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गुरुवार, 4 जून 2015

ये कैसा संन्यास ?

करोड़ों की संपत्ति छोड़ रघुनाथ दोषी भिक्षु बने अर्थात उन्होंने सन्यास ग्रहण कर लिया और यहीं से एक प्रश्न ने दिमाग में हल्ला मचा दिया जब देखा कि १०० करोड़ की लागत से तो पंडाल बनाया गया जहाँ भिक्षु बनने का आयोजन संपन्न हुआ . 

प्रश्न उठता है जब आपने सन्यास लेने का मन बना ही लिया तो माया से भी दूर हो गए और यदि माया से दूर हो गए तो ये दिखावा क्यों ? 

क्या संन्यास लेना दिखावा है ?

 संन्यास तो मन की वो अवस्था है जहाँ इंसान अपने मन से काम क्रोध लोभ मोह अहंकार के त्याग के साथ ही अपने रिश्ते नातों सबका त्याग कर देता है फिर इस तरह के दिखावे का आयोजन करने का क्या औचित्य ? 

आप पैसे वाले थे तो आपको चाहिए था कि आप उन १०० करोड़ रूपये से देश के गरीब लोगों या और कुछ नहीं आज किसान का क्या हाल है किसी से छुपा नहीं उन्हें देते , उनकी समस्याओं पर खर्च करते तो शायद संन्यास लेना वास्तव में सार्थक हो जाता . मगर इस तरह तो आपने सिर्फ अपने पैसे और रुतबे का ही प्रदर्शन किया साथ ही माया से भी मुक्त नहीं हुए . 

सन्यास की सार्थकता इसी में है कि आप कोई ऐसा कार्य कर जाएँ जो देश और समाज के हित में हो न कि अपनी भव्यता का प्रदर्शन मात्र हो . जो सन्यासी बनते हैं वो आडम्बरों से दूर हो जाते हैं क्योंकि संन्यास मन की अवस्था है दिखावे की नहीं शायद ये उन्हें किसी ने नहीं बताया या हमारे धर्मगुरु ऐसा बताना अपना कर्तव्य नहीं समझते जबकि संन्यास लेने की पहली शर्त माया का त्याग ही होता है साथ में यदि माया है आपके पास तो उसका सदुपयोग करके त्याग किया जाए न कि सिर्फ अपनी जय जयकार करवा एक नयी रीत कायम की जाए जो समाज को गलत दिशा प्रदान करे . 

आडम्बरों , ढोंग और प्रदर्शन से परे होती है संन्यास की स्थिति ये तो एक बच्चा भी जानता है फिर ये कैसा संन्यास जहाँ सिर्फ और सिर्फ पैसे का ही प्रदर्शन था ?

सोमवार, 1 जून 2015

कसैलेपन के स्वाद के साथ

सच कहूँ तो 
अब तुमसे कोई भी 
सवाल करने का मन ही नहीं करता 

बदलाव की प्रक्रिया में हैं हम दोनों ही 
शायद इसीलिए अब फिर से 
एक अजनबियत तारी होने लगी है 

तुम्हें जानकार भी 
शायद अब तक जान नहीं पायी 
और पूरी तरह शायद जान भी न सकूँ 

क्योंकि 
रोज रंग बदल जाती है इंसानी फितरत 
फिर कैसे संभव है 
उम्मीद की डोर का एक सिरा तुम्हें पकड़ा 
हो जाना निश्चिन्त 

अपने अपने किनारों पर चलते हुए भी 
साथ रहना हमारी नियति है 
एक दूरी और एक साथ के बीच कहीं बचा है एक रिश्ता 
तो उसे बचाए रखने को 
कटिबद्ध हैं हम दोनों ही 
फिर चाहे अजनबियत के छोर रोज अपने पाँव सुरसा से बढाए जा रहे हैं 

चुक चुकी हूँ अब 
रोज रोज की खिटपिट से बेहतर है 
अजनबियत की गोद में बैठ सफ़र को मंजिल तक पहुँचाना 

अब फर्क नहीं पड़ता है 
मिश्री की डली के साथ नीम चबाने में 
जुबाँ तो कब की सारे स्वाद भूल चुकी है 

कसैलेपन के स्वाद के साथ  
मैं खुश हूँ अपने निविड़ अंधेरों में .........


गुरुवार, 28 मई 2015

भरम टूट चुके हैं मेरे

एक और दिन की शुरुआत ... कुछ ख़ास नहीं .......वो ही उलझा उलझा , अपनी वीरानियों में सिमटा हुआ , एक ठंडी चाय के अहसासों से लबरेज़ , किसी वृक्ष से गिरी पीली पत्तियों सा बिखरा ..........जाने कौन सा फलसफा लिखेगा ........ जहाँ कोई मुलाकात का वादा नहीं किसी से , जहाँ इंतज़ार के ठहरे हुए पलों में नहीं है कोई कहानी .....बस एक ख़ामोशी है जिसके पीछे जाने कौन सी वजह है दरयाफ्त करने को आजकल नहीं मिला करती खुद से भी ...........बेगानापन तारी है मानो जुबाँ पर कसैलापन चढ़ा हो और मिश्री भी कडवी लग रही हो ..........सुनो , क्या कर सकोगे व्याख्या आखिर मैं चाहती क्या हूँ क्योंकि एक अरसा हुआ भटकते बियाबानों में मगर ?

