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सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

मैं दर्द में घुली इक नज़्म बनी होती

मैं 
दर्द में घुली इक नज़्म बनी होती
हर हर्फ़ में दर्द की ताबीर होती 
कुछ तो लहू- सा दर्द रिसा होता
हर्फों के पोर- पोर से तो
और हर पोर हरा बना होता 
असीम अनुभूत वेदना का 
साक्षात्कार किया होता 
तो शायद दर्द भी 
पनाह मांग बैठा होता
दर्द के आगोश में मैं क्या
दर्द ही मेरे आगोश में
सिमट गया होता
कुछ तो दर्द को भी
सुकून मिल गया होता
मेरे दर्द की जिंदा लाश पर
कुछ देर दर्द भी जी लिया होता    

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

हर चीज़ की कीमत होती है............

न जाने 
इतनी क़ुरबानी 
देनी पड़ी होगी
न जाने कितने 
अपनों का 
साथ छूटा होगा
न जाने कितनी 
हसरतों को 
दफ़न किया होगा
न जाने कितने 
मौसमों पर बसंत
आया  ही न होगा
न जाने कितनी
अरमानों की 
लाशों पर
पैर रख तू 
आगे बढ़ा होगा 
सिर्फ एक चाहत को
बुलंदी पर पहुँचाने के लिए 
आसमान को छूने की 
ऊंचाई पर पहुँचने की
चाहत की कुछ तो 
कीमत चुकानी पड़ती है
क्या हुआ गर 
"मैं" तुम से दूर हूँ तो 
क्या हुआ गर आज 
मेरी चाहत की कब्र 
पर पैर रख तुमने 
अपनी चाहतों को 
बुलंद किया 
मैं तो राह का 
वो पत्थर थी 
जो तुम्हारी
ऊंचाइयों में    
मील का पत्थर बनी 
शुक्र है पत्थर ही सही
तुम्हारी कामयाबी में 
कुछ तो बनी 
हर चीज़ की कीमत होती है
और ऊंचाई पर पहुँचने की
कीमत सभी को 
चुकानी पड़ती है
और तुम्हारी
ऊंचाई की
कीमत "मैं " हूँ

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

बदले अर्थ

रोने के भी क्या 
अर्थ होते हैं ?
हाँ , शायद 

एक रोना जब
दर्द हद से गुजरे तब
या कोई बच्चा रोये तब
या जब कोई अपना बिछुड़े तब

कभी विरह के
कभी ख़ुशी के
कभी गम के
अश्क उतरे जब भी
असर कर गए
मगर जब कोई 
स्वार्थ में रोये तब 
जब कोई दिखावटी रोये 
तब शायद अर्थ बदल जाते हैं 
न अश्क सच्चे होते हैं 
न रोना अर्थपूर्ण
मगर असर वो भी 
कर ही जाता है 
शायद हकीकत से भी ज्यादा

आज दुनिया 
दर्द की इन्तिहाँ 
शोर में सुनती है
बिन ढलके जो 
अश्क जज़्ब होते हैं 
उस रोने का भी 
क्या कोई अर्थ होता है?

ये दुनिया अपने 
अर्थ बनाती है
अपनी कसौटी पर
परखती है और 
जहाँ जितना दिखावा हो 
उसे उतना ही 
ग़मज़दा समझती है 

शायद तभी आज 
रोने के भी 
अर्थ बदल गए हैं  

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

उफ़ ! कब और कैसे

उसने नज़रों से छुआ
तो भी सिहर गयी
उफ़ ! कब और कैसे
दिल की ये हालत हो गयी


वो बेसाख्ता हँस पड़ा
और मैं खुद में सिमट गयी
उफ़ ! कब और कैसे
नज़र ये चार हो गयी


उसकी सांसो को छूकर
पुरवा जो उतरी मुझमे
उफ़ ! कब और कैसे
खुद से मै बेगानी हो गयी

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

हाट में बिकते दिल देखो

प्यार के निराले खेल देखो
हाट में बिकते दिल देखो

प्रेम प्रतीक की बेकदरी देखो
कोई तोड़ देती है
कोई फेंक देती है
होता है बुरा हाल तब
जब किसी और को दे देती है
गुलाब की आई शामत देखो
हाट में बिकते दिल देखो


वादों की बदहाली देखो
पब, रेस्तरां, नाईट क्लब में जाते हैं
जोड़े नाचते गाते हैं
कसमें वादे भी करते हैं मगर 
प्रेम इज़हार एक से करते हैं
जाते दूजे के साथ हैं
और तीसरे के साथ निकलते हैं
वैलेन्टाइन डे की चाल मतवाली देखो
ये एक हाथ से बजती ताली देखो
प्रेम की छटा निराली देखो




मोल भाव यहाँ भी होता है
गिफ्टों से प्रेम तोला जाता है
महंगे गिफ्ट वाला ही 
कन्या का सानिध्य पाता है 
प्रेम का अजब खेल है ये
एक ही दिन में सिमट जाता है
किसी का दिल टूट जाता है
किसी का दिन बन जाता है
कोई धोखा खाता है
तो कोई हँसता गाता है
मगर अमर प्रेम ना कोई पाता है
ये झूठे प्रेम की क्रांति देखो
मन में बैठी भ्रान्ति देखो
प्रेम की नयी परिभाषा देखो
झूठी इक अभिलाषा देखो


