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सोमवार, 28 मार्च 2016

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी की नज़र से 'अँधेरे का मध्य बिंदु'

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी की नज़र से मेरे पहले उपन्यास 'अँधेरे का मध्य बिंदु' की समीक्षा विमर्श के नए आयाम खोलती हुई एक समीक्षक की दृष्टि का व्यापक कैनवस है जिसे इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है . 

http://pustakvimarsh.blogspot.in/2016/03/blog-post.html

स्नेह-विश्वास के पारम्परिक आधार पर लिव-इन का निर्माण


स्त्री-पुरुष सम्बन्ध किसी कृति के केंद्र में हों तो उसमें स्वतः ही अनेक विमर्श जन्म लेने लगते हैं और यदि उस कृति में लिव-इन रिलेशन जैसी अवधारणा हो तो संभावनाओं के कई-कई आयामों को तलाशा जाने लगता है. अपनी पहली औपन्यासिक कृति अँधेरे का मध्य बिंदु में वंदना गुप्ता ने ऐसे विषय को चुना जो पश्चिम सभ्यता-संस्कृति के कारण उन्मुक्त संबंधों, रिश्तों की वकालत करता है. पश्चिम आयातित इस सम्बन्ध ने भारतीय समाज में भी अपनी जड़ों को फैलाना शुरू कर दिया है, बावजूद इसके भारतीय समाज में इसे सहजता से स्वीकार नहीं किया जा रहा है. इसके पीछे लिव-इन रिलेशन में उन्मुक्त संबंधों का निर्माण, पश्चिमी यौन-संस्कृति का अनुपालन, गैर-जिम्मेवारी का भाव पैदा होना, रिश्तों के नामकरण से दूर महज शारीरिक सुखों का उपभोग करना आदि माना जा रहा है. यद्यपि पारिवारिक सहमति से निर्मित विवाह संस्था का स्वरूप वर्तमान युवा-वर्ग ने प्रेम-विवाह के द्वारा बहुत हद तक परिवर्तित किया है तथापि लिव-इन रिलेशन के द्वारा वे विवाह स्वरूप को खंडित कर पायेंगे, कहना मुश्किल प्रतीत होता है.
लिव-इन रिलेशन के प्रति समाज की सोच को जानते हुए भी वंदना जी ने अपनी पहली ही कृति में इस विषय पर कलम चलाई, इसे अवश्य ही प्रशंसनीय कहा जा सकता है. उपन्यास की कथा एक आदर्शात्मक स्थिति में ही गतिमान रहते हुए इस संबंध के सुखद अंत को परिभाषित करके ही रुकी. इसे संभवतः लेखिका का वो भय कहा जा सकता है जो उनकी स्वीकारोक्ति लिव-इन संबंधों की घोर विरोधी होते हुए भी जाने क्यों कलम ने यही विषय चुना. शायद यही मेरी सबसे बड़ी परीक्षा थी, जिन संबंधों को मैं कभी स्वीकार नहीं कर सकती उसी पर कलम चलाई जाए जो आसान कार्य नहीं था. में परिलक्षित होता है. कथा नायक रवि और कथा नायिका शीना के संबंधों का, रिश्तों का निरंतर सुखमय रूप से चलते रहना, उनके आपसी स्नेह, विश्वास, समन्वय, सहयोग का बने रहना किसी अन्य दूसरे लिव-इन रिलेशन रिलेशन की सफलता की गारंटी नहीं माना जा सकता है. जिस विश्वास, रिश्ते की गरिमा, अपनेपन, सहयोग की भावना का विकास इन दोनों के अनाम रिश्ते में दिखाया गया है, वो किसी भी सम्बन्ध की सफलता होते हैं. संभवतः लेखिका के मन-मष्तिष्क में खुद के इस सम्बन्ध के विरोधी होने का प्रतिबिम्ब बना हुआ था और इसी कारण से जाने-अनजाने वे लिव-इन रिलेशन की कमियों, दोषों को प्रदर्शित करने से बचती रहीं हैं. एकाधिक जगहों पर जहाँ भी ऐसा अवसर आया वहाँ अपनी मौलिकता से लेखिका ने उन्हें उभरने का अवसर नहीं दिया. ऐसे अवसरों के अलावा उपन्यास की कथा में अन्य दूसरे वैवाहिक संबंधों को कटुता, अहंकार, झगड़े, अविश्वास से भरे दिखाये जाने के पीछे लिव-इन रिलेशन को सफलता और वैवाहिक संबंधों को असफलता की तरफ ले जाने वाला समझ आता है. सदियों से चली आ रही विवाह संस्था में समय के साथ कई-कई विसंगतियाँ देखने को अवश्य मिली हैं किन्तु इसके बाद भी न केवल भारतीय समाज में वरन विदेशी समाज में भी वैवाहिक संबंधों को सहज मान्यता प्राप्त है. ऐसे समाजों में बहुतायत दंपत्ति ऐसे हैं जो ठीक उसी तरह का जीवन-निर्वहन करते हुए अनुकरणीय बने हैं जैसे कि रवि और शीना बने.
कथा के बीच वंदना जी ने एकाधिक अवसरों पर जानकरी देने का अनुकरणीय कार्य किया है. भले ही कई पाठकों को कहानी में मध्य में समाजोपयोगी तथ्यों का आना बोझिल अथवा अनुपयोगी जान पड़े किन्तु समालोचना की दृष्टि से इसमें और विस्तार की सम्भावना दिखती है. रवि शीना के संबंधों के आरम्भ में परिवार नियोजन की चर्चा, शीना के एचआईवी संक्रमित हो जाने पर चिकित्सकीय परामर्श, आदिवासी परम्परा का उल्लेख, कतिपय असफल लिव-इन संबंधों की चर्चा आदि को इस रूप में देखा जा सकता है. इसके अलावा वंदना जी की लेखनी की प्रशंसा इस रूप में भी की जानी चाहिए कि लिव-इन रिलेशन जैसा विषय चुनने के बाद भी वे रवि शीना के संबंधों का अत्यंत शालीनता के साथ उत्तरोत्तर विकास करती रही हैं. उनके पास इन संबंधों के नाम पर उन्मुक्तता, शारीरिक संसर्ग, मौज-मस्ती आदि के प्रस्तुतीकरण का विस्तृत कैनवास था किन्तु इसके उलट उनकी संतुलित लेखनी का परिचय मिला है. परंपरागत भारतीय समाज इन संबंधों को किस रूप में स्वीकारेगा, आधुनिकता में रचा-बसा युवा-वर्ग इसका विस्तार किस तरह करेगा, जिम्मेवारी से मुक्त इस सम्बन्ध में जिम्मेवारी का कितना भाव जागृत होगा ये तो भविष्य के गर्भ में छिपा है. वर्तमान में जिस तरह से विवाह संस्था में विसंगतियाँ देखने को मिल रही हैं, कुछ हद तक ऐसा ही लिव-इन रिलेशन में भी हो रहा है. यदि इन संबंधों में सब कुछ सामान्य अथवा अनुकरणीय होता तो लिव-इन संबंधों के बहुतायत मामलों में पुलिसिया कार्यवाही न हो रही होती. 
भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, उसे भविष्य पर छोड़ते हुए वंदना जी की कलम की, उनके विषय चयन की, भाषा की सरलता की, कथ्य की सहजता की, कथा गतिशीलता की, शाब्दिक चयन की, प्रस्तुतीकरण की सराहना करनी ही पड़ेगी. कृति की सफलता इसी में है कि या तो वो समुचित, सकारात्मक समाधान प्रस्तुत करे अथवा संभावनाओं के, विमर्श के नए द्वार खोले. अंत में लालित्य जी के अनुसार सबको पसंद आने वाले वाक्य तुम्हें फोल्ड कर के  अपनी पॉकेट में रख लूँ जहाँ-जहाँ जाऊँ वहाँ-वहाँ तुम मेरे साथ हो. को रवि शीना संबंधों के सापेक्ष प्रेमपरक कहा जा सकता है, इसकी प्रेम तासीर में मदहोश हुआ जा सकता है. इसके ठीक उलट यदि इसी वाक्य को स्त्री-विमर्श के, पति-पत्नी के संबंधों के नजरिये से देखा जाये तो स्त्री के प्रति गुलाम मानसिकता को, पुरुष द्वारा उसे अपनी जेब में रखे रहने को परिलक्षित करने लगता है. सहमतिपूर्ण वैवाहिक सम्बन्ध, प्रेम-विवाह, लिव-इन रिलेशन आदि कुछ इसी तरह के नजरिये को समेटे समाज में विचरण कर रहे हैं, जो आपसी प्रेम, स्नेह, सहयोग, समन्वय, विश्वास के आधार पर सफल, असफल सिद्ध हो रहे हैं.
समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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कृति : अँधेरे का मध्य बिंदु (उपन्यास)
लेखिका : वन्दना गुप्ता
प्रकाशक : एपीएन पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली
संस्करण : प्रथम, 2016
ISBN : 978-93-85296-25-3
 


