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सोमवार, 2 दिसंबर 2019

तुम्हारा स्वागत है

 1
तुम   कहती  हो  
" जीना है मुझे "
मैं कहती हूँ ………… क्यों ?
आखिर क्यों आना चाहती हो दुनिया में ?
 क्या मिलेगा तुम्हे जीकर ?
बचपन से ही बेटी होने के दंश  को सहोगी 
बड़े होकर किसी की निगाहों में चढोगी
तो कहीं तेज़ाब की आग में खद्कोगी
तो कहीं बलात्कार की  त्रासदी सहोगी 
फिर चाहे वो बलात्कार 
घर में हो या बाहर 
पति द्वारा हो या रिश्तेदार द्वारा या अनजान द्वारा 
क्या फर्क पड़ता है या पड़ेगा 
क्योंकि 
शिकार तो तुम हमेशा ही रहोगी 
जरूरी नहीं की निर्वस्त्र करके ही बलात्कार किया जाए 
कभी कभी  जब निगाहें भेदती हैं कोमल अंगों को 
बलात्कृत हो जाती है नारी अस्मिता 
जब कपड़ों के अन्दर का दृश्य भी 
हो जाता है दृश्यमान देखने वाले की कुत्सित निगाह में 
हो जाती है एक लड़की शर्मसार 
इतना ही नहीं कोई फर्क नहीं पड़ता 
तुम बच्ची हो , युवा या प्रौढ़ 
तुम बस एक देह हो सिर्फ देह 
जिसके नहीं होते हाथ, पैर या मन 
होती है तो सिर्फ शल्य चिकित्सा की गयी देह के कामुक अंग 
उनसे इतर तुम कुछ नहीं हो 
क्या है ऐसा जो तुम्हें कुलबुला रहा है 
बाहर आने को प्रेरित  कर रहा है 
क्या मिलेगा तुम्हें यहाँ आकर 
देखो तो ………….
 कितनी निरीह पशु सी 
शिकार हो चुकी हैं न्याय की आस में 
मगर यहाँ न्याय
एक बेबस विधवा के जीवन की अँधेरी गली सा शापित खड़ा है 
कहीं नाबलिगता की आड़ में तो कहीं संशोधनों के जाल में 
मगर स्वयं निर्णय लेने में कितना सक्षम है 
ये आंकड़े बताते हैं 
कि न्याय की आस में वक्त करवट बदलता है 
मगर न्याय का त्रिशूल तो सिर्फ पीड़ित को ही लगता है 
हो जाती है वो फिर बार- बार बलात्कृत 
कभी क़ानून के रक्षक द्वारा कटघरे में खड़े होकर 
तो कभी किसी रिपोर्टर द्वारा अपनी टी आर पी के लिए कुरेदे जाने पर 
तो कभी गली कूचे में निकलने पर 
कभी निगाह में हेयता तो कभी सहानुभूति देखकर 
तो कभी खुदी  पर दोषारोपण होता देखकर 
अब बताओ तो ज़रा ………… क्या आना चाहोगी इस हाल में 
क्या जी सकोगी विषाक्त वातावरण में 
ले सकोगी आज़ादी की साँस 
गर कर सको ऐसा तो आना इस जहान में ……………तुम्हारा स्वागत है 

