पृष्ठ

समर्थक

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

मंगलवार, 21 मई 2013

"बेबाक महिला "

सुनो 
मत खाना तरस मुझ पर 
नहीं करना मेरे हक़ की बात 
न चाहिए कोई आरक्षण 
नहीं चाहिए कोई सीट बस ,ट्रेन या सफ़र में 
मैंने तुमसे कब ये सब माँगा ?
जानते हो क्यों नहीं माँगा 
क्योंकि 
तुम कभी नहीं कर सकते मेरी बराबरी 
तुम कभी नहीं पहुँच सकते मेरी ऊँचाईयों पर 
तुम कभी नहीं छू सकते शिखर हिमालय का 
तो कैसे कहते हो 
औरत मांगती है अपना हिस्सा बराबरी का 
अरे रे रे ..............
फ़िलहाल तो 
तुम डरते हो अन्दर से 
ये जानती हूँ मैं 
इसलिए आरक्षण , कोटे की लोलीपोप देकर 
अपने कर्त्तव्य की इतिश्री करते हो 
जबकि मैं जानती हूँ 
तुम मेरे बराबर हो ही नहीं सकते 
क्योंकि 
हूँ मैं ओत-प्रोत मातृत्व की महक से 
जनती हूँ जीवन को ......जननी हूँ मैं 
और जानते हो 
सिर्फ जनते समय की पीड़ा का 
क्षणांश भी तुम सह नहीं सकते 
जबकि जनने से पहले 
नौ महीने किसी तपते रेगिस्तान में 
नंगे पाँव चलती मैं स्त्री 
कभी दिखती हूँ तुम्हें थकान भरी 
ओज होता है तब भी मेरे मुख पर 
और सुनो ये ओज न केवल उस गर्भिणी 
गृहणी के बल्कि नौकरीपेशा के भी 
कामवाली बाई के भी 
वो सड़क पर कड़ी धूप  में 
वाहनों को दिशा देती स्त्री में भी 
वो सड़क पर पत्थर तोडती 
एक बच्चे को गोद में समेटती 
और दूजे को कोख में समेटती स्त्री में भी होता है 
और सुनना ज़रा 
उस आसमान में उड़ने वाली 
सबकी आवभगत करने वाली में भी होता है 
अच्छा न केवल इतने पर ही 
उसके इम्तहान ख़त्म नहीं होते 
इसके साथ निभाती है वो 
घर परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी भी 
पूरी निष्ठां और ईमानदारी से 
जरूरी तो नहीं न 
हर किसी को उपलब्ध हों वो सहूलियतें 
जो एक संपन्न घर में रहने वाली को होती हैं 
कितनी तो रोज बस ट्रेन की धक्कामुक्की में  सफ़र कर 
अपने गंतव्य पर पहुँचती हैं 
कोई सब्जी बेचती है तो कोई होटल में 
काम करती है तो कोई 
दफ्तर में तो कोई कारपोरेट ऑफिस में 
जहाँ उसे हर वक्त मुस्तैद भी रहना पड़ता है 
और फिर वहां से निकलते ही 
घर परिवार की जिम्मेदारियों में 
उलझना होता है 
जहाँ कोई अपने बुजुर्गों की सेवा में संलग्न होती है 
तो कोई अपने निखट्टू पति की शराब का 
प्रबंध कर रही होती है 
तो कोई अपने बच्चों के अगले दिन की 
तैयारियों में उलझी होती है 
और इस तरह अपने नौ महीने का 
सफ़र पूरा करती है 
माँ बनना आसान नहीं होता 
माँ बनने के बाद संपूर्ण नारी बनना आसान नहीं होता 
तो सोचना ज़रा 
कैसे कर सकते हो तुम मेरी बराबरी 
कैसे दे सकते हो तुम मुझे आरक्षण 
कैसे दे सकते हो कोटे में कुछ सीटें 
और कर सकते हो इतिश्री अपने कर्त्तव्य की 
जबकि तुम्हारा मेरा तो कोई मेल हो ही नहीं सकता 
मैंने तुमसे कभी ये सब नहीं चाहा 
चाहा तो बस इतना 
मुझे भी समझा जाए इंसान 
मुझे भी जीने दिया जाए 
अपनी इच्छाओं आकांक्षाओं के साथ 
बराबरी करनी हो तो 
आना मेरी ऊँचाई तक 
मेरी जीवटता तक 
मेरी कर्मठता तक 
मेरी धारण करने की क्षमता तक 
जब कर सको इतना 
तब कहना बराबर का दर्जा है हमारा 
जानना हो तो इतना जान लो 
स्त्री हूँ .........कठपुतली नहीं 
जो तुम्हारे इशारों पर नाचती जाऊं 
और तुम्हारी दी हुयी भीख को स्वीकारती जाऊं 
आप्लावित हूँ अपने ओज से , दर्प से 
इसलिए नही स्वीकारती दी हुयी भीख अब कटोरे में 
जीती हूँ अब सिर्फ अपनी शर्तों पर
और उजागर कर देती हूँ स्त्री के सब रहस्य बेबाकी से 
फिर चाहे वो समाजिक हों या शारीरिक संरचना के 
तोड देती हूँ सारे बंधन तुम्हारी बाँधी
वर्जनाओं के , सीमाओं के 
और कर देती हूँ तुम्हें बेनकाब
इसलिय नवाजी जाती हूँ "बेबाक महिला " के खिताब से 
और यदि इसे तुम मेरी बेबाकी समझते हो तो 
गर्व है मुझे अपनी बेबाकी पर 
क्योंकि 
ये क्षमता सिर्फ मुझमे ही है 
जो कर्तव्यपथ पर चलते हुए 
दसों दिशाओं को अपने ओज से नहला सके 
और अपना अस्तित्व रुपी कँवल भी खिला सके 