सोमवार, 21 मार्च 2016

न बाँची गयी कविता

स्त्री होने से पहले और स्त्री होने के बाद भी 
बचती है एक अदद कविता मुझमे 

अब बाँचनी है वो कविता 
जिसमे मैं कहीं न होऊँ 
फिर भी मिल जाऊँ 
पेड़ों की छालों पर ,
गली के नुक्कड़ पर 
ख्वाब के डैने पर 
साँझ की पायल में 
सुबह की झंकार में 
एक राग पूरब से पश्चिम तक के सफर का बनकर 
एक संगीत का अबूझा स्वर बनकर 
खुले केशों पर गिरती शबनम बनकर 
किसी आस की थिरकन बनकर 
नृत्य गायन और वादन के 
सभी नियमों में ढलकर 
चन्दन के पालने में झूलते शिशु की लोरी बनकर 
आल्हाद का आखिरी स्वर बनकर 
रेशम के कीड़े का रेशा बनकर 
किसी किशोरी की जीभ का चटकारा बनकर
क्या संभव होगा 
मेरे न होने में मेरा होना 
और एक न बाँची गयी कविता का पढ़ा जाना बिना शब्दों के …… 

गुरुवार, 10 मार्च 2016

चीखो चीखो चीखो

आओ चलो
गढ़ें एक चीखों का संविधान
कि 
चीखें  अप्रासंगिक तो नहीं
बना डालें चीखों को ज़िदों का पर्याय
ये समय है
चीखों की अंतरात्मा को कुरेदने का
एक दुर्दांत समय  के साक्षी बनने  बेहतर है
चीखो चीखो चीखो
कि
 जिन आवाज़ों में दम होता है
वो ही पहुँचती हैं अर्श तक
आज मेरी चीख तेरी चीख से तेज कैसे की प्रतियोगिता नहीं
आज जितनी तेज चीख
उतना साष्टांग दंडवत करने  का नियम है
तो फिर करो एक जिद खुद से
चीखना महज क्रिया या प्रतिक्रिया नहीं
चीखना जरूरत है
मेरी तुम्हारी
इसकी उसकी
चीखना बिना मोल भाव की रंगोली है
एक घड़घड़ाहट ही काफी है बादलों को छाँटने को ..

