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बुधवार, 30 जुलाई 2014

पड़ावों के शहरों में आशियाने नहीं बना करते …

इतनी कसक 
इतनी कशिश 
और इतनी खलिश 
कि  नाम जुबान पर आ जाए 
तो 
कभी इबादत 
कभी गुनाह 
तो कभी तौबा बन जाए 
और एक जिरह का पंछी 
पाँव पसारे 
बीच में पसर जाए 

जहाँ न था कभी 
हया का भी पर्दा 
वहां अभेद्य दीवारों के 
दुर्ग बन जाएं 
तो क्या जरूरी है 
शब्दों को गुनहगार बनाया जाए 
कुछ गुनाह मौत की नज़र कर दो 
अजनबियत से शुरू सफर को 
अजनबियत पर ही ख़त्म कर दो 
जीने को इतना सामाँ काफी है 
कि  सांस ले रहे हो तुम 
हर प्रश्नचिन्ह के बाद भी 

वैसे भी पड़ावों के शहरों में आशियाने नहीं बना करते ……… 

रविवार, 27 जुलाई 2014

जैसे कोई स्वप्न साकार हुआ हो

डायलॉग में सदी के शीर्ष कवि केदार नाथ सिंह को ज्ञानपीठ मिलने पर नागरिक अभिनंदन और बधाई और उनका एकल कविता-पाठ के सुअवसर पर उनसे रु-ब-रु होने का छोटा सा मौका हमने भी सहेज लिया ……एक अनमोल पलों का साक्षी बन खुद को गौरान्वित महसूसा ……जैसे कोई स्वप्न साकार हुआ हो 

















गुरुवार, 24 जुलाई 2014

जाने कितनी बार तलाक लिया



जाने कितनी बार तलाक लिया 
और फिर 
जाने कितनी बार समझौते की बैसाखी पकड़ी 
अपने अहम को खाद पानी न देकर 
बस निर्झर नीर सी बही 
युद्ध के सिपाही सी 
मुस्तैद हो बस 
खुद से ही एक युद्ध करती रही 
ये जानते हुए 
हारे हुए युद्ध की धराशायी योद्धा है वो 
आखिर किसलिए ?
किसलिए हर बार 
हर दांव को 
आखिरी दांव कह खुद को ठगती रही 
कौन जानना चाहता है 
किसे फुर्सत है 
बस एक बंधी बंधाई दिनचर्या 
और बिस्तर एक नित्यकर्म की सलीब 
इससे इतर कौन करे आकलन ?
आखिर क्या अलग करती हो तुम 

वो भी तो जाने 
कितनी परेशानियों से लड़ता झगड़ता है 
आखिर किसलिए 
कभी सोचना इस पर भी 
वो भी तो एक सपना संजोता है 
अपने सुखमय घर का 
आखिर किसलिए 
सबके लिए 
फिर एकतरफा युद्ध क्यों ?
क्या वो किसी योद्धा से कम होता है 
जो सारी गोलियां दाग दी जाती हैं उसके सीने में 

आम ज़िन्दगी का आम आदमी तो कभी 
जान ही नहीं पाता 
रोटी पानी की चिंता से इतर भी होती है कोई ज़िन्दगी 
जैसे तुम एक दिन में लेती हो ३६ बार तलाक 
और डाल देती हो सारे हथियार समर्पण के 
सिर्फ परिवार  के लिए 
तो बताओ भला 
दोनों में से कौन है जो 
ज़िंदगी की जदोजहद से हो परे 
मन के तलाक रेत के महल से जाने कब धराशायी हो जाते हैं 
जब भी दोनों अपने अहम के कोटरों से बाहर निकलते हैं 

आम आदमी हैं , आम ज़िन्दगी है , आम ही रिश्तों की धनक है 
यहाँ टूटता कुछ नहीं है ज़िन्दगी के टूटने तक 
बस बाहरी आवरण कुछ पलों को 
ढांप लेते हैं हकीकतों के लिबास 
तलाक लेने की परम्परा नहीं होती अपने यहाँ 
ये तो वक्ती फितूर कहो या उबलता लावा या निकलती भड़ास 
तारी कर देती है मदिरा का नशा 
दिल दिमाग और आँखों से बहते अश्कों पर 
वरना 
न तुम न वो कभी छाँट पाओगे एक - दूजे में से खुद को 
अहसासों के चश्मों में बहुत पानी बचा होता है 
फिर चाहे कितना ही सूरज का ताप बढ़ता रहे 
शुष्क करने की कूवत उसमे भी कहाँ होती है रिसते नेह के पानी को   