2
तुम कहती हो 
दुनिया  बहुत सुन्दर है 
देखना चाहती हो तुम 
जीना चाहती हो तुम 
हाँ सुन्दर है मगर तभी तक 
जब तक तुम " हाँ " की दहलीज पर बैठी हो 
जिस दिन " ना " कहना सीख लिया 
पुरुष का अहम् आहत हो जाएगा 
और तुम्हारा जीना दुश्वार 
तुम कहोगी …………क्यों डरा रही हूँ 
क्या सारी दुनिया में सारी स्त्रियों पर 
होता है ऐसा अत्याचार 
क्या स्त्री को कोई सुख कभी नहीं मिलता 
क्या स्त्री का अपना कोई वजूद नहीं होता 
क्या हर स्त्री इन्ही गलियारों से गुजरती है 
तो सुनो ……………एक कडवा सत्य 
हाँ ……………एक हद तक ये सच है 
कभी न कभी , किसी न किसी रूप में 
होता है उसका बलात्कार 
कभी  इच्छाओं का तो कभी उसकी चाहतों का 
तो कभी उसकी अस्मिता का 
होता है उस पर अत्याचार 
यूं ही नहीं कुछ स्त्रियों ने आकाश पर परचम लहराया है 
बेशक उनका कुछ दबंगपना  काम आया है 
मगर सोचना ज़रा ……ऐसी  कितनी होंगी 
जिनके हाथों में कुदालें होंगी 
जिन्होंने खोदा होगा धरती का सीना 
सिर्फ मुट्ठी भर …………… एक सब्जबाग है ये 
नारी मुक्ति या नारी विमर्श 
फिर चाहे विज्ञापन की मल्लिका बनो 
या ऑफिस में  काम  करने वाली सहकर्मी 
या कोई जानी मानी हस्ती 
सबके लिए महज  सिर्फ देह भर हो तुम 
फिर चाहे उसका मानसिक शोषण हो या शारीरिक 
दोहन के लिए गर तैयार हो 
प्रोडक्ट के रूप में प्रयोग होने को गर तैयार हो 
अपनी सोच को गिरवीं रखने को गर तैयार हो 
तो आना इस दुनिया में ………… तुम्हारा स्वागत है 

3
अभी जमीन उर्वर नहीं है 
महज ढकोसलों और दिखावों की भेंट चढ़ी है 
दो शब्द कह देना भर नहीं होता नारी विमर्श 
आन्दोलन  करना भर नहीं होता नारी मुक्ति 
नारी की मुक्ति के लिए नारी को  करना होता है 
जड़वादी ,   रूढ़िवादी सोच से खुद को मुक्त 
मगर अभी  जमीन उर्वर नहीं है 
अभी नहीं डाली गयी है इसमें उचित मात्र में खाद ,बीज और पानी 
फिर कैसे बहे बदलाव की बयार 
कैसे पाए नारी अपना सम्मान 
अभी संभव नहीं हवाओं के रुख का बदलना 
जानती हो क्यों ………… क्योंकि 
यहाँ है जंगलराज ……… न कोई डर है ना कानून 
चोर के हाथ में ही है तिजोरी की चाबी 
ऐसे में किस किस से और कब तक खुद को बचाओगी
कैसे इस माहौल में जी पाओगी 
ये सब सोच लेना तब आना इस दुनिया में ………… तुम्हारा स्वागत है 

4
और सुनो सबसे बडा सच 
नहीं हुयी मैं इतनी सक्षम 
जो बचा सकूँ तुम्हें 
हर विकृत सोच और निगाह से 
नहीं आयी मुझमें अभी वो योग्यता 
नहीं है इतना साहस जो बदल सकूँ 
इतिहास के पन्नों पर लिखी इबारतें 
पितृसत्तात्मक समाज के चेहरे से 
सिर्फ़ कहानियों , कविताओं ,आलेखों या मंच पर 
बोलना भर सीखा है मैनें 
मगर नहीं बदली है इक सभ्यता अभी मुझमें ही 
फिर कैसे तुम्हें आने को करूँ प्रोत्साहित 
कैसे करूँ तुम्हारा खुले दिल से स्वागत 
जब अब तक खुद को ही नहीं दे सकी तसल्लियों के शिखर 
जब अब तक खुद को नहीं कर सकी अपनी निगाह में स्थापित 
बन के रही हूँ अब तक सिर्फ़ और सिर्फ़ 
पुरुषवादी सोच और उसके हाथ का महज एक खिलौना भर 
फिर भी यदि तुम समझती हो 
तुम बदल सकती हो इतिहास के घिनौने अक्षर 
मगर मुझसे कोई उम्मीद की किरण ना रखना 
गर कर सको ऐसा तब आना इस दुनिया में ……तुम्हारा स्वागत है 


ये वो तस्वीर है  
वो कडवा सच है 
आज की दुनिया का 
जिसमें आने को तुम आतुर हो 
और कहती हो 
" जीना है मुझे " 


गुरुवार, 28 नवंबर 2019

दहल उठा है आसमां..