 


रविवार, 6 मार्च 2016

डार्क हॉर्स पर मेरी नज़र

 चार दिन पहले सोचा अब कुछ पढ़ा नहीं जा सकेगा यदि पढ़ा भी तो लिखा नहीं जा सकेगा लेकिन मेरी सोच फेल हो गयी जब #डार्कहॉर्स शुरू की . सहज प्रवाहमयी शैली ने ऐसा समां बाँधा कि आधा पहले दिन पढ़ा तो रात को सोते समय एक बेचैनी घेरे रही और अगले दिन उसे पूरा पढने के बाद भी ख़त्म नहीं हुई जब तक कि जो मन में घटित हो रहा था उसे लिख नहीं लिया . क्या कहा जाए इसे ? क्या ये लेखन की सफलता नहीं ? आज का युवा जो लिख रहा है वो पढ़ा जाना भी उतना ही जरूरी है जितना वरिष्ठों को . एक साल में उपन्यास के चार संस्करण आ गए . कुछ तो बात होगी ही और फिर जिस तरह उपन्यास की समीक्षा आ रही थीं या पाठकीय टीप उससे लग रहा था , एक बार इस घोड़े पर दांव खेल ही लिया जाए और #बुकफेयर में पहले दिन लेखक नहीं मिल सके तो बुक भी नहीं खरीदी . दोबारा जब गयी तब मिले तो उस दिन खरीदी और लेखक के साथ एक तस्वीर खिंचवाने का भी आनंद लिया . उस दिन मैंने कहा था कि पहले जो किताबें भेंट में मिली हैं उन पर लिख दूँ उसके बाद मेरी मर्ज़ी लेकिन यहाँ मेरी मर्ज़ी नहीं चली . चली तो लेखन की मर्ज़ी जिसने खुद को पढवा भी लिया और लिखवा भी लिया जबकि भेंट में मिली पुस्तक अभी लाइन में हैं .शायद यही होती है लेखन की सफलता .जाने कितने चेतन भगत वक्त के गर्भ में छुपे हैं जरूरी है तो उनका सही मूल्याँकन. तो प्रस्तुत है मेरा नजरिया :

शब्दारम्भ प्रकाशन से प्रकाशित उपन्यास ‘डार्क हॉर्स’ नीलोत्पल मृणाल का पहला उपन्यास है तो प्रकाशन का भी .

एक युवा का लेखन के क्षेत्र में आगमन स्वागत योग्य है क्योंकि पहला ही उपन्यास इतनी प्रसिद्धि पा रहा है ....आखिर क्यों ? ये सोचने का विषय हो सकता है . आखिर क्या है इसकी विषय वस्तु जबकि नाम अंग्रेजी का है . ‘डार्क हॉर्स .... एक अनकही दास्ताँ’ .......सच ही कहा है लेखक ने . ये एक अनकही दास्ताँ ही है . साहित्य समाज का दर्पण होता है ........अक्सर कहा जाता है और लेखक ने वो ही तो किया है उस क्षेत्र को छुआ है जिस पर अभी तक किसी ने लिखा ही नहीं , किसी की दृष्टि पड़ी ही नहीं . उस पर भी लेखक का ये कहना ,’इसमें कितना साहित्य है और एक ज़िन्दगी की सच्ची कहानी कितनी है ‘ सोचने को मजबूर करता है कि आखिर साहित्य को जब समाज का दर्पण कहा गया है तो समाज सिर्फ किन्ही गिने चुने क्षेत्रों से तो नहीं बनता न . समाज का हर क्षेत्र उस दायरे में आता है . जरूरी नहीं कि सिर्फ दलित , आदिवासी ,किसान, प्रेम या स्त्री विषयक विषय ही साहित्य के क्षेत्र में आते हों . अपने वक्त में जो भी लिखा गया वो उस वक्त की तस्वीर होता है और उसी से उस दौर का आकलन . ये तभी संभव है जब उस वक्त की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत की जाए और सच्ची तस्वीर तभी बनेगी जब उस समय के हर पहलू , हर क्षेत्र पर दृष्टिपात किया जाये , तभी उस वक्त का साहित्य उस समाज का वास्तविक दर्पण बनेगा और ऐसा ही इस उपन्यास के लेखक ने किया है . यदि आज किसी भी लेखन को सिर्फ इसलिए खारिज कर दिया जाए कि उसमे शुद्ध परिष्कृत भाषा नहीं तो ये उस समाज का दर्पण कभी नहीं हो सकता . ये तो ऐसा हुआ जैसे श्रृंगार युक्त नववधू लेकिन असलियत तो श्रृंगार रहित होने पर सामने आती ही है न तो क्यों नहीं बिना अलंकृत किये जो जैसा है वैसा ही स्वीकारा जाए क्योंकि आडम्बर सर्वग्राह्य नहीं होता और जब इस वक्त का आकलन हो तो सत्य सामने होना जरूरी है .फिर इस उपन्यास में ऐसा कुछ नहीं है जिसे साहित्य से विलग किया जाए . भाषाई चमत्कार ही साहित्य नहीं होता आज के आलोचकों, पाठकों और वरिष्ठ साहित्यकारों सभी को ये समझना चाहिए .

आज के बदलते परिवेश और तकनीक के इतना फ़ास्ट होने के कारण हर क्षेत्र में प्रतिद्वंदिता इतनी बढ़ गयी है कि आज का युवा समझ भी नहीं पाता उसके लिए क्या सही है और क्या गलत . लेखक ने इस उपन्यास ने भोगे हुए यथार्थ के साथ अनुभव को भी आत्मसात किया है और उस सच्चाई को प्रस्तुत किया है जो देखने में तो बहुत सुन्दर लगती है और हर कोई चाहता है उसका बेटा हो या बेटी वो आई ए एस बने लेकिन उस ख्वाब को पूरा करने में किन बीहड़ों से आज का युवा गुजरता है उसका मानो जीवंत चित्रण लेखक ने किया है . पढ़ते हुए पाठक को लगता है अरे हाँ , इस पात्र को तो जैसे मैं जानता हूँ . एक चलचित्र सा सामने खींचता चला जाता है . कैसे दूर दराज के क्षेत्रों में नौकरी के ज्यादा संसाधन न होने के कारण युवा हो या उसके घरवाले सिर्फ एक ही सपना देखते हैं किसी तरह उनका बच्चा कलेक्टर बन जाए फिर उनकी कई पीढियां तर जाएँगी और इसी विश्वास पर वो अपने जीवन के स्वर्णिम पल दांव पर लगा देते हैं बिना जाने इस हकीकत को कि बहुत कठिन है डगर पनघट की .

