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मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

दिल चाहता है मूक हो जायें
सिर्फ़ धडकनों की धडकनों से बात हो
चहुँ ओर फैली खामोशी में
दिल के साज़ पर
धडकनों का संगीत बजता हो
कुछ इस तरह
धड़कने धडकनों में
समां जायें
तू , तू न रहे
मैं , मैं न रहूँ

2 टिप्‍पणियां:

  1. तू , तू न रहे
    मैं , मैं न रहूँ
    ये धडकनों का साज़ बहुत कम लोगों के पास होता है.....
    बहुत ही प्रभावशाली लिखा है...

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  2. तू , तू न रहे
    मैं , मैं न रहूँ

    ab is se badi abhivyakhti kya hongi .. yahi poorntha hai ..

    Pls visit my blog for new poems..

    vijay
    http://poemsofvijay.blogspot.com/

    जवाब देंहटाएं

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