गुरुवार, 17 जुलाई 2014

वहाँ दहशत के आसमानों में सुराख नहीं हुआ करते



अपने समय की विडंबनाओं को लिखते हुए 
कवि खुद से हुआ निर्वासित 
आखिर कैसे करे व्यक्त 
दिल दहलाते खौफनाक मंजरों को 
बच्चों की चीखों को 
अबलाओं की करुण पुकारों को 
अधजली लाशों की शिनाख्त करते 
बच्चों बड़ों के दहशतजर्द 
पीले पड़े पत्तों से चेहरों को 
रक्तपात और तबाही की दस्तानों को 
किस शब्दकोष से ढूँढे 
शब्दों की शहतीरों को 
जो कर दे व्यक्त 
अपने समय की नोक पर रखी 
मानसिकता को 

एक भयावह समय में जीते 
खुद से ही डरते मानव के भयों को 
आखिर कैसे किया जा सकता है व्यक्त 
जहाँ सत्ता और शासन का बोलबाला हो 
मानवता और इंसानियत से 
न कोई सरोकार हो 
मानवता और इंसानियत के 
जिस्मों को तार तार कर 
स्वार्थ की रोटियाँ सेंकी जा रही हों 
वहाँ खोज और खनन को 
न बचते हथियार हैं 
फिर कैसे संभव है 
कर दे कोई व्यक्त अपने समय को 

मुल्ला की बांग सा आह्वान है 
जलती चिताओं से उठाते 
जो मांस का टुकड़ा 
गिद्धों के छद्मवेश में 
करते व्यापार हों 
कहो उनके लिए कैसे संभव है 
हाथ में माला पकड़ राम राम जपना 
स्वार्थ की वेदी पर 
मचा हर ओर हाहाकार है 
बच्चों का बचपन से विस्थापन 
बड़ों का शहर नगर देश से विस्थापन 
बुजुर्गों का हर शोर की आहट से विस्थापन 
मगर फिर भी चल रहा है समय 
फिर भी चल रहा है संसार 
फिर भी चल रही है धड़कन 
जाने बिना ये सत्य 
वो जो ज़िंदा दिखती इमारतें हैं 
वहां शमशानी ख़ामोशी हुंकार भरा करती है 
मरघट के प्रेतों का वास हुआ हो जहाँ 
सुकूँ ,अपनेपन , प्यार मोहब्बत की 
जड़ों में नफरत के मट्ठे ठूंस दिए गए हो जहाँ 
कहो कैसे व्यक्त कर सकता है 
कोई कवि अपने समय की वीभत्सता को महज शब्दों के मकड़जाल में  

कैसे संभव है मासूमों के दिल पर पड़ी 
दहशत की छाप को अक्षरक्षः लिखना 
जाने कल उसमे क्या तब्दीली ले आये 
काली छाया से वो मुक्त हो भी न पाये 
जाने किसका जन्म हो जाए 
एक और आतंक के पर्याय का 
या दफ़न हो जाए एक पूरी सभ्यता डर के वजूद में 
फिर कैसे संभव है 
कवि कर सके व्यक्त 
अपने समय के चीरहरण को 
जहाँ निर्वसना धरा व्याकुल है 
रक्त की कीच में सनी उसकी देह है 

ओह ! मत माँगो कवि से प्रमाण 
मत करो कवि का आह्वान 
नहीं नहीं नहीं 
नहीं कर सकता वो शिनाख्त 
वक्त की जुम्बिश पर 
थरथरायी आहों की 
जहाँ स्त्रियों की अस्मत महज खिलवाड़ बन रह गयी हो 
नहीं मिला सकता निगाह खुद से भी 
फिर भला कैसे कर सकता है 
व्यक्त अपने समय की कलुषता को 
खिलखिलाती किलकारियों का स्वप्न 
धराशायी हुआ हो जहाँ 
सिर्फ मौत का तांडव 
अबलाओं बच्चों का रुदन 
छलनी हृदय और शमशानी खामोशी 
अट्टहास करती हो जहाँ 
वहां कैसे संभव है 
व्यक्त कर सके कवि 
अपने समय को कलम की नोक पर 


