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बुधवार, 18 अप्रैल 2018

स्त्रियों के शहर में आज जम के बारिश हुई है

कृष्णपक्ष से शुक्लपक्ष तक की यात्रा है ये
आकाशगंगाओं ने खोल लिए हैं केश और चढ़ा ली है प्रत्यंचा
खगोलविद अचम्भे में हैं
ब्रह्माण्ड ने गेंद सम बदल लिया है पाला

ये सृष्टि का पुनर्जन्म है
लिखी जा रही है नयी इबारत मनु स्मृति से परे
ये न इतिहास है न पुराण
चाणक्य की शिखा काट कर टांग दी गयी है नभ पर
प्रतीकों को नहीं बनाना हथियार इस बार
भेस बदलने के चलन को कर निष्कासित
खिल रहा है स्वरूप धरती का

खामोशी की कंटीली डगर एक दुस्वप्न सरीखी
चाहे जितना करे स्यापा
चहक, महल, लहक की उजास से द्विगुणित हो गया सौन्दर्य

मंडप में विराजमान है आदिम सत्ता की राख
नृत्यरत है रक्कासा
देवियाँ बजा रही हैं दुन्दुभी और यक्षिणी फूल 

वहाँ रागों के बदल गए हैं सुर
पहले ख्वाब की पहली मोहब्बत सा
ये है उजास का पहला चुम्बन

स्त्रियों के शहर में आज जम के बारिश हुई है

शनिवार, 14 अप्रैल 2018

सुनो देवी

सुनो देवी
तुम तो नहीं हिन्दू या मुसलमान
फिर कैसे देखती रहीं अन्याय चुपचाप
क्यों न काली रूप में अवतरित हो
किया महिषासुर रक्तबीज शुम्भ निशुम्भ का नाश

सुनो देवी
क्या संभव है तुम्हें भी तालों में बंद रखना?
फिर क्यों नहीं खोले तुमने
चंड मुंडों के दिमाग
क्यों नहीं दुर्गा रूप में अवतरित हो
किया अत्याचारियों का विनाश

सुनो देवी
क्या मान लें अब हम
तुम्हारा अस्तित्व भी महज कपोल कल्पना है
क्या जरूरी है
इंसानियत और मानवता से उठ जाये सबका विश्वास
और आस्था हो जाए पंगु

देखो देवी देखो
चहुँ ओर मच रहा कैसा हाहाकार
जब ईश्वरीय अस्त्तिव भी प्रश्चिन्ह के कटघरे में खड़ा हो गया
और कोई राजनीतिज्ञ
राम और रहीम के नाम पर
अपनी रोटी सेंक गया
क्या महज उन्हीं के हाथ की कठपुतली हो तुम
या फिर
उन्हीं तक है तुम्हारी भी प्रतिबद्धता?

उठो देवी उठो
करो जागृत खुद को
करो सुसज्जित स्वयं को दिव्य हथियारों से
सिर्फ एक बार
कर दो वो ही भीषण रक्तपात
मिटा दानवों को दो मनुष्यता को आधार

गर न कर सको ऐसा
तो कर दो देवी पद का त्याग
जो भ्रम से तो बाहर आ जाए इंसान

ईश्वर सबसे संदेहात्मक दलील है ...

#आसिफा

रविवार, 8 अप्रैल 2018

बचे रहेंगे रंग मेरी नज़र में


जीवन का उल्लास हैं रंग. ज़िन्दगी में इंसान चाहता ही क्या है सिवाय रंगों के होने के. बिना रंगों के कैसा जीवन? कितना नीरस होता जीवन यदि उसमें रंग न होते. यहाँ तक कि प्रकृति भी समेटे हुए है जाने कितने रंग और शायद यही है कारण इंसान ने रंगों के महत्त्व को जाना , समझा और अपनाया. ऐसा ही एक रंग लिए आये हैं कवि-चित्रकार कुंवर रविन्द्र जी बोधि प्रकाशन से प्रकाशित अपने नए कविता संग्रह ‘बचे रहेंगे रंग’ के साथ.

कवि होने के साथ चित्रकार हैं या चित्रकार होने के साथ कवि ये तय करना जरूरी नहीं क्योंकि दोनों ही विधाओं में रविन्द्र जी की जबरदस्त पकड़ है. जब उनकी कलाकृति देखते हैं तो वो खुद बोलती है और जब उनकी कविता पढ़ते हैं तो वो अन्दर उतरती है, आपको पिन चुभाती रहती है. सहज सरल भाषा में बेहद साफगोई के साथ रविन्द्र जी अपनी बात रखते हैं. शब्दों की मितव्ययिता कोई उनसे सीखे लेकिन कम शब्दों में बड़ी बात कहना आसान नहीं होता. गागर में सागर भरती कवितायेँ पढने वाले के जेहन पर तीखा प्रहार करती हैं. जो कहते हैं वो तो आप पढ़ लेते हैं लेकिन जो अनकहा रह जाता है वो ही देर तक आपको सोचने पर विवश किये रहता है और यही कविता की सार्थकता है जो बाद तक आपको उद्वेलित करती रहे.

रंगों के चितेरे रंग ही जीवन में उतारते हैं फिर वो कैनवस हो या किताब. यहाँ कवि का अभिप्राय समझने की जरूरत है. यहाँ आखिर रंगों से कवि का क्या आशय है ये सोचना जरूरी है. यूँ तो ज़िन्दगी रंगों बिना अजाब है मगर इसी ज़िन्दगी में जब भ्रष्टाचार, असमानता, वैमनस्य , जातिवाद, राष्ट्रवाद आदि के स्याह रंग घुलते हैं तब जीवन कैसे दूभर हो जाता है तब एक कवि उद्वेलित हो कह उठता है और शायद यही उसकी दृष्टि है जो अन्धकार में भी प्रकाश खोज लेती है, उम्मीद का दामन कवि नहीं छोड़ता और कह उठता है – बचे रहेंगे रंग लेकिन कौन से रंग बचाना चाहता है कवि? ये भी सोचना जरूरी है और जब कवितायें पढो तो पता चलता है कवि कौन से रंग चाहता है ज़िन्दगी में. कवि चाहता है इंसानियत, मानवीयता, समानता, अपनेपन का रंग. यदि ये रंग बचे रहेंगे तो जीवन सहज हो जाएगा और कवि आशा का वाहक है. निराशा से आशा की ओर प्रस्थान करना ही संग्रह का उद्देश्य है. तभी कह उठता है – ‘मैं अँधेरे से नहीं डरता/ अँधेरा मुझसे डरता है/ मैं उजाला अपने हाथ में लेकर चलता हूँ’

कवि की चिंताएं हैं देश और समाज के प्रति, जहाँ विकास का झुनझुना सबको पकडाया गया है मगर एक जागरूक इंसान जानता है महज खोखली बातों से, सब्जबागों से कोई देश तरक्की नहीं कर सकता तभी तो गहरा कटाक्ष करता है ये कहकर तो साथ में मन की पीड़ा भी उभर कर आती है जो बताती है जागरूक है कवि – ‘एक दिन जब तुम सुबह सोकर उठाओगे/ तो देखोगे तुम्हारा गाँव स्मार्ट सिटी बन चूका है /बुलेट ट्रेन तुम्हारे गाँव के बीच से होकर गुजर रही है/ और तुम खुद को स्मार्ट सिटी के / किसी फुटपाथ पर भीख मांगते पाओगे/ तब समझ लेना विकास हो चूका है/ और तुम एक विकसित देश के /सभी व् सम्माननीय नागरिक हो’

क्योंकि कवि मन है तो व्यथित होना लाजिमी है. संवेदनशील होना ही कवि होने की पहली निशानी होती है तभी तो कविताओं के माध्यम से धर्म से परे इंसानियत को तरजीह देता है कवि ये कहते हुए- ‘मुझे दुःख नहीं होता / ईसाईयों के मारे जाने पर/ मुसलामानों या हिन्दुओं/ या फिर यहूदियों के मारे जाने पर/ मुझे दुःख नहीं होता/ मुझे बहुत दुःख होता है/ सिर्फ / इंसानों के मारे जाने पर’