जाने किस मोड़ पर छोड़ आयी
आँसू, आहें और दर्द
अब जिद की नोक पर कर रही है नृत्य
प्रज्ञा उसकी
तुम्हारी भौंहों के टेढ़ेपन को बनाकर जमीन

यूँ ही चलते फिरते खींच रही है वो अपनी लकीर
न तुमसे छोटी और न ही तुमसे बड़ी

जाने क्यों गुनगुनाहट के घुंघरुओं से दहल उठा है आसमां...

सोमवार, 2 सितंबर 2019

आ अब लौट चलें

इस दौड़ती भागती दुनिया में
समय की धुरी पर ठहरा मन मेरा
कहता है
आ अब लौट चलें
एक बार फिर उसी दौर में
जहाँ पंछियों से रोज मुलाकात हो
मेरे आँगन में रोज उनकी आमद हो

मैं सितार सी बजती फिरूँ
उमंगों का संगीत रूह में बजता रहे
मन की अलंगनी पर
इक ख्वाब रोज नया सजता रहे

वो गली चौराहों पर
अपनेपन के ठहाके गूंजते मिलें
शहर शहर से गले मिल
किलकारियों से सजते मिलें
धर्म जाति से परे
भाईचारे के घुंघरू बजते मिलें

आमीन कहने की न दरकार रहे
यूँ आईनों के चेहरे शफ्फाक रहें
युद्ध के कान खींचकर
शांति बस यही कहे
आ अब लौट चलें
समय की धुरी पर इक नयी रौशन सभ्यता नर्तन करे


मंगलवार, 18 जून 2019

हम शर्मिंदा हैं


मरे हुए लोग हाय हाय नहीं करते
मरे हुए लोगों की कोई आवाज़ नहीं होती
मरे हुए लोगों की कोई कम्युनिटी नहीं होती
जो कोशिशों के परचम लहराए
और हरी भरी हो जाए धरा मनोनुकूल

आइये हम अपने लिए शांति पाठ करें
यूँ कहकर
हम शर्मिंदा हैं कि हम मर चुके हैं
बच्चों हम से कोई उम्मीद मत रखना
हम बस तुम्हारे लिए नहीं
स्वयं के लिए
स्वयं को साबित करने के लिए
दो शब्द लिखने को जिंदा होते हैं
और फिर मर जाते हैं

हम भूल चुके हैं
जब एक बच्चा मरता है
तब लाखों उम्मीदें मरती हैं
और करोड़ों संभावनाएं
मरे हुए लोगों को नहीं होता सरोकार किसी जीवित से
फिर एक मरे या सौ

मरना हमारे समय का सबसे सुभीता शब्द है
आइये मरने को राष्ट्रीय शब्द घोषित करें

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

मैं बस इक जलता अलाव हूँ

न जाने किस पर गुस्सा हूँ
न जाने क्यों उदास हूँ
खोज के बिंदु चुक गए
मौसम सारे रुक गए
फिर किस चाह की आस में हूँ

जब कोई कहीं नहीं
अपना पराया भी नहीं
मृग तृष्णा की किस फाँस में हूँ
किस जीवन की तलाश में हूँ
यूँ लगता है कभी कभी
मैं बस इक जलता अलाव हूँ

किसी दिशा का भान नहीं
अब बचा कोई ज्ञान नहीं
जब जीवन रीता बीत गया
सुख दुःख का भान छूट गया
और तरकश सारा खाली हुआ


तब सोचूँ ये किस पड़ाव में हूँ

सोमवार, 5 नवंबर 2018

तुम खुदा नहीं हो

मैं सो रहा था
मुझे सोने देते
चैन तो था

अब न सो पाऊंगा
और न जागा रह पाऊँगा
मझधार में जैसे हो नैया कोई
एक विशालकाय प्रेत की मानिंद
हो गया हूँ अभिशप्त
तुम्हारी बनायीं मरुभूमि में

शापित बना दिया
नहीं सोचा तुमने
अपनी महत्वाकांक्षा से ऊपर
अब झेलना है मुझे
शीत ताप और बरसात
यूँ ही सदियों तक

