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शनिवार, 6 जुलाई 2013

खुद से खुद को हारती .......... एक स्त्री

मेरे अन्दर की स्त्री भी 
अब नहीं कसमसाती 
एक गहन चुप्पी में 
जज़्ब हो गयी है शायद 

रेशम के थानों में 
अब बल नहीं पड़ा करते 
वक्त की फिसलन में 
ज़मींदोज़ हो गए हैं शायद 

बिखरी हुयी कड़ियाँ 
अब नहीं सिमटतीं यादों में 
काफी के एक घूँट संग 
जिगर में उतर गए हैं शायद 

बेतरतीब ख़बरों के 
अफ़साने नहीं छपा करते 
अख़बार की कतरनों में 
नेस्तनाबूद हो गए हैं शायद 

(खुद से खुद को हारती .......... एक स्त्री अपनी चुप से लड रही है )

11 टिप्‍पणियां:

  1. सब को,
    हर क्षण,
    अपने से ही जूझना होता है,
    क्या करें,
    क्या न करें,
    स्वयं से पूछना होता है।

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  2. बहुत गहरी बात ...दिल को छू गई रचना ...बहुत बहुत

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  4. अब जब यहाँ असमवेदानाओं की हद नहीं रही तो भला एक संवेदन शील इंसान या स्त्री कब तक इस भावना से वंचित रह सकते है यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं जब शायद एक भी संवेदनशील इंसान न हो इस धरती पर और किसी को किसी भी बात का कोई असर ही न हो गहन भाव अभिव्यक्ति...

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  5. दिल को छूती बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति...

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  6. इस मौन में छिपा बहुत शोर है

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अपने विचारो से हमे अवगत कराये……………… …आपके विचार हमारे प्रेरणा स्त्रोत हैं ………………………शुक्रिया