वहीँ लोकतंत्र का अर्थ यही कोई जानना चाहे तो ‘माली हुई तम्बाकू’ कविता पढ़े तो जानेगा सच्चाई...कम शब्दों में गहरी मार करती कविता न केवल कटाक्ष करती है बल्कि हमारी कमजोरियों को भी उजागर करती है तो साथ ही बताती है कैसे हम अपने अधिकारों और कर्तव्यों का दुरूपयोग करते हैं. इसी तरह जंग लगा लोकतंत्र भी कवि को गंवारा नहीं तभी उम्मीद का दामन थामे है, आशा की किरण तमाम अन्धकार को मिटाने को काफी है फिर चाहे कितना भी वो असंवेदनशीलता दिखाएँ. व्यवस्था से व्यथित कवि सिवाय कटाक्ष के और कर क्या सकता है और वो अपनी कलम की धार से कहीं भी वार करने को नहीं चूकता. तभी तो कहने में संकोच नहीं करता कि बेशक कुएं सूखे, बच्चे मरें और तुम यानि शासक कितना भी पुरजोर कोशिश करे मिटाने की, हम नहीं मिटने वाले क्योंकि बाकी है अभी जिजीविषा. शायद यही है एक इंसान के अन्दर का जज्बा जो उसे हर कड़वा घूँट भरने के बाद भी बचाए रखता है. वहीँ ‘बनैले सूअर’ कविता के माध्यम से सोये हुओं को जगाने का आह्वान करता है कवि. इसी तरह कैसे आदिवासियों को सिर्फ वोट बैंक की तरह प्रयोग किया जाता है ये छोटी सी कविता द्वारा जाना जा सकता है जहाँ शहर और जंगल का फर्क ही ख़त्म हो चुका है तो आदमी एक प्रश्नचिन्ह बन चुका है जो वोट बैंक में तब्दील हो चुका है.

देश के प्रति कवि की चिंता हर दूसरी कविता में प्रगट हो रही है जहाँ हम सब जानते हैं, देखते हैं लेकिन कहने की हिम्मत नहीं कर पाते. वहीँ कवि सच्चाइयों को एक के बाद एक प्रस्तुत करता जाता है जब कहता है –‘लोगों के दिमाग निकाल कर/ किनारे रख दिए गए हैं/किस्से-कहानियों और मिथकों के बल पर/ उनके देखने, सोचने और समझने की शक्ति/ बड़ी सफाई से छीन ली गयी है/ झूठ और अफवाहों के बल पर/ एक ही लाठी से / गधे-घोड़े, गाय-भैंस और इंसान को हांका जा रहा है’ विचारणीय यहीं है आखिर क्यों ऐसा किया जा रहा है? क्या सिर्फ इसलिए कि शासक चाहते हैं किसी भी तरह खुद की वाहवाही फिर इसके लिए चाहे किसी भी हद को तोडा जाए, फिर इससे चाहे विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश किसी हिटलर के ख़्वाबों की भेंट चढ़ जाए और देश लोकतान्त्रिक ‘है’ से ‘था’ हो जाए. यही कटाक्ष फिर अगली कविता में अलग ढंग से उभरता है जब कवि फिर शासक के खिलाफ एक और दलील पेश करता है जहाँ शासक की दिखाई लोलीपोप से जनता सम्मोहित है और वो खुद ऐश कर रहा है वहीँ आम जनता यानि किसान आत्महत्या कर रहा है वहां एक कटाक्ष काफी है हकीकत बयां करने को – ‘ध्यान रहे/ देश की क़ानून व्यवस्था/ मृतकों के लिए नहीं होती’

‘यदि तुम चीख नहीं सकते’ कविता में मानो कवि यही कहना चाहता है उठो, खड़े हो, लड़ो अपने अधिकारों के लिए, सत्ता के रौब में मत रहो. जो डरता है , दबता है वो मारा जाता है इसलिए कर रहा है कवि आह्वान कि करो अपना ज़मीर जिंदा वर्ना मार दिए जाओगे किसी भी दिन या त्यौहार पर फिर वो होली दिवाली हो या ईद या चुनाव

कितनी कविताओं का जिक्र करूँ और किन्हें छोडूँ, दुविधा उत्पन्न हो जाती है जब जगह जगह कवि मन की व्याकुलता प्रकट होती है और ये सिर्फ कवि मन की ही व्याकुलता नहीं है, ये हम सबकी व्याकुलता है, हम सबके व्यथित ह्रदय की पुकार है जो कवि ने कविताओं के माध्यम से उकेरी है. एक जलता अलाव सीने में ज्वालामुखी सा धधक रहा है और कवि उसकी कुछ बूँद ही मानो अभी छींट पाया है, नहीं उंडेल पाया पूरा लावा वर्ना तहस नहस हो जाए सभ्यता. सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा कविता ने तो इस सच्चाई को साबित कर दिया है कि यदि आपकी जेब भरी है तभी आप इस देश के नागरिक कहलाने लायक हैं, ये देश आपका है और सबसे बड़ी बात आप इस देश के हुक्मरान हैं, आप उन पर भी राज कर सकते हैं जो शासक हैं क्योंकि न्याय उन्हीं के लिए होता है पैसे के बल पर ख़रीदा हुआ और अन्याय आम आदमी के संग, ऐसे में मान लो यदि नहीं जाग सकते कि ये देश अब तुम्हारा नहीं रहा. मानो कवि कहना चाहता है जिसकी जेब भारी देश उसी का बस इतने तक रह गयी है आज देशप्रेमी होने की परिभाषा. तार तार कर देती हैं कविताएँ राजनीति के रेशे रेशे को. एक एक बंद को खोल रही है कवि की कलम. कवि कम शब्दों में गहरी मार कर रहा है और जो नहीं कह रहा वो ही ज्यादा सुनाई दे रहा है. हत्यारे हों या पद्म सम्मान से किन्हें नवाज़ा जाता है आज या फिर अच्छे दिन या सीमा पर मरते जवान कोई शय नहीं जो कवि के कटाक्ष का माध्यम न बनी हो. कवि के मन की बेचैनी कविताओं के माध्यम से उभरती हुई हमारी बेचैनियों को पोषित करती है.

‘उसने कहा/देश मेरे इशारों पर चलेगा /यदि नहीं चला / तो मैं देश को बर्बाद कर दूंगा/ देश पहले से ही अपाहिज था/ उसके इशारों पर नहीं चल पाया/ और अंततः उसने देश बेच दिया/ मूर्खों की बस्ती में जश्न था/ बुद्धिजीवी कर रहे थे विलाप’ क्या इस कविता के बाद भी कहने को कुछ बचता है? कवि की निगाह हर विसंगति पर है और कहने से उसकी कलम चूकती नहीं.

संग्रह में कवि की धारदार कलम ने सत्ता के खिलाफ मानो बिगुल बजा दिया है और मानो यही कहना चाहता हो या कहो यही है कवि का आह्वान – ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’, मानो इसी के माध्यम से सोई जनता को उठाना चाहता है कवि, जगाना जरूरी है और ये काम कवि ही कर सकता है वो वक्त आने से पहले कि एक बार फिर देश विकास के नाम पर अदृश्य गुलामी की जंजीरों में जकड जाए. कवि की छटपटाहट बेशक कितनी हो लेकिन उन्हीं के बीच उम्मीद का दीया जलाया हुआ है जो चिन्हित करता है कितनी ही दुश्वारियां क्यों न हों राह में, कितने ही अंधेरों के बीहड़ हों, आशा का मद्धम सा जलता दीया काफी है जीवन की खूबसूरती को बचा सकने में, उम्मीदों, उमंगों, उल्लास और ख़ुशी के रंगों से जरूर रंगे रहेगा जीवन फिर चाहे हताश, निराश, कंटकाकीर्ण मार्ग ही क्यों न हो और यही तो हैं ज़िन्दगी के सच्चे रंग. एक चित्रकार से ज्यादा कौन रंगों के महत्त्व को समझ सकता है फिर वो कैनवस पर हों या ज़िन्दगी में.

रविन्द्र जी की बेबाक लेखनी के लिए उन्हें साधुवाद. उम्मीद है कवि जीवन के सभी रंगों को बचा ले जायेगा जब तक आशा की एक भी किरण बाकी है.

