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बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

ज़ख्मों का बाज़ार

ज़ख्मों को प्यार हमने दिया
तेरे दिए हर ज़ख्म को
दुलार हमने दिया
ज़ख्मों का बाज़ार
हमने भी लगा रखा है
एक बार हाथ लगाओ तो सही
ज़ख्मों को देख मुस्कुराओ तो सही
हर ज़ख्म से आवाज़ ये आएगी
यार मेरे , तुम एक नया ज़ख्म
और दे जाओ तो सही
आओ प्यार मेरे , ज़ख्मो को
नासूर बनाओ तो सही
प्यार का ये रंग भी
दिखाओ तो सही
बेवफाई नाम नही देंगे इसे
मोहब्बत का हर तोहफा कुबूल है हमें

15 टिप्‍पणियां:

GATHAREE ने कहा…

गहरा प्यार दर्शाती रचना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

प्यार का ये रंग भी
दिखाओ तो सही
बेवफाई नाम नही देंगे इसे
मोहब्बत का हर तोहफा कुबूल है हमें

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।
ऐसा लग रहा है कि ये रचना
आपने दिल से लिखी है।
बधाई!

ओम आर्य ने कहा…

bahut hi gahare bhaaw hai par jakham se bhare....badhayi!

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

बहुत खूब !

श्रीकांत पाराशर ने कहा…

sabd nahin hain tarif ke liye. bahut chhoti si magar achhi rachna.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ज़ख्मों को देख मुस्कुराओ तो सही
हर ज़ख्म से आवाज़ ये आएगी
यार मेरे , तुम एक नया ज़ख्म
और दे जाओ तो सही .....

आपके जख्मों की दास्ताँ कमाल की है ......... बहूत खूब लिखा है ..........

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति है इस रचना में ...बहुत बढ़िया

M VERMA ने कहा…

बेवफाई नाम नही देंगे इसे
मोहब्बत का हर तोहफा कुबूल है हमें
समर्पण और एहसास भावनाओ के साथ कूट कूट कर परिलक्षित हो रहे है.
बहुत सुन्दर

रश्मि प्रभा... ने कहा…

बहुत बढिया

MANOJ KUMAR ने कहा…

जख़्म था जख़्म का निशान भी था
दर्द का अपना इक मकान भी था।
बेहद रोचक रचना

संगीता पुरी ने कहा…

सही है .. अच्‍छा लिखा है !!

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

प्यार का ये रंग भी
दिखाओ तो सही
बेवफाई नाम नही देंगे इसे
मोहब्बत का हर तोहफा कुबूल है हमें

ये रंग़ भी पसंद आया। अति सुन्दर रचना।

Harkirat Haqeer ने कहा…

ज़ख्मों को प्यार हमने दिया
तेरे दिए हर ज़ख्म को
दुलार हमने दिया
ज़ख्मों का बाज़ार
हमने भी लगा रखा है
एक बार हाथ लगाओ तो सही
ज़ख्मों को देख मुस्कुराओ तो सही

वाह.....वंदना जी क्या बात है ....!!

औरत के पास तो ज़ख्मों का जखीरा होता है कोई ले तो सही ....!!

MUFLIS ने कहा…

मुहोब्बत का हर तोहफा कुबूल है हमें

इन्हीं चाँद अल्फाज़ ने पूरी नज़्म को
मुकम्मिल कर दिया है
लफ्ज़-लफ्ज़ इक पैगाम बन कर खुद
बोल रहा है
बहुत अच्छी रचना

बालकृष्ण अय्य्रर ने कहा…

अच्छी लाईनें है, याद रखी जाने लायक.
और कुछ याद भी आ गया.
"रश्क होता है जमाने को मेरे जख्मों से
मेरे हर जख्म से तेरा नाम नुमाँयाँ जो हुआ"