वैलेन्टाइन डे के नाम पर 
मिटती मर्यादा देखो
झूठ फरेब की नयी दुनिया देखो
जानते बूझते हाथ जलाते देखो
इक पल की चाह में
खुद को बहलाते देखो
ये आडम्बर के खोल में लिपटी
आधुनिक कहलाती दुनिया देखो
बाहरी संस्कृति से प्रेरित 
बहकती युवा पीढियां देखो
ये आधुनिकता का दंभ भरती
इधर उधर भटकती दुनिया देखो
प्यार के निराले खेल देखो
हाट में बिकते दिल देखो

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

सबका अपना दृष्टिकोण

क्या अच्छा क्या बुरा
सबका अपना दृष्टिकोण
किसी के लिए जो अच्छा
वो दूजे के लिए बुरा
फिर कैसे अच्छे बुरे की
परिभाषा बांचे हम

शायद होता तो सब
अच्छा ही है दुनिया में
सिर्फ दृष्टिकोण के फर्क से
इन्सान ही बुराई ढूँढ लेता है
और अपने मन मुताबिक
अपने पैमाने बना लेता है
और नयी परिभाषा गढ़ लेता है

फिर कैसे अच्छे बुरे को बांचे हम
कैसे किसी को कम आंके हम
क्यों न अपनी सोच बदलें हम
हर बात मे अच्छा देखें हम
नज़र बदलते ही नज़ारा बदल जायेगा
जो बुरा नज़र आता था अच्छा नज़र आयेगा
फिर जीवन सबका संवर जायेगा
एक स्वर्ग धरती पर भी उतर आयेगा

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

कैसे मन मे बसंत हो?

एक रात की नीरवता
एक मन की व्यथा
एक ओस की बूँद
जीवन क्षण भंगुर
फिर कैसे नव निर्माण
संभव हो
कैसे  कोई स्पंदन हो
कैसे मन में  बसंत हो

एक ख्वाब का आलिंगन
एक अंधेरे का सूनापन
एक दर्द की पराकाष्ठा
खुद ही अपना तर्पण
फिर कैसे ज्योति
प्रज्वलित हो
कैसे अन्तस रौशन हो
कैसे मन मे बसंत हो


अव्यक्त से व्यक्त
होने की आतुरता
साकार को पाने की
तुच्छ लालसा
क्लिष्ट मन की
भीषण आकुलता
और राह अगम्य
फिर कैसे दिव्य दर्शन हो
कैसे आत्मावलोकन हो
कैसे मन मे बसंत हो

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

वन्दे ब्लोगिस्तान............

आओ ब्लोगरों तुम्हें दिखाएं झांकी ब्लोगिस्तान की
इस ब्लोगिंग को नमन करो ये ब्लोगिंग है कमाल की 
वन्दे ब्लोगिस्तान , वन्दे ब्लोगिस्तान  


बड़े बड़े दिग्गज यहाँ पर मुँह की खाके जाते हैं 
ऐरे- गिरे नत्थू खैरों के भी दांव चल जाते हैं
हिंदी इंग्लिश भाषा -भाषी यहाँ मिलते हैं बड़े प्यार से 
जिनकी रग -रग में बहती हैं धाराएं ब्लॉगिंग नाम की
इक धारा में बहते सारे , बनते मोती ब्लोगिस्तान के
इस ब्लोगिंग को नमन करो ...................


छोटी मोटी बाधाएं ना ब्लोगरों को हिलाती हैं 
यहाँ लिखी रचनायें भी मील का पत्थर बन जाती हैं 
समीक्षाएं भी हो जाती हैं कालजयी भी बन जाती हैं
साहित्य की हर विधा यहाँ पर जानी जाती है 
नमन करो उस ब्लागस्पाट को जो ब्लोगिंग से जुड्वाता है
अन्दर बैठे कलाकार को बाहर लेकर आता है
 वन्दे ब्लोगिस्तान वन्दे ब्लोगिस्तान 




टिप्पणियां नाच नचाती हैं कभी अग्रीगेटर नाच नाचते हैं
मगर हम ब्लोगर हर बाधा को धता बताते हैं 
ब्लोगिंग की बहती धारा अपना इतिहास बनाएगी 
आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ सन्देश पहुंचाएगी
सलाम करो उस जज्बे को जो ब्लोगर मीट कराती है 
विश्व पटल पर हिंदी ब्लोगिंग अपना परचम फहराती है 
इस ब्लोगिंग को नमन करो ...............................

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

जीने के नए मानक गढ़ती हूँ…………

रोज नए चेहरे
छलने आते हैं
मुझे छल छल
जाते हैं और मैं
उस छल को जानकर भी
खुद को छलवाती हूँ
और कुछ देर के लिए
हकीकत से
पलायन कर जाती हूँ
मै ऐसा क्यूँ करती हूँ
ये एक प्रश्न है जिसका
उत्तर नहीं पाती हूँ
या
शायद जानती भी हूँ
मगर अन्जान रहना
चाहती हूँ
कुछ देर भ्रम में
जीने के लिए
या
 खुद से ही
भागना चाहती हूँ
इसलिए भ्रम में
जीकर हकीकत से
टकराने की कुछ
हिम्मत जुटाती हूँ
और बार बार
छली जाकर
एक नया अंकुर
उपजाती हूँ
खुद के पलायन से
नया तोहफा पाती हूँ
जीने के नए
मानक बना पाती हूँ
वो कहते हैं ना
गिर गिर कर ही इन्सान
संभालना सीखता है
और मैं खुद को छलवाकर
जीना सीखती हूँ
जीने के नए मानक
गढ़ती हूँ