वंदना गुप्ता





बुधवार, 4 अप्रैल 2018

एक लड़की की डायरी के अंतिम पन्ने 2

लड़की बोल रही है चट्टान, लिख रही है दूब...लड़की खोज रही है संसार, पा रही है खार...वाकिफ नहीं हकीकत के प्रवाह से ...लड़की बह रही है नदी सी समय के चक्रव्यूह में...नहीं जानती, तोड़ी जायेगी, मरोड़ी जाएगी, काटी जायेगी, छिली जायेगी, तपाई जायेगी तब बनेगी बांसुरी जिस पर गुनगुनायी जायेगी कोई एकतरफा प्रेमधुन...प्रेम, वो ही जिसके पलड़े कभी सम नहीं होते, एक तरफ झुकाव ही जिसकी नियति होती है, जिसमे देह बजे सितार सी उनके हाथों, उनकी धुन पर नाचे ता थैया थैया थैयी ...और वो रात और दिन के क्रम बदल दें उसके लिए..ये वक्त की खामोशियाँ हैं, कौन सुनता है? बस चुप रहो और छू सको तो छू लो अंतर्मन के ख्याली पुलाव तक है तुम्हारी नियति!!!

दिन बदलने से बदलते हैं...सुन रही हो न? हाँ, तोड़ो अपने पैर में पहना तोडा, गर तोड़ सको...लड़की छूमंतर कर दो डर के कबूतर और उड़ जाने दो आसमां में...गूंगा बहरा होना नहीं है अंतिम विकल्प...यहाँ देह वो अजायबघर है जिसमे गुनगुना रहा है आदिम संगीत, निकलो देह से बाहर, तोड़ो चौखट, करो लड़की प्रयाण...महाप्रयाण से पहले!!!

फिर स्वप्न! आह कितने स्वप्न! कितनी बेड़ियाँ! कितनी कहानियाँ, कितने जन्म, कितनी मौत...साँस साँस मौत, फिर भी जिंदा है लड़की...आखिर क्यों?
स्वप्न गुनाह नहीं, स्वप्न भोर का वो तारा है जो रखता है तुममें तुम्हें जिंदा... लड़की...बचा लो खुद को...बचा लो स्वप्न को...बचा लो उम्मीद की अंतिम टिमटिमाती लौ को !!!


आकाश के कदली स्तम्भ पर टिकी है तुम्हारी सृष्टि...लड़की मत हिलाओ नींव कि दरकने पर दरक जाए तुम्हारे शहर का समूचा लहलहाता ढाँचा जो भरता है रंग इन्द्रधनुषी तुम्हारी ख्वाबगाह में...और तुम लपेट लेती हो सम्पूर्ण धरा को अपनी देह पर...धानी रंग से भर लेती हो मांग और हो जाती हो सुहागन !!!

लड़की मत मिटने दो न सृष्टि के अंतिम विकल्प को...तुम हो तो सृष्टि है...जिंदा रखो अपने पहले स्वप्न को, बनाओ उसे अंतिम स्वप्न...
आस के दरीचों में करो बागवानी...जहाँ उम्र निठल्ली बैठी रहे और तुम संवार लो ज़ुल्फ़ का उलझा बल 

ये उम्र की परछाइयाँ चुकाने का वक्त है!!!


लड़की जिंदा हो रही है फलसफों में ...
©vandana gupta

शनिवार, 31 मार्च 2018

एक लड़की की डायरी के अंतिम पन्ने-1

आशा की देह से उतार दी है चमड़ी और निराशा को दी हो ऐसा भी नहीं...साजन के प्यार का तबस्सुम घूँघट की ओट में ज्यादा खिलता है...जाना जब से, खुमारी है कि उतरती ही नहीं, सोच लड़की खिल उठी. किताबी ज्ञान ही उसकी प्रथम गुरु...

दिन सोने की सान चढ़ाए उगता और रातें चाँदी के केश फैला करती पदार्पण ...लड़की उमंग के घोड़े पर सवार कर रही थी यात्रा...दिल किसी परीलोक की यात्रा में मिलता अपने प्रियतम से...आह! बस सुखद स्वप्न कभी टूटे न!!!

वो स्वप्न ही क्या जो टूटे न? फिर तो स्वप्न देखा ही नहीं...स्वप्न का भी अपना विज्ञान होता है लेकिन समझे कौन? स्वप्न जो साकार हो बस वहीँ तक चाहना, विपरीत स्वर मान्य नहीं...मगर चाहत का बाज़ार कब स्वर्ण की सीढ़ी चढ़ा है...तुम करते रहो अजान या जपते रहो राम राम रावण तो आएगा ही यदि राम ने जन्म लिया है तो...फिर वो स्वप्न क्या जो टूटे ही नहीं फिर स्वप्न सुखद हो या दुखद!!!

और टूट गया स्वप्न जब हकीकत की आँच पर सुलगी लड़की की चाहतें, हसरतें, इच्छाएं...ब्याह किया था उसने अपनी चाहतों से, नहीं पता था कल के हाथ में है उसकी जीवन की डोर, जिसमे जब चाहे रोक लगा दी जाए और लगा दी गयी...लड़की मौन के गह्वर में सूख गयी...चुप की डोर जो पकड़ी तो उम्र भर निभाई...लड़की खुद को भूल गयी...अपना नाम भी...विस्मृति के घने जंगल में छूट गया उसका लड़कपन, वो ख्वाबों का घरौंदा, वो तितली के पंखों पर सवार अरमानों की डोली में विहार करती थी...स्मृति की स्लेट से मिट गया...अब मत पूछना उससे-वो कौन? 

एक लड़की की डायरी का अंतिम पन्ना पढना कभी...वो कहीं मिलेगी ही नहीं...टूट गया डाल से पत्ता, झडा, उड़ा और कहाँ गया किसने जाना...लड़की जान चुकी थी अपना भविष्य...ढल चुकी थी उस साँचे में जिसमें ढाली गयी...अब न अवशेष हैं न शेष, चाहे कितना चूलों में तेल डालो अब, जंग लगी चूलें फिर रवां नहीं हुआ करतीं...शून्य कितना बड़ा होता है उनका नहीं जान सकते, समा सकता है उसमे पूरा ब्रह्माण्ड, बस देखना कभी उस लड़की की आँख में उलझे उस शून्य को...खुद को न भुला दो तो कहना, फिर कभी आँख नहीं उठा सकोगे.

बस इतनी सी कहानी है उसकी जिसके रोम रोम में एक हाहाकार है, एक ज्वाला है, एक दर्द का चीत्कार है, एक लावा है, एक ज्वालामुखी है मगर भीतर से, बाहर का ठंडापन मात कर देगा उत्तरी ध्रुव को भी...फिर कहाँ खोजते हो अब पहचान चिन्ह? लड़की एक खोज का विषय भर रह गयी अब..पुरातत्ववेत्ता खोज में लगे हैं सदियों से!!!

युग बीते मगर
एक लड़की की डायरी का अंतिम पन्ना किसी ने कभी पढ़ा ही नहीं...अट्टहास कर रही है लड़की, सुनना कभी उसका अट्टहास, फट जायेंगे कान के परदे या फिर नष्ट हो जाएगी तुम्हारी सारी सभ्यता!!!


लड़की ख्वाब की दहलीज पर बैठी है आज भी...
©vandana gupta

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव
हम नमन के सिवा तुम्हें कुछ नहीं दे सकते
बदल चुकी है हवा
बदल चुकी हैं प्रतिबद्धताएं

वो दौर और था
ये दौर और है
बस इतने से समझ लेना सार
आज नहीं पैदा होती वो मिटटी
जिससे पैदा होते थे तुमसे लाल

और सुनो
ये नमन भी बस कुछ सालों तक चलेगा
आने वाला दौर शायद ऐसा भी हो जाए
पूछ ले नयी पौध
कौन भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव ?
क्यों लकीर पीट रहे हो
आगे क्यों नहीं देख रहे हो

आजकल कर्ज लेने और देने की परिभाषाएं बदल चुकी हैं
फिर तुम्हारे कर्ज का क्या मोल समझेंगे
जिस दौर में कर्ज ले भाग जाने का रिवाज़ है

उम्मीद के दीये में तेल ख़त्म होने की कगार पर है
बस कर सको तो कर लेना
नमन पर ही सब्र ...
 
दर्द का चेहरा बदल चुका है !!!



शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

बिजूका पर मेरी कवितायेँ

आपका लिखा कभी जाया नहीं होता इसका उदाहरण है ये कि हिंदी समय पर मेरी कवितायें शामिल हैं. वहाँ प्रोफ़ेसर संजीव जैन जी ने पढ़ीं और बिजूका समूह जो व्हाट्स एप पर बनाया गया है उस पर शेयर कीं. उसके बाद मुझसे 10 नयी कवितायें मांगी गयीं जिन्हें आज 'बिजूका' ब्लॉग पर स्थान मिला है. Satya Patel जी आपकी हार्दिक आभारी हूँ जो आपने कविताओं को इस लायक समझा और बिजूका पर जगह देकर मान बढाया.
आपका स्नेह मेरी कविताओं को यहाँ भी प्राप्त होगा ऐसी आशा करती हूँ. 

 https://bizooka2009.blogspot.in/2017/12/1.html?m=1


कवितायें सिर्फ लगाईं ही न जाएँ बल्कि उन का गहन अध्ययन कर उस पर अपनी पड़ताल भी प्रेषित की जाए तो लिखने वाला बहुत प्रेरित होता है. ऐसा ही यहाँ हुआ है. ऐसे में लगता है लिखना सार्थक हुआ. बिजूका का ये प्रयास बेहद सराहनीय है . एक बार फिर से हार्दिक आभार Satya Patel जी और अनिल कुमार पाण्डेय जी .
बिजूका ब्लॉग पर अनिल कुमार पाण्डेय जी ने कविताओं की पड़ताल भी की है और उस पर गहन व विस्तृत विवेचना भी की है.

https://bizooka2009.blogspot.in/2017/12/blog-post_8.html?m=1

सोमवार, 27 नवंबर 2017

सच कुछ और था - मेरी नज़र से

 
सुधा ओम ढींगरा जी का कहानी संग्रह 'सच कुछ और था' मिले तो शायद २ महीने बीत गए. पढ़ भी लिया गया था बस लिख नहीं पायी क्योंकि बीच में एक महीना मैं खुद लिखने पढने से दूर रही. आज वक्त और मूड दोनों ने साथ दिया तो कलम चल निकली.

लेखिका का लेखन ही उसकी पहचान का सशक्त हस्ताक्षर है इसलिए बिना किसी भूमिका के सीधे कहानियों पर अपना दृष्टिकोण रखती हूँ.

संग्रह की पहली ही कहानी 'अनुगूंज' एक साथ कई सन्दर्भों और समस्याओं को समेटे है. जहाँ लेखिका ने अपने लेखकीय कौशल से गागर में सागर भर दिया है. ये सच है भारतियों में बाहर खासतौर से अमेरिका में बेटी ब्याहना जैसे किसी स्वप्न के सच होने जैसा है लेकिन उसके साथ अनेक प्रश्न लेखिका उठाती चलती हैं कि क्यों भारतीय उसके सुखद भविष्य को अपने स्वप्न आकाश में ही देखते हैं बिना असलियत जाने समझे वहीँ कैसे वहां रहने वाले भारतीय भी अपनी उसी सोच से मुक्त नहीं हैं फिर चाहे किसी भी देश में रहा जाए. शराबी ऐय्याश पति और पूरा घर सास ससुर सहित उनके लिए भारतीय लड़की एक नौकरानी से इतर नहीं होती. और इसी मुद्दे को आकार देते हुए गुरप्रीत को जब मार दिया जाता है तो देवरानी मनप्रीत पर दबाव बना उनके पक्ष में गवाही देने के लिए मजबूर करना और फिर मनप्रीत का सूझबूझ से काम लेते हुए सत्य का साथ देना और खुद को भी उनके चंगुल से कैसे आज़ाद करना है इस पर भी लेखिका ने बहुत कुशलता से प्रकाश डाला है. एक साथ अनेक समस्याएं और उन सबको एक सूत्र में पिरोना आसान नहीं होता लेकिन लेखिका इसमें सिद्धहस्त हैं.

'उसकी खुशबू' कहानी पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे ऐसी ही कहानी पहले भी पढ़ी हों. जैसे किसी वक्त हम जासूसी नावेल पढ़ते थे तब ऐसे ही चरित्र आकार लेते थे वहीँ रहस्य और रोमांच से भरपूर कहानी में जूली नामक पात्र का अपनी खुशबू से मदहोश कर देना साथ ही उसके जीवित होने पर भी संदेह होना आदि ऐसे मोड़ हैं जो कहानी को रहस्यमयी बनाते हैं. वहीँ जैसे एक तरफ लेखिका ने रहस्य की चादर बनाया है जूली को जो मानो कहना चाहती हों वो मर चुकी है और अब उसकी आत्मा अपना बदला ले रही है. जब प्रेम असफल हो जाता है तब वो हिंसक हो जाता है और हिंसक प्रेम का मानो यही रूप होता है उसको दिग्दर्शित कर रही हों. एक कहानी अपने में जाने कितने आयाम समेटे हुए है.

शीर्षक कहानी 'सच कुछ और था' प्रेम त्रिकोण के चौथे कोण का मानो एक ऐसा वर्णन है जहाँ प्रेम तो उसे नहीं कहा जायेगा बल्कि एक जिद और एक काम्प्लेक्स इंसान को कैसे बर्बाद कर देता है, पूरी कहानी उसी का फलसफा है. कैसे एक इंसान जब उम्र भर काम्प्लेक्स में जीवन व्यतीत करता है . एक कुंठाग्रस्त इंसान कैसे अपना और सबका जीवन बर्बाद करता है , उसे लेखिका ने इस तरह लिखा है लगता है जैसे उन्होंने खुद अपनी आँखों के सामने ये सब घटित होते देखा हो. सच है, जो सच दुनिया जानती है और वास्तव में जो हकीकत होती है उसमे जमीन आसमान का अंतर होता है लेकिन ये दुनिया का दस्तूर है वो उसी पर विश्वास करती है जो सामने आता है, जबकि सत्य कई बार सात पर्दों की ओट में छुपा सिसक रहा होता है.
'तलाश जारी है' कहानी में एक बार फिर भारतीयों की मानसिकता और जुगाड़ की फितरत को लेखिका ने उजागर किया है तो वहीँ अमेरिका की पुलिस की मुस्तैदी और कैसे कानून पालन किये और करवाए जाते हैं, उन पर भी बखूबी प्रकाश डाला है.

संग्रह की कहानी 'विकल्प' यूँ तो आम कहानी जैसी लगेगी लेकिन विकल्प की तलाश कहो या विकल्प लेखिका ने कहाँ से खोजा, ये सोचने का विषय है क्योंकि अक्सर होता यही है यदि पति बच्चा पैदा करने योग्य नहीं तो ज्यादातर बच्चा गोद ले लेते हैं या जोर जबरदस्ती से सम्बन्ध बनवाकर बच्चा पैदा कर दिया जाता है य फिर आजकल तो वैज्ञानिक तकनीक डेवलप हो गयी हैं आर्टिफिशल इन्सैमिनेशन तो उनका प्रयोग कर बच्चा पैदा किया जा सकता है. लेकिन यहाँ पर लेखिका ने जो विकल्प खोजा है आज तक तो ऐसा कहीं सुना नहीं, पढ़ा नहीं. हो सकता है विदेश में ऐसा होता हो. जहाँ पूरे खानदान के ही मर्द बच्चा पैदा करने में सक्षम नहीं होते यानि जेनेटिक प्रॉब्लम. जहाँ स्पर्म शरीर छोड़ते ही कमजोर पड़ने लगते हैं वहां यदि कोई स्त्री अपना बच्चा चाहे यानि खुद माँ बनना चाहे और अपनी ही वंशबेल को बढ़ाना चाहे वहां यही विकल्प बचता है कि अपने ही घर के उस मर्द से संसर्ग करे जिसमे ये समस्या न हो या कम हो और यही विकल्प यहाँ अपनाया जाता है. जो पाठक के हलक से भी जल्दी नीचे नहीं उतरता. लेकिन लेखिका एक ऐसी कंट्री में रहती हैं जहाँ सब कुछ संभव है और हो सकता है ऐसा कुछ उन्होंने देखा या सुना हो और जिसने इस तरह कहानी के रूप में आकार लिया हो क्योंकि लेखक कोई हो बेशक अपनी कल्पना से पात्रों को गढ़ता है मगर कहीं न कहीं जमीन अपना या आस पास का अनुभव ही होती है.

'काश ऐसा होता' एक संवेदनशील छोटी से कहानी अपने आप में एक बड़ा कैनवस लिए है. वृद्धावस्था खुद में एक समस्या सी आजकल दिखती है ऐसे में दो देशों की सोच और संस्कृति का फर्क लेखिका ने कहानी के माध्यम से व्यक्त किया है. जहाँ बच्चे अपने परिवारों में व्यस्त हो जाते हैं वहां बुजुर्ग उपेक्षित. ऐसे में जरूरी है जीवन में आगे बढ़ना और कहानी के माध्यम से लेखिका ने वही दर्शाया है. कैसे विदेश में दो बुजुर्ग अपने एकाकीपन को आपस में विवाह का फैसला कर दूर करते हैं वहीँ अपने देश में यदि कोई ऐसा सोचे भी तो जाने कितनी तोहमतों का शिकार हो जाए. बेशक कोई उनके एकाकीपन को समझे नहीं और उनके लिए कुछ करे भी नहीं लेकिन यदि वो यहाँ ऐसा कदम उठाये तो जैसे समाज से ही निष्कासित सा हो जाता है. यही दो देशों की सोच का फर्क इंगित होता है.