बहुत आसान है सीधे ग्रेजुएशन कर आई ए एस की तैयारी करना लेकिन उस लक्ष्य को प्राप्त करना एक दुरूह काँटों भरी डगर है . लेखक ने उपन्यास में मुख्य किरदारों में रायसाहब , मनोहर , गुरु और संतोष को रखा और इन्ही के माध्यम से कहानी आगे बढाई . सभी किरदार यू पी , बिहार आदि क्षेत्रों से हैं . एक सपना पाले कि बस दिल्ली के मुख़र्जी नगर से यदि कोचिंग कर ली तो कलेक्टर बनना तय है और इसी विश्वास के सहारे सभी दिल्ली आते हैं और घर वाले हों या गाँव वाले सभी को ये आस हो जाती है कि ये तो पक्का कलेक्टर बन कर ही रहेगा . मगर बाहर से आने वाला जब अपने सपने की दुनिया से हकीकत की दुनिया में कदम रखता है तब उसका ज़िन्दगी की खट्टी मीठी हकीकतों से सामना होता है और पता चला है यथार्थ का धरातल कितना उथला है .

मुख़र्जी नगर देश में विख्यात एक ऐसी जगह है जहाँ सपने सच करने का विश्वास पूरे देश में कायम है और इसी वजह से दूर दराज से बच्चे वहां आते हैं मगर आने के बाद सबसे पहले रहने के लिए जब किराए पर जगह देखते हैं तो ऐसी हकीकत सामने आती है जो गले से नीचे नहीं उतरती लेकिन उतारनी पड़ती है . गाँव से जो आता है वो एक खुले वातावरण से आता है जहाँ खुला घर होता है लेकिन यहाँ उसे सिर्फ २५ गज में कमरा, बाथरूम और किचन मिलता है जहाँ उस के कोमल मन पर पहली दरार पड़ती है लेकिन कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है या कहिये कुछ पाने के लिए समझौता तो करना ही पड़ेगा और वो करता है . इस दृश्य का इतना सटीक वर्णन लेखक ने किया है कि पढ़ते हुए पाठक को आँखों के आगे घटित होता जान पड़ता है .

इसके बाद आती है कोचिंग की बारी . मुख़र्जी नगर जो कोचिंग इंस्टिट्यूट का हब है वहां जब कोई नया नया आता है तो उसे नहीं पता होता कौन सा बेस्ट है और कम से कम २ साल तो वो इंस्टिट्यूट बदलने में ही बर्बाद कर देता है क्योंकि जहाँ जाता है वहीँ हर इंस्टिट्यूट खुद को बेस्ट बताने में माहिर होता है तो दूसरी तरफ मुर्गा फंसाने में भी और इसके लिए वो हर तरीका अपनाते हैं कैसे प्रलोभन दिया जाये जो मुर्गा फंस जाए और अक्सर ऐसा ही होता है . यहाँ तक कि यदि आपका कोई जानकार वहां पहले से हो तो भी सही गाइड नहीं कर पाते और आप उस मकडजाल में फंस जाते हैं .और अंत में जब आपका कीमती वक्त हाथ से निकल जाता है तब आपको समझ आता है कि पहला कदम ही सोच समझ कर पूरी जानकारी के साथ उठाना चाहिए .

अगली बात आती है संग साथ की . क्योंकि वहां सब बाहर से आये होते हैं तो यूँ कोई किसी को नहीं जानता लेकिन सब इतने आत्मीय हो जाते हैं कि लगता ही नहीं कि पहली बार मिले हों . नए आने वाले के रहने खाने आदि के सब इंतजाम सब मिलजुल कर ऐसे करते हैं कि आने वाला खुद पर फक्र करने लगता है . वहीँ इस तरह रहने वाले बच्चे धीरे धीरे सही गलत सोहबत में भी पड़ जाते हैं जो समझदार होते हैं वो खुद को संभाल लेते हैं और जो यहाँ की रंगीनियों से प्रभावित हो जाते हैं वो फिर कहीं के नहीं रहते बल्कि उनका करियर भी प्रभावित हो जाता है और लक्ष्य भी . इस उपन्यास के माध्यम से मानो लेखक बिना कहे बहुत कुछ कह रहा है और पाठक के विवेक पर छोड़ रहा है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं . और यही बात उसने अंत में सिद्ध भी की लेकिन अपनी तरफ से एक शब्द नहीं कहा और जो नहीं कहा वो ही इस उपन्यास की मुख्य ध्वनि है क्योंकि जब किसी का सिलेक्शन नहीं होता तो वो अपने को दोष नहीं देता कि खुद को कहाँ कमी रही बल्कि वो भाग्य को दोष देने लगता है कि सही कहते हैं लोग कि मेहनत के साथ भाग्य का होना भी जरूरी है और इसी आधार पर कई ख़ारिज हो जाते हैं और उनके अटेम्प्ट जब ख़त्म हो जाते हैं तो बिलबिलाते पंछी की भाँती वो भाग्य को कोसते चले जाते हैं वहीँ कुछ भाग्य से ज्यादा खुद पर भरोसा रखते हैं और आत्मविश्लेषण करते हैं कि कहाँ क्या गलती हुई या कहाँ क्या कमी हुई और फिर वो उन कमियों और गलतियों से सबक लेकर जब अगली बार जुटते हैं तो लक्ष्य हासिल करके ही रहते हैं . जिनसे कोई उम्मीद नहीं होती कि ये लक्ष्य प्राप्त कर भी सकेगा कभी वो ही बाजी मार जाते हैं और ‘डार्क हॉर्स’ कहलाते हैं जबकि जो बडबोले होते हैं या ज्यादा जानकार होते हैं , जिनकी हर चीज पर अच्छी पकड़ होती है और जिनके हर शब्द से सामने वाला प्रभावित हो जाता हो , कई बार वो ही लोग मात खा जाते हैं . मानो लेखक ने उपन्यास के माध्यम से यही संकेत देने की कोशिश की है ... हर किसी को अपना हंड्रेड परसेंट देना चाहिए यानि अपने कर्म को पूरी ताकत झोंक कर करना चाहिए फिर सफलता आपके कदम जरूर चूमेगी इसमें कोई शक नहीं . वहीँ असफल विद्यार्थी कैसे भाग्य के साथ ज्योतिष आदि में विश्वास कर अपना मन उस तरफ से फेर लेते हैं और दूसरी राह चुन लेते हैं लेकिन उस सब में उनके जीवन के कीमती साल बर्बाद हो जाते हैं .