ए .......... अब इसे मोहब्बत नाम न देना भरम टूट चुके हैं मेरे ........उससे इतर कोई नयी इबारत लिख सको या बयां कर सको तो खट्टी इमली सा स्वाद भी काफी होगा जीने के लिए  ......... यूँ भी पतझड़ से झड़ते दिन गवाह हैं कल फिर एक आज बन खड़ा होगा यही प्रश्न लिए .......... क्या कर सकोगे अब इबादत बिना बुत के सजदे में झुकने की रस्म अदा कर हलाल होने की .........क्योंकि जरूरी तो नहीं दिन बदलने से बदल जाएँ तकदीरें भी .....वक्त की स्याही हमेशा काली ही हुआ करती है ..........और तुम वक्त से आगे हो और मैं न आगे न पीछे ............मध्य मार्ग मेरी मजबूरी है ........उदासियों के शहर में खामोशियों का अनशन सिखा रहा है मुझे दिन को कतरा कतरा बेजुबान करना मानो गिद्धों ने नोंच डाला हो जिस्म सारा ......अब और क्या दिन बीतने और रीतने के फलसफे सुनाऊँ तुम्हें ..........समझ सको तो समझ लेना यहाँ सुबह बासी फूल सी मुरझाई हुआ करती है और शामें किसी शोक संतप्त परिवार सी गुजरा करती हैं ........और तुम कहते हो दिन की हथेली पर लिखूं तुम्हारा नाम तो खिल उठेंगे सारे शहर के गुलाब ........आह ! 

मंगलवार, 26 मई 2015

अच्छे दिन आयेंगे

साहेब मदारी बन डुगडुगी बजा रहे हैं 
जनता जानती है नाचना बन्दर सा 
देखो खेल सफल हो रहा है 
सावन के अंधों को सिर्फ हरा ही सूझ रहा है 

वैसे भी मैं इतनी विदेश यात्राएं यूँ ही नहीं कर रहा 
बस जनता का जनता को लौटा रहा हूँ 
अपना नाम थोड़े ही देश का नाम रौशन कर रहा हूँ 
ख्याली पुलाव पकाना आदत है मेरी 
जो मुझे जानते हैं विश्वास नहीं करते

चलिए एक साल निकल गया 
चार और इसी तरह निकल जायेंगे 
आप हमारे सम्मोहन में फंसे किधर जायेंगे 
लौट कर बार बार यहीं आयेंगे 

यूँ मिशन पूरा हो जाएगा 
देश का भला , जनता का भला करते करते 
अपना भला कर जायेंगे 
आप फिर से कहेंगे जनाब 
अच्छे दिन आयेंगे , अच्छे दिन आयेंगे , अच्छे दिन आयेंगे ........

अच्छे दिनों के ख्वाब में ही अच्छे दिन निकल जाएंगे 

सोमवार, 18 मई 2015

ए री सखी

ए री सखी
याद तो आती होंगी वो रेशमी मुलाकातें
जहाँ तुम थीं, मैं थी और थीं हमारी कभी न ख़त्म होने वाली बातें


उफ़
जाने कहाँ खो गए वो दिन वो रातें
जिनमे होती थीं कभी तरन्नुम सी बातें
रातरानी से महकते थे जब हम
बेख्याली में गुजर जाती थीं मुलाकातें
अब यादों के चंदोवे कहाँ बिछाऊँ
जिन पर वो महफिलें फिर से सजाऊँ
रह रह यही ख्याल आ रहा है
दिल बस यही गुनगुना रहा है
'गुजरा हुआ ज़माना आता नहीं दोबारा ' 


क्या सच री सखी
गुजरती है तू भी कभी यादों के उस दौर से
तो एक बार इशारा करना
मुझ तक पहुँच जायेगा
दिल से दिल को राह होती है वाला मामला जो ठहरा 


शायद उस पल
गुजरा वक्त इक पल को ही सही लौट आएगा , लौट आएगा , लौट आएगा ...

रविवार, 10 मई 2015

ज़िन्दगी जीने को ज़िन्दगी तो देना ....



जाने किस अंगार पर चली होगी
जाने किस आंच में झुलसी होगी
यूँ ही तो नहीं आह निकली होगी

जब भी तूने घूँट भरी होगी
पोर पोर विष में सनी होगी
माँ ने जो ज़िन्दगी जीयी थी
जाने किस दोजख से गुजरी होगी

तभी तो
यूँ नहीं नहीं निकला होगा मुख से
अगला जन्म कोई हो तो ए ईश्वर
नारी का न चोला देना
ज़िन्दगी जीने को ज़िन्दगी तो देना ....

बेशक नारी हूँ बेटी हूँ मगर
नहीं गुजरी जिन पगडंडियों से
कैसे अनुमान लगा सकती हूँ
कैसे तेरे दर्द से रु-ब-रु हो सकती हूँ

शायद तभी
विष के प्याले पीने को मीरा होना जरूरी होता है ..... है न माँ !!!

शुक्रवार, 8 मई 2015

न तुम गया वक्त हो और न मैं .........

जाने वो कौन सा गाँव कौन सा शहर कौन सी डगर है
जहाँ कोयल के कुहुकने से होती हैं सुबहें

अब चौपाये इश्क के हों या अंधेरों के
एक बिखरी रौशनी कात रही है सूत
उम्र का रेशा रेशा कम होता रहे बेशक
ओढने को चादर बना ही दी जाएगी

फिर क्या फर्क पड़ता है
दिन हो या रात
शहर हो या गाँव
गली हो या डगर
नीम बेहोशी के गुम्बदों पर ही तो
गुटर गूं किया करते हैं इश्क के कबूतर

ये दैनन्दिनी नहीं
जिसमे दर्ज की जा सकें हिमाकतें
इश्क के खूबसूरत छलावों ने ही तो बांधे हैं पीपल पर लाल धागे

फिर कौन सुप्त तारों को झिंझोड़े
और बनाए एक नयी सरगम
जब इश्क की कोयलों के पाँव में छनकती हों पायलें
और नर्तन से करती हो धरा अपना श्रृंगार

आओ कि उस सुबह का आगाज़ करें हम .......लेकर एक दूजे का हाथ हाथों में
न तुम गया वक्त हो और न मैं .........