'क्यों ब्याही परदेस' एक बार फिर देश और विदेश की संस्कृति की भिन्नता के साथ वहां जाने पर जो लडकियाँ महसूस करती हैं उसका मार्मिक चित्रण है, जिस पर अक्सर ध्यान ही नहीं दिया जाता. कैसे विश्वासघात होते हैं, कैसे सब अपनी ज़िन्दगी में मस्त रहते हैं तो वहीँ खान पान, नियम कानून आदि सब का दर्शन एक पत्र के माध्यम से लेखिका कराती चलती हैं.

'और आंसू टपकते रहे' ऐसी कहानी जो या तो निचले तबके के हर चौथे घर में दिखाई पड़ेगी या फिर मजबूरी के मारे के घर में. लड़की होना जैसे गुनाह. स्त्री है तो केवल देह. बस इससे इतर उसका अस्तित्व ही नहीं. कैसे एक माँ का साया सर से उठ जाए तो बेटी का जीवन देह की दलदल में झोंक दिया जाता है उसका चित्रण है कहानी. वहीं यदि कोई समय रहते साथ दे दे तो निकल सकती हैं ये लड़कियां उस दलदल से लेकिन आज की आपाधापी वाली ज़िन्दगी में शायद इतनी मानवीय संवेदनाएं ही नहीं बचीं जो किसी और के दर्द को उस हद तक महसूस कर सकें. और यदि किसी में जागृत भी हो जाएँ तो जरूरी नहीं वक्त रहते जागृत हो सकें, फिर पछतावे के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता मानो यही लेखिका कहना चाह रही हैं. अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत वाली उक्ति यहीं चरितार्थ होती है मानो लेखिका कहना चाहती हैं कि यदि तुम समाज को साफ़ सुथरा देखना चाहते हो तो जरूरी है अपने सब जरूरी कामों को पीछे कर मानवीयता के पक्ष को आगे रखना ताकि किसी का जीवन संवर सके क्योंकि पैसा ज़िन्दगी भर कमा सकते हो लेकिन किसी का जीवन बचाने के लिए जरूरी है संवेदना का होना.

बेघर सच, विषबीज और पासवर्ड ये पहले भी कहानी संग्रहों में शामिल कहानियाँ हैं जिन पर पहले ही काफी बात हो चुकी है.

कुल मिलाकर संग्रह की ग्यारह कहानियों में स्त्री जीवन, प्रेम , छल, विश्वासघात और दो देशों का तुलनात्मक अध्ययन कर लेखिका ने आज मानव जीवन की विडम्बनाओं को रेखांकित किया है कैसे मानव कहीं रहे लेकिन अपनी नेचर नहीं छोड़ता. लेखिका अपनी कहानियों में मनोवैज्ञानिक स्तर तक पहुँचती हैं और फिर पात्रों और घटनाओं के माध्यम से कहानी को न केवल आयाम देती हैं बल्कि हर विसंगति पर उनकी नज़र पड़ती है और उसकी गहरी पड़ताल करती चलती हैं और यही एक लेखक का काम होता है. बस जरूरत है हर अच्छाई और बुराई पर प्रकाश डालते चलना शायद किसी का जीवन सुधर जाए और लेखन सफल हो जाए, कहानियां पढ़ ऐसा महसूस होता है मानो यही लेखिका का असल मंतव्य है कहानी लेखन का. लेखिका बधाई की पात्र हैं. आशा है हमें आगे भी उनकी लेखनी इसी प्रकार धन्य करती रहेगी. शुभकामनाओं के साथ .....

शनिवार, 9 सितंबर 2017

अँधा युग

गोली और गाली
जो बन चुके हैं पर्यायवाची
इस अंधे युग की बनकर सौगात
लगाते हैं ठिकाने
बडबोली जुबान को

तुम , तुम्हारी जुबान और तुम्हारी कलम
रहन है सत्ता की
नहीं बर्दाश्त सत्ता को कलम का अनायास चल जाना
बन्दूक की निकली गोली सा
गर करोगे विद्रोह तो गोली मिलेगी
और मरने के बाद गालियों के फूलों से सजेगी तुम्हारी राख

आमूलचूल परिवर्तन आ चुका है हवाओं में
अब नहीं बहा करती हवा
पूरब से पश्चिम या उत्तर से दक्षिण
अब हवाएँ बहती हैं ऊपर से नीचे
आग उगलती हुईं, झुलसाती हुईं , मिटाती हुईं

ये नया युग है
नाम है अँधा युग
यहाँ जरूरत है ऐसे ताबेदारों की
जो फूँक से पहाड़ उड़ा दें
जो दस्तावेजों से हकीकत मिटा दें
जो देशभक्त को गद्दार बता दें
आओ , नवाओ सिर
कि कलम हो जाओ उससे पहले...
तुम थोथे चने हो
निराश हताश जंगल के बिखरे तिनके
कोई संगठित बुहारी नहीं
जो बुहार ले कूड़े करकट के ढेर को

सांत्वना के शब्द ख़त्म हो चुके हैं शब्दकोशों से
अब तुम तय करो अपना भविष्य
प्रतिमाएं स्थापित करने का युग है ये
शब्दों के कोड़ों से अक्सर उभर आते हैं नीले निशान
बच सको तो बच के रहना
ये वक्त न प्रतिशोध का है न प्रतिरोध का

दानव मुँह फाड़े खड़ा है
दाढ़ों में फँसने को हो जाओ सज्ज



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©वन्दना गुप्ता vandana gupta  

रविवार, 3 सितंबर 2017

हारे हुए सपनों की सनक

सपनों की लुगदी बनाओ 
और चिपका लेना ज़िन्दगी का फटा पन्ना 
उसने कहा था ......
और मैंने ब्रह्म्वाक्य मान किया अनुसरण 

आज हारे हुए सपनों की भीड़ में खड़ी
पन्ना पन्ना अलग कर रही हूँ 
तो हर पन्ना मुंह चिढ़ा रहा है 
मानो कह रहा है 
सपने भी कभी सच होते हैं ...........
और मेरे हारे हुए सपनों की सनक तो देखिये 
अनशन पर बैठ गए हैं 


जबकि जानते हैं ये सत्य सपनो के आकाश कभी नीले नहीं हुआ करते ..........

बुधवार, 16 अगस्त 2017

बातें हैं बातों का क्या .......

अम्बुआ की डाली पर
चाहे न कुहुके कोयल
किसी अलसाई शाम से
चाहे न हो गुफ्तगू
कोई बेनामी ख़त चाहे
किसी चौराहे पर क्यों न पढ़ लिया जाए
ज़िन्दगी का कोई नया
शब्दकोष ही क्यों न गढ़ लिया जाये
अंततः
बातें हैं बातों का क्या ...

अब के देवता नहीं बाँचा करते
यादों की गठरी से ... मृत्युपत्र

न दिन बचना है न रातें
फिर बातों का भला क्या औचित्य ?

श्वेत केशराशि भी कहीं लुभावनी हुआ करती हैं
फिर
क्यों बोझिल करें अनुवाद की प्रक्रिया

जाओ रहो मस्त मगन
मेरे बाद न मैं , मेरे साथ भी न मैं
बस सम ही है अंतिम विकल्प समस्त निर्द्वंदता का

कौन हल की कील से खोदे पहाड़ ?