रुक जाती है कवि की कलम 
समय की नोक पर 
जहाँ रक्त की नदियाँ 
तोड़कर सारे बाँध बहा ले जा रही हैं 
एक पूरी सभ्यता को 
जहाँ नही दिख रहा मार्ग 
सिर्फ क्षत विक्षत लाशों के अम्बार से पटी 
सड़कों के कराहने का स्वर भी 
डूब चुका है स्वार्थपरता की दुन्दुभियों में 
स्त्री पुरुष बाल बच्चे बुजुर्ग 
नहीं होती गिनती जिनकी इंसान होने में 
मवेशियों से दड़बों में कैद हों जैसे 
वहाँ कैसे संभव है 
बन्दूक की नोक पर संवेदना का जन्म 
जहाँ सिर्फ लोहा ही लोहा पिघले सीसे सा सीने में दफ़न हो 
फिर बोको हरम  हो , ईराक हो , फिलिस्तीन , गाज़ा या नाइजीरिया 
दहशत के आसमानों में सुराख नहीं हुआ करते 
फिर कैसे संभव है 
व्यक्त कर सके कवि अपने समय को अक्षरक्षः 

वीभत्स सत्यों को 
उजागर करने का हुनर 
अभी सीख नहीं पायी है कवि की कलम 
आखिर कैसे 
इंसानियत के लहू में डूबकर कलम 
लिखे दहशतगर्दी की काली दास्ताँ 

एक ऐसे समय में जीते तुम 
नहीं हो सकते मनचाहे मुखरित ....   ओ कवि !!!


बुधवार, 9 जुलाई 2014

सुबह की पलकों पर



हिंदी अकादमी दिल्ली के सहयोग से प्रकशित '  सुबह की पलकों पर ' शोभना मित्तल जी का काव्य संग्रह सजग प्रकाशन से आया है।  अभी कुछ समय पहले उन्होंने मुझे अपना काव्य संग्रह भेंट किया।  शोभना जी की कविताओं में मानवीय संवेदनाएं उभर कर आई हैं तो स्त्री स्वर भी प्रमुखता से उभरा है।  जीवन की हर विसंगति पर दृष्टिपात करते हुए शोभना जी सीधे सरल सहज शब्दों में अपनी बात कहने का गुर रखती हैं।  
कुंठाओं की ईंट ढोता 
इंसान खुद भी 
बन गया है ईंट जैसा 
क्या यह आरम्भ है 
एक और पाषाण युग का 
' पाषाण युग ' कविता के माध्यम से आज की जमीनी हकीकत को बयां करती गहरा प्रहार करती हैं आखिर कैसे सूख गए संवेदनाओं के स्रोत तो वहीँ ' मुक्ति ' के माध्यम से अहिल्या नहीं बनने की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं।  ' इंसानियत की चीख ' आतंक से दहली मानवता की बेचारगी को दर्शाती कविता है।  वहीँ ' राम - राज्य ' के माध्यम से समाज में उपजे  नारी के प्रति अन्याय को दर्शाया है जिसे आज तक नारी भोग रही है।  राम को कठघरे में खड़ा करते हुए :

राम . 
जानकर या अनजाने 
सूत्रपात कर गए तुम 
निरपराध नारी निष्कासन की 
निष्कृष्ट रीत से 

ये कवि मन ही ऐसा होता है जो नयी नयी संभावनाएं खोज लेता है तभी तो कवयित्री ने सच्चाई , ईमानदारी , धैर्य , सौहार्द , सहिष्णुता , उदारता , सद्भावना आदि का ' गैट - टुगैदर ' कर लिया और कोशिश की आज के वक्त पर प्रहार करने की यदि आज इन्हें ढूंढने जाओ तो कहीं नहीं मिलेंगे 

