमारे
राधे राधे 
तुम बिन 
कैसे बीते 
दिवस हमारे

संसार में 
जीना था
कर्म भी 
करना था
प्रेम को 
तो जाने 
सिर्फ ह्रदय 
हमारे
राधे राधे
तुम बिन 
कैसे बीते
दिवस हमारे

निष्ठुर कहाया
निर्मोही बनाया
किसी ने जाना
भेद हमारा
तुम बिन 
कैसे बीती
रैन हमारी
राधे राधे
तुम बिन 
कैसे बीते 
दिवस हमारे

दूर मैं कब था
तुम तो 
बसती थी 
दिल में हमारे
द्वैत का पर्दा 
 कब था प्यारी
तुम बिन 
अधूरा था 
अस्तित्व हमारा
राधे राधे
तुम बिन
कैसे बीते
दिवस हमारे

विरह अवस्था
दोनों की थी
उद्दात प्रेम की
लहर बही थी 
इक दूजे बिन
कब पूर्ण थे
अस्तित्व हमारे
राधे राधे 
तुम बिन 
कैसे बीते
दिवस हमारे

हे सर्वेश्वरी 
प्यारी 
ये तुम जानो
या हम जाने
राधे राधे
तुम बिन 
कैसे बीते 
दिवस हमारे

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

रिश्तों की गाँठ

अंतर्मन के सागर की 
अथाह गहराइयों में 
उपजी पीड़ा का दर्द
छटपटाहट, बेबसी की
जंजीरों में जकड़ी
रिश्ते की डोर 
ना जाने कितनी 
बार टूटी 
और टूटकर 
बार- बार
जोड़नी पड़ी 
इस आस पर 
शायद मोहब्बत को 
मुकाम मिल जाये
और हर बार
रिश्ते में एक
नयी गाँठ 
लगती रही
हर गाँठ के साथ 
डोर छोटी होती गयी
प्रेम की , विश्वास की
चाहत की डोर
तो ना जाने कहाँ 
लुप्त हो गयी
अब तो सिर्फ 
गाँठे ही गाँठे
नज़र आती हैं 
डोर के आखिरी 
सिरे पर भी 
आखिरी गाँठ
अब कैसे नेह 
के बँधन को 
निभाए कोई 
कब तक 
स्वयं की
आहुति दे कोई
शायद अब 
नया सिरा 
खोजना होगा 
रिश्ते की डोर 
को मोड़ना होगा
गाँठों के फंद में 
दबे अस्तित्व 
को खोजना होगा
रिश्ते को पड़ाव
समझ जीना होगा
रिश्तों के मकडजाल 
से उबरना होगा
खुद को एक 
नया मुकाम 
देना होगा 

बुधवार, 25 अगस्त 2010

"मैं" का व्यूहजाल

एक सिमटी 
दुनिया में 
जीने वाले हम
मैं, मेरा घर ,
मेरी बीवी,
मेरे बच्चे 
मैं और मेरा
के खेल में 
"मैं" की 
कठपुतली 
बन नाचते 
रहते हैं 
और तुझे 
दुनिया का 
हर उपदेश
समझा जाते हैं
देश के लिए
कुछ कर 
गुजरने की
ताकीद कर 
जाते हैं
मगर कभी 
खुद ना उस
पर चल पाते हैं
क्योंकि "मैं" के
व्यूहजाल से 
ना निकल 
पाते हैं
समाज का सशक्त 
अंग ना बन पाते हैं

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

घायल यादें

बेल बूँटों सा 
टाँका था कभी 
यादों को
दिल की 
उजली मखमली 
चादर पर
बरसों बाद जो
तह खोली
तो वक्त की
गर्द में दबे 
बेल बूँटे अपना
रंग खो चुके थे
सिर्फ बेरंग,
मुड़ी - तुड़ी
कटी- फटी सी
यादें अपने
घावों को
सहलाती मिलीं

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

सावन कितना बरस ले ............

बरसते मौसम में 
भीगता तन 
मन को ना
भिगो पाया 
मन के आँगन 
की धरती 
तो कब की
सूखे की
भयावह मार से
फट चुकी है 
अब अहसासों 
की खेती ना
कर सकोगे
तमन्नाओं की
फसल ना 
उगा सकोगे
भाव ना कोई
जगा सकोगे
सावन कितना 
बरस ले 
कुछ आँगन
कभी नहीं 
भीगते 

शनिवार, 14 अगस्त 2010

वन्दे मातरम कहते जाओ

वन्दे मातरम कहते जाओ
आस्तीनों में साँप पाले जाओ

ए खुदा के नामुराद बन्दों 
देश को लूट - खसोटे जाओ

कल की फिक्र तुम ना करना
बस आज जेबें भरते जाओ

जनता मरती है मरने दो 
बस तुम अमरता को पा जाओ 

शहीद की कुर्बानी को भी तुम
अपना मान बनाये जाओ 

सत्ता के गलियारों में बस
अपनी रोटियां सेंके जाओ

भूखी बिलखती जनता से तुम
जीने  का हक़ छीने जाओ

सपनों के भारत के नाम पर
जनता का शोषण किये जाओ 


भ्रष्टाचार की जमीन पर तुम
अपनी गोटियाँ बिछाये जाओ 

आज़ादी की वर्षगाँठ पर 
आज़ादी को रुलाये जाओ 

तिरंगे का अपमान  करके 
वन्दे मातरम कहते जाओ


 

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

यूँ तेरी मोहब्बत में.............