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रविवार, 13 अगस्त 2017

देश में सब ठीक ठाक है

चलिए शोक मनाईये ... दो मिनट का मौन रखिये ... एक समिति गठित कीजिये और विभागीय कार्यवाही करिए ...... बस इतना करना काफी है उनके घावों पर मरहम लगाने को और पूरा घाव ठीक करने को २०-२५ लाख दे कर कर दीजिये इतिश्री अपने कर्तव्य की .....आखिर सरकार माई बाप हैं आप और माई बाप को सिर्फ एक को ही थोड़े देखना है .....पूरा देश उनके बच्चों सरीखा है और हर बच्चे का ध्यान रखना जरूरी है ऐसे में यदि दो चार उपेक्षित भी हो जाएँ तो फर्क नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि अगस्त में बच्चे तो मरते ही रहते हैं ........माई बाप हम अनपढ़ गंवार कहाँ जान सकते हैं और समझ सकते हैं आपकी देशभक्ति. आपकी सुरक्षा चाक चौबंद होनी जरूरी है बच्चों का क्या है ये तो पैदा होते ही मरने के लिए हैं जैसे आम जनता. क्या देशहित में इतना बलिदान नहीं कर सकती जनता. आप तिरंगा फहराइए 15 अगस्त पर जनाब .....लाल किले से भाषण जरूरी है आखिर स्वतन्त्रता का उत्सव जो ठहरा तो क्या हुआ जो कुछ घरों के चिराग बुझ गए और वो मातम मनाते रहें उस दिन , हर दिन , सालों साल, उम्र भर ...... अनुशासन तो अनुशासन ठहरा. कर्तव्य है आपका देश को संबोधित करना, उन्हें बताना सब ठीक है, आपने सब ठीक कर दिया है, देश विकास कर रहा है तो क्या हुआ जो कोई माँ बौरा ही गयी हो रोते रोते. किसी पिता की चीख नहीं पहुंचेगी आपके कान तक. विकास की दिशा में जनता की आहुति होती रहनी चाहिए आखिर आपने भ्रष्टाचार ख़त्म कर दिया, विदेशी धन वापस ले आये, इनकम टैक्स चोरी ख़त्म कर दी, गायों की रक्षा की, किसान सुखी हो चुका, उसने आत्महत्या करनी बंद कर दी, लड़कियां देखिये कितने सुरक्षित हैं आधी रात भी निकलें तो मजाल है कोई निगाह भी उठा ले उनके बलात्कार होने बंद हो चुके ये तो विपक्ष या मीडिया हल्ला मचाता है वर्ना आपने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, यहाँ तक कि पाठ्यक्रम में बदलाव कहाँ किसी ने किया वहाँ प्रेमचंद, टैगोर , ग़ालिब आदि को हटाने की जुर्रत भला किसी में थी आपने वो भी करने की ठान ली ...भला और कोई कहाँ कर पाया इतना पिछले 70 सालों में जो आपने 3 साल में कर दिखाया ......नतमस्तक है हुजूर जनता आपके चरणों में ......बंदगी करने को जरूरी है खुद को देशभक्त दिखाना क्योंकि यही है आज की सच्ची परिभाषा ....गर करोगे विद्रोह या नहीं कहेंगे आपके पक्ष में तो देशद्रोही करार दिए जाते हैं ........तो हुजूर , आप हैं तो हम हैं वर्ना हममें भला कहाँ दम है ......न हुजूर ये आप पर न व्यंग्य है न तोहमत ..... आपका इस्तकबाल करती है जनता. आपने इतना कुछ दिया जनता को कि आँखें डबडबा जाती हैं, मुंह से बोल नहीं फूट रहे, कलेजा फटा जा रहा है आपकी दरियादिली से ... बहुत बहुत शुक्रिया सरकार आपका , वाकई रामराज्य आ गया और अगले दो सालों में तो शायद जनता वैकुण्ठ दर्शन कर ले .... जय हिन्द , १५ अगस्त की आपको शुभकामनाएं जनता की तरफ से .......देश में सब ठीक ठाक है आप अपना भाषण और भ्रमण जारी रखिये

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

ये मेरी हत्या का समय है

ये मेरी हत्या का समय है
न कोई पूर्वाभास नहीं
कोई दुर्भाव नहीं
बस जानता हूँ
तलवारों की दुधारी धार को

मैं विवश हूँ
स्वीकारने को नियति
धिक्कारने को प्रगति
जिसकी बिनाह पर हो रहे हैं कत्ले आम

धरोहरें सहमी खड़ी हैं
अपनी बारी की प्रतीक्षा में
बाढ़ में बहते धान की चीखें कब किसी कान तक पहुंची हैं

दुर्भावना मेरा स्वभाव है
और सम्भावना उनका
तो सोच लो
क्या होगा हश्र
या कहूँ
यही है सच
ये मेरी हत्या का समय है


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(ये पोस्ट पूर्णतया कॉपीराइट प्रोटेक्टेड है, ये किसी भी अन्य लेख या बौद्धिक संम्पति की नकल नहीं है।
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©वन्दना गुप्ता vandana gupta)

सोमवार, 24 जुलाई 2017

'वो सफ़र था कि मुकाम था' - मेरी नज़र से


Maitreyi Pushpa जी की लिखी संस्मरणात्मक पुस्तक पर मेरे द्वारा लिखी समीक्षा "शिवना साहित्यिकी" के जुलाई-सितम्बर 2017 अंक में प्रकाशित हुई है ......जो चित्र में न पढ़ पायें उनके लिए यहाँ भी लगा रही हूँ....शिवना प्रकाशन की हार्दिक शुक्रगुजार हूँ जो उन्होंने मेरी प्रतिक्रिया को प्रकाशित किया :

‘वो सफ़र था कि मुकाम था’ मैत्रेयी पुष्पा जी द्वारा लिखी एक संस्मरणात्मक पुस्तक तो है ही शायद राजेंद्र यादव जी को दी गयी एक श्रद्धांजलि भी है और शायद खुद से भी एक संवाद है , प्रतिवाद है . 

मुझे नहीं पता कैसे सम्बन्ध थे मैत्रेयी जी और राजेन्द्र जी के और न जानने की उत्सुकता क्योंकि एक स्त्री होने के नाते जानती हूँ यहाँ तथ्यों को कैसे तोडा मरोड़ा जाता है . मुझे तो पढने की उत्सुकता थी कैसे किसी के जाने के बाद जो शून्य उभरता है उसे लेखन भरता है. इस किताब में शायद उसी शून्य को भरने की लेखिका द्वारा कोशिश की गयी है मगर शून्य की जगह कोई नहीं ले सकता. शून्य का कोई विलोम भी नहीं. यानि लेखिका की ज़िन्दगी में जो शून्य पसरा है अब उम्र भर नहीं भर सकता. जिस गुरु, पथप्रदर्शक, विचारक , दोस्त के साथ ज़िन्दगी के २०-२२ साल गुजरे हों तमाम सहमतियों और असहमतियों के बाद भी, क्या उसे किसी भी वस्तु, मनुष्य या अनर्गल संवाद से विस्थापित किया जा सकता है . ये रिश्ता क्या कहलाता है , ये जानने की उत्सुकता तो सभी को रही लेकिन ये रिश्ता कैसे निभाया जाता है शायद ही कोई समझ पाया हो. जहाँ भी स्त्री और पुरुष हों वहां उनके कैसे स्वच्छ सम्बन्ध हो सकते हैं ? ये हमारी मानसिकता में घोंट घोंट का ठूंसा गया है तो उससे अधिक हम सोच भी नहीं सकते जबकि रिश्ता कोई हो वो भरोसे की नींव पर ही टिक सकता है और शायद दोनों ने ही उस भरोसे को कायम रखने की कोशिश की तभी इतना लम्बा सफ़र तय कर पाया . हो सकता है राजेंद्र जी की छवि के कारण मैत्रेयी जी को भी वैसा ही माना गया हो क्योंकि कहते हैं ताड़ी के पेड़ के नीचे बैठकर गंगाजल भी पियो तो भी आपको शराबी ही समझा जाएगा और शायद उसी का शिकार ये सम्बन्ध भी रहा. 