निर्जन में भटकता
अँधेरे से लड़ता
खड़ा हूँ निसहाय
संभव नहीं अब मुक्ति
जानता हूँ

पढ़ सको तो पढना कभी
मेरी आँखें, उनकी ख़ामोशी, उनका दर्द
जिनमें ठहर गया है पतझड़ किसी बनवास सा

देख सको तो देखना मेरा चेहरा
जिस पर वेदना का संगीत फूट रहा है
और तुम उसे बना रहे हो अपना सुगम संगीत

झाँक सको तो झांकना मेरे ह्रदय में
जिसमें तिल तिल मरता देश पूछ रहा है प्रश्न
क्या औचित्य है इस गगंचुम्बियता का
जब एक तरफ जल रही हैं श्वांसें
जब फिर टुकड़ों में बाँट रहा है देश
जब सब अपना मजहब ढूंढ रहे हैं
सब अपनी जाति पूछ रहे हैं
अबलाओं की कातर पुकार छिन्न भिन्न कर रही है
सभ्यता की अंतड़ियाँ
क्या जवाब दूं भाई .......बताओ तो जरा

सुनो कर्ज सर पर रख कर
महल नहीं बनाए जाते
छद्म राग नहीं सुनाये जाते
आडम्बर के ढोल नहीं बजवाये जाते
मगर जानता हूँ
तुम न सुनोगे
न समझोगे
न देखोगे
अहंकार के रथ पर सवार रथी को
नहीं दिखाई देती विनाशलीला
कुछ कहना बेमानी है

अच्छा सुनो
तुमने सब कुछ तो मनचाहा कर दिया
एक काम और कर देते
और कुछ नहीं तो
मेरी पीड़ा का ख्याल ही कर लेते
एक विशालकाय छतरी तो और बनवा देते
जिस पर सीधे लैंड कर जाता तुम्हारा प्लेन
तो इतिहास में थोडा और दर्ज हो जाते
इसके साथ
शायद हो जाता बचाव कुछ तो
तुम्हारी बनायीं इस महत्वाकांक्षा का
पंछियों की बीट से, आंधी धूल और मिटटी से

मेरा क्या है
मुझे तो चढ़ा ही दिया तुमने सलीब पर
पीड़ा ही मेरा प्रायश्चित है अब शायद

आह ! नहीं जानता था
एक नयी लकीर खींचने से ज्यादा जरूरी है
वर्तमान को इतिहास से साफ़ करना

खुदा खैर करे
मैं और मेरा बीहड़
अब मोहताज हैं तुम्हारे हाथ की जुम्बिश के

मगर जान लो एक सत्य
तुम खुदा नहीं हो !!!

मंगलवार, 25 सितंबर 2018

गौरतलब कहानियाँ मेरी नज़र में


कहानियां, हमारे जीवन का आधार रही हैं आदिम काल से. जैसे जैसे सभ्यता विकसित होती गयी, कहानियाँ उसी के अनुसार आकार लेती रहीं. वक्त के साथ कहानियों के स्वरुप में भी परिवर्तन आया लेकिन कहानियों का जो मुख्य स्वरुप है वो ही पाठक/श्रोता के जेहन पर मुख्यतः कब्ज़ा जमाये रहता है.

कहानी में मुख्य तत्व होता है – कहानी में कहानी का होना. कोई एक शुरुआत हो तो उसका कोई अंत भी हो. दूसरा तत्व होता है उसके कहन का तरीका. जब पाठक को ये दोनों तत्व मिल जाते हैं तो वो कहानी खुद को पढवा ले जाती है. ऐसा ही संग्रह इन दिनों पढ़ा जिसमें ये दोनों तत्व विद्यमान थे. कहानियाँ आधी अधूरी नहीं छोड़ी गयीं. सिर्फ दृश्यांकन भर नहीं रहीं बल्कि हर कहानी पढ़कर पाठक मन उसे देर तक गुनता रहा. ये है कहानी की सफलता का तीसरा तत्व, जब वो पाठक मन को सोचने पर विवश कर दे.

