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गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020
खाली बैठी औरतें
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सुनिए अपनी नाराज़गी की पुड़िया बनाइये और गटक जाइए गए वो ज़माने जब कोल्हू के बैल सी जुती दिखाई देती थी दम भर न जो साँस लेती थी साहेब डाल ...
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सोमवार, 2 दिसंबर 2019
तुम्हारा स्वागत है
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1 तुम कहती हो " जीना है मुझे " मैं कहती हूँ ………… क्यों ? आखिर क्यों आना चाहती हो दुनिया में ? क्या मिलेगा तुम्हे ...
1 टिप्पणी:
गुरुवार, 28 नवंबर 2019
दहल उठा है आसमां..
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जाने किस मोड़ पर छोड़ आयी आँसू, आहें और दर्द अब जिद की नोक पर कर रही है नृत्य प्रज्ञा उसकी तुम्हारी भौंहों के टेढ़ेपन को बनाकर जमीन यूँ ...
सोमवार, 2 सितंबर 2019
आ अब लौट चलें
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इस दौड़ती भागती दुनिया में समय की धुरी पर ठहरा मन मेरा कहता है आ अब लौट चलें एक बार फिर उसी दौर में जहाँ पंछियों से रो...
7 टिप्पणियां:
मंगलवार, 18 जून 2019
हम शर्मिंदा हैं
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मरे हुए लोग हाय हाय नहीं करते मरे हुए लोगों की कोई आवाज़ नहीं होती मरे हुए लोगों की कोई कम्युनिटी नहीं होती जो कोशिशों के परचम लहराए और हरी...
1 टिप्पणी:
बुधवार, 12 दिसंबर 2018
मैं बस इक जलता अलाव हूँ
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न जाने किस पर गुस्सा हूँ न जाने क्यों उदास हूँ खोज के बिंदु चुक गए मौसम सारे रुक गए फिर किस चाह की आस में हूँ जब ...
सोमवार, 5 नवंबर 2018
तुम खुदा नहीं हो
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मैं सो रहा था मुझे सोने देते चैन तो था अब न सो पाऊंगा और न जागा रह पाऊँगा मझधार में जैसे हो नैया कोई एक विशाल...
2 टिप्पणियां:
मंगलवार, 25 सितंबर 2018
गौरतलब कहानियाँ मेरी नज़र में
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कहानियां, हमारे जीवन का आधार रही हैं आदिम काल से. जैसे जैसे सभ्यता विकसित होती गयी, कहानियाँ उसी के अनुसार आकार लेती रहीं. वक्त के ...
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