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मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

जो बचता है शून्यता के बाद भी

शून्य शून्य और सिर्फ़ शून्य
पता नही फिर भी लगता है
कुछ बचता है कहीं शून्य से परे
स्वंय का बोध
या कोई कडी
अगली सृष्टि की
अलग रचना की
अलग सरंचना की
कुछ तो ऐसा है जो
बचता है शून्य के बाद भी
शून्य से शून्य मे समाना
बदलना होगा इस विचार को
खोजना होगा उस एक तारे को
उस नव ब्रह्मांड को
उस नव निर्माण को

जो बचता है शून्यता के बाद भी

जो मिट्कर भी नही मिटता

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

एक नया इतिहास रचने

मौन की भाषा
अश्रुओं की वेदना
और मिलन ?
कैसे विपरीत ध्रुव
कौन से क्षितिज
पर मिलेंगे
ध्रुव हमेशा
अलग ही रहे हैं
अपने अपने
व्योम और पाताल में
सिमटे सकुचाये
मगर मिलन की आस
ये तो मिलन का
ध्रुवीकरण हो जायेगा ना
बस तुम भी खामोश रहो
मैं भी खामोश चलूँ
संग संग नि:संग होकर
एक नया इतिहास रचने
चलो हम चलें
शायद तब कोई
नयी कविता जन्मे
और हमें
नए आयाम दे

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

दरिया वापस नही मुडा करते

मै तो आज भी
वहीं उसी मोड पर
खडी हूँ
जहाँ समय ने
तुम्हे मुझसे
...छीना था
मगर तुम ही
ना जाने कब
और कैसे
समय के साथ
बह गये
दरिया वापस
नही मुडा करते

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

हाँ ..........बचपन याद आ गया

एक बेफ़िक्री का आलम होता था
वो छत पर सोना तारों को निहारते हुये……
वो बारिश मे भीगना सखियों संग
वो नीले आकाश मे
पंछियों को उडते चहचहाते देखना
रात को हवा ना चलने पर
 पुरो के नाम लेना
वो सावन मे झूलों पर झूलना
कभी धूप मे खेलना
तो कभी शाम होते ही
छत पर धमाचौकडी मचाना 
कभी पतंगो को उडते देखना
तो कभी उसमे शामिल होना ,
कभी डूबते सूरज के संग
उसके रंगो की आभा मे खो जाना ,
कभी गोल गोल छत पर घूमना
और अपने साथ - साथ
पृथ्वी को घूमते देखना और खुश होना
आह! बचपन तेरे रंग निराले
सुन्दर सुन्दर प्यारे प्यारे
मगर अब ना दिखते ये नज़ारे
मेरे बच्चे ना जान पायेंगे
ये मासूम लम्हे ना जी पायेंगे
यादो मे ना संजो पायेंगे
आज न वो खेल रहे
न वो वक्त रहा   
पढाई  के बोझ तले
बचपन इनका दब गया  
उम्र का एक हिस्सा 
जो मैंने जी लिया
कैसे बच्चे जान पाएंगे  
सिर्फ यादों में बसर रह पाएंगे
एक सुखद अहसास का दामन
जिनका यादो मे बसेरा है
आज एक बार फिर
मुझे मुझसे मिला गया
मुझे भी बचपन याद आ गया
हाँ ..........बचपन याद आ गया 


सोमवार, 11 अप्रैल 2011

स्वादहीन फ़ीका बासी खाना लगती है ज़िन्दगी


स्वादहीन फ़ीका बासी खाना लगती है ज़िन्दगी
जब तक कि रूह के चौबारे पर ना उतरती है ज़िन्दगी

ये सब्ज़ियों के पल पल बदलते स्वाद मे उतरती है ज़िन्दगी
जब तक कि आत्मिक स्वाद को ना चखती है ज़िन्दगी

ये देवताओं सा अच्छा बुरा फ़ल देती है ज़िन्दगी
जब तक कि देवाधिदेव से ना मिलती है ज़िन्दगी

ये दिवास्वप्न सा भ्रमित करती है ज़िन्दगी
जब तक कि समाधिस्थित ना होती है ज़िन्दगी

ये अवसान मे भी बहुत उलझती है ज़िन्दगी
जब तक कि गरल को भी न अमृत समझती है ज़िन्दगी

ये भोर को भी अवसान समझती है ज़िन्दगी
जब तक कि जीने का मर्म ना समझती है ज़िन्दगी

ये संसार के झूठे मायाजाल मे उलझती है ज़िन्दगी
जब तक कि नीम के औषधीय गुण ना समझती है ज़िन्दगी

