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मंगलवार, 22 सितंबर 2015

आओ जश्न मनाएं

 
 
थोडा सा रूमानी होने को जरूरी थी
एक वाकफियत दिल की दिल से
और अब जब
किस्सों सी किश्तों में सिसकती रही मोहब्बत
तुमने डाल दी अपनी हसरतों की चादर

यूँ भरमाने के दौर तो नहीं थे
फिर भी हमने खुद को भरमा लिया
सोच , शायद मिल जाए मुझे मेरे हिस्से की दौलत

मगर किस्से कहानियों के
कब किसने तर्जुमे किये हैं
और कालखंड की
किसने सिसकारी सुनी है
जानते हुए भी
रूमानियत को जिंदा रखने को भरा है मैंने मोहब्बत का खामोश घूँट

जिस्म , न नीला पड़ा न पीला और न ही सफ़ेद
देख , रूमानियत के अहसास का असर
गुलाबों की खेती से सुर्खरू है राख भी मेरी

ये प्रेम की अद्यतन ख़ामोशी है 
आओ जश्न मनाएं

2 टिप्‍पणियां:

  1. ये प्रेम की अद्यतन ख़ामोशी है.....

    मुझे आपकी हर कविता अच्छी लगती है ये जो गहराई लिए होती है शायद और कहीं नहीं मिलती।

    जवाब देंहटाएं
  2. @ Rohitas ghorela जी आपको लिखा पसंद आता है ये मेरा सौभाग्य है ..........हार्दिक आभार .

    जवाब देंहटाएं

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