मंगलवार, 5 मई 2015

मजदूर दिवस की मजबूरी



 हास्य व्यंग्य पत्रिका अट्टहास के मई अंक में :




लेखक संघ के प्रवक्ता जोर से माइक पर चिल्लाये :
अरे जागो जागो सोने वालों चलिए आ गया एक बार फिर हो - हल्ला मचाने का दिन . कुम्भकर्णी नींद में सोये हुओं को जगाने का दिन . बाद में न कहना अरे बता दिए होते जगा दिए होते . आखिर एक ही दिन की तो बात होती है फिर तो लम्बी रात होती है 364 दिन लम्बी रात . भई , ये लेखकों की बिरादरी है जो खास ख़ास दिनों पर जरूर जागती है और उस ख़ास दिन को अपने लेखन से ख़ास बना उस दिन के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराती है तो कैसे संभव है हम इस दिन को चूक जाए और जो हाथ में संवेदनशील होने का मौका आया है उसे भुनाने से खुद को रोक पाएंइसलिए आज तुम सबको चेताने को हमने सोचा और इस सभा का आयोजन किया है ताकि तुम सब दल बल के साथ तैयार हो जाओ .

देखो मजदूर दिवस आ रहा है . अब आ रहा है तो आ रहा है इसमें नया क्या तुम कहोगे लेकिन उसी बारे में तुम्हें बताना है . यूं तो हर साल आता है लेकिन फिर भी बहुत से लेखकों को पता ही नहीं चलता तो वो इलज़ाम लगाते हैं हमें बता दिए होते तो हम भी दो चार रचनाएँ ठेल दिए होते इसलिए इस शिकायत को दूर करने के लिए हमने ये आयोजन रखा है . अब हमें तुम्हें मई दिवस के बारे में विस्तार से बताते हैं ताकि अगली बार ये न कहो कि ये तो बताया ही नहीं गया कि आखिर लिखना क्या था .

अरे भाई ,जब मजदूर दिवस है तो  करना ही क्या होता है सिर्फ इतना ही न कि थोडा उनका दर्द लिखो , उनके फाकों पर अपने प्रतीकों और बिम्बों का मरहम रखो , उनकी भूख , उनकी पीड़ा , उनकी तकलीफों पर ऐसे दर्द का गान लिखो कि जो पढ़े वो तुम्हें ही उनका सबसे बड़ा खैर ख्वाह जाने , तुम से ऊपर न तुम से आगे कोई भी ऐसा किरदार दिखे , बस होने को मशहूर और क्या चाहिए भला क्योंकि क्या पता कौन सी कविता , कौन सा व्यंग्य , कौन सी कहानी या कौन सा आलेख तुम्हें कालजयी बना दे और यही तो होता है अंतिम उद्देश्य कुछ भी रचने का

देखो मजदूर दिवस का औचित्य क्या है भले तुम न जानो तो गूगल खंगाल डालो. सारी जानकारी एक क्लिक की दूरी पर ही तो है . कितना आसान हो जायेगा फिर लिखना कहना और खुद को हमदर्द सिद्ध करना . वैसे भी यदि तुम चूक गए तो एक साल के लिए बात चली जाती है इसलिए जरूरी है उस दिन आन्दोलनकारी कविता कहानी आदि लिखना और संवेदनशीलों की श्रेणी में शामिल होना

वैसे भी जरूरी है आज ये स्लोगन : चलो मई दिवस मनाएं , मजदूरों के हक़ में आवाज़ उठाएं . आखिर हमारा भी फर्ज बनता है , लेखक कवि की श्रेणी में आते हैं संवेदनशील कहाते हैं , मजदूर के दर्द , उत्पीडन , तंगहाली , बदहाली पर एक कविता लिखनी ही होगी . फिर देखना कैसे तुम मजदूरों के हमदर्दों में शामिल हो जाओगे और उनके लिए हुए आयोजनों में बुलाये जाओगे वहां अपनी कविता पढ़ आना तुम्हारा भी काम हो जाएगा और आयोजकों का भी . बाकी मजदूर का क्या है वो कल भी वहीँ था , आज भी वहीँ है और कल भी वहीँ रहेगा .........ये अकाट्य सत्य है . तो क्यों न  एक दिन के लिए जाग कर अपने सारे लाव लश्कर के साथ कूच किया जाए और लेखनी को प्रमाणित सिद्ध किया जाए . वैसे भी करना क्या है उनके दर्द तकलीफों में नमक मिर्च लगाकर परोसना भर ही तो है वो भी ऐसे कि हर आँख नम हो उठे और हर कोई पूछ बैठे : आपने कैसे इतना सब कुछ लिख दिया ? क्या आपने ऐसा जीवन देखा है या जीया है ? तब तुम्हें मौका मिलेगा ऊंची - ऊंची हांक देना . चाहो तो अपने माँ बाप और अपने बचपन को ऐसे माहौल में जीया बता देना चाहो तो कहना , मैं तुम्हारा दुःख दर्द जानने और समझने के लिए कुछ वक्त तुम्हारे जैसे लोगों के बीच रहा तब जाना और तभी मेरी कलम में तुम्हारी पीड़ा जीवंत हो उठी लेकिन मुझे तो लगता है मैंने तो तुम्हारी पीड़ा का क्षणांश भी नहीं लिखा , मैं तो तुम्हारे दर्द के बस करीब भर से गुजरा हूँ लेकिन तुम्हारी पीड़ा को व्यक्त कर सकूं ऐसी सामर्थ्य मेरी लेखनी में नहीं कहते कहते दो आंसू टपका देना बस समझो सारी बाजी तुम्हारे हाथ आ गयी . समझे या नहीं अब भी ? अरे भैये कौन से तुम्हारी अंटी से लक्ष्मी देवी खिसक जायेंगी बल्कि ऐसे आयोजनों में तुम्हारी अंटी में ही आएँगी