शुक्रवार, 17 मई 2013

" मन पखेरू उड़ चला फिर "………आखिर कैसे ये कमाल हुआ



जीवन एक कविता ही तो है बस जरूरत है तो उसे गुनगुनाने की , जीवन एक प्रेमगीत ही तो है बस जरूरत है तो उसमें रच बस जाने की और इन सब भेदों को जीवन्त किया सुनीता शानू ने अपने काव्य संग्रह " मन पखेरू उड़ चला फिर " के माध्यम से जो हिन्द युग द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह है .

मन की गति अबाध होती है  . कौन कौन से ब्रह्मांडों की सैर पर निकल जाती है कोई सोच भी नहीं सकता मगर सुनीता के पैर धरती पर ही हैं बस मन है जो हिरन सा कुलांचे भरता अपने लक्ष्य की और दौड़ रहा है . कभी प्रेम बनकर तो कभी विरह बनकर , कभी मानवीय सरोकारों से जूझता तो कभी जीने की जिजीविषा का गान बनकर एक ऐसा संगीत बनकर जो प्रकृति सा निस्सृत बह रहा है और पाठक उसके संग डूब उतर रहा है . 
कवि मन कितनी सादगी से मन के उद्गारों को प्रकट करता है कि लगता है जैसे हम ये ही तो सोच रहे थे 

मोहब्बत की बातें होठों पर होती नहीं हैं 
आँखें खुद बताती हैं छुपाकर सोती नहीं है 

तो कहीं यादों के झुरमुट में खोजते वो क्षण हैं जो ज़ेहन  कि धरोहर बने रहते हैं ताउम्र 


बचपन के उस घरौंदे की कसम तुमको 
अब आ ही जाओ 
कच्ची इमली की कसम तुमको 
आह भी वो 
नीम पीपल बर्गाफ्द बुलाते हैं 
तन्हाई में 
हमें अक्सर वाही तो याद आते हैं 

कितनी कोमलता है भावों में तो एक कसक , एक मिठास भी तारी है जो मन को भिगोता है .