संयम के मकान की 
लोभ ने करादी है कुर्की 
द्वेष ने स्नेह की 
कर दी है छुट्टी 

सुन्दर बिम्ब प्रयोग करते हुए गहरा कटाक्ष करती है रचना। 

व्यर्थ है 
उससे अब 
अपेक्षा करना 
रिश्तों में 
गर्मजोशी की 
ऊंचे पहाड़ों पर 
तो हमेशा 
बर्फ जमी रहती है 
' ऊँचाई ' कविता छोटी मगर सटीक अर्थ प्रस्तुत करती हुयी।  

'कविता से साक्षात्कार' में कविता की उपयोगिता और उसके दर्द को बयां किया है साथ ही आज कविता के बाज़ार में कविता के चीरहरण पर प्रहार करते हुए सच्चाई बयां की है:

 किया है , कर सकती हूँ बहुत कुछ 
गर न मिले 'खेमों' अभिशाप 
 कविता ही रहूँ तो अच्छी 
मत बनाओ अनर्गल प्रलाप 

' वैश्वीकरण ' के माध्यम से करारा प्रहार किया है आज की संस्कृति पर कि कैसे वैश्वीकरण के नाम पर घर टूट रहे हैं। 

' लक्ष्मीबाई ' के माध्यम से आज की नारी  की जीवटता को तो दर्शाया ही है कि कैसे एक नौकरीपेशा स्त्री किन किन हालत से गुजरते हुए जीवनयापन करती है वहीँ उन हालात में एक गर्भवती स्त्री की मनोदशा का भी मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है:

यह भी मुमकिन है कि 
चक्र्व्यून को भेदना सीखता यह अभिमन्यु 
सीख ले व्यूह निर्माण भी 
और बहुत संभव है 
की इसके व्यूह में  फँसी हो 
कल कोई और लक्ष्मीबाई 

स्त्री के दुःख दर्द , पीड़ा से लेकर मानवता के दंश तक हर विषय पर कवयित्री की कलम चली है।  प्रकृति हो या पशु कोई अछूता नहीं रहा , हर विषय को बखूबी उकेरा है।  छोटी छोटी रचनायें सहज सम्प्रेक्ष्णीय हैं।अपनी शुभकामनाओं के साथ उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हूँ । 


 

शनिवार, 5 जुलाई 2014

" लो जी बच्चा बड़ा हो गया "


 " लो जी बच्चा बड़ा हो गया " .२० वर्ष पूरे होते ही टीन एज ख़त्म .......... :)


नव प्रभात ने घूंघट खोला 
नव रश्मियों से स्वागत कर 
उन्नति का मार्ग प्रशस्त करे 
मनोकामना पूर्ण हो तुम्हारी 
मगर हृदय में भान रहे 
शोषित उपेक्षित वर्ग के प्रति 
मन में सदा सम्मान रहे 
जीवन के नए अर्थ ग्रहण कर 
आगे बढ़ते जाना 
पर मूल्यों और संस्कृति का भी 
ह्रास न होने पाये 
इतना ध्यान भी देते रहना 
उम्र के नाजुक दौर से निकल चुके हो 
हर नारी का सम्मान करना और 
माँ का सिर न कभी झुकने देना 
बस अब यही दुआ और सीख दे सकती हूँ 
माँ हूँ न सिर्फ दुआएं देकर ही  
न कर्त्तव्य की इतिश्री कर सकती हूँ 
दुआओं के साथ उचित मार्गदर्शन करना ही 
एक माँ का कर्तव्य  होता है 
या शायद यही माँ होने का वास्तविक अर्थ होता है 


सफल सार्थक खुशहाल जीवन की शुभकामनाओं के साथ नए विचारों , नयी खुशियों से ओत  -प्रोत नव जीवन में स्वागत है तुम्हारा 

चाहती तो थी आज ग्रैंड सैलीब्रेशन हो मगर बेटे ने ही मना कर दिया ये कहकर कि इतना पैसा जो आप लगाओगे वो कहीं दान कर देना किसी जरूरतमंद को दे देना तो उसके बाद कुछ कहने को बचा ही नहीं ईश्वर उसे इसी तरह सदबुद्धि प्रदान करता रहे ………इसके बाद एक माँ को और क्या चाहिये भला :)