ये संग्रह पढने के लिए बहुत लम्बा इंतज़ार करना पड़ा. कुछ न कुछ मुश्किलें आतीं गयीं और संग्रह न खरीद पायी न मंगवा पायी. अभी पिछले दिनों कुछ किताबें ऑनलाइन मंगवाईं तो सबसे ऊपर लिस्ट में इसी का नाम था. अब जब पढ़ रही थी तो इसके बारे में एक दिन एक छोटा सा स्टेटस भी डाला था लेकिन उसके बाद एक महीने से परेशानियों में घिरी रही और लिखना मुल्तवी होता रहा. जाने क्यों कभी कभी हम कुछ पढना चाहते हैं, उस पर कहना चाहते हैं लेकिन हमारे चाहे सब नहीं हो पाता मगर आज इस संग्रह का नंबर आ ही गया. हिमाचल बुक्स से प्रकाशित “गौरतलब कहानियाँ” सुभाष नीरव जी की प्रतिनिधि कहानियों का संग्रह है जिसमें उनकी चुनिन्दा 17 कहानियाँ शामिल हैं.

कहानियों में आस पास का परिवेश, यादों के सरमाये, दिल की कहीं कचोट तो कहीं उलझन, समाज के अच्छे बुरे चेहरे सभी गुणक शामिल हैं जो किसी भी संग्रह को मुकम्मल बनाते हैं. संग्रह की कहानी ‘वेलफेयर बाबू’ समाज के चेहरे को उजागर करती है. कैसे मतलबपरस्त है दुनिया, उसका जीता जागता उदाहरण है. जरूरत पड़ने पर आप जिस कॉलोनी के लिए अपना तन मन धन लगा देते हैं वहां के ही लोग काम नहीं आते. वहीँ उसी कॉलोनी में रहने वाला वो शख्स जो है तो मुसलमान, ऊपर से उनका विरोधी या ये कहा जाए वो इंसानी फितरत को हरिदा से बेहतर जानता था, वो काम आता है. आप अपना पूरा जीवन जिन्हें समर्पित कर दें जरूरी नहीं उनमें इंसानियत बची भी हो और जिन्हें योग्य समझते रहे हों, वक्त पड़ने पर वो ही काम आ जाते हैं. एक संवेदनशील कहानी जहाँ भावनाएं जाने कितनी गलियों से गुजरती हैं और दिल पर एक छाप छोड़ जाती हैं.

‘इतने बुरे दिन’ कहानी यूँ तो पहले भी पढ़ी है लेकिन ये कहानी है ही ऐसी जो खुद को दोबारा पढवा ले जाती है. दो बूढ़े बूढ़ी, बूढ़ी बिस्तर की मोहताज तो बूढा उसकी सेवा में दिन रात एक किये रहता. दो बुजुर्ग जो उम्र के एक मोड़ पर आकर जब नितांत अकेले रह जाते हैं, तब कितना मुश्किल होता है जीना. जीने के लिए पैसों की आवश्यकता क्या कुछ करने को विवश कर देती है, ये कोई सोच भी नहीं सकता. आज के वक्त में जब लोग व्यावहारिक ज्यादा होते जा रहे हैं, ऐसे में ये कहानी मार्मिकता की तमाम सीमाओं को पार कर जाती है. ज़िन्दगी जीने के लिए अर्थ की कितनी जरूरत होती है, ये इसे पढ़कर जाना जा सकता है, जहाँ एक वक्त के लिए भी रोटी का जुगाड़ नहीं, ऐसे में इंसान कितना विवश हो जाता है उसका बेहद संवेदनशील चित्रण है. लेखक पाठक को अपनी ऊंगली पकड़ा अपने साथ चलने को मजबूर कर देता है, बस यहीं आकर लेखक सफल हो जाता है.