जीने को क्या चाहिए सिर्फ इक मुट्ठी आसमान और उसी की चाहत यहाँ जज़्ब है 

लोग 
कहते हैं मसीहा 
सरे जग को 
देने वाले ज्यादा नहीं पर थोडा सा ही 
 मुझको तेरा प्यार दे दे 
जी सकें जिसमें तनिक , इक 
छोटा सा संसार दे दे 

भावों की गरिमा ग़ज़ल में माध्यम से दिल तक पहुँचती है 

लगे हैं फूलों के मेले शाखों पर ऐसे 
की जैसे  परिंदा नया कोई आया है 

काग भी बोल रहा था मुंडेर पर कब से 
घर पे तुम्हारे ये मेहमान कौन आया है 


ये ही नहीं कवि मन अपनी संस्कृति को भी नहीं भूलता है बल्कि उसमे तो उसका मन और हिलोरें लेने लगता है तभी तो होली का खूबसूरत चित्रण कर पाता है 

दूर कहीं कलरव करती 
चली परिंदों की बरात 
कहीं बजी बांस में शहनाई 
और महकती बह चली 
रंगीन पुरवाई 
 कि आज होली रे ..........................


मन पखेरू से बतियाती सुनीता उस असमंजस को बयां करती है जिससे हर कोई गुजरता है और मन को बाँधने के जतन  करता है 

रे नीडक , तू चंचल क्यूं है 
कहीं तेरा छोर न पाता  है 
कभी इधर तो कभी उधर 
इक डाल  पे टिक नहीं पाता है 

रे पाखी अब मान भी जा टू 
क्यूं अपमानित हुआ जाता है
 ये सच है  कि सुबह का भूला 
लौट शाम घर आता है 
आ तनिक विश्राम भी कर ले 
ठहर क्यों नहीं पाता है 


"पंछी तुम कैसे गाते हो "कविता के माध्यम से जीवन की जिजीविषा का बहुत ही सफल वर्णन किया है साथ ही एक सीख भी मिलती है  कि जीवन जीना कैसे चाहिए .


एक तरफ " इंतज़ार" के मुहाने पर खड़ा प्रेम है तो दूसरी तरफ " प्यार का सितारा" कहीं टूट जाता है क्योंकि गागर में भी सागर समाया है 

फेंक कर पत्थर जो मर 
तड़प उठीं मौन लहरें 
डूबने से डर रहे तुम 
शांत मन की झील में 

शायद झील से भी ज्यादा गहरा है यहाँ प्रेम का अस्तित्व 


छोटी छोटी क्षणिकाएं बहुत गहरी बात कह रही हैं 

मौत ने ज़िन्दगी पर 
जब किये हस्ताक्षर 
वह था एक और ज़िन्दगी के 
जन्म लेने का पहला दिन 


तुम तनहा कहाँ हो 
लिपटी हुयी तुमसे 
मैं जो रहती हूँ सदैव 
कहती है तन्हाई मुझसे 


उसकी आँखों से हकीकत बयां होती है 
हर घडी एक नया इम्तिहान होती है 
घूरने लगती हैं दुनिया  कि नज़र उसको 
जब किसी गरीब की बेटी जवान होती है 


बहुत देर के बाद कहा 
तुमने मुझे अपना 
लेकिन अब मैं 
किसी और की हो चुकी हूँ 


अंतर्मन जब बेचैन हो उठता है , कहीं कोई ठौर न उसे दीखता है तब पुकार उठता है उस असीम को और जोड़ लेता है उसी से " दर्द का रिश्ता " क्योंकि एक वो ही तो है जहाँ जाकर दर्द भी चैन पाता है 

एक कोने में बैठा 
निर्विकार 
सौम्य 
अपलक निहारता मुझे 
और बा्ट जोहता की 
मैं 
पुकारूं तेरा नाम 


" अतीत के दंश " नाम ही काफी है सब कुछ बयां करने को जिसे कुछ यूं बयां किया है 

कभी कभी आत्मा के गर्भ में 
रहा जाते हैं कुछ अंश 
दुखदायी अतीत के 
जो उम्र के साथ साथ 
फलते फूलते 
लिपटे रहते हैं 
अमर बेल की मानिंद 


तो दूसरी तरफ भावुक मन समाज में फैले कोढ़ पर भी दृष्टिपात किये बिना नहीं रहता जिसे उन्होंने मासूमियत के माध्यम से उकेरा है 