वैसे अंत में एक सत्य आप सभी को बता दूं गर एक कविता लिखने से मजदूर की ज़िन्दगी बदली होती तो संसार में कोई क्रांति न हुई होती , उनकी जिंदगियों में परिवर्तन नहीं आया करता , जब सब ढकोसलों के वस्त्र ओढ़कर बड़े बड़े आयोजन कर लेते हैं तो बहती गंगा में यदि हम भी हाथ धो लेते हैं तो कौन सा गंगा का जल कम हो जाएगा बल्कि हम सबका नाम भी उनके हमदर्दों की फेहरिस्त में जुड़ जाएगा , बाकि उसे तो दो रोटी के लिए कल भी जद्दोजहद करनी पड़ती थी और आज भी करता है ऐसे आयोजनों या ऐसे दिन मनाने से उनकी ज़िन्दगी में कुछ नहीं बदलता है , तो उन्हें उनके हाल पर छोडो और अपने लेखन से नाता जोड़ो ........इसलिए एक सत्य ये भी जानो , तुम भी मजदूर की श्रेणी में आते हो , अरे भाई तुम कलम के मजदूर हो न ? तो फिर तुम्हारे ही तो भाई बंधू हैं क्या उनके लिए एक दिन नहीं जाग सकते ? क्या उनके लिए कुछ प्रभावशाली नहीं लिख सकते कम से कम उन्हें ऐसा तो लगे कि कोई हो न हो लेकिन लेखक संघ उनकी समस्या को सबसे ज्यादा समझता है तभी तो अपनी कलम में उनका दर्द लिखता है

बाकी सारे सत्य तुम्हारे सामने हमने तो रख दिए अब तुम्हारी मर्ज़ी इसे मजदूर दिवस की मजबूरी समझो या हाथ में आया मौका . भई , हम तो चले जुगाड़ भिडाने की कोशिश में अब तुम सोचो तुम्हें कैसे इस मौके को भुनाना है और अपना नाम रौशन करवाना है

तो बोलो सब मिलकर : मजदूर दिवस की जय


बुधवार, 29 अप्रैल 2015

मेरी प्यास ... मेरा वजूद


मेरी प्यास 
जब भी बनी 
रेगिस्तान की दुल्हन ही बनी 

हांड़ी जिस भी चूल्हे पर चढ़ी 
तली टूटी ही निकली 

उम्मीद के गरल से तर रहा गला 
अब जरूरी तो नहीं नीलकंठ कहलवा 
खुद को महिमामंडित करना 

मेरा वजूद ही क्या है 
जो प्यास के पैमाने बने और नपें


अस्थि कलश में छंटाक भर ही तो है मेरा वजूद 

सोमवार, 20 अप्रैल 2015

इश्क तुम्हें हो जायेगा ......मेरी नज़र से


प्यार इश्क मोहब्बत आदिम की मूलभूत चाहना जिसके इर्द गिर्द है संसार की संरचना .एक आदिम प्यास , एक खोज , एक घटना , एक पीड़ा , एक दर्द , एक दुर्घटना जाने कितने नाम मिले मगर अंततः शरीर भूगोल से परे इसके तंतु तो सिर्फ रूह में मिले जो जाने कैसे बटे गए थे जितने खोले उतने उलझते गए फिर कौन कर सकता है व्यक्त निराकार को .....निराकार ही तो होता है प्रेम जो दो मानवों में आकार ले खुद को साकार करना चाहता है बस शुरू हो जाती है वहीँ से एक भटकन ........एक अंतहीन शुरुआत की ....... प्रेम चाहना है या उपासना या प्रताड़ना या आलोचना इन सन्दर्भों में कौन पड़े .......प्रेम में प्रेम होना ही शायद है उसकी सबसे बड़ी परिभाषा और फिर जब एक स्त्री प्रेम में होती है तो कैसे अपने भावों की गर्जना को संगृहीत करती है उसी संग्रहण का नाम है : इश्क तुम्हें हो जायेगा .

हिन्द युग्म प्रकाशन से प्रकाशित अनुलता राज नायर का कविता संग्रह अपने शीर्षक से ही सबसे पहले आकर्षित करता है और अन्दर जाओ तो प्रेम का अथाह सागर उमड़ा पड़ा है जिसका दिग्दर्शन पहली कविता ही कराती है :
‘ रूह ‘ जहाँ प्रेम का चरम है तो कवयित्री की सोच की महीनता भी जो बताती है इश्क का चरम तो रूह में तब्दील होने के बाद ही आकार लेता है जहाँ मानव मन तो पहुँच ही नहीं सकता वहां तो वो ही पहुँच सकता है जो नख से शिख तक प्रेम में डूबा हो . छोटी सी कविता में पूरा प्रेम शास्त्र मानो समा गया हो .



इसीलिए तो खाई जाती हैं कसमें
अपने अपने झूठ पर
सच की मोहर लगाने को
‘ कसम ‘ खाने का इससे बेहतर अर्थ कोई क्या देगा भला गागर में सागर भरती कविता गहन अर्थ संजोये है .