संग्रह में कई कहानियाँ हैं जिनमें जीवन के अंतिम पड़ाव में अकेले रह गए बुजुर्गों के दर्द को लेखक ने समेटा है जैसे ‘नए साल की धूप’ में भी ज़िन्दगी की दुश्वारियों के साथ बीमारियों से घिरे शरीर हैं लेकिन एक दूसरे का साथ वो संबल है जिसके सहारे वो अपनी जीवन नैया खेते रहते हैं और नकारात्मकता में भी सकारात्मकता बचाए रखते हैं. एक दूसरे का साथ कितना ऊर्जा से भर देता है ये पढ़कर जाना जा सकता है. ऐसे ही ‘बूढी आँखों का आकाश’ में भी दो अलग अलग घरों में बुजुर्गों की स्थिति का चित्रांकन है. पढ़ते हुए एक पुरानी फिल्म याद आ जाती है जिसमें राजेश खन्ना और शायद स्मिता पाटिल होते हैं. दो अलग अलग घरों में रहते हैं, शाम को पार्क में मिल बैठ लेते हैं तो दूसरे तो बाद में खुद घर के लोग ही उनके दुश्मन हो जाते हैं फिर घर में चाहे उन्हें दो रोटी के लिए भी न पूछें. लेकिन यहाँ कहानी एक मोड़ लेती है जहाँ उम्मीद सिरे चढ़ने लगती है वहीँ ज़िन्दगी दगा दे जाती है, पढ़ते हुए पाठक सोचता है – हाँ, ये ही सही रहेगा ऐसे रहने से तो मगर अंत एक बार फिर नियति अपने हाथ में ले लेती है और पाठक गहन उदासी में डूब जाता है. ऐसी ही कहानी ‘आखिरी पड़ाव का दुःख’ है जहाँ माँ बोझ बन जाती है और उसे वृद्धाश्रम भेजने का प्रबंध कर दिया जाता है.

‘रंग बदलता मौसम’ आज के युवाओं की सोच और व्यवहार का दस्तावेज है. जिनके लिए व्यावहारिकता ही मायने रखती है, भावनाएं नहीं. किस इंसान के दिल में किसी के लिए क्या है कोई नहीं जान सकता. कौन किसे प्रयोग कर रहा है ये भी पता नहीं चलता, प्रयोग होने वाले को. और जब पता चलता है तो खुद को ठगा पाता है मानो लेखक ये कहना चाहता हो – हर आदमी में हैं दस बीस आदमीं, जब भी देखना बार बार देखना.

‘भेड़िये’ कहानी इंसानी फितरत को बखूबी उजागर करती है. कैसे हर इंसान में एक भेड़िया छुपा होता है, जैसे ही मौका मिलता है घात लगा लेता है. वहीँ गाँव में जाति व्यवस्था के दंश से पीड़ित जब पलायन कर शहर आते हैं तो किन किन परिस्थितियों से गुजरते हैं उसका बहुत सूक्ष्म वर्णन यहाँ लेखक ने किया है. दूसरी तरफ ऑफिस में शोषण का शिकार होती स्त्रियों की दशा को भी बखूबी उकेरा है लेकिन शोषक के लिए हर मादा सिर्फ मादा ही होती है फिर वो ऑफिस में काम करने वाली हो या फिर किसी कामगार की बहन, बेटी या बीवी. लेखक ने एक कहानी में कई आयामों को समेटा है फिर समाज में फैले भेड़िये किसी भी रूप में मिलें, उम्र भर पीछा नहीं छोड़ते. शोषण उनका मुख्य हथियार होता है मानो यही कहना चाह रहा हो लेखक.

‘गोष्ठी’ कहानी साहित्य के संसार का कच्चा चिटठा है. जहाँ सच कहने वाला किनारे बैठा दिया जाता है और जुगाड़ करने वाला, झूठ बोलने वाला ही मलाई खाता है. लेखक ने पूरे साहित्यिक समाज की सच्चाई को इस कहानी में समेट दिया है जिससे आज हर कोई वाकिफ है लेकिन सच कहने की हिम्मत नहीं करते.

‘लड़कियों वाला घर’ एक ऐसी कहानी है जहाँ जिस घर में लडकियाँ होती हैं उस पर हर आते जाते की कैसे वक्र दृष्टि होती है उसका वर्णन है. ऐसे में डर डर कर जीने से काम नहीं चलता. उसके लिए जरूरी है अपने अन्दर आत्मविश्वास पैदा करना और सही निर्णय लेना. लडकियाँ हैं तो इंसान कमजोर नहीं हो जाता, बस जरूरत है तो युक्ति की ताकि आप सही तरह बिना किसी खौफ के जी सकें. ऐसा ही यहाँ समाधान दिया गया है. वहीँ दूसरी तरफ मानसिकता पर भी प्रहार है फिर वो समाज की हो या माता पिता की.

