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रविवार, 8 जून 2008

इन्सान

आज इन्सान सिर्फ़ अपनी सोच और अपने लिए ही जीता है । उसे फर्क नही पड़ता की कोई क्या सोचता है । उसे किसी की चाहत से कोई मतलब नही । अपने लिए जीना और सिर्फ़ अपने मन की सुनना और करना सिर्फ़ इतना चाहता है। क्या यही है ज़िंदगी की सच्चाई?कहीं कोई प्यार नही,किसी की इच्छा का सम्मान नही। रिश्ते भी सिर्फ़ अपनी जरुरत के लिए नीभाना फिर भूल जाना.........क्या यही इंसान है? क्यों इन्सान की सोच इतनी मतलबी हो गई है ?

1 टिप्पणी:

अपने विचारो से हमे अवगत कराये……………… …आपके विचार हमारे प्रेरणा स्त्रोत हैं ………………………शुक्रिया