कुछ पल का मिलना
फिर बिछड़ जाना 
क्या जरूरी है ?
कुछ देर रुके होते 
दो बात की होती
कुछ अपनी कही होती
कुछ मेरी सुनी होती
कुछ दर्द लिया होता 
कुछ दर्द दिया होता
कुछ अपनी बेचैनियों का 
कोई राज़ दिया होता
कुछ वादे मोहब्बत के किये होते
कुछ शिकवे वफाओं के किये होते
कुछ अपने भरम तोड़े होते
कुछ नए भरम दिए होते
कुछ दिल के टुकड़े किये होते
कुछ चुन लिए होते
कुछ बिखर गए होते
कुछ पल यूँ ही तेरे आगोश में
हम जी लिए होते 
कुछ पल तो मोहब्बत की 
बरखा में भीग लिए होते
मिलने की हसरतों के
हर अरमान जी लिए होते
जुदाई के लम्हों को
फिर हम सह लिए होते
यूँ तेरी मोहब्बत में
कुछ जी लिए होते
कुछ मर लिए होते

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

माँ हूँ ना मैं.......

कभी बेच दिया
कभी नीलाम किया 
कभी अपनों के 
हाथों ही अपनों ने 
शर्मसार किया
कुछ ऐसे मेरे 
बच्चों ने मुझे 
दागदार किया
माँ हूँ ना मैं ........

इनकी धरती माँ
सिर्फ दो दिन ही
इन्हें याद आती हूँ
उसके बाद 
स्वार्थपरता की
कोठरी में कैद 
कर दी जाती हूँ
दिन रात सीने 
पर पाँव रख 
उसूलों, आदर्शों की
बलि चढ़ाकर 
आगे बढ़ते जाते हैं 
मेरे बच्चे ही मेरी 
जिंदा ही चिता 
जलाते हैं
और रोज ही मेरी
आहुति दिए जाते हैं
माँ हूँ ना मैं..........

माँ होती ही 
जलने के लिए है 
माँ होती ही
बलिदान के लिए है
माँ होने का 
क़र्ज़ तो मुझे ही
चुकाना होगा
अपने ही बच्चों के
हाथों एक बार फिर
बिक जाना होगा
अपने आँसू पीकर 
छलनी ह्रदय 
को सींकर 
बच्चों की ख़ुशी 
की खातिर
अपनी आहुति 
देनी होगी 
चाहे बच्चे 
भूल गए हों 
मगर मुझे तो
माँ के फ़र्ज़ को 
निभाना होगा
माँ हूँ ना मैं
आखिर 
माँ हूँ ना मैं.......

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

विनाश के चिन्ह यादो की धरोहर बन जाते हैं

ये सीने में कैद
ज्वार- भाटे 
उफन कर
बाहर आने 
को आतुर
जब होते हैं 
अपने साथ
विनाश को भी 
दावत देते हैं
कहीं अरमानो के 
मकानों को 
धराशायी 
कर जाते हैं
कहीं हसरतों
के वृक्ष
उखड जाते हैं
तमन्नाओं की 
सुनामी में
सभी संचार 
के माध्यमो को
नेस्तनाबूद कर
विनाश पर 
अट्टहास करते हैं
और चहुँ ओर
फैली वीभत्स
नीरवता 
एक शून्य 
छोड़ जाती है
और विनाश 

के चिन्ह 
यादो की 
धरोहर 
बन जाते हैं
कभी ना 
मिटने के लिए

शनिवार, 31 जुलाई 2010

ज़िन्दगी का हिसाब -किताब

ज़िन्दगी के 
हिस्से होते रहे
टुकड़ों में 
बँटती रही 
बच्चे की
किलकारियों सा
कब गुजर 
गया बचपन 
और एक हिस्सा  
ज़िन्दगी का
ना जाने 
किन ख्वाबों में
खो गया
मोहब्बत ,कटुता 
भेदभाव,वैमनस्यता
अपना- पराया 
तेरे- मेरे 
की भेंट 
दूजा हिस्सा 
चढ़ गया
कब आकर 
पुष्प को
चट्टान 
बना गया
पता ही ना चला
आखिरी हिस्सा 
ज़िन्दगी का
ज़िन्दगी भर के 
जमा -घटा 
गुना -भाग 
में निकल गया
यूँ ज़िन्दगी 
टुकड़ों में
गुजर गयीं
कुछ ना हाथ लगा 
और फिर अचानक
मौसम बदल गया
इक अनंत
सफ़र की ओर
मुसाफिर चल दिया 

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

बस वो ना बनाया ..........