इसके साथ लेखक ने अन्य पहलुओं पर भी दृष्टिपात किया है जैसे कैसे कोई कर्ज लेकर बच्चे को पढने भेजता है तो कोई किसान का बेटा है तो किसी के यहाँ कोई कमी भी नहीं तो उसी के सहारे वो आखिरी अटेम्प्ट तक कोशिश करता है और जब माता पिता कर्ज के नीचे दबने लगते हैं और अपनी सहायता न देने पर विवश हो जाते हैं तो उसे वापसी कूच करना पड़ता है . वही आज जब इन हालातों का जब बच्चों को पता होता है तो उन्हें चाहिए थोड़ी किफ़ायत से पैसे का प्रयोग करें लेकिन शुरू में सब हरा ही हरा दीखता है तो उन्हें पैसे की कद्र नहीं होती और आपसी दोस्ती और पार्टी आदि में काफी खर्च कर देते हैं यहाँ तक की इंस्टिट्यूट में भी पूरी फीस भर देते हैं जबकि कुछ समझदार पहले वहां डेमो क्लास लेकर देखते हैं और ठीक समझते हैं तभी एडमिशन लेते हैं . इसी तरह लड़कियों का जीवन में आने पर क्या प्रभाव पड़ता है उसका भी साथ में दिग्दर्शन कराया है कोई बहक जाता है , कोई संभल जाता है तो कोई बेवक़ूफ़ क्योंकि नए नए आते होते हैं कुछ पता नहीं होता जो जरा सा हंस कर बात कर ले उसे ही दिल दे बैठते हैं जबकि कुछ लड़कियां अपने काम में माहिर होती हैं , कैसे किस्से काम निकलवाना है वो जानती हैं . इसी तरह शराब सिगरेट नॉन वेज आदि का प्रयोग कैसे युवा को अपनी गिरफ्त में लेता है क्योंकि वहां कोई अंकुश नहीं होता ऊपर से नयी दोस्ती , एक खुला माहौल जो उन्हें अपने लक्ष्य से भटकाने को काफी होता है . जाने कितनी ही ऐसी विसंगतियां हैं जिन पर लेखक ने प्रकाश डाला है लेकिन अपनी तरफ से एक शब्द नहीं कहा , सब पाठक के विवेक पर छोड़ दिया कि उसे तय करना है क्या सही है और क्या गलत . वहीँ जो बाहर से आकर दिल्ली में रहते हैं तो उनके घर के चाचा मामा आदि को यूं लगता है जैसे उनकी लाटरी लग गयी और जब चाहे मुंह उठाये कभी बीमारी के कारण तो कभी दिल्ली भ्रमण के आशय से आ जाते हैं और उम्मीद करते हैं कि अब उनके आशय को पूरा करना उन बच्चों का दायित्व है और वो बेचारे लिहाज के कारण वो सब करने को विवश होते हैं . उपन्यास में बेशक उन पात्रों को फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वो अपना ज्यादातर समय वैसे भी कौन सा पढने पर लगाते थे लेकिन सोचने वाली बात है जो दिन रात सिर्फ पढ़ाई में लगे हों वहां उनका एक एक मिनट कीमती होता है ऐसे में यदि कोई रिश्तेदार ऐसे आ जाए और उसकी खातिरदारी में उसे अपना कीमती वक्त जाया करना पड़े तो क्या उसकी परफॉरमेंस पर असर नहीं पड़ेगा ....... मानो ये किस्सा देकर लेखक ने उसी विसंगति पर प्रहार किया है .

इसी तरह एक सत्य और कहलवाया पात्र मनमोहिनी के माध्यम से कि ये सच है यहाँ सब कलेक्टर बन्ने आते हैं लेकिन हमें पता होता है कि सौ में से दस ही सलेक्ट होंगे बाकी सब गधे ही होते हैं पर सबको घोडा कहना होता है . यानि ये एक ऐसा धोखा होता है जिसकी खूबसूरती से ही सब धोखा खाते हैं और फिर भी वहीँ एडमिशन लेते हैं और इसी तरह उनका धंधा फलता फूलता रहता है जबकि सच्चाई सिर्फ इतनी होती है कि अपनी लगन और मेहनत ही सफलता की गारंटी होते हैं न कि कोचिंग सेंटर . वो तो कोरे वाणिज्यिक संस्थान होते हैं . जो कलेक्टर नहीं बन पाया वो टीचर बन गया और वहीँ पढ़ाने लगा और बताने लगा मेरा तो सिलेक्शन हो गया था लेकिन वो मैंने छोड़ दिया क्योंकि मुझे उससे ज्यादा सुकून यहाँ मिलता है या मेरा लक्ष्य इतने हजार छात्रों को कलेक्टर बनाने का है और विद्यार्थी उनकी इन बातों में आ जाते हैं जबकि वो वहां अपना साइड बिज़नस कर रहे होते हैं जैसे साथ में अपनी लिखी किताब बेचना या टिफ़िन आदि पहुंचाना . सब एक ऐसा दृष्टिभ्रम बन उभरता है कि जब हकीकत का आभास होता है तो खुद को लुटा हुआ ही पता है एक विद्यार्थी .
वहीँ यदि कोई सफल हो जाता है तो कैसे उसकी सफलता उसकी ही नहीं उसके घरवालों की भी तकदीर बदलने लगती है ये विमेलेंदु के उदाहरण से प्रस्तुत किया . तो जिसने यहाँ की सच्चाई जान ली वो चुपचाप कैसे अपने भविष्य का निर्माण करता है वो संतोष के माध्यम से प्रस्तुत किया .

