पेज

रविवार, 28 दिसंबर 2014

गिरहकट

कितने धीमे से काटते हो गिरह 
मालूम चलने का सवाल कहाँ 
चतुराई यही है 
और बेहोशी का दंड तो भोगना ही होता है 

होश आने तक 
ढल चुकी साँझ को 
कौन ओढ़ाए अब घूंघट ?

एक मुश्किल सवाल बन सामने खड़े हो जाना 
यही है तुम्हारा अंतिम वार 
जिससे बचने को पूरी शक्ति भी लगा लो अब चाहे 
काटना  नियति है तुम्हारी 

धीरे धीरे इस तरह  रिता देना 
कि बूँद भी न शेष बचे 
जानते हो न 
खाली कुओं से प्रतिध्वनियाँ नहीं आया करतीं 

कितने बड़े गिरहकट हो तुम ............ ओ समय !!!

रविवार, 21 दिसंबर 2014

ये समय की मौत नहीं तो क्या है ?

घुटन चुप्पी विवशता 
और पथरायी आँखें 
बिना किसी हल के शून्य में ताक रही हैं 

कैसे शेर के कसे हुए जबड़ों में 
दबी चीख 
घायल हिरण सी 
फड़फड़ा रही है 

ताको सिर्फ ताको 
घूँट भरने को नहीं बची संवेदना 
जंगल और जंगली जानवरों का 
भीषण हाहाकारी शोर 
नहीं फोड़ेगा तुम्हारे कान के परदे 

इस समय के असमय होने के साक्षी हो 
विकल्प की तलाश में भटकते हुए 
अब क्या नाम दोगे इसे तुम ?

सोचना जरा 
ये समय की मौत नहीं तो क्या है ?

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

वो मेरा कोई नहीं था

हैवानियत के  अट्टहास पर इंसानियत किसी बेवा के  लिबास सी लग रही है 


वो मेरा कोई नहीं था
वो पडोसी मुल्क का था
मैं उसे नहीं जानती
मैंने उसे कभी नहीं देखा
फिर भी मेरा उसका कोई रिश्ता था 
हाँ जरूर था कोई तो रिश्ता
वर्ना कलेजा यूँ फटा न होता
आँख से आंसू झरा न होता 


हाँ था मेरा और उसका रिश्ता
शायद इंसानियत का
शायद ममत्व का

वो मेरा कोई नहीं था ........फिर भी इक रिश्ता तो था , फिर भी इक रिश्ता तो था

(कल जब उन मासूमों के चेहरे दिखाए जो हैवानियत की भेंट चढ़ गए तो आंसू रोके नहीं रुके )

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

अब किसकी करें इबादत

अब किसकी करें इबादत कौन सुनता है 
यहाँ दूर दूर तक फैला अँधेरा ही अँधेरा है 

मासूमियत संगसार हुई ज़िन्दगी दुश्वार हुई 
तेरे जहान में इंसानियत की ये कैसी हार हुई 

ओ खुदा ईश्वर अल्लाह जीसस  वाहे गुरु 
बता तो मासूमियत के क़त्ल में कहाँ है तू 

खुश्क आँखों से वहां रोती है इक माई 
क्या मासूमों पर इतनी दया भी न आई 

ये कैसा आतंक है ये कैसा समय है 
करुणा दया ममता को न मिली जगह है 

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

दर्द के बाज़ार में

प्रेम की चिरपरिचित आवाज़
जिसे सुन सुन तिड़क उठती है अन्दर की लड़की

देव तुम हो ,,,,,,,हाँ यहीं हो
मेरी निगाहों में देखो 
तुम्हारी ही तस्वीर नज़र आएगी
और आकाश सुनहरी ...........
बस जरूरत है तो सिर्फ मेरी आँख से देखने की ..........

हे देव ! क्या सुन पाए मेरा अनकहा ?
क्या अब लिख पाओगे फिर कभी कोई कविता ?

दर्द के बाज़ार में मायूसियों की अकेली खरीदार हूँ मैं !!!