मैं 
ख्वाब बनी 
हकीकत में ढली
नज़्म भी बनी

गीतों में ढली 
तेरे सांसों की 
सरगम पर 
सुरों की झंकार
भी बनी 
रूह का स्पंदन 
भी बनी
मौसम का खुमार 
भी बनी
सर्दी की गुनगुनी
धूप में ढली
कभी शबनम 
की बूंद बन
फूलों में पली
तेरे हर रंग में ढली 
वो सब कुछ बनी
जो तू ने बनाया
तूने सब कुछ बनाया
 मगर वो ना बनाया
जो तेरे अंतर्मन के
दीपक की बाती होगी
तेरे अरमानों की
थाती होती
तेरे हर ख्वाब की
ताबीर होती
तेरी हर धड़कन की
आवाज़ होती
तेरी रूह की पुकार होती
तेरी जान की जान होती
बस वो ना बनाया 
तूने कभी 
बस वो ना बनाया ..........

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

मानव! व्यर्थ भूभार ही बना

ज़िन्दगी व्यर्थ 
वक्त की बर्बादी 
नतीजा---शून्य 
अगर किसी एक 
को भी अपना ना बना पाया 
या किसी का बन ना पाया

मानव!
व्यर्थ भूभार ही बना
अगर कोई एक
कर्म ना किया ऐसा 
जिसे याद रखा जा सके 
पूजा का ढोंग
तेरा व्यर्थ गया
ढकोसलों में 
ढकी शख्सियत 
तेरी व्यर्थ गयी
अगर किसी 
एक आँख का
आँसू ना पोंछ सका

मानव !
तू तो 
खुद से ही हार गया
अगर
"मैं " को ही ना जीत पाया
जीवन तेरा व्यर्थ ही गया
खाली हाथ आया
और खाली ही चल दिया


शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

काव्य के नए मानक गढ़ने दो

क्यूँ बंदिशों में बांधते हो
क्यूँ बन्धनों में जकड़ते हो
भरने दो इन्हें भी उड़ान
नापने दो इन्हें भी दूरियां
छूने दो इन्हें भी आसमान
कर सकते हो तो इतना करो
हौसले इनके बढ़ाते चलो
मार्ग प्रशस्त करते चलो
 

क्यूँ लिंगभेद के उहापोह में
दिग्भ्रमित करते हो
रचना तो सबकी होती है
जनक चाहे कोई भी हो
क्यूँ स्त्री पुरुष के भेद को
ना पाट पाते हो
क्यूँ सृजनात्मकता पर
अंकुश लगाते हो
 

काव्य ---स्त्री या पुरुष
की थाती नहीं
सिर्फ कोमल भावों का
ही तो सृजन होता है
फिर पुरुष हो या स्त्री
भावों पर तो किसी का
जोर नहीं
तब तुम क्यूँ 

बाँध बनाते हो
उड़ने दो 

उन्मुक्त हवाओं को
बहने दो समय की
धारा के साथ
एक दिन ये भी
नया आकाश 

बना देंगी
इन्हें भी रूढ़ियों
को बदलने दो
काव्य के नए 
मानक गढ़ने दो


दोस्तों
ये रचना कल की पोस्ट की ही उपज है क्यूँकि कुछ लोग सोचते हैं कि स्त्री को स्त्री के भावों पर ही लिखना चाहिये और पुरुष को पुरुष् के भावों पर मगर मेरे ख्याल से तो भावों को बांधा नही जा सकता इसलिए फिर चाहे स्त्री हो या पुरुष वो जो भी मह्सूस करे उसे लिखने देना चाहिये …………हो सकता है काव्य की दृष्टि से ये बात सही हो मगर मुझे इसका ज्ञान नही है और जरूरत भी नही है क्यूँकि भाव तो किसी भी बंधन को स्वीकार नही करते………बस कल यूँ ही ये भाव बन गये तो आपके समक्ष प्रस्तुत कर दिये।

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

वरना आफताब पा गया होता..........

घर की देहरी 
पार कर भी ले 
मन की देहरी
ना लाँघ पाया कभी 
तेरे मन की दहलीज
पर अपने मन की
बन्दनवार सजाई
मगर फिर भी
सूक्ष्म, अनवरत 
बहते विचारों को 
मथ ना पाया कभी
ना जाने कौन सा 
सतत प्रवाह 
रोकता रहा  
बढ़ने से 
कौन सा बाँध 
बना था 
तेरे मन की 
देहरी पर खिंची 
लक्ष्मण रेखा पर 
जिसे आज तक 
ना तू लाँघ पाया
ना मुझे ही आने 
की इजाजत दी
मन की खोह 
में छिपी कौन सी 
प्रस्तर प्रतिमा 
रोकती है तुझे
जिसके अभिशाप 
से कभी मुक्त 
ना हो पाया
ना वर्तमान को
अपना पाया
ना भविष्य 
को सजा पाया
सिर्फ भूत के
बिखरे टुकड़ों 
में खुद को
मिटाता रहा 
एक छोटी- सी 
रेखा ना लाँघ 
पाया कभी
वरना आफताब सी
 प्रेम की तपिश
पा गया होता
माहताब तेरा 
बन गया होता
जीवन तेरा
सँवर गया होता 