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

गरीबी के सिर्फ़ आंकडे होते हैं

गरीबी के सिर्फ़ आंकडे होते हैं………आकलन नही
नसीब का सिर्फ़ एकाउंट होता है………बंटवारा नहीं
हुस्न के सिर्फ़ नखरे होते हैं………हकीकत नही
मोहब्बत के सिर्फ़ सपने होते हैं………पैमाने नही
 
 
शब्दों का आलिंगन रोज करती हूँ
तब कुछ देर के लिये जी लेती हूँ
ये शब्द ही हैं जो हमे
जीने की कला सिखाते हैं
कभी शब्द रूह बन जाते हैं
कभी रूह शब्दो मे उतर आती है
 
 
अपनो के हाथ का मारा है हर शख्स
ज़िन्दा है मगर ज़िन्दगी का मारा है हर शख्स
मौसम सी बदल जाती हैं शख्सियतें 
मिज़ाज़पुरसी की चाहत का मारा है हर शख्स
 




कमबख्त कौन से युग मे पैदा हो गया 
जहाँ साया भी अपना होता नहीं
फिर गैर तो गैर ही होते हैं 
उम्र भर ये ही नही जान पाया 
बदनामी ओढ कर 
इंसानियत के चोले मे 
वजूद को ढांप कर सो गया
कमबख्त कौन से युग मे पैदा हो गया

 

 

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

कहीं देखा है ऐसा आशियाना ?

ए मेरे ख्वाब
डरती हूँ
तुझे साकार करने से
कहीं ज़माने की
नज़र ना पड़ जाये
कहीं कोई दूजा
तुझे ना नैनों से
चुरा ले जाये
कहीं कोई
और आँख
ना तुझे भा जाए
और मेरा वजूद
जो मैं
तुझमे देखती हूँ
किसी और की
आँख का खवाब
ना बन जाए
और मेरी नज़र
रीती ही रह जाये
कभी कभी
चाह होती है
तुझे पाने की
तुझे देखने की
तुझे आकार देने की
मगर डरती हूँ
इसलिए ना
नैन बंद करती हूँ
सिर्फ तुझे
अपने अहसास में ही
जी लेती हूँ
दिल का हर हाल
कह लेती हूँ
कुछ इस तरह
गुफ्तगू कर लेती हूँ
क्या देखा है
तूने मुझे कभी
ए  ख्वाब
हवाओं में उड़ाते हुए
बादलों पर तैरते हुए
आसमानों को छूते हुए
किसी फूल की खुशबू
सहेजते हुए
किसी से दिल लगाते हुए
किसी को अपना बनाते हुए
किसी से दिल की कहते हुए
किसी के अश्कों में बहते हुए
किसी के दिल की धड़कन
बनते हुए
नहीं ना ............
डरती हूँ ना
ख्वाब सजाने से
तुझे आकार देने से
इसीलिए तुझे सिर्फ
अहसासों में पिरो लिया है
अब हर पल
हर सांस के साथ
हर धड़कन के साथ
आँख की पुतली
 बन रहता है
नज़र ना किसी को
आता है
मगर मेरे संग संग
रहता है
कहीं देखा है
ऐसा आशियाना ?

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

छलावा

तू और तेरी याद
इक छलावा ही सही
छले जाने का भी
अपना ही मज़ा होता है
ज़िन्दगी रोज़ मुझे
छलती है----सोचा
इक रोज़ ज़िन्दगी को
छल कर देखूँ
और कौन ……तुम ही तो हो
मेरी ज़िन्दगी
मेरी याद
मेरी रूह
मेरा चैन
मेरे आरोह
मेरे अवरोह
तो क्या हुआ
जो इक बार
खुद से खुद को
छल लिया
जीने के लिये
कुछ तो वजह
होनी चाहिये

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

आज मूर्खोत्सव कुछ ऐसे मनाया

आज मूर्खोत्सव कुछ ऐसे मनाया
उनको बिना तेल पानी के झाड़ पर चढ़ाया
बिना बात ही उन्हें सरताज कह दिया
मानो आज तो उन्हें कोहिनूर मिल गया
ख़ुशी के मारे ऐसे उछल रहे हैं
जैसे उल्लू दिन में देख रहे हैं
आज उन्हें अपना lifeguard बताया
फिर तो जैसे आसमाँ जमीन पर उतर आया
बिना संगीत के आगे पीछे नाच रहे हैं
पाँव ना जमीन पर पड़ रहे हैं
अब उन्हें लिस्ट पकड़ा दी है
शौपिंग , outing , खाने पीने का
सारा प्लान समझा दिया है
बिना मेहनत के रंग जमा दिया है
आज के दिन का फायदा उठा लिया है
उनको महामूर्ख का ख़िताब दिला दिया है
तो तुम भी गुरु हो जाओ शुरू
बना लो दिन को दिवाली
एक पांसा फेंको और तमाशा देखो
महामूर्ख दिवस का कमाल देखो
अपने अजीजों को बेहाल देखो