मासूम अबोध आँखों को घेरे 
स्याह गड्ढों ने भी शायद 
वक्त से पहले ही 
समझा दिया था उसे 
 कि सबको खिलाने वाले 
उसके ये हाथ 
जरूरी नहीं कि भरपेट खि्ला पायेंगे 
उसी को 

" मलाल " शायद ज़िन्दगी की हकीकत को बयां करती रचना है जहाँ जरूरी होता है दोनों पक्षों का खुश रहना जो कभी संभव ही नहीं हो पाता और एक मलाल दोनों के दिलों को ता- ज़िन्दगी कचोटता रहता है 

तुम्हें शायद 
यकीं न हो किन्तु यही सच है 
तुम ही कहो 
क्या कभी कोई किसी को 
रखा पाया है खुश 
पूरी तरह से ?

एक बेटी के मन की पीड़ा को गहनता से महसूसता दिल उसके दर्द को कुछ इस तरह बयां करता है 

कहा था एक दिन तुमने 
पराई अमानत है 
ये बच्ची 
तभी से आज तक माँ 
मैं अपना घर ढूंढती हूँ 


" कामवाली " कविता जीवन के कटु यथार्थों को बेलिबास करती वो रचना है जो सच कहने से नहीं हिचकिचाती  कि लाइफ लाइन हैं ये कामवालियां आज लेकिन किन हालात में और कैसे काम करती हैं खुद को भुलाकर ये एक सोचने का विषय है 

घरवाली के सौन्दय का ख्याल रख तुम्हें 
बने रहना है पूर्ववत 
कामवाली तुम्हें बस काम से मतलब रखना है 
तुम्हारा पति 
तुम्हारे बच्चे 
तुम्हारा सजना संवारना 
शाम होने और दिन निकलने के 
बीच का मामला है 
तुम जानती हो 

कुंठित सोच पर तुषारापात करती है कविता .....कामवाली 

किस पर करूँ विश्वास , ख़ामोशी , श्रृंखला , एक शाम , कन्यादान , माँ आदि सभी कवितायेँ जीवन के पहलुओं से ओतप्रोत रचनायें हैं जो रोज हम सबके जीवन में घटित होती हैं मगर सब कोई उन्हें शब्दों में बांध नहीं पाता और ये तो रोजमर्रा का काम है सोच कोई भी ध्यान नहीं देता जबकि ये ही तो जीवन की हरित क्रांति का एक हिस्सा हैं जिनके बिना जीवन अधूरा दीखता है और जिन्हें यदि शब्दों की मेड लगा कर बांध दिया जाए तो एक जीवन दर्शन होता है .

 सुनीता की सभी कवितायेँ जीवन के प्रत्येक क्षण की गवाह रही हैं फिर चाहे वो " चिन्ह " हो या " डोर " या " फिर जीना चाहती थी मैं " हो . हर कविता सहजता से अपनी बात कह जाती है जहाँ पाठक को जोर नहीं लगाना पड़ता बस डूबता जाता है उन पलों में जो उसके जीवन के करीब होते हैं , जहाँ वो खुद को जैसे एक आईने के सम्मुख पाता है और अपने जीवन का दर्शन करता है . 

एक ऐसा काव्य संग्रह है " मन पखेरू उड़ चला फिर " जिसमे मन ही तो बतिया रहा है ,मन ही उड़ान भर रहा है कभी दिशा में तो कभी दिशाहीन होता मगर मन तो आखिर मन है , चंचल है , किसी जगह नीड़ कब बनाता है और उसी चंचलता ने हमें इस काव्य संग्रह के रूप में एक हम सबके जीवन का आईना दिया है जिसमे कुछ देर बैठकर हम खुद को निहार सकें , खुद से बतिया सकें और यही किसी भी लेखक के लेखन की सफलता है जहाँ पाठक खुद को उन क्षणों का हिस्सा समझे और उसमे जिए .

सुनीता को अपनी हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए कामना करती हूँ वो इसी तरह आगे बढती जाएँ और हम सब को अपनी प्रतिभा से रु-ब -रु कराती रहे . 