मैं ये मानती हूँ जो भी लेखक लिख रहा है वो सच लिख रहा है खासतौर से यदि वो संस्मरण हों या आत्मकथा जबकि कहते हैं आत्मकथा में भी थोड़ी लिबर्टी ले ली जाती है लेकिन जब श्रद्धांजलि स्वरुप कुछ लिखा जाए तो वहां कैसे किसी अतिश्योक्ति के लिए जगह होगी . वैसे भी मैंने न तो आज तक राजेन्द्र जी को पढ़ा न मैत्रेयी जी को इसलिए निष्पक्ष होकर पढने का अलग ही मज़ा है बिना कुछ जाने. किताब पढो तो लगता है सफ़र में हम साथ ही तो चल रहे हैं उन दोनों के फिर उसे मुकाम कैसे कहें. लेखिका ने अपनी भावनाओं के सागर में डुबकी लगा कैसे चुनिन्दा लम्हों को कैद किया होगा , ये आसान नहीं. खासतौर से तब जब जिसे श्रद्धांजलि आप दे रहे हैं उसके अच्छे और बुरे दोनों पक्षों से आप वाकिफ हो चुके हों. फिर भी उन्होंने अपने साहस का परिचय दिया . राजेंद्र जी सकारात्मक में नकारात्मक छवि और नकारात्मक में सकारात्मक छवि का अद्वितीय उदाहरण थे. लेखिका को उनके जीवन की कुंठा भी पता थी तो उनकी महत्वाकांक्षा भी . तभी संभव हो पाया उनके दोनों पक्षों से न्याय करना . राजेन्द्र जी कैसे व्यक्तित्व थे मुझे नहीं पता क्योंकि न कभी मिली न उन्हें जानती थी न कभी देखा. जितना जाना , पढ़ा उनके बारे में तो नेट पर किसी पोस्ट में या फिर अब इस किताब में तो मेरे अन्दर की स्त्री की छटी इंद्री यही कहती है कहीं न कहीं अपने पिता द्वारा तिरस्कृत व्यक्तित्व थे वो जो उपेक्षा का जब शिकार हुए तो उन्होंने उसे भी अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाने का फैसला कर लिया. यानि अपनी कमियों को अपनी ताकत बनाया और पिता का कहा एक वाक्य – ‘कौन इससे अपनी बेटी ब्याहेगा’ ने मानो उन्हें जीने की वजह दे दी. खुद से और ज़माने से लड़ने का विचार भी और इसके लिए उन्होंने मानो यही सोचा हो अब खुद को इतना बड़ा बनाओ कि ये कहावत सही सिद्ध हो जाए – खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है . इसे ज़िन्दगी का मूलमंत्र बना मानो उन्होंने पूरी तयारी के साथ साहित्य जगत में कदम रखा तो एक क्या जाने कितने ही नाम उनसे जुड़ते चले गए . मतलब अपनी अपनी गरज से जुड़ने वाले रिश्ते कितने खोखले होते हैं ये सभी जानते हैं और ऐसा ही यहाँ होता रहा और उनकी छवि मानो एक प्ले बॉय जैसी बन गयी . मानो एक धधकती आग को वहीँ विराम मिला कि देखो आज लाइन लगी है मेरे पास , मानो अपने पिता को वो एक जवाब देना चाहते हों कि यहाँ इंसान की कमी मायने नहीं रखती बस जरूरत है खुद को ऐसा बना लो कि दुनिया चरणों में झुकने लगे. इसका ये मतलब नहीं उन्होंने किसी का जबरदस्ती फायदा उठाया जैसा कि लेखिका ने कहा . जो जिस उद्देश्य से आया उसे वो सब मिला वहीँ राजेन्द्र जी के अन्दर एक सच्चे प्यार की प्यास का भी लेखिका ने दिग्दर्शन तो कराया वहीँ एक सच से भी जैसे पर्दा उठाया मानो इस बहाने कहना चाहती हों लेखिका कि उनके अन्दर बेशक चाहत तो थी लेकिन सबसे ऊपर था उनका स्वभाव जिसे वो किसी के लिए नहीं बदल सकते थे . मन्नू जी से शादी भी जैसे एक समझौता था दोनों के मध्य जैसा कि लेखिका ने कहा . कोई नहीं जानता किसने किस उद्देश्य से सम्बन्ध जोड़ा और फिर अलग हुए क्योंकि दोनों की अपनी अपनी अपेक्षाएं थीं एक दूसरे से जिस पर दोनों ही शायद खरे न उतरें हों. इस सन्दर्भ में भी लेखिका ने अपना पक्ष साथ साथ रखा जिससे यदि सिद्ध हुआ वो उनके मध्य नहीं थीं या वो कारण नहीं थीं उनके अलगाव का क्योंकि जो सम्बन्ध जरूरतों से बनते हैं वो एक मोड़ पर आकर अलग रास्ता अख्तियार ही कर लेते हैं फिर वो राजेन्द्र जी ही क्यों न हों जिन्होंने मानो खुद को और अपने पिता और ज़माने को दिखाना चाहा हो कि अपाहिज होने से ज़िन्दगी नहीं रुका करती. हम इस सम्बन्ध पर कुछ नहीं कह सकते कौन कितना सही था और कितना गलत क्योंकि पति पत्नी का रिश्ता तो होता ही विश्वास का है और यदि वो टूटा तो वहां सिवाय किरचों के कुछ नहीं बचता जो उम्र भर सिर्फ चुभने के लिए होती हैं . लोग कह सकते हैं औरत उनकी कमजोरी थी या ये भी कहा जा सकता था वो आगे बढ़ने की सीढ़ी थे लेकिन जो भी था वो सच हर कोई अपने अन्दर जानता है उसकी क्या पड़ताल की जाए . 

यहाँ एक बात और उभर कर आई खासतौर से तब जब लेखिका स्त्री विमर्श के लिए खड़ी होती हैं और औरतों के लिए छिनाल शब्द का प्रयोग किया जाता है तब लेखिका की आँखों से जाने कितने परदे हटते हैं . जिस विश्वास के सहारे उनका रिश्ता आगे बढ़ता रहा वो एकदम दरक गया मानो लेखिका कहना चाहती हो जरूरी नहीं आप किसी के साथ अपना ज्यादा से ज्यादा वक्त गुजार लें फिर भी उसे पहचान लेने का दावा कर सकें . एक चेहरे में छिपे हैं कई कई आदमी जब भी देखना जरा गौर से देखना . लेखिका के साथ यही हुआ मानो कांच छन् से टूट गया. वो इंसान जिसने उन्हें कदम कदम पर स्त्रियों के हक़ के लिए लड़ना सिखाया हो, बोलना सिखाया हो, लिखना सिखाया हो यदि अचानक वो ही उन्हें ऐसे विमर्श से हटने को कहने लगे तो कैसा लग सकता है ये शायद लेखिका से बेहतर कोई नहीं जान सकता. शायद वो अब भी उतना नहीं कह पायीं जितना अन्दर रख लिया. किस अंदरूनी कशमकश से गुजरी होंगी वो उस दौर में इसका तो अंदाज़ा लगाना भी आसान नहीं . जिसे अपना गुरु, पथ प्रदर्शक माना हो , अपना सबसे अच्छा दोस्त माना हो जिससे आप अपने घर परिवार की , पति पत्नी के संबंधों की वो बातें भी कह सुन सकते हों जो शायद अपने पति से भी कोई पत्नी कभी न कह पाती हो, यदि वो ही आपको दबाने लगे, चुप रहने को कहने लगे और आपको बीच समंदर में अकेला छोड़ दे तो कैसा लगता होगा ये वो ही जानता है जिस पर गुजरी हो लेकिन इस किस्से से जो एक बात सामने आई वो ये कि राजेन्द्र जी चाहे जितना ऊँचा नाम रहे हों लेकिन उनके अन्दर के मर्द के अहम् को चोट लगती है , वो भी बाकी मर्दों से इतर नहीं क्योंकि कौन कह सकता है या कौन जान सकता है जो मर्दों की पार्टियाँ होती हैं या कहिये साहित्यकारों की पार्टियाँ होती हैं उसमे किस हद तक बातें होती हैं और फिर राजेंद्र जी जैसी शख्सियत हो सकता है बढ़ा चढ़ा कर कह देते हों अपने संबंधों के बारे में लोगों से सिर्फ अपना दबदबा दिखाने को , सबकी नज़र में चढ़ने को क्योंकि जो इंसान अपने पिता के शब्द बर्दाश्त न कर पाया हो वो किसी भी हद तक जा सकता है . कौन जानता है उन पार्टीज में महिलाओं और उनके लेखन के लिए कैसी बातें होती हों और शायद जो भी अच्छा या बुरा मैत्रेयी जी के बारे में कहा गया वो उन्ही का उड़ाया हो क्योंकि बिना आग के धुंआ नहीं होता जैसे वैसे ही बेपर की बातें ऐसे ही उडाई जाती हैं फिर ये साहित्य की दुनिया है यहाँ तो आज भी ऐसा हो रहा है फिर वो तो राजेंद्र यादव थे उनके बारे में तो विरोधियों को भी मसाला चाहिए होता होगा ऐसे में यदि वो कोई बात अपनी शेखी बघारने को हलके में भी कहते हों तो संभव है उसे नमक मिर्च लगाकर आगे फैलाया जाता रहा हो . होने को कुछ भी हो सकता है. लेकिन हम बात करते हैं लेखिका और राजेंद्र जी के सम्बन्ध की तो जब इस किताब को मैं पढ़ रही थी तो मुझे अपनी लिखी ही एक कहानी याद आ रही थी - ‘अमर प्रेम’ जहाँ पति , पत्नी और वो का त्रिकोण है जिसमे तीसरे कोण को स्वीकारा गया है पति द्वारा, जो कम से कम हमारे आज के समाज में फिलहाल तो संभव नहीं मगर मैत्रेयी जी और उनके परिवार के सम्बन्ध देखकर यही लगता है जैसे इन तीनों ने इस रिश्ते को जीकर मेरी कहानी को ही सार्थकता प्रदान की हो. यहाँ गुरु शिष्या का रिश्ता था , दोस्ती का रिश्ता था तो एक आत्मिक सम्बन्ध था जो दोस्ती या गुरु शिष्य के सम्बन्ध से भी ऊपर था जिसमे पूरी पवित्रता थी . जरूरी नहीं शारीरिक सम्बन्ध बनें ही यदि वो स्त्री और पुरुष हैं तो बिना सम्बन्ध बनाए भी किसी रिश्ते को कैसे जीया जाता है, कैसे निभाया जाता है ये शायद इन्ही के रिश्ते में देखने को मिलता है , अब कयास लगाने वाले चाहे जो कयास लगायें या कहें अपनी आत्मा के आईने में लकीर नहीं होनी चाहिए और यही तो लेखिका ने लिखकर साबित किया मानो उन सब बड़बोलों को चुप कराने को ही लेखिका ने अब अपने सम्बन्ध की पवित्रता उजागर की हो और कयासों को विराम दिया हो. किसी भी सम्बन्ध की सार्थकता उसकी गहराई में होती है और यहाँ अनेक असहमतियाँ होने के वाबजूद भी किसी ने किसी को नहीं छोड़ा. अंत तक निबाहा और शायद यही इस रिश्ते की सबसे बड़ी खूबसूरती है . 