जीवन खेल ही स्मृतियों का है , उम्र का कोई भी दौर हो कोई भी मोड़ हो नहीं छोड़तीं स्मृतियाँ पीछा तभी तो ‘ स्मृतियाँ ‘ कविता के माध्यम से कवयित्री ने जब अपनी स्मृति का पिटारा खोला तो स्वाद की कडवाहट उतर ही आई

मुझे स्मरण है अब भी तेरी हर बात
तेरा प्रेम , तेरी हंसी , तेरी ठिठोली
और जामुन के बहाने से
खिलाई थी तूने जो निम्बोली
अब तक जुबान पर
जस का तस रखा है वो कड़वा स्वाद
अतीत की स्मृतियों का

‘ राग विराग ‘ कविता अतीत और वर्तमान में भ्रमण करती एक बार फिर प्रेम की आवश्यकता को स्थापित करती है

ऐसा नहीं कि प्रेम के अभाव में जीवन नहीं
मगर
बड़ा त्रासद है
प्रेम का होना और फिर न होना


उसकी आँखों को चूमे बिना ही
चखा है मैंने
कोरों पर जमे नमक को
एक रात नींद में वो मुस्कुराई
और बादल उसके इश्क में दीवाना हो गया

इसे इश्क की इन्तेहा न कहा जाए तो भला क्या कहा जाए , एक भीना भीना मीठा मीठा अहसास संजोये है कविता ‘ दुआ ‘ जिसका स्वाद , जिसकी कसक धीमा धीमा अन्दर ही अन्दर कसकती है .

‘ मेरे कमरे का मौसम ‘ एक बार फिर प्रेम का लबालब भरा प्याला ही तो है जहाँ प्रेमी , प्रेम और खुद के सिवा कुछ दिखे ही न , कुछ महसूसे ही न , जहाँ के रोम रोम में बस ठाठें मारता प्रेम का सागर हो वहां कैसे अन्य अनुभूतियों के लिए जगह हो सकती है भला
सारे मौसम एक साथ होते हैं जब
सब खिड़कियाँ बंद होती हैं और
मेरे कमरे में
तुम होते हो

अहा!
तुम , मैं और तुम्हारा बारामासी प्रेम !
यही तो एक स्त्री की चाहत की पराकाष्ठा है जिसे प्रेम भी चाहिए तो बारहमासी , पूर्ण रूप से , कोई मोल तोल नहीं क्योंकि न वो खुद अपूर्ण है और न ही जीवन में अपूर्णता चाहती है तभी तो ऐसे उदगार जन्म लेते हैं .

‘ प्रेम में होने का अर्थ ‘ कितने गहरे और सच्चे अर्थ समेटे है ये तो कोई उसमे उतरने वाला ही जान सकता है . गहन अर्थों को समेटे कविता प्रेम के अर्थ के साथ प्रेम का विसर्जन भी कर दे तो होगी न प्रेम के अर्थों में कहीं कोई ऐसी गहनता जहाँ प्रेम अपने होने के साथ न होने के विकल्प को भी समाये होता है :
मैं प्रेम में हूँ
इसका सीधा अर्थ है
मैं नहीं हूँ
कहीं और

आह ! क्या व्याख्या है , क्या परिभाषा है और यूं ही नहीं लिखा जा सकता ये सब जब तक प्रेम न किया हो किसी ने , जब तक उस राह पर न चला हो कोई क्योंकि अंत में जो कहा वो बिना अनुभव बिना अनुभूतियों के संभव ही नहीं :

मैं प्रेम में हूँ
इसके कई अर्थ हैं
और सभी निरर्थक

स्वीकार्यता और अस्वीकार्यता दोनों भावों का समावेश चंद शब्दों में संजोना मानो कवयित्री खुद स्वीकार रही हो दोनों ही परिस्थितियाँ , प्रेम के होने और न होने से परे उसके अर्थों को कर रही हो परिभाषित .

‘ प्रेम का गणित ‘ सच कितना गहन है ये तो सिर्फ कवयित्री ही बता सकती है जब कहती हैं :
यदि प्रेम एक संख्या है
तो निश्चित ही
विषम संख्या होगी
इसे बांटा नहीं जा सकता कभी
दो बराबर हिस्सों में

कहने को कुछ बचता ही नहीं सिर्फ कथ्य में ही डूबे रहो और गुनते रहो .

‘ प्रेम की प्रकृति ‘ सच ऐसी ही तो होती है जैसा कि कवयित्री ने चंद शब्दों में ही बयां कर दी और पाठक मंत्रमुग्ध रह गया :
प्रेम का एक पल
छिपा लेता है अपने पीछे
दर्द के कई कई बरस

कुछ लम्हों की उम्र ज्यादा होती है , बरसों से

जहाँ एक टीस है , एक कसक है , एक अकुलाहट है और एक समर्पण भी .छोटी छोटी रचनायें गहन अर्थ समेटे अपनी फुहारों में पाठक मन को भिगो देती हैं . सच यही तो है प्रेम का अर्थशास्त्र .


उस रोज
जब सीना चीरकर
तुम दे रहे थे
सबूत अपनी मोहब्बत का
तब चुपके से वहां
मैंने अपना एक ख्वाब
छिपा दिया था

जो हलचल है तेरे दिल में उसे
धड़कन न समझना
मानो यूं ‘ धड़कन ‘ को सही अर्थ दे दिया हो कवयित्री ने . जैसे सरोजिनी प्रीतम की कवितायें गागर में सागर भरती हैं फिर वो हास्य में कही गयीं हो वैसे ही अनुलता की कवितायेँ पढ़ते हुए  लगता है .


मैंने कुछ सकुचा के पुछा
सुखद से सुखद स्वप्न भी मुफ्त ?
उसने जवाब दिया
हाँ , हर स्वप्न मुफ्त
क्यूंकि किसी के भी
पूरा होने का कोई बंधन नहीं
कोई शर्त नहीं
फिर उनका क्या मोल
जो चाहे देखो
‘ सपनो का सौदागर ‘ कविता में मानो जीवन का शाश्वत सत्य उतार दिया हो .