195 रूपये मूल्य वाल इस काव्य संग्रह को जो भी पाठक प्राप्त करना चाहते हैं वो हिन्दयुग्म से संपर्क कर सकते हैं 

हिन्द युग्म 
1 , जिया सराय , हौज खास 
नई दिल्ली ---110016

मोबाइल --
9873734046
9968755908

प्यारी सखी सुनीता की कल इस किताब का विमोचन कांस्टीट्यूशन क्लब में होगा और मेरी तरफ़ से उन्हें ये प्यार भरा तुच्छ तोहफ़ा मैं भेंट कर रही हूँ ह्रदय के उदगारों के रूप में जो मैने उनकी किताब पढकर महसूस किये ………उम्मीद है स्वीकार्य होगा 

शुक्रवार, 10 मई 2013

तो क्या लिख सकूंगी कभी खुद को ऐसा ख़त ...................?

कहाँ से शुरू करूँ
क्या संबोधन दूं
और क्या लिखूं
कुछ ख्याल टकरा रहे हैं
मगर आकार पाने से पहले
एक जिद कर रहे हैं
सभी ने कुछ न कुछ लिखा
अपने प्रिय को
मगर नहीं मिला कोई ऐसा
जिसने खुद को कोई ख़त लिखा हो
चलो लिखो आज तुम
अपने नाम एक ख़त
मगर ईमानदारी से
जिसमे जिक्र हो तुम्हारी
उन अधूरी हसरतों का
उन अनकही चाहतों का
उन मिटटी में दबे जज्बातों का 

जिन्हें ना कभी आकार मिला हो
उन सुबहों का जिनमे
कोई इठलाता सपना
सरगोशी  करता हो
उन रातों का जब
एक एक पहर में
न जाने कितने
इन्द्रधनुष खिल उठे हों
या किसी रात को
जब तकिये पर सिर्फ निशाँ
ही बाकी रह गए हों
और अश्क सूख गए हों
उस तन्हाई का जिसमे तुम
किसी के साथ होते हुए भी
अकेली रह गयी हों ………

या उस मुस्कुराहट का 
जब दर्द के असंख्य बिच्छू 
डंक मार रहे हों
और तुम मुस्कुरा रही हो
क्या लिख सकोगी
पूरी ईमानदारी से खुद को ख़त
जो किसी ने पढ़ा न हो
और तुम्हारी ज़िन्दगी का
सशक्त हस्ताक्षर बन गया हो 


और मैं ....................
अब सोच में हूँ
क्या लिख सकूंगी कभी खुद को ऐसा ख़त
जिसमे रूह में जज़्ब कीलें
एक - एक कर निकालनी होंगी
और आहों की पारदर्शी स्याही से
किसी अनाम पन्ने पर
वो इबारत लिखनी होगी
जिसे पढने की ज़हमत तो खुदा भी न कर सके
क्योंकि ..........जानती हूँ
ज़मींदोज़ रूहों की मजारों पर दिए नहीं जला  करते

तो क्या लिख सकूंगी कभी खुद को ऐसा ख़त ...................?

मंगलवार, 7 मई 2013

यूँ भी फ़ना होने के हर शहर के अपने रिवाज़ होते हैं …………


बिना आँच के भट्टी सा सुलगता दर्द 
रूह पर फ़फ़ोले छोड गया 
आओ सहेजें 
इन फ़फ़ोलों में ठहरे पानी को रिसने से …………
कम से कम 
निशानियों की पहरेदारी में ही 
उम्र फ़ना हो जाये 
तो तुझ संग जीने की तलब 
शायद मिट जाये 
क्योंकि ………
साथ के लिये जरूरी नहीं 
चांद तारों का आसमान की धरती पर साथ साथ टहलना

यूँ भी फ़ना होने के हर शहर के अपने रिवाज़ होते हैं …………

शुक्रवार, 3 मई 2013

ये मौन के ज्वालामुखी किस टंकार के इंतज़ार में हैं ???