आज साहित्यिक समाज जो चाहे सोचे जो चाहे कहे मगर लेखिका ने अपने सम्बन्ध की परत-दर-परत उधेड़ दी वर्ना चाहती तो राजेन्द्र जी की नकारात्मक छवि को छुपा भी सकती थीं लेकिन उन्होंने कहीं कुछ नहीं छुपाया बिना लाग लपेट के ज्यों का त्यों धर दिया , बस यही उनकी सच्चाई का प्रमाण है . लेखिका कितना द्वन्द में घिरी , कितनी छटपटाहट से गुजरी और फिर अपने अंतर्विरोधों से खुद को वापस मोड़ा ये पंक्ति दर पंक्ति सामने दीखता है फिर लेखन से न्याय करना आसान नहीं. अपनी बेचैनी और पीड़ा से एक युद्ध लगातार चलता रहा लेखिका का और उस सबके साथ हर रिश्ते के साथ न्याय करते चलना, अपने लेखन को भी जगह देते चलना आसान नहीं मगर लेखिका जैसे तलवार की धार पर चलीं सिर्फ अपने लेखन के जूनून के बलबूते . निजी और साहित्यिक जीवन के मध्य समन्वय स्थापित करना आसान नहीं होता ये वो दलदल है जिसमे एक बार धंसे तो कीच लगे बिना बाहर नहीं निकल सकते क्योंकि यहाँ ऊपर चढाने वाला यदि एक हाथ होगा तो खींचने वाले हजार . यहाँ तो बिन किसी प्रतिस्पर्धा के स्पर्धा होती है , उसकी लेखनी मेरी लेखनी से बेहतर कैसे की तर्ज पर सरकारें बनायी और मिटाई जाती हैं ऐसे में लेखिका ने संतुलन स्थापित करते हुए अपना सफ़र तय किया जिसमे राजेन्द्र जी जैसे पथ प्रदर्शक, गुरु, दोस्त ने उनका साथ दिया.

जब कोई सिर्फ एक पाठक के नाते इस किताब को निष्पक्ष होकर पढ़ेगा तभी उसकी सच्चाई या प्रमाणिकता को स्वीकार कर सकेगा लेकिन पूर्वाग्रह से ग्रस्त लोगों से कोई उम्मीद नहीं की जानी चाहिए.
अब लेखिका ने जो शीर्षक दिया है वो तो अपने आप में एक खोज का विषय है लेकिन उसके विषय में सिर्फ ये ही कहूँगी :
वो सफर था कि मुकाम था
ये तुझे पता न मुझे पता
फिर भी इक फलसफा लिखा गया


डिसक्लेमर :
(ये पोस्ट पूर्णतया कॉपीराइट प्रोटेक्टेड है, ये किसी भी अन्य लेख या बौद्धिक संम्पति की नकल नहीं है।
इस पोस्ट या इसका कोई भी भाग बिना लेखक की लिखित अनुमति के शेयर, नकल, चित्र रूप या इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रयोग करने का अधिकार किसी को नहीं है, अगर ऐसा किया जाता है निर्धारित क़ानूनों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
©वन्दना गुप्ता vandana gupta)
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मंगलवार, 18 जुलाई 2017

जन्मदिन के बहाने दर्द पिता का





साइटिका के दर्द से बोझिल पिता
नहीं रह पाते खड़े कुछ पल भी
मगर 

जब भी करते हैं बस में सफ़र
नहीं देते दुहाई किसी को
कि
बुजुर्गों के लिए होते हैं विशेष प्रावधान

अपनी जगह
बैठा देते हैं
जवान बेटी को
कि जानते हैं
ज़माने का चलन
आदिम सोच से टपकती बेशर्मी
करती है मजबूर खड़े रहने को
दर्द सहने को

तिलमिलाती है बेटी
पिता के दर्द से
कर ले कितनी अनुनय
मगर मानते नहीं पिता
जानते हैं
आदम जात की असली जात
कैसे स्पर्श के बहाने की जाती है
मनोविकृति पूजित

अपने अपने खोल में सिमटे
दोनों के वजूद
अपनी अपनी सीमा रेखा में कैद
एक दूसरे को दर्द से मुक्त
करने की चाह लिए
आखिर पहुँच ही जाते हैं
गंतव्य पर

दर्द की कोई भाषा नहीं
कोई परिभाषा नहीं
मगर फिर भी
अव्यक्त होकर व्यक्त होना
उसकी नियति ठहरी
मानो हो पिता पुत्री का सम्बन्ध

सफ़र कोई हो
किसी का हो
अंत जाने क्यों तकलीफ पर ही होता है
फिर दर्द पिता का हो या बेटी का

यादों के सैलाब में ठहरे हैं पिता
कि
आज जन्मदिन है आपका
तो क्या हुआ
नहीं हैं आप भौतिक रूप से
स्मृतियों में जिंदा हैं आप

और सुना है
जो स्मृति में जिंदा रहते हैं
वही तो अमरता का द्योतक होते हैं 




डिसक्लेमर
ये पोस्ट पूर्णतया कॉपीराइट प्रोटेक्टेड है, ये किसी भी अन्य लेख या बौद्धिक संम्पति की नकल नहीं है।
इस पोस्ट या इसका कोई भी भाग बिना लेखक की लिखित अनुमति के शेयर, नकल, चित्र रूप या इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रयोग करने का अधिकार किसी को नहीं है, अगर ऐसा किया जाता है निर्धारित क़ानूनों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
©वन्दना गुप्ता vandana gupta

सोमवार, 3 जुलाई 2017

शून्य

कुछ पन्ने हमेशा कोरे ही रह जाते हैं
उन पर कोई इबारत लिखी ही नहीं जाती
एक शून्य उनमे भी समाहित होता है

बिलकुल वैसे ही
जैसे
सामने टीवी चल रहा है
आवाज़ कान पर गिर रही है
मगर पहुँच नहीं रही
जहाँ पहुंचना चाहिए
एक शून्य उपस्थित है वहां भी

सब कुछ है
फिर भी कुछ न होने का अहसास तारी है
चाहे खुशियों के अम्बार हों या सफलता के
अक्सर छोड़ ही जाते हैं जाते जाते एक शून्य

और दिल हो या दिमाग
नहीं कर पाता खुद को मुक्त
शून्य की उपस्थिति से
तो पन्नों सा कोरा रहना स्वभाव है मन का भी

शून्य न कृष्ण पक्ष है न शुक्ल
चिंदियों के बिखरने का कोई मौसम नहीं होता 

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