‘ सिन्दूर ‘ कविता नारी मन , नारी जीवन का वो सत्य है जिसे हर स्त्री युगों से परिभाषित कर रही है अपनी अपनी तरह और आज तक पुरुष उसे पकड़ नहीं पाया क्योंकि वो उसकी तह तक कभी गया ही नहीं , जाना ही नहीं उसके त्याग और समर्पण को तो क्या समझेगा वो उसके प्रेम की परिभाषा को .....ये कविता तो मानो गूंगे का गुड है जिसके स्वाद की चाशनी में पाठक डूब जाता है जब कवयित्री हर चिन्ह की स्वीकार्यता को अपना प्रेम बताती है न कि थोपा हुआ आडम्बर और कह देती है अंत में उसे अपने जूनून का उन्मुक्त प्रदर्शन ..आह ! शायद तभी कवयित्री का  ‘प्रेम की कोई तय परिभाषा नहीं होती ‘ कहना सार्थक हो जाता है .


सो , अब तय कर दी है उसने
अपनी आकांक्षाओं की सीमा
और बाँध दी हैं हदें
ख्वाबों की पतंग भी कच्ची और छोटी डोर से बाँधी

ऐसा कर देना आसान था बहुत
सीमाओं पर कंटीली बाद बिछाने में
समाज के हर आदमी ने मदद की
ख्वाबों की पतंग थमने भी बहुत आये

औरत को अपना आकाश सिकोड़ने की बहुत शाबाशी मिली
‘ औरत की आकांक्षा ‘ को कब कोई समाज स्वीकार पाया है ? कैसे वो उन्मुक्त आचरण कर सकती है ? कैसे वो कोई ख्वाब देख कर उसे फलीभूत कर सकती है ? पहरे तो बिठाए ही जायेंगे उसके साथ कोशिश की जाती है उसे इतना बेबस करने की कि एक दिन जब उनके अनुसार आचरण करने लगे तो हो जाती है शाबाशी की हकदार या कहो एक सुगढ़ गृहणी , एक अच्छी स्त्री . खुद को नेस्तनाबूद कर जब ज़मींदोज़ किया तभी औरत को खुद को अच्छा दिखने का खिताब मिला .


प्रेम जब अनंत हो गया रोम रोम संत हो गया सच कहा किसी ने लेकिन जब प्रेम में नाकामी मिले तो ? यही है इश्क की वो सर्पीली चाल जिसके बारे में कहा गया है पता ही नहीं चलता कब कौन सा मोड़ ले ले और ऐसा ही तो ‘ नाकाम इश्क ‘ कविता का मनोविज्ञान है जिसमे कवयित्री नहीं सहेजना चाहती नाकाम इश्क की निशानियाँ भी और ढलका देती हैं समंदर के खारे नमक को आंसुओं के रूप में . प्रेम की ऊर्ध्गामी गति जहाँ प्रेमिका अस्वीकारती है हर वो जहाँ उसका अस्तित्व ही मिट जाए , उसका होना ही स्वीकार्य न हो वहां इश्क नाकाम ही हुआ करते हैं :

नामंजूर था मुझे खुद को खो देना
नामंजूर था मुझे तेरा नमक

‘ तारों की घर वापसी ‘ एक खूबसूरत बिम्ब का प्रयोग . प्रेम में तकरार को तारों चाँद और आसमान के माध्यम से बहुत खूबसूरती से संजोया है जो एक बार फिर प्रेम के एक और अलग रूप का प्रतिपादन करता है .....बिलकुल प्यार में तकरार भी होती है और तकरार इंसान ही नहीं करते बल्कि चाँद तारों में भी हुआ करती है .

‘ महामुक्ति ‘ ईश्वरीय तत्व , उस चेतन के प्रति समर्पण का भाव है जहाँ आत्मा और परमात्मा का मिलन हो जाए और द्वैत का भाव मिट जाए उस परम आनंद में समां जाने को आतुर है कवयित्री की चेतना जो हर कवि  या कवयित्री उसकी मूलभूत चाहत होती है और उसी खोज का परिणाम होता है लेखन और फिर कवयित्री में कृष्ण प्रेम स्वतः जागृत है तो ऐसी अनुभूतियों का जागृत होना स्वाभाविक है .

‘ रूपांतरण ‘ स्त्री का आंतरिक और बाह्य सौन्दर्य का प्रतिरूप है . कैसे एक स्त्री में अनेक स्त्रियाँ मिला करती हैं , कैसे अपने अन्दर संजोये होती है वो एक बच्चा भी तो एक सबल पुरुष भी . यानि स्त्री वक्त पड़ने पर बन सकती है बच्चा और कर सकती है बाल सुलभ चेष्टाएं भी तो वहीँ किसी आकस्मिक स्थिति में बन सकती है पुरुष से भी ज्यादा सबल क्योंकि यही है उसकी प्रकृति , आखिर जननी है वो जानती है हर माहौल में जरूरत के अनुसार खुद को उस प्रकृति में रूपांतरित करना और यही फर्क है एक स्त्री होने में बनिस्पद पुरुष होने के .

‘ पापा ये आपके लिए ‘ में कवयित्री ने अपने उन मनोभावों को पिरोया है जिससे अक्सर सभी गुजरते हैं . एक वक्त होता है जब पिता की ऊंगली पकड़ बच्चा चलना सीखता है और एक उम्र पर उसी पिता को अपने बच्चे की ऊंगली की जरूरत पड़ती है या फिर कब क्या खाना पीना है उसका ध्यान रखना या चोट लगने पर दर्द का अहसास होना वो सब एक बेटी को भी उसी तरह होता है जैसा उसके पिता को होता है और बदल जाते हैं पात्रों के रूप वक्त के साथ . बचपन में जैसे बच्चों को पिता की जरूरत होती है वैसे ही बुढापे में उन्हें बच्चों की , एक खूबसूरत सन्देश देती हुई मार्मिक कविता मन भिगो देती है .