कभी कभी अजब स्थिति आ जाती है …………हम कुछ कहना चाहते हैं और कुछ और ही कहा जाता है ………कल ऐसा ही हुआ …………सबसे पहले उपसंहार कहा …………उसके बाद आरंभ …………मगर चैन नहीं मिला लगा जैसे कुछ छूट रहा है कहना ……………तो तभी फिर एक दस्तक हुई और जो बच रहा था उपसंहार और आरंभ के बीच का दरिया जिसे बहना था मगर अपने तटों में बंधा था आखिर तोड ही दिया उसने बाँध ………बह निकला अपनी मंज़िल की तरफ़ ……………और इस प्रकार हुआ इस रचना का जन्म :

छिज रही हूँ अन्दर ही अन्दर 
कोई चीरे और बताये 
कुछ बचा भी है या 
भुरभुरा चुकी है 
अस्थि मॉस मज्जा के साथ 
जज़्बात , संवेदनाएं , अहसास के साथ ......रूह भी 

देखो न फर्क ही नहीं पड़ रहा 
चारों तरफ शोर है 
संवेदनाएं हैं
जज़्बात हैं 
आन्दोलन हैं 
हक़ की लड़ाई है 
और एक मैं हूँ 
जिस पर असर ही नहीं हो रहा 
फिर चाहे बच्ची से बलात्कार हुआ हो 
या नारी की अस्मिता का सवाल हो 
या सरबजीत मर गया हो 
या न्याय के नाम पर अन्याय का आन्दोलन हो 
या देश हाहाकार कर रहा हो 
मेरा अन्तस्थ सूखे ठूंठ सा मौन खड़ा है 

शायद जान गयी हूँ 
कुछ नहीं होने वाला 
कुछ नहीं बदलने वाला 
क्योंकि 
ये तस्वीर तो रोज का सच है 
जिसे रोज अख़बार के पन्ने सा पलटते हैं हम 
और फिर अगली खबर के आने तक 
उसे भूल जाते हैं 
कमजोर याददाश्त की कमजोर इंसान जो हूँ मैं 
इसलिए मृत संवेदनाओं की लाश को ढोती मैं 
जिंदा भी हूँ या नहीं ...........इसी पशोपेश में उलझी हूँ 

तभी एक उद्घोषणा होती है :
फिर भी कुछ है 
जो 
सुलग रहा है 
मगर फ़ट नहीं रहा 

बस तभी से इसी सोच में हूँ 
ये मौन के ज्वालामुखी किस टंकार के इंतज़ार में हैं ???

बुधवार, 1 मई 2013

पता नहीं वो सच था या ये सच है

एक अरसा हुआ तुमसे बिछड़े
कितने अजनबी हो गए
साथ रहते हुए भी .......है ना
कितना नागवार गुजरने लगा है
एक दूजे का साथ ना
साथ चल भी रहे हैं
मगर साथ नहीं हैं
कल जिस  साथ को
जन्म जन्म का बनाने की चाहत थी
आज एक जन्म भी निभाना
कितना मुश्किल लगने लगा है
है ना................
ना जाने कब
अजनबियत की दरार उभरी
और इतनी गहराती गयी
कि पाटनी मुमकिन ना रही
और आज इतनी गहरा गयी है
कि अगर उसमे झांको तो
कुछ दिखाई नहीं देता
सिवाय गहरे बियाबान अंधेरों के
कोई अक्स भी गलती से यदि
उभरता दिखता है तो वो भी
भयावह शक्ल अख्तियार कर लेता है
तब लगता है
कैसे इतना सफ़र तय हो गया
कैसे वादा किया हमने साथ रहने का
जबकि आज लफ़्ज़ों में भी
तेजाब उफनता है
कैसे अजनबी एक हुए
और फिर अजनबी बन गए
या शायद एक तो कभी होते ही नहीं
सिर्फ समझौते पर समझौते करते
हमारे वजूद सहने की सीमा से आगे
झुकने को मजबूर नहीं होते
बेशक टूट क्यों ना जाए
शायद तभी हम ये सोचने को
मजबूर हो जाते हैं
क्या कभी हम साथ चले थे
क्या कभी हमने एक दूजे को चाहा था
पता नहीं वो सच था
या ये सच है
जब अभी तो ज़िन्दगी का
सिर्फ एक पड़ाव ही तय किया है
किनारे तक पहुँचने के लिए तो
ना जाने कितनी अग्निपरीक्षायें
मूंह बाये खडी हैं
बताओ ना फिर ...................
क्या इसी तरह तय कर पाओगे
अजनबियत का सफ़र
क्यूँकि जानते हो ना
जो तारे आसमाँ से टूट जाते हैं वो फिर नहीं जुडा करते!!!