अब यदि भाषा को देखा जाए तो लेखक ने वहां भी जो जहाँ का था उसी की भाषा का प्रयोग किया ख़ास तौर से भोजपुरी भाषा और बोली के प्रयोग ने उपन्यास को सम्पूर्णता प्रदान की वहीँ एक जगह अंग्रेजी और हिंदी भाषा के मध्य खिंची रेखा को भी बखूबी रेखांकित किया ये बताने को कि इंसान की ज़िन्दगी में किस भाषा का क्या महत्त्व होना चाहिए . जो यही दर्शाता है संभावनाओं की फसल बखूबी लहराएगी यदि लेखक को उचित प्रोत्साहन मिले . आज के युवा को एक सही मार्गदर्शन आज के समय को परिभाषित करने में ही सहयोग करेगा क्योंकि आज का युवा क्या चाहता है , क्या सोचता है ये सिर्फ वो ही बता सकता है और उसके लिए जरूरी है साहित्य को खांचों में न बांटा जाए बल्कि एक खुला आकाश सबको दिया जाए ताकि हर कोई अपनी उन्मुक्त उड़ान भर सके .

लेखक ने अनेक पहलुओं को छुआ और इतनी सादगी से छुआ कि पाठक का अन्तरंग भीगता रहा लेकिन वो पता भी नहीं चला कि लेखक आखिर कहना क्या चाहता है जबकि लेखक बिना कहे भी सब कह गया . यही होती है एक सफल लेखन की निशानी जहाँ क्या और कितना कहना है के फर्क का लेखक को पता हो . लेखक का पहला उपन्यास है जो वास्तव में एक आईना है उस सच्चाई का जिससे अक्सर महरूम ही रहता है पाठक .

आज के हर युवा को ये उपन्यास पढना चाहिए यदि वो खुद को ऐसे किसी ओहदे पर देखना चाहता है तो कम से कम उस राह की विसंगतियों से तो वाकिफ होना जरूरी है और यही लेखक के लेखन का मकसद है .


ये उपन्यास हर युवा पढ़े इसके लिए जरूरी है इसका अंग्रेजी भाषा में भी अनुवाद हो क्योंकि आज का युवा ज्यादातर अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल करता है तो वहीँ मैं तो चाहूंगी भोजपुरी में भी अनुवाद हो ताकि जहाँ से सबसे ज्यादा युवा एक ख्वाब देखकर मुख़र्जी नगर या अन्य कोई चाहत पाले आता है तो उस तक अच्छइयां और बुराइयां दोनों पहुंचें और वो सटीक निर्णय ले सके .
लेखक अनेकानेक बधाइयों और शुभकामनाओं का पात्र है जो उसने एक ऐसा उपन्यास लिख जाने कितनी भ्रांतियों पर से पर्दा उठाया है . उम्मीद है लेखक की आगे भी ऐसी कृतियाँ पाठकों को मिलती रहेंगी जो साहित्य को समृद्ध करने में अपना योगदान देती रहेंगी . एक युवा लेखक के लेखन को सराहना हम सब का दायित्व है क्योंकि इन्ही में देश , समाज और साहित्य का भविष्य छुपा है .

वंदना गुप्ता


मंगलवार, 1 मार्च 2016

कहा है ज्योतिषी ने

मेरे दिल में आज क्या है ... कुछ भी तो नहीं
फिर भी गुफ्तगू जारी है ... किससे ,पता नहीं

अब इस सिलसिले को क्या नाम दूँ ?

एक ठहरा हुआ काफिला
या एक रुकी हुई रिदम
एक साँस साँस बजती शहनाई
या एक नर्तन करती कोई धुन

गुस्ताख दिल की गुस्ताखियाँ
तुम तक पहुँच रही हैं ... जानती हूँ

ये तारों भरी रात ओढने के दिन हैं
जहाँ सब उल्टा पुल्टा है
मेरे दिल की तरह

चलो , मोहब्बत की उलटबांसियों को गले लगा लें
मिलन का ये तरीका शायद तुम्हें रास आ जाए
और
मेरे मन का चिनार
तुम्हारे देवदार तले खिल जाये

मैं नहीं कहूँगी
देख लो आज हमको जी भर के
क्योंकि
मुझे चाहिए मोहब्बत का सारा आकाश मेरी हथेली पर

कहा है ज्योतिषी ने
मेरे हाथ में मोहब्बत की रेखा अनंत है ..........

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

असुरक्षा की भावना

हम खुद कुछ कर नहीं सकते
करना आता जो नहीं
मगर यकीन जानिये
जोड़ तोड़ में माहिर हैं
इसकी टोपी उसके सिर
करना हमारी पुरानी फितरत है

सत्ता परिवर्तन हो या निष्कासन
बाएं हाथ का खेल है हमारे लिए
माहिर हैं हम शतरंजी चालों में
जब भी कोई पैदल चलने की कोशिश करे
अपनी ढाई चालों से कर धराशायी
जीत ही लेते हैं बाजी

हम आत्ममुग्ध वर्णसंकर प्रजाति हैं
जो अपने रूप सौन्दर्य से कभी
बाहर ही नहीं आ पाते
तो भला कैसे जाने दुनिया का सौदर्य

हमें चाहिए सुरक्षित ठिकाने
इसीलिए
असुरक्षा की भावना से ग्रस्त हम
कभी नहीं लांघ पाए सफलता के पहाड़

चलिए कीजिये हमारी जय जयकार
यूँ कि
आज के वक्त की आवाज़ है ये 
 
तीलियों को मिटटी के तेल में डुबाकर ही आग लगाने का चलन है आजकल




बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

न देशभक्त न देशद्रोही

चलिए देशभक्ति शब्द को फांसी दे दें
या कर दें बनवासी
और देशद्रोह शब्द को आदर सम्मान दे दें
शायद आज इन शब्दों की बस इतनी सी है पहचान

