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शनिवार, 27 जून 2009

क्यूँ नेह बढाते हो

क्यूँ नेह बढाते हो
मैं तो पत्थर हूँ
पत्थरों में स्पंदन नही होता
एक ऐसी जड़ हूँ
जिसमें जीवन नही होता
वो नदिया हूँ
जिसमें बहाव नही होता
वो आकाश हूँ
जिसका कोई दायरा नही होता
वो ठूंठ हूँ
जिस पर कोई फूल नही खिलता
वो साज़ हूँ
जिसमें कोई आवाज़ नही होती
वो सुर हूँ
जिसकी कोई ताल नही होती
वो ज़ख्म हूँ
जिसकी कोई दवा नही होती
वो ख्वाब हूँ
जिसकी कोई ताबीर नही होती
वो कोशिश हूँ
जो कभी पूरी नही होती
वो दीया हूँ
जिसमें बाती नही होती
वो चिराग हूँ
जिसमें रौशनी नही होती
वो शाम हूँ
जिसकी कोई सुबह नही होती
फिर क्यूँ नेह
बढाते हो ................

शुक्रवार, 19 जून 2009

ये जानती हूँ मैं

एक मुलाक़ात का
वादा चाहा उसने
मैं दे न सकी
मिलने की ख्वाहिश थी
फिर भी
मैं मिल न सकी
कुछ तो चोट लगी होगी
उसे भी
ये जानती हूँ मैं
मगर मेरी मजबूरियां
भी कम न थी
ये वो भी जानता होगा
अपनी ख्वाहिशों को
कैसे जब्त किया होगा
उसने
दिल पर अपने पत्थर
कैसे रखा होगा उसने
खामोशी का ज़हर
कैसे पिया होगा उसने
ये जानती हूँ मैं
मगर
कहीं बेपर्दा न हो जाऊँ
मेरी खातिर वो
कैसे जिया होगा
ये जानती हूँ मैं
दर्द के सैलाब से
गुज़र गया होगा
टीस चेहरे पर
आंखों में भी
न उतारी होगी
ये जानती हूँ मैं
कहीं कोई पढ़ न ले
कोई जान न ले
इस बेनामी
रिश्ते के
अनकहे
अनछुए
उसके जज्बातों को
इसलिए ज़हर का ये
कड़वा घूँट
कैसे पिया होगा उसने
ये जानती हूँ मैं
पल-पल कितनी मौत
मर-मर कर
जिया होगा
हँसी का कफ़न
चेहरे को उढाकर
कैसे हँसा होगा
ये जानती हूँ मैं

शुक्रवार, 12 जून 2009

क्या यह बालश्रम नही ?

बाल श्रम के बारे में न जाने कब से बातें हो रही हैं और कभी कभी इसके खिलाफ कदम भी उठाये जाते हैं सब जानते हैं बच्चों से काम करवाना कानूनन अपराध है मगर क्या इसका सही ढंग से पालन किया जाता है ? क्या इसमें भेदभाव नही किया जाता?

आज मानवाधिकार आयोग बाल श्रम के ख़िलाफ़ कदम उठाता है । सरकार भी अपनी तरफ़ से भरसक कोशिश करती है मगर तब भी बाल श्रमिक हर जगह मिलते हैं । सवाल उठता है बाल श्रम किस पर लागू होता है ? क्या सिर्फ़ निचले तबके पर ही या फिर हर तबके पर , फिर चाहे वो ऊंचा तबका ही क्यूँ न हो ।

एक निचले तबके वाला बच्चा तो अपने जीने के लिए, दो वक्त की रोटी के लिए श्रम करता है । मगर ऊंचे तबके के लोग क्यूँ अपने बच्चों से काम करवाते हैं या फिर वो बच्चे काम क्यूँ करते हैं ? क्या उन्हें भी पैसों की उतनी ही जरूरत है जितनी कि निचले तबके के बच्चों को।
क्या यह बालश्रम नही ?

आज देखा जाए तो हर दूसरे सीरियल में , विज्ञापनों में बच्चे काम करते नज़र आते हैं। क्या ये बाल श्रम नही ?

एक तरफ़ तो एक बच्चा अपने जीने के लिए, पेट भरने के लिए काम करता है तो उसे पकड़ कर बाल सुधार गृह आदि में डाल दिया जाता है और दूस्रती तरफ़ सबकी आंखों के सामने , खुलेआम हम सब बच्चों को काम करते देखते हैं टेलिविज़न आदि पर , जबकि उन्हें पैसे की या कहो जिंदा रहने के लिए पैसे कमाने की उतनी जरूरत नही होती जितनी कि निचले तबके के बच्चों को होती है , फिर भी उनके खिलाफ न तो सरकार न ही मानवाधिकार आयोग कोई कदम उठता । क्या ये बालश्रम नही ?
अगर नही है तो फिर उन बच्चों को भी नही रोका जाना चाहिए जो जिन्दा रहने के लिए काम करते हैं और अगर रोका जाता है तो सरकार को उनके खाने पीने, रहने आदि के लिए इंतजाम करना चाहिए । या फिर कानून सबके लिए एक जैसा बनाया जाना चाहिए और एक जैसा ही लागू किया जाना चाहिए।