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

सुन्न

जब सुन्न हो जाता है कोई अंग
महसूस नहीं होता कुछ भी
न पीड़ा न उसका अहसास
बस कुछ ऐसी ही स्थिति में
मेरी सोच
मेरे ह्रदय के स्पंदन
सब भावनाओं के ज्वार सुन्न हो गए हैं

अंग सुन्न पड़ जाए तो

उस पर दबाव डालकर
या सहलाकर
या सेंक देकर
रक्त के प्रवाह को दुरुस्त किया जाता है
जिससे अंग चलायमान हो सके
मगर
जहाँ मन और मस्तिष्क
दोनों सुन्न पड़े हों
और उपचार के नाम पर
सिर्फ अपना दम तोड़ता वजूद हो
न खुद में इतनी सामर्थ्य
कि  दे सकें सेंक किसी आत्मीय स्पर्श का
न ऐसा कोई हाथ जो
सहला सके रिश्ते की ऊष्मा को
या आप्लावित कर सके
रिक्तता को स्नेहमयी दबाव से
फिर कैसे संभव है
खुद -ब -खुद बाहर आना
सूने मन के , तंग सोच के
सुन्न पड़े दायरे से ...............

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

बस निर्णय करो ..........किस तरफ से ?



ना लीक पर
और ना लीक से हटकर
कुछ भी तो नहीं रहा पास मेरे
ना कुछ कहना
ना कुछ सुनना
एक अर्धविक्षिप्त सी तन्द्रा में हूँ
किसी स्वर्णिम युग की दरकार नहीं
और ना ही किसी जयघोष की चाह
खुश हूँ अपने पातालों में
फिर भी कशमकश के खेत
कैसे लहलहा रहे हैं ........
आदिम वर्ग कितना खुश है
और मेरी जड़ सोच के समूह कितने कुंठित
फिर भी जिह्वया लपलपा रही है
ज्यों मनचाही पतंग काटी हो
ये सोच पर पड़े पालों पर
ना जाने कैसे इतने सरकंडे उग आये हैं
कि  कितना दुत्कारो
कितना समझाओ
मगर आकाश बेल से बढे जा रहे हैं
अब जड़ों को चाहे कितना खोदो
बीज कब और कहाँ रोपित हुआ था
उसका न कोई अवशेष मिलेगा
जीना होगा तुम्हें ............हाँ ऐसे ही
इसी अधरंग अवस्था में
क्योंकि
ना तुम लीक पर हो
ना लीक से हटकर हो
तुम उस दुधारी तलवार पर हो
जिसके दोनों तरफ तुम्हें ही कटना है
बस निर्णय करो ..........किस तरफ से ?

इतिहास की किताब का महज एक पन्ना भर हो तुम

क्योंकि
संस्कृति और संस्कार तो सभ्यताओं संग ही ज़मींदोज़ हो चुके हैं
अब पुरातत्वविदों के लिए महज शोध का विषय हो तुम ..............

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

प्रेम का अंतिम लक्ष्य क्या ………सैक्स?