वो और वक्त था
जब देशभक्ति एक जज़्बा हुआ करता था
ये और वक्त है
जब देशद्रोह एक जज़्बा हुआ करता है 
 
फूट डालो और शासन करो 
की कभी बिसात बिछायी जाती थी 
क्या ऐसा नहीं लगता 
एक बार फिर वो ही चक्रव्यूह रचा गया 
देशद्रोह और देशभक्ति के मध्य खड़ा किया गया

क्या हुआ है
देश बदला या समय या सोच
जरा सोचिये
कुछ भी कहने या करने से पहले
उत्तर तुम स्वयं जानते हो
फिर भी
अपने ही देश को धिक्कारते हो

न ,न , नहीं कहूँगी कुछ भी तुम्हें
न देशभक्त न देशद्रोही
बस तुम खुद का खुद आकलन कर लेना
देशभक्ति और देशद्रोह शब्दों की
थोड़ी व्याख्या कर लेना
अंतर जब समझ जाओ
देश के प्रति कुछ नतमस्तक हो लेना

मेरा देश तुम्हें माफ़ कर देगा ...........जानती हूँ बहुत सहिष्णु है ये

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

कैसे करूँ नमन ?




शहीदों को नमन किया
श्रद्धांजलि अर्पित की
और हो गया कर्तव्य पूरा


ए मेरे देशवासियों
किस हाल में है मेरे घर के वासी
कभी जाकर पूछना हाल उनका


बेटे की आंखों में ठहरे इंतज़ार को
एक बार कुरेदना तो सही
सावन की बरसात तो ठहर भी जाती है
मगर इस बरसात का बाँध कहाँ बाँधोगे
कभी बिटिया के सपनो में झांकना तो सही
उसके ख्वाबों के बिखरने का दर्द
एक बार उठाना तो सही
कुचले हुए
अरमानों की क्षत-विक्षत लाश के
बोझ को कैसे संभालोगे?


कभी माँ के आँचल को हिलाना तो सही
दर्द के टुकड़ों को न समेट पाओगे
पिता के सीने में जलते
अरमानो की चिता में
तुम भी झुलस जाओगे


कभी मेरी बेवा के
चेहरे को ताकना तो सही
बर्फ से ज़र्द चेहरे को
एक बार पढ़ना तो सही
सूनी मांग में ठहरे पतझड़ को
एक बार देखना तो सही
होठों पर ठहरी ख़ामोशी को
एक बार तोड़ने की कोशिश करना तो सही
भावनाओं का सैलाब जो आएगा
सारे तटबंधों को तोड़ता
तुम्हें भी बहा ले जाएगा
तब जानोगे
एक ज़िन्दगी खोने का दर्द


चलो ये भी मत करना
बस तुम कुछ तो जिंदा खुद को कर लेना
मेरी बीवी मेरे बच्चे
मेरी माँ मेरे पिता
सबके चेहरे पर मुस्कान खिल जायेगी
जिस दिन शहादत के सही मायने तुम्हें समझ आयेंगे
और तुम
अपने घर में छुपे गद्दारों से दो - दो हाथ कर पाओगे 


पडोसी मुल्क जिंदाबाद के नारों
और आतंकवादी की मृत्यु के विरोध में
उठती आवाजों से
जिस दिन तुम्हारे कान फट जायेंगे
विद्रोह के बीज के साथ
देशभक्ति के बीज तुम्हारी नस्लों में बुब जायेंगे
मेरी शहादत आकार पा जायेगी
देश की मिटटी देश के काम आयी
सोच , मेरी रूह सही मायनों में
उस दिन सुकून पाएगी 


क्योंकि तुम
तब शायद समझ पाओगे
कर्तव्य सिर्फ़ नमन तक नही होता
सिर्फ़ नमन तक नही होता....

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

पहाड़ भर सपने ... अंजुरी भर प्यार

तुम्हारे
अंजुरी भर प्यार में
मैंने
पहाड़ भर देख डाले सपने

पहाड़
जिन्होंने नहीं सीखा हिलना
अडिग रहना है
जिनकी नियति

अंजुरी
जिसे कभी न कभी
खुलना ही था
हथेली सीधी करते हुए

फिर भी
जानते हुए इस सत्य को
तुम्हारे 

अंजुरी भर प्यार में
मैंने
पहाड़ भर देख डाले सपने

शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

घुलनशील पदार्थ




अपने आने जाने के क्रम में
कितनी ही उठापटक कर लें
मगर हश्र अंततः मिटना ही है
फिर वो कोई भी हो
चिंताएं , ज़िन्दगी या इन्सान

तिल तिल कर जलने से नहीं मिटा करतीं
जबरन चाहतों पर फूल नहीं चढवाये जा सकते
चिंताओं की अनगिनत लकीरों में
उम्र के तकाज़े फीके पड़ने लगते हैं

तमाम पोशीदा राज़ मानो
उघड़ने को आतुर हो उठते हों
मगर
नफीरियों के बजने से ही तो
नहीं होता इल्म बारात का
वक्त की नज़ाकतें ही
तजवीजें उपलब्ध कराती हैं
मुक्ति की

ये एक आत्मघाती हमला है
बचाव का कोई साधन नहीं
फिर भी
जाने क्यों ढोई जाती हैं चिता तक
जबकि जानते हैं सब
घुलनशील पदार्थ सी तो होती हैं चिंताएं

शनिवार, 23 जनवरी 2016

दस्तकें

तुम्हारे आश्वासनों की दहलीज पर
बैठी रही आस मेरी ताकते हुए
दरवाज़ा खुला रखा था मैंने

तुमने नहीं आना था
तुम नहीं आये
और अब
आस की गुलाबी दहलीज पर
सन्नाटों के शहर में
लगी आग से
कौतुहल में मत पड़ना
रिवाज़ है अपने अपने शहर का
रस्मों को जिंदा रखने का