‘गोली दागो रामसिंह’ राजनीति के चेहरे से नकाब उतारती है. जिनके लिए सिर्फ अपनी कुर्सी ही महत्त्व रखती है अन्य सब सिर्फ एक टूल होते हैं और उन्हें कब कैसे और कहाँ प्रयोग करना है, वो जानते हैं. आपको सिर्फ सर झुककर हुक्म बजाना आना चाहिए तभी आप उनके साथ टिक सकते हैं अन्यथा आपके लिए कहीं कोई जगह नहीं.
ऊपर से चाहे कितना ही इंसान अच्छा , सत्चरित्र ईमानदार दिखे, जनता में कितनी ही अच्छी छवि क्यों न हो, अन्दर से सब कितने काइयाँ होते हैं मानो यही कहना चाहता है लेखक.

एक और उम्दा कहानी है ‘साँप’ जिसे तो पढ़कर ही उसका आनंद पाठक ले सकता है. समाज में किसकी नज़र कैसी है कौन जान सकता है. जाने कितने साँप इंसान के आस पास डोलते मिलेंगे जो जब मौका मिले डंसने की तैयार रहते हैं ऐसे में एक सीधा साधा इंसान कभी जान ही नहीं पाता कौन कैसा है मगर उस सीधे इंसान की शराफत का नाजायज़ फायदा नहीं उठाना चाहिए क्योंकि जब वो अपनी आई पर आता है तो सारे हिसाब किताब बराबर कर देता है वो भी इस तरह कि सामने वाला समझ भी नहीं पाता आखिर ये हुआ क्या, मानो इस कहानी के माध्यम से लेखक यही सन्देश दे रहा है .

‘थके पैरों का सफ़र’ कहानी एक बार फिर जात बिरादरी के पेंच में उलझी ज़िन्दगी का आइना है. कहने को इंसान उम्र भर अपनी जाति को सम्मान देता है लेकिन जब उसे जरूरत हो तो वो ही बिरादरी उसके काम नहीं आती. एक लड़की के पिता की क्या दशा होती है जब बेटी ब्याह योग्य हो जाए और अपनी बिरादरी में कोई अच्छा लड़का न मिले या मिले तो दहेज़ के नाम पर मुंह खुला मिले. ऐसे में उसके पास क्या रास्ता बचता है? मानो ये प्रश्न कर रहा है लेखक और साथ में जवाब भी दे रहा है कि अंतिम विकल्प तो बाहर की तरफ देखना ही बचता है फिर कोई कितना ही नाराज़ क्यों न हो. बदलाव की बयार इसी तरह बहती है मानो यही कहना चाह रहा है लेखक.

‘औरत होने का गुनाह’ शीर्षक ही पूरी मुकम्मल दास्ताँ है. जन्म से लेकर मरण तक वो सिवाय जागीर के होती क्या है? उस पर गैर धर्मी से विवाह कर ले तो कीमत तो उसे चुकानी ही पड़ेगी, मानो यही कहना चाहता है लेखक.

कुल मिलाकर सभी कहानियाँ ऐसी हैं जिन्हें पढ़कर पाठक रुकेगा, सोचेगा. छोटी छोटी कहानियाँ एक बड़ा कलेवर प्रस्तुत करती हैं. वहीं लेखक पाठक की नब्ज जानता है, उसे क्या चाहिए, उसी के अनुसार खुराक देता है. कहानियों की सबसे बड़ी खूबी ये है कि पाठक पढ़कर निराश नहीं होता, कहानी में कहानी मिलती है और अनावश्यक विवरणों से बचते हुए लेखक बहुत ही चतुराई से अपनी बात कह भी देता है. पठनीयता कहानियों सा सबसे बड़ा गुण होता है और उसमें कहानियाँ खरी उतरती हैं. भाषा शैली भी रोचक है. एक प्रवाह है जिसमें पाठक बहता जाता है. ऊब के लिए कहानियों में कोई स्थान नहीं है.



सुभाष नीरव जी किसी पहचान के मोहताज नहीं. उनके लेखन का हर कोई कायल है. बस पाठकों को आगे भी निरंतर उनकी कलम ऐसे ही लाभान्वित करती रहेगी, यही उम्मीद करती हूँ.