‘ प्रेम कविता ‘ प्रेमियों की वास्तविक स्थिति का चित्रण है . सच है ये जो प्रेम करते हैं उन्हें जरूरत नहीं कविता के माध्यम से व्यक्त करना और जो जानते भी नहीं प्रेम करना वो ही अक्सर कागज़ काले किया करते हैं क्योंकि ख्याली आकाश इतना विस्तृत होता है उसमे ही जीना उन्हें सुगम लगता है जबकि हकीकत में जरूरत नहीं होती असल प्रेमियों को किसी भी उपालंभ की क्योंकि प्रेम की प्रकृति ही यही है कि जब दो दिल मिल रहे होते हैं , जब प्रेम , प्रेमी और प्रेमास्पद का मिलन होता है तब
प्रेमी नहीं करते बातें
ऐसी वैसी
कैसी भी

वे नहीं करते प्रेम से इतर
कुछ भी .........

यही तो प्रेम का वास्तविक सत्य है . जहाँ प्रेम होगा वहां बस प्रेम का ही साम्राज्य होगा तो फिर कैसे ढूंढ सकते हैं हम उसमे अन्य चाहतें , इच्छाएं या आकांक्षाएं , यही तो स्थिति है प्रेम में प्रेम होने की क्योंकि वो समय तो सिर्फ एक दूजे में खो जाने का होता है राधा कृष्ण सा .

पूरा संग्रह प्रेम के आख्यानों का दस्तावेज है .हर कविता में एक धमक है ,एक रुनझुन है , एक छमछम है .  एक मंद मंद बहती नदी बहा ले जाती है अपने साथ अपने प्रेम के प्रवाह में . छोटी छोटी सीधे सरल शब्दों में व्यक्त की गयी प्रेम की अनुभूतियाँ हैं जिन्हें कवयित्री ने कलमबद्ध किया और पाठकों के लिए प्रस्तुत किया तो पाठक भी उस प्रवाह में बहने से खुद को रोक न सका . मंत्रमुग्ध सा कवयित्री की ऊंगली पकडे चलता चला गया और फिर खुद को कहने से रोक न सका सच कहती है कवयित्री : ‘ इश्क तुम्हें हो जायेगा ‘ . सच संग्रह से इश्क हुए बिना एक सच्चा पाठक तो रह ही नहीं सकता क्योंकि कहीं न कहीं हर जगह उसके दिल के जज्बातों को ही तो कवयित्री ने पिरोया है .
अनुलता राज नायर का पहला कविता संग्रह पहले प्रेम की तरह है जिसमे कोंपले फूटी हैं और वो अपनी कच्ची सी , भीनी सी सुगंध से पाठक के मन मस्तिष्क पर अपना एकाधिकार जमाने को आतुर हो . कवयित्री को बधाई देते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती हूँ .

प्यारी अनु उर्फ़ ‪#‎अनुलताराजनायर‬ 


आज तुम्हारे जन्मदिन पर मैं अपनी तरफ से तुम्हें ये तोहफा दे रही हूँ 


क्योंकि मुझे लगा इतनी दूर से हम शुभकामनाएं ही दे सकते हैं तो क्यों न


 इस बार ये नया प्रयोग करूँ शायद तुम्हें पसंद आये .........जन्मदिन की 


ढेरों शुभकामनाएं सखी 



बुधवार, 8 अप्रैल 2015

कड़ी धूप के सफ़र पर मेरी नज़र :


शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित " कड़ी धूप का सफ़र " मुकेश दूबे जी द्वारा लिखित उपन्यास इस पुस्तक मेले में उन्होंने पहली बार मिलने पर ही जिस आत्मीयता और प्रेम से दिया तो कैसे संभव है कोई पढ़े बिना रह सके और सही में पढ़ा तो उसी में खो गयी . किरदारों ने एक घेरा बना लिया और जब तक अंत तक नहीं पहुंची चैन नहीं लेने दिया .  

'सच्चा प्रेम किसे कहते हैं' मानो उसी को परिभाषित किया गया है . लोग सच्चे प्रेम के जाने कितने अर्थ देते रहे लेकिन मुकेश दूबे जी ने बेहद सहज सरल पठनीय और प्रवाहमयी भाषा में उसे रेखांकित कर दिया . प्रेम के कितने ही रूप अक्सर पाठक पढता है और उसमे खोता रहता है कुछ ऐसा ही नशा मुकेश जी के उपन्यास में है जहाँ दो पात्र मनोज और अनुभा हैं , जहाँ प्रेम का इज़हार नहीं हुआ , इकरार नहीं हुआ मगर फिर भी उसका अस्तित्व कायम रहा , उस प्रेम ने आकार लिया अपने अपने खांचों में , अपने अपने समय के वृत्त में . एक पवित्र प्रेम की मिसाल है ये उपन्यास जहाँ प्रेम है अपनी सम्पूर्णता के साथ मगर देह हैं ही नहीं , बल्कि क्यों नहीं हैं जबकि हो सकती थीं ये प्रश्न और इसका उत्तर लेखक ने छुपा दिया है ये पाठक की सोच पर छोड़ दिया है आखिर वो वहां तक पहुँच पाता भी है या नहीं और यही उनके लेखन का कौशल है . जहाँ पानी का अथाह सागर हिलोरें मार रहा हो मगर दोनों तट फिर भी प्यासे रहने को मजबूर हों , आसान नहीं होता भरी थाली से भूखे पेट उठना और यहाँ दोनों पात्र अपनी अपनी सीमाओं में बंधे हैं फिर भी कोई शिकायत नहीं बल्कि अद्भुत प्रेम का दर्शन है . एक का त्याग और तपस्या दूजे का जीवन बन गयी जहाँ वहां भला कैसे शरीर या उसकी जरूरतें आकार ले सकती हैं . वो जो कहते हैं प्रेम आत्मिक धुनों पर नर्तन करता है और कैसे तो उन्हें ये उपन्यास पढना चाहिए और जानना चाहिए कैसे धरती और आकाश हमेशा साथ साथ होते हुए भी एक दूसरे से एक निश्चित दूरी पर रहकर भी अपनी प्यास बुझाते हैं , कैसे नदी के दो पाट बीच में बहते नदी के पानी को अपने मिलन का माध्यम बनाते हैं . 