हाँ , रस्म है ये भी
आस के बिलबिलाते पंछी को सांत्वना देने की
कर लो तुम भी दरवाज़ा बंद
कि
पहर पिछले हों या अगले
दस्तकें , बंद दरवाज़ों पर ही हुआ करती हैं

सोमवार, 18 जनवरी 2016

पहला समीक्षा संग्रह

मित्रों
१२ जनवरी २०१६ को विश्व पुस्तक मेले में लेखक मंच पर मेरे द्वारा लिखे ‪#‎पहलेसमीक्षासंग्रह‬ ' सुधा ओम ढींगरा : रचनात्मकता की दिशाएं ' का पुस्तक मेले में विमोचन हुआ जो शिवना प्रकाशन से प्रकाशित है . उस अवसर की कुछ झलकियाँ आपके समक्ष :


जो मित्र ये पुस्तक पढना चाहते हैं वो यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं :


https://paytm.com/…/sudha-om-dhingra-rachnatmkta-ki-dishaye…
http://www.flipkart.com/item/9789381520314

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बुधवार, 30 दिसंबर 2015

बेमुरव्वत!

आने वाला आता है जाने वाला जाता है
दस्तूर दुनिया का हर कोई निभाता है

कोई खार बन तल्ख़ ज़ख्म दे जाता है
कोई यादों में गुलाब बन खिल जाता है

बेमुरव्वत! इक फाँस सा सीने में धंसा जाता है
उम्र भर का लाइलाज दर्द जो दिए जाता है

गिले शिकवों का शमशानी शहर बना जाता है
जब भी यादों में बिन बुलाये चला आता है

यही जाते साल को नज़राना देने को जी चाहता है
फिर न किसी मोड़ पर तू ज़िन्दगी के नज़र आना

मुझे मुझसे चुरा लिया बेखुदी में डुबा दिया
अब किसी पर न ऐतबार करने को जी चाहता है


गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

बेखुदी के शहर में

इश्क का लबालब भरा प्याला था जब
उमंगों की पायल अक्सर छनछनाया करती थी
छल्का करता था गागर से इश्क का मौसम बेपरवाह सा

मगर अब बेखुदी के शहर में लगी आग में
झुलस गयी है मेरे इश्क की गुलाबी रंगत
मातमपुर्सी को नहीं है रूह के पास कोई साजो सामान

कौन सा सवाया लगाऊँ
किस पीर फ़क़ीर से मुनादी कराऊँ
कि राज-ए-उल्फ़त में कतरा - कतरा बिखरा है जूनून मेरा

ओ बेखबर शहर के खुमार
यूँ अक्सर खुद को घटते देख रही हूँ मैं ...........

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

कत्ले आम का दिन था वो

 
 
कत्ले आम का दिन था वो
अब सन्नाटे गूंजते हैं
और खामोशियों ने ख़ुदकुशी कर ली है

तब से ठहरी हुई है सृष्टि
मेरी चाहतों की
मेरी हसरतों की
मेरी उम्मीदों की

अब
रोज बजते शब्दों के झांझ मंजीरे
नहीं पहुँचते रूह तक

तो क्या खुदा बहरा हो गया या मैं
जिंदा सांसें हैं या मैं
मौत किसकी हुई थी उस दिन
नहीं पता
मगर रिश्ता जरूर दरक गया था

और सुना है
दरके हुए आईने को घर में रखना अपशकुन होता है

रविवार, 29 नवंबर 2015

लव ब्लॉसम्स हेयर जानां ...........

 
 
प्यार महकता है
मोहब्बत की सौंधी सौंधी महक
इश्क की खुशबू
कुछ भी कहूँ
बात तो एक ही है
बस जरूरत है तो इतनी सी
वो तुम तक पहुँचे

वो ' तुम '
कोई भी हो सकते हो
न मैंने नहीं देखा तुम्हें
नहीं जानती कौन हो
कहाँ हो , कैसे हो
बस महकते हो मुझमे साँसों से
चहकते हो , बहकते हो
और मैं बेबस सी
तुम्हारी अनजानी अनदेखी मोहब्बत में गिरफ्तार
युगों से प्रतीक्षा की दहलीज पर
सजदा किये बैठी हूँ
एक कभी न बुझने वाली चिर परिचित प्यास का घूँट पीकर

जबकि जानती हूँ
तुम नहीं हो कहीं
न यहाँ न कहीं और इस पूरे ब्रह्माण्ड में
सिवाय मेरे अनचीन्हे ख्याल की पुआल पर बैठे एक जोगी की तरह

सदायें बिना पंखों की वो पंछी हैं
जिन्हें उड़ने को न आकाश चाहिए
और न ही धड़कने को दिल
पहुँच ही जाती हैं मंजिल तक

जाने क्यों फिर भी कहने को दिल करता है
मृग की नाभि में कस्तूरी सा
लव ब्लॉसम्स हेयर जानां ...........

रविवार, 22 नवंबर 2015

बस चलन है

जाने कैसी दुनिया कैसे लोग
नकाब पर नकाब पर नकाब डाल 
जी लेते हैं जो
और वो छद्मों को
उँगलियों पर गिनते गिनते बुढा जाते हैं
फिर भी न फितरत समझ पाते हैं
और एक दिन उकता कर
ख़ुदकुशी को निकल जाते हैं
फिर वो ख़ुदकुशी
समाजिक हो राजनीतिक हो या साहित्यिक 

ये लेखक की साहित्यिक मौत नहीं
राजनीतिज्ञ की राजनीतिक मौत नहीं
इंसान की समाजिक मौत नहीं
ये वैसे भी कभी बहस का मुद्दा होता ही नहीं
अति भावुकता का होना और व्यावहारिक होने में कुछ तो फर्क होता ही है

बस चलन है अपने अपने देश का
समझ सकते हो तो रहना जंगल में वर्ना ...

देश निकाले के सबके लिए अपने अपने अर्थ होते हैं