सोमवार, 12 जुलाई 2010

यही तो अमर प्रेम है ………………है ना

दोस्तों , 

आज की पोस्ट में हम सबकी साथी कुसुम ठाकुर जी को समर्पित कर रही हूँ क्यूंकि आज उनका जन्मदिन है और कल उनकी शादी की सालगिरह ..........इसमें उनके भावों को शब्दों में पिरोने की कोशिश कर रही हूँ और उनकी उस महान भावना के आगे नतमस्तक हूँ ..........शायद यही तो अमर प्रेम होता है ............ये सिर्फ एक कोशिश है मगर शायद अभी भी काफी कुछ अधूरा रह गया हो तो उसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ क्यूंकि जितना उनको समझा है और जाना है उसी आधार पर ये लिखने का प्रयत्न कर रही हूँ .........

तुम्हें याद है
कल हमारे
वैवाहिक बँधन
में वक़्त एक
और यादों की
लकीर छोड़ रहा है
कल का दिन
तुम्हारे और मेरे
जीवन का अनमोल दिन
हमारा बँधन
शरीरों  का तो
रहा ही नहीं
आत्मिक बँधन
कब किसी
बँधन को
स्वीकारते हैं
आज तुम
मेरे पास नहीं
वहाँ जा चुके हो
जहाँ से कोई आता नहीं
सब यही कहते हैं
क्या  हमारा
बँधन शरीरों
का था
नहीं ना
क्या तुम
मेरे पास नही
मुझे तो तुम
कभी
दूर दिखे ही नहीं
हर पल
मेरे साथ ही
तो होते हो
मेरी साँसों
में बसते हो
मेरे दिल में
धड़कन बन
धड़कते हो
मेरे रोम- रोम में
तुम्हारा ही तो
अक्स झलकता है
देखो मैं
आज भी वैसे ही
वर्षगाँठ मानती हूँ
क्यूँकि तुम
मेरे साथ हो
मेरे पास हो
मैं तो आज भी
तुम्हारे लिए ही
सँवरती हूँ
जैसा तुम चाहते थे
मुझे हमेशा
इन्द्रधनुषी
रंगों सा
खिला - खिला देखना
और मैं तुम्हारे
रंगों में रंगी
आज भी प्रीत की
रंगोली सजाती हूँ
आत्मिक बँधन को
वो क्या जाने
जो कभी
शरीर से ऊपर
उठे ही नहीं
देखो अब
मुझे कल का
इंतज़ार है
जैसे हमेशा
होता था
जब तुम और मैं
एक साथ
मोहब्बत की
रस्म निभाएंगे
शायद तुम्हें भी
उसी लम्हे का
इंतज़ार होगा
है ना................

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

मैं कुछ पल का ब्लॉगर हूँ

मैं कुछ पल का ब्लॉगर हूँ
कुछ पल की मेरी पोस्टें हैं 
कुछ पल की मेरी हस्ती है
कुछ पल की मेरी ब्लॉगिंग है 
मैं कुछ पल ...........................

मुझसे पहले कितने ब्लॉगर
आये और आकर चले गए ,चले गए 
कुछ झंडे गाड़कर चले गए 
कुछ ठोकर खाकर चले गए,चले गए
वो उस पल की ब्लॉगिंग का हिस्सा थे 
मैं इस पल की ब्लॉगिंग का हिस्सा हूँ
कल तुमसे जुदा हो जाऊँगा 
जो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ
मैं कुछ  पल  .........................................

कल और आयेंगे ब्लॉगिंग की
नयी ऊँचाइयाँ छूने वाले 
हमसे बेहतर कहने वाले
तुमसे बेहतर पढने वाले
कल कोई किसी को याद करे
क्यूँ कोई किसी को याद करे 
मसरूफ ज़माना ब्लॉगिंग के लिए
क्यूँ वक़्त अपना बरबाद करे 
मैं कुछ पल ........................

बुधवार, 30 जून 2010

कभी तो जगेगा ही...............

तपते चेहरे 
कुंठित मन
ह्रदय में पलता 
आक्रोश का
ज्वालामुखी 
लिए हर शख्स 

 कभी 
सत्ता के 
गलियारों  में
भटकता
गिडगिडाता
कसमसाता
राजनीतिक 
समीकरणों से
बेहाल 
आक्रोशित 
नाराज मानस 
के मन का
उबाल 

 कभी 
समाज के 
विद्रूप चेहरे से
खुद को 
उपेक्षित
महसूसता
मानव
रीतियों, रिवाजों
की भेंट चढ़ता
जीवन का इक अंग

मानव के 
अंतस में
सिर्फ ज़हर का
दावानल ही 
सुलगाता है
कब तक 
इन्सान खुद से
सत्ता से
समाज से लड़े
कब तक
आश्वासन के
अवलंबन का
बोझ ढोए
कभी तो 
उफनेगा ही
लावा कभी तो
फूटेगा ही
बगावत का 
बिगुल बजेगा ही
फिर ये 
अँधा ,बहरा
और गूंगा 
समाज
कभी तो 
जगेगा ही
कभी तो .................