सिर्फ़ कानून को बनाना ही काफी नही है बल्कि उसको सफलता पूर्वक लागू भी किया जाए यह भी देखना सरकार का काम है । इसके साथ देश कि जनता को भी जागरूक होना चाहिए सिर्फ़ अपने खुशी के लिए अपने बच्चों को पैसा कमाने की होड़ में इस नाज़ुक उम्र में ही नही लगा देना चाहिए। उनके बचपन को उन्हें जी लेने देना चाहिए , ये तो उनका जन्मसिद्ध अधिकार है ।

बच्चे हैं हम
हमें जीने दो
रोटी , कपड़े
के लालच में
न ज़हर हमारे
बचपन में घोलो
क्या बचपन मेरा
फिर आएगा
दो घूँट खुशी के
पी लेने दो
बच्चे हैं हम
हमें जी लेने दो

आज इंसान को चाहिए अपनी महत्वाकांक्षाओं को थोड़ा कम करे और बच्चों को बच्चा ही रहने दे ।
बाल श्रम कानून सब पर एक जैसा ही लागू होना चाहिए क्यूंकि बच्चे तो सिर्फ़ बच्चे हैं फिर चाहे वो किसी भी तबके के हों ।

रविवार, 7 जून 2009

तड़पता तो तू भी होगा

नींद तुझे भी न आती होगी
तू भी करवट बदलता होगा
मुझे खामोश करने वाले
तू कौन सा चैन से सोता होगा

दिल तो तेरा भी तड़पता होगा
आँख तो तेरी भी रोती होगी
मुझे बेवफा कहने वाले
तू कौन सा बफा निभाता होगा

कसक तो तेरे सीने में भी उठती होगी
मिलन को निगाह तरसती होगी
मुझे बेचैन करने वाले
तू कौन सा चैन से रहता होगा

क्या मुझे हर मोड़ पर ना ढूंढता होगा
मेरे निशां को तरसता होगा
मेरा नामोनिशां दिल से मिटाने वाले
क्या ख़ुद के निशां कहीं पाता होगा

सोमवार, 1 जून 2009

कुछ अनुत्तरित प्रश्न

मैं - किसके लिए क्या हूँ ?
मेरा क्या अस्तित्व है ?
आज प्रश्न मुखर हो उठे हैं ।

ज़िन्दगी के हर पड़ाव पर हर रूप में कभी सिर्फ़ मेरा ही अस्तित्व था । बिना मेरी सहमति के , बिना मेरी इच्छा के कोई कार्य नही होता था । जैसे सबके जीवन की धुरी थी मैं । एक सुकून सा था दिल में । कभी पति की सहचरी बनी,कभी उसकी दोस्त , कभी उसके जूनून का शिकार हुयी तो कभी उसके अहम् का । मगर हर रूप में उसका साथ देती ही गई और हर ज्यादती भी बर्दाश्त करती गई । कभी बच्चों के लिए सिर्फ़ माँ बनी तो कभी उनकी दोस्त। हर हाल में जीना सिखाया , ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया , गिरने पर अपने आँचल का साया दिया । हर पल बच्चों और पति की खुशियों में बंटती रही । उन्ही की खुशियों के लिए जीती रही , मरती रही । हर गम हर आंसू पीती गई , सहती गई और उफ़ भी नही की ।
और आज उम्र के इस पड़ाव पर सब ओर से दुत्कारी गई । कभी जिस पति का अस्तित्व थी उसी के लिए बेनाम हो गई । कभी जिन बच्चों के लिए ज़िन्दगी की हर खुशी हँसते हँसते न्योछावर करती गई आज उनके जीवन में एक अवांछित वस्तु के सिवा कुछ भी नही ।
क्या ज़िन्दगी भर की तपस्या का यही फल मिलता है ? एक कांच के टूटे हुए टुकडों सा दिल बंटता है । आज लगा किसके लिए जीती रही ?क्यूँ अपना जीवन कुर्बान करती रही ? क्या उनके जीवन में आज मेरा कोई अस्तित्व ही नही ? फिर ज़िन्दगी से मैंने क्या पाया ? ज़िन्दगी भर सिर्फ़ देती ही रही-कभी प्यार , दुलार , ममता तो कभी आर्शीवाद। मगर उसका सिला आज ये मिला ।

क्या आज मैं घर के कोने में पड़ी एक अवांछित वस्तु से ज्यादा नही ?
क्या अब मुझे इस सत्य को स्वीकारना होगा ?
क्या मुझे अब ज़िन्दगी को गुजारने के लिए एक नए सिरे से सोचना होगा ?
क्या कभी मेरा भी कोई अस्तित्व होगा ?
न जाने कितने अनुत्तरित प्रश्न मुखर हो उठे हैं ।
शायद अब उम्र के इस पड़ाव पर इन प्रश्नों का उत्तर खोजना होगा ।