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गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

वो मेरा कोई नहीं था

हैवानियत के  अट्टहास पर इंसानियत किसी बेवा के  लिबास सी लग रही है 


वो मेरा कोई नहीं था
वो पडोसी मुल्क का था
मैं उसे नहीं जानती
मैंने उसे कभी नहीं देखा
फिर भी मेरा उसका कोई रिश्ता था 
हाँ जरूर था कोई तो रिश्ता
वर्ना कलेजा यूँ फटा न होता
आँख से आंसू झरा न होता 


हाँ था मेरा और उसका रिश्ता
शायद इंसानियत का
शायद ममत्व का

वो मेरा कोई नहीं था ........फिर भी इक रिश्ता तो था , फिर भी इक रिश्ता तो था

(कल जब उन मासूमों के चेहरे दिखाए जो हैवानियत की भेंट चढ़ गए तो आंसू रोके नहीं रुके )

5 टिप्‍पणियां:

  1. इन्सानियत के रिश्ते तो हैं तभी तो ऐसी हैवानियत देख कर आँसू लाज़िमी हैं ...हम सब भी इसी दुःख से गुजर रहे हैं

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (19-12-2014) को "नई तामीर है मेरी ग़ज़ल" (चर्चा-1832) पर भी होगी।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. इंसानियत मुहताज नहीं पहचान की.
    आसुओं की एक ही पहचान है.
    एक ही आवाज होती है.

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