सोमवार, 21 जून 2010

दीया और लौ

दीया 
आस का 
विश्वास का
प्रेरणा का
प्रतीक बन
आशाओं का संचार करता 

मगर
टिमटिमाती लौ 
वक्त की आँधियों से थरथराती
टूटे विश्वास की
बिना किसी आस की
गहन वेदना को समेटे हुए
कंपकंपाते पलों को ओढ़कर
अपने आगोश में
सिमटने को आतुर
धूमिल होती
आशाओं का प्रतीक बन
जीवन के अंतिम कगार पर
बिना किसी विद्रोह के
समर्पण कर देती है
अपने हर 
रंग का, हर रूप का 
और बता जाती है
ज़िन्दगी का सबब

त्याग , बलिदान
आशा और उजाले
का प्रतीक बन
जीना सीखा जाती है

मंगलवार, 15 जून 2010

मैं लौट कर नहीं आऊंगा

कल
एक लम्हा 
टूटा
गिरने लगा 
मैंने लपका
पकड़ा हाथ में 
कहा
रुक तो ज़रा 
कहाँ जा रहा है?
वो बोला 
रुक नहीं सकता
मुझे तो 
मिटना है
तुम जी लो 
जितना जी
सकते हो 
भर लो
अंक में
हर क्षण को
जितना भर
सकते हो
संजो लो
हर ख्वाब को
जितना संजो 
सकते हो
मुझे तो अब 
गुजरना होगा
आने के बाद 
जाने के नियम
को निभाना होगा
बस तुम भी
ऐसे ही 
अपना नियम
निभाते रहो 
हर लम्हे को
जुदा होने 
से पहले
यादों के दामन
में समेट 
लिया करो
और कुछ पल 
जी लिया करो
इस अथाह 
सागर में
डूब लिया करो
मैं लौट कर 
नहीं आऊंगा 
इस सत्य को
मान लिया करो


 

शुक्रवार, 11 जून 2010

राष्ट्रमंडल खेलों का असर ?

राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन पहली बार वर्ष 1930 में हेमिल्‍टन शहर,  ओंटेरियो( कनाडा) में आयोजित किया गया था. तब इस खेल आयोजन का नाम ब्रिटिश एम्पायर गेम्स था. इसके खेल आयोजन का मूल विचार एक भारतीय का था जिनका नाम एशली कूपर था. उन्होंने इस खेल आयोजन को आपसी शांति और सौहार्द्र के लिए सही मानते हुए इसका प्रस्ताव तात्कालिक राजनेताओं को दिया था. 1930 में पहली बार  इस खेल आयोजन का शुभारंभ हुआ जिसमें मात्र 11 देशों के 400 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था. वर्ष 1978 में इसे सर्वसम्मति से कॉमनवेल्थ गेम्स नाम दिया गया.

खेल का उद्देश्य नेक था जिस कारण इसकी प्रसिद्धि  बढती गयी मगर हर देश के लिए तो ये सही नहीं है कम से कम उन देशों के लिए तो नहीं जो अभी विकास की ओर अग्रसर हैं , ऐसे देशों के लिए इन खेलों का आयोजन करना इतना आसान काम नहीं है .यही हाल हमारे देश का भी हो रहा है . 


राष्ट्रमंडल  खेल -----------जब से ये नाम हमारे देश में आया है यूँ लगता है जैसे कोई अजूबा आ गया हो जिसके आने से देश की क्या हर इंसान की किस्मत बदल  जाएगी ............जैसे कोई जादू की छड़ी हो जो घुमाई और बस फिर सब हाजिर हो जायेगा............देश से गरीबी मिट जाएगी ,इंसान बदल जायेगे ,सब खुशहाल हो जायेगे ..........................क्या ऐसा होगा?ये सोच कितनी कुंठाग्रस्त है . जबकि ऐसा कुछ नहीं होने वाला . जब से राष्ट्रमंडल खेलों का नाम आया है देश के हालत बद  से बदतर होते जा रहे हैं .........गरीब और गरीब होता जा रहा है और बेचारे अमीर पर भी इसकी तपिश पहुँचने लगी है और मध्यवर्गीय इंसान कैसे जी रहा है ये सिर्फ वो ही जानता है ...............सरकार सिर्फ अपनी सोच रही है कि एक बार ये खेल कराने  से सारी दुनिया में भारत का नाम रोशन हो जायेगा और इससे काफी पैसा देश में बरसेगा मगर ऐसा कुछ नहीं होगा सब जानते हैं भारत को और उसकी गरीबी को ...........हाँ ,शायद हो जाये तब जबकि गरीब रहे ही ना और ऐसा ही तो होना है तभी तो सारी शक्ति सरकार ने इन खेलों के प्रति लगा दी है फिर चाहे गरीब  जिए या मरे तभी तो देश में महंगाई  सुरसा के मुख की तरह बढती जा रही है और सरकार का इस तरफ ध्यान ही नहीं है और हो भी क्यूँ ? जो सरकार चाहती है वो हो रहा है तो उसके बाद देश का या उसकी जनता का जो चाहे सो हो जाये क्या फर्क पड़ता है .