कहानी एक सजह प्रवाह में लिखी गयी है , कहीं कोई अतिश्योक्ति नहीं , कहीं भावनाओं से खिलवाड़ नहीं , कहीं बेवजह दृश्यों को ठूंसा नहीं गया . सीढ़ी सपाट सड़क हो और कोई मुसाफिर जिसे पता हो उसकी मंजिल बस चलता चला जा रहा हो ऐसा है कहानी का आवरण , पाठक उस प्रवाह में ऐसा बहता है कि एक बार पढना शुरू करता है तो अंत तक पहुँचने की उत्सुकता बनी रहती है और अंत पढ़कर लगता है , हाँ , यही तो एक इंसान को ज़िन्दगी में चाहिए होता है , हाँ , यही तो प्रेम की पराकाष्ठा होती है जहाँ अपने लिए कुछ चाह नहीं बस प्रेमी के लिए , उसके जीवन के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर देना और फिर भी रिश्ते को कोई नाम न देना यानि ये बताना रिश्ते किसी नाम के मोहताज नहीं होते , जहाँ प्रेम हो , विश्वास हो वहां उन रिश्तों को नाम दो न दो वो अपनी पहचान खुद बन जाते हैं और सबसे बड़ी बात प्रेम करने वाले कब दुनिया की , समाज की परवाह किया करते हैं वो सिर्फ अपने प्रेमी के सुकून में अपना सुकून पाया करते हैं , उसकी मुस्कराहट में खुद मुस्कुराया करते हैं और ऐसे ही प्रेमी युगल थे अनुभा और मनोज जो एक अरसे बाद मिले तो पता चला दोनों को कि ज़िन्दगी कैसे छलती रही और जब उम्र गुजरने पर प्रेम की स्वीकारोक्ति हुई या कहो मिलन हुआ तब जाकर उसने आकार ग्रहण किया तो वो भी चाँद में दाग सरीखा या कहो जब ज़माने की तमाम मुश्किलें हल हो चुकी तब प्रेम की असल परीक्षा शुरू हुई और उस पर खरा उतरने को अनु का त्याग और बलिदान प्रशंसनीय होने के साथ प्रेम की उच्चता को दर्शाता है और शायद यही होती है प्रेम की असली परिभाषा . एक अकथ कहानी प्रेम की जिसका रस ऐसा बस भीगे जाओ , कसमसाए जाओ और हल भी कोई दूजा न मिले . प्रेमी की सेहत और ज़िन्दगी के लिए कभी एक न होने का त्याग आसान नहीं होता वो भी उस मोड़ पर  जब आप अचानक मिले हों और साथ रहने लगे हों फिर भी एक निश्चित दूरी बनाए रखी जाए सिर्फ उसकी सेहत ,उसकी ज़िन्दगी के लिए वर्ना मौत का फरमान तो हर वक्त उसके संग संग डोला करता है क्या कहेंगे ऐसे प्रेम को जहाँ अनिश्चितता के बादल हर पल मंडरा रहे हों और प्रेमी उन्ही बादलों के मध्य घूँट घूँट प्रेम की मदिरा पी रहे हों ,प्रेम रस में भीग रहे हों मगर फिर छलक न रहे हों ...... प्रेम त्याग समर्पण का अद्भुत चित्रण है कड़ी धूप का सफ़र जिसमे शीतल छाँव भी प्रेम है और कड़ी धूप भी ............एक फासलों से गुजरती आहट संग उम्र का सफ़र तय करना ही नियति बन गयी हो मगर फिर भी कोई प्यास न हो , हर प्यास बुझ गयी हो और क्या होगी प्रेम की इससे बेहतर परिणति . हाँ , यही है प्रेम कड़ी धूप में शीतल छाया सा , प्यास के आलिंगन में पूर्ण तृप्त सा , एक मीठे अहसास में एक कसक बन समाया सा और जब ऐसे अहसास समाये हों तो जरूरत नहीं होती किसी शिल्प या बिम्ब की न ही भाषा के सौन्दर्य की , एक प्रवाहमयी शैली ही काफी होती है और लिखा जा सकता है इस तरह भी प्रेमग्रंथ . 

मुकेश जी ने ये उपन्यास अपनी बीमारी के दौरान लिखा जब वो अस्पताल में थे तब तीन उपन्यास लिखे जिनमे से ये पहला मैंने कल ही पढ़ा और पढ़कर कहीं से नहीं लगा कि पहला होगा . जाने कौन सी शक्ति से संचालित हुए जो अस्पताल के माहौल में बैठकर तीन उपन्यास लिख दिए वर्ना तो इंसान बीमारी से ही परेशान रहता है ,शायद थी कोई अन्दर एक कसक जो उस समय मुखरित हो उठी और मुकेश जी उसे कलमबद्ध करने को मजबूर हो गए . मुझे पढ़कर जैसा लगा वैसा मैंने अपनी पाठकीय दृष्टि से लिख दिया .मुकेश जी को उपन्यास के लिए ढेरों बधाइयाँ और आगे के लिए शुभकामनाएं उनकी लेखन यात्रा निर्बाध गति से चलती रहे .