महंगाई  बढ़ने के कारण किसी के घर में दो वक्त का चूल्हा जले या नहीं मगर खेलों का काम नहीं रुकना चाहिए ,कोई बच्चा स्कूल जा पाए या नहीं मगर खेल समय पर होने चाहिए . जब देश के करतार ही ऐसे होंगे तो फिर उसके बाशिंदों का तो अल्लाह ही मालिक है . क्या ये खेल इतने जरूरी थे इस वक़्त जब देश पहले ही आर्थिक रूप से इतना उन्नत नहीं था? दूसरी और सबसे जरूरी बात  क्या इतना पैसा जो खेलों में लगाया गया है यदि वो ही पैसा देश की उन्नति के लिए प्रयोग किया जाता तो क्या तब देश खुशहाल नहीं होता या जनता सुखी नहीं होती ..............बेरोजगारों को रोजगार दिया होता तो अपने आप देश तरक्की की सीढियां चढ़ता चला जाता और कहीं भी ये साबित करने की जरूरत नहीं होती अपने आप साबित हो जाता ............हीरा अपनी चमक अपने आप बिखेरता है उसे अपने को साबित नहीं करना पड़ता .अरबों रूपया लगाया जा रहा है क्या यही पैसा अगर अपने देश के गरीब और बेरोजगारों के लिए प्रयोग किया जाता तो क्या  तब देश खुशहाल नहीं  होता?विदेशियों की आवभगत में करोड़ों रुपया बर्बाद होगा मगर क्या फर्क पड़ता है ,इससे नाम तो होगा ना .बस इतना ही काफी है बाकी जनता का जो चाहे हो .  ये देश के कर्णधार देश को ना जाने किस दिशा में ले जा रहे हैं शायद सिर्फ अपना ही नाम रोशन करना चाहते हैं इसलिए हर हालत में खेल करवाने हैं ताकि आने वाली पीढियां उनका गुणगान कर सकें मगर इन खेलों की नींव में ना जानेकितने  लोगों के अरमानों की लाशें  दबी हैं ये कोई ना जान पायेगा .............किसान आत्महत्या कर रहा है तो करे मगर खेल होने जरूरी हैं क्यूंकि इनके कराये बिना ये सेहरा इनके सिर नहीं बंध सकेगा फिर चाहे उसमें गरीब और निरीह जनता का खून ही क्यूँ ना लिपटा हो.
करोड़ों रुपया बड़े -बड़े अभिनेताओं को आमंत्रित करने के लिए दिया जायेगा और विज्ञापनों पर खर्च  किया जाएगा  और फिर जब ये खेल हो जायेंगे तब एक गंदगी का ढेर मिलेगा उसकी साफ़ सफाई पर फिर रुपया बहाया जायेगा ..............क्या ये पैसा जनता का नहीं  है जिसे इस तरह बर्बाद किया जाएगा ?जनता का पैसा जनता से ही लूट कर अपनी वाहवाही कराने  का इससे अच्छा और क्या उपाय हो सकता है.
 इन खेलों के विद्रोह में कोई भी नेता या कोई भी पार्टी आगे नहीं आई क्यूंकि कोई भी अपने सिर नाकामी का सेहरा नहीं बांधना चाहता . सब बड़े हमदर्द बनते हैं जनता के मगर सभी एक ही थाली के बैगन हैं .यदि इसके अलावा और कोई बात होती चाहे कितनी ही छोटी होती उसे बड़ा मुद्दा बना दिया जाता जैसे एक मूवी को बड़ा बना दिया जाता है और उसे प्रदर्शित होने से रोक दिया जाता है मगर अब कोई नहीं बोलेगा .............टैक्स के बोझ से आम इन्सान मरता  जा रहा है मगर किसी भी दल  के कान पर जून तक नहीं रेंगी ........कौन ओखली में सिर दे ? आज एक मजदूर जिसके घर में  एक वक़्त का चूल्हा नहीं जल पाता कहाँ से रोटी का जुगाड़ करे और कैसे ? इसकी किसी को फिक्र नहीं है सबको अपनी ही पड़ी है ............ऐसे में खेल कितने जरूरी हैं  इस ओर किसी का ध्यान क्यूँ जायेगा .
अब तो ये खेल जनता के गले की फांस बन  ही चुके हैं और अब  इन्हें झेलना ही होगा जनता को और कामयाबी का सेहरा सरकार अपने माथे पर लगा ही लेगी फिर उसके बाद जनता का जो चाहे हो ..................मगर प्रश्न फिर भी अपनी जगह कायम रहेगा कि जब एक देश खेल कराने में सक्षम ना हो तो क्या ऐसे माहोल में खेल कराने जरूरी हैं? क्या निरीह , असहाय जनता के खून का पाप अपने सर लेना जरूरी है? कब यहाँ के कर्णधार देश और उसकी जनता के विषय में सोचेंगे ?ये कुछ अनुत्तरित प्रश्न हर युग में कायम रहेगे और आने वाली पीढ़ी इनके जवाब मांगेगी .

रविवार, 6 जून 2010

वो जो कभी दोस्त बनकर आया था.............

वो जो कभी
दोस्त बन कर 
आया था
दोस्ती का 
हर फ़र्ज़ 
निभाया था
दोस्ती की कसमें
खाता था
दोस्ती पर जान
लुटाता था
कब पथप्रदर्शक
बन गया 
कब आलोचक 
बन गया
कब दोस्ती 
को एक नाम 
देने का 
सोचने लगा 
सिर्फ अपने 
ख्यालों में ही 
किसी को पता
ही ना चला
मगर बिना कुछ 
कहे, दोस्ती
निभाता रहा
अपने जज्बातों को
अन्दर ही अन्दर
दबाता रहा
किसी पर ना
जाहिर करता रहा
पल- पल दोस्ती 
को पूजता रहा
हँसता रहा ,मुस्कुराता रहा
अपनी ज़िन्दगी का
हर फ़र्ज़ निभाता रहा
दोस्ती को प्यार नहीं
पूजना चाहता था
सिर्फ इतना ही तो
अधिकार चाहता था
मगर दोस्त ने तो
वो भी ना दिया
सिर्फ दोस्ती का 
ही वचन लिया
फिर एक दिन 
चला गया वो
नक्सली इलाके में
किस्मत ने तबादला
करा दिया
उसे कहाँ से कहाँ
पहुंचा दिया
हर पल मौत के
साये में जीने लगा वो
उधर उसका दोस्त 
भी तड़पने लगा
दोस्त के लिए
दुआएँ करने लगा
वापस मिलने के लिए
पैगाम देने लगा
जब कोई हादसा 
सुनता तो 
सहम- सहम जाता
सिर्फ` अपने दोस्त
का ही उसे तो 
ख्याल आता
कभी उससे मिला 
भी ना था
सिर्फ पत्राचार का
सिलसिला चला ही था 
उसको  देखा भी 
तो ना था
मगर दोस्ती का 
जज्बा भी 
कम ना था
मगर एक दिन
उसका दिल टूट गया
दोस्ती पर से 
विश्वास उठ गया
दोस्ती का हर 
भरम टूट गया
जब देखा उसने
एक ख़त आया था
गलती से पता
उसका लिखा था
मगर ख़त 
किसी और के नाम था
और ख़त का 
मजमून वैसा ही था
जैसा उसे लिखा
करता था
और अब उसने 
दोस्त बनाना
छोड़ दिया था

बुधवार, 2 जून 2010

ये कैसा प्रेम का पंछी है....................

वो रोज मुझे 
ये कहता है 
प्रेम वो मुझसे
करता है
मैं रोज उसे
ये कहती हूँ 
प्रेम तो बस 
इक धोखा है
वो रोज मुझे
समझाता है
प्रेम के पाठ 
पढ़ाता है
मैं रोज उसे
बतलाती हूँ
ये प्रेम हवा का
झोंका है
जो आकर 
गुजर जाता है
कभी ठहर कहीं 
नहीं पाता है
ये प्रेम- प्यार 
कुछ नही होता है
सिर्फ नज़रों का 
ही धोखा  है
वो प्रेम को 
पूजा कहता है
और प्रेम की
अतल गहराइयों में
ही डूबा रहता है
बस प्रेम- प्रेम 
पुकारा करता है
बावरा -सा जग में
घूमा करता है
मैं रोज उसे 
समझाती हूँ
प्रेम सिर्फ कोरा 
शब्द है यहाँ
कौन वहाँ तक
पहुंचा है
किसने प्रेम को
जाना है
महज शरीरों का
ये धोखा है
उसने इक ही 
रटना लगायी है
प्रेम ही उसकी
आशनाई है
सिर्फ एक ही शब्द
तो सीखा है
प्रेम के अलावा
तो कुछ ना जाना है
अब कैसे उसे 
समझाऊँ मैं 
ये प्रेम डगरिया
बड़ी टेढ़ी है
पथरीले कंटक पथों
पर चलकर भी
प्रेमी कब मिल पाते हैं
विरह अगन में
ही जलते रहते हैं
और प्रेम- प्रेम ही
रटते  रहते हैं
दूसरा शब्द तो 
जाना ही नहीं
किसी और को तो 
पहचाना ही नहीं 
प्रेमी भ्रमर तू 
मान भी जा अब
जान जाएगी 
जान जा अब
मगर भ्रमर 
कब सुनता है
अपनी धुन में
ही रहता है
प्रेम अगन में
जलता है
और पिहू -पिहू 
कहता है
प्रेम की माला
जपता है
मेरी कुछ ना
सुनता है
वो अपनी धुन 
में गाता है
बस प्रेम- प्रेम 
दोहराता है
ये कैसा प्रेम 
का पंछी है
ये कैसा प्रेम
का पंछी है..............

शनिवार, 29 मई 2010

धागा हूँ मैं

धागा हूँ मैं
मुझे माला बना
प्रीत के मनके पिरो
नेह की गाँठें लगा
खुद को सुमरनी
का मोती बना
मेरे किनारों को
स्वयं से मिला
कुछ इस तरह
धागे को माला बना
अस्तित्व धागे का
माला बने
माला की सम्पूर्णता
में सजे
जहाँ धागा माला में
विलीन हो जाये
अस्तित्व दोनों के
एकाकार हो जायें

मंगलवार, 18 मई 2010

खुद से निगाह मिला ना पाया

सुनो
उदासी का
लहराता साया
क्या तूने नहीं देखा?
जिसे कभी तू
कँवल कहा करता था
उस रुखसार पर
डला ख़ामोशी का
नकाब
हटाया तो होता
हर तरफ टूटी -बिखरी
निराशा में डूबी
आहें और ख्वाबों
को ही पाया होता
हर पग पर सिर्फ
ज़ख्मो के ही निशाँ
टिमटिमाये होते
हर तरफ तबाही का
मंजर ही पाया होता
और हर तबाही के लिए
खुद को ही कसूरवार
ठहराया होता
शायद इसीलिए
नकाब हटा ना पाया
सत्य के आईने में
खुद से निगाह
मिला ना पाया

सोमवार, 17 मई 2010

महिला ब्लॉगर्स का सन्देश जलजला जी के नाम

कोई मिस्टर जलजला एकाध दिन से स्वयम्भू चुनावाधिकारी बनकर.श्रेष्ठ महिला ब्लोगर के लिए, कुछ महिलाओं के नाम प्रस्तावित कर रहें हैं. (उनके द्वारा दिया गया शब्द, उच्चारित करना भी हमें स्वीकार्य नहीं है) पर ये मिस्टर जलजला एक बरसाती बुलबुला से ज्यादा कुछ नहीं हैं, पर हैं तो  कोई छद्मनाम धारी ब्लोगर ही ,जिन्हें हम बताना चाहते हैं कि हम  इस तरह के किसी चुनाव की सम्भावना से ही इनकार करते हैं.

ब्लॉग जगत में सबने इसलिए कदम रखा था कि न यहाँ किसी की स्वीकृति की जरूरत है और न प्रशंसा की.  सब कुछ बड़े चैन से चल रहा था कि अचानक खतरे की घंटी बजी कि अब इसमें भी दीवारें खड़ी होने वाली हैं. जैसे प्रदेशों को बांटकर दो खण्ड किए जा रहें हैं, हम सबको श्रेष्ट और कमतर की श्रेणी में रखा जाने वाला है. यहाँ तो अनुभूति, संवेदनशीलता और अभिव्यक्ति से अपना घर सजाये हुए हैं . किसी का बहुत अच्छा लेकिन किसी का कम, फिर भी हमारा घर हैं न. अब तीसरा आकर कहे कि नहीं तुम नहीं वो श्रेष्ठ है तो यहाँ पूछा किसने है और निर्णय कौन मांग रहा है? 
हम सब कल भी एक दूसरे  के लिए सम्मान रखते थे और आज भी रखते हैं ..
                            
 अब ये गन्दी चुनाव की राजनीति ने भावों और विचारों पर भी डाका डालने की सोची है. हमसे पूछा भी नहीं और नामांकन भी हो गया. अरे प्रत्याशी के लिए हम तैयार हैं या नहीं, इस चुनाव में हमें भाग लेना भी या नहीं , इससे हम सहमत भी हैं या नहीं बस फरमान जारी हो गया. ब्लॉग अपने सम्प्रेषण का माध्यम है,इसमें कोई प्रतिस्पर्धा कैसी? अरे कहीं तो ऐसा होना चाहिए जहाँ कोई प्रतियोगिता  न हो, जहाँ स्तरीय और सामान्य, बड़े और छोटों  के बीच दीवार खड़ी न करें.  इस लेखन और ब्लॉग को इस चुनावी राजनीति से दूर ही रहने दें तो बेहतर होगा. हम खुश हैं और हमारे जैसे बहुत से लोग अपने लेखन से खुश हैं, सभी तो महादेवी, महाश्वेता देवी, शिवानी और अमृता प्रीतम तो नहीं हो सकतीं . इसलिए सब अपने अपने जगह सम्मान के योग्य हैं. हमें किसी नेता या नेतृत्व की जरूरत नहीं है.
 
इस विषय पर किसी  तरह की चर्चा ही निरर्थक है.फिर भी हम इन मिस्टर जलजला कुमार से जिनका असली नाम पता नहीं क्या है, निवेदन करते हैं  कि हमारा अमूल्य समय नष्ट करने की कोशिश ना करें.आपकी तरह ना हमारा दिमाग खाली है जो,शैतान का घर बने,ना अथाह समय, जिसे हम इन फ़िज़ूल बातों में नष्ट करें...हमलोग रचनात्मक लेखन में संलग्न रहने  के आदी हैं. अब आपकी इस तरह की टिप्पणी जहाँ भी देखी जाएगी..डिलीट कर दी जाएगी.