प्रेम
एक अनुभूत प्रक्रिया
न रूप न रंग न आकार
फिर भी  भासित होना
शायद यही इसे
सबसे जुदा बनाता है
ढाई अक्षर में सिमटा
सारा संसार
क्या जड़ क्या चेतन
बिना प्रेम के तो
प्रकृति का भी अस्तित्व नहीं
प्रेम का स्पंदन तो
चारों दिशाओं में घनीभूत होता
अपनी दिव्यता से आलोकित करता है
फिर भी प्रेम कलंकित होता है
फिर भी प्रेम पर प्रश्नचिन्ह लगता है
आखिर प्रेम का वास्तविक अर्थ क्या है
क्या हम समझ नहीं पाते प्रेम को
या प्रेम सिर्फ अतिश्योक्ति है
जो सिर्फ देह तक ही सीमित  है
जब बिना प्रेम के प्रकृति संचालित नहीं होती
तो बिना प्रेम के कैसे
आत्मिक मिलन संभव है
जो मानव देह धारण कर
इन्द्रियों के जाल में घिर
हर पल संसारिकता में डूबा हो
उससे कैसे आत्मिक प्रेम की
अपेक्षा की जा सकती है
आम मानव के प्रेम की परिणति तो
सिर्फ 
सैक्स पर ही होती है
या कहिये 
सैक्स ही वो माध्यम होता है
जिसके बाद प्रेम का जन्म होता है
ये आम मानव की व्यथा होती है
जिस निस्वार्थ प्रेम की अभिलाषा में
वो उम्र भर भटकता है
अपने साथी से ही न निस्वार्थ प्रेम कर पाता  है
उसका प्रेम वहां सिर्फ
सैक्स पर ही आकर पूर्ण होता है
ये मानवमन की विडंबना है
या कहो
उसकी चारित्रिक विशेषता है
जो उसका प्रेम
 सैक्स की बुनियाद पर टिका होता है
मगर देखा जाये तो
 
सैक्स सिर्फ सांसारिक प्रवाह का
एक आधार होता है
मानव तो उस सृजन में
सिर्फ सहायक होता है
और खुद को सृष्टा मान
 सैक्स का दुरूपयोग
स्व उपभोग के लिए करना जब शुरू करता है
यहीं से ही उसके जीवन में
प्रेम का ह्रास होता है
क्योंकि
प्रेम का अंतिम लक्ष्य 
सैक्स कभी नहीं हो सकता
ये तो जीवन और सृष्टि के संचालन में
मात्र सहायक की भूमिका निभाता है
ये तो वक्ती जरूरत का
एक अवलंबन मात्र होता है
जिसे आम मानव प्रेम की परिणति मान  लेता है
जबकि
प्रेम की परिणति तो सिर्फ प्रेम ही हो सकता है
जहाँ प्रेम में प्रेम हुआ जाता है
प्रेम में किसी का होना नहीं
प्रेम में किसी को अपना बनाना नहीं
बल्कि खुद प्रेमस्वरूप हो जाना
बस यही तो प्रेम का वास्तविक स्वरुप होता है
जिसमे सारी  क्रियाएं घटित होती हैं
और जो होता है आत्मालाप ही लगता है
बस वो ही तो प्रेम में प्रेम का होना होता है
मगर
आम मानव के लिए
विचारबोध ज़िन्दगी के
अंतिम पायदान पर खड़ा होता है
उसके लिए तो
प्रेम सिर्फ प्राप्ति का दूसरा नाम है
जिसमे सिर्फ जिस्मों का आदान प्रदान होता है

लेकिन वो प्रेम नहीं होता
वो होता है ………प्यार 
हाँ ………प्यार 
क्योंकि प्यार में सिर्फ़ 
स्वसुख की प्रक्रिया ही दृष्टिगोचर होती है
जिसमें साथी सिर्फ़ अपना ही सुख चाहता है
जबकि प्रेम सिर्फ़ देना जानता है
और प्यार सिर्फ़ लेना ………सिर्फ़ अपना सुख 
और यही पतली सी लकीर 
प्रेम और प्यार के महत्त्व को
एक दूजे से अलग करती है 
मगर आज का प्राणी
अपने देहजनित प्यार को ही प्रेम समझता है 
और
बेशक उसे ही वो प्रेम की परिणति कहता है
क्योंकि
कुछ अंश तक तो वहां भी प्रेम का
एक अंकुर प्रस्फुटित होता है
तभी कोई दूसरे की तरफ आकर्षित होता है
और अपने जिस्म को दूजे को सौंपा करता है
और उनके लिए तो
यही प्रेम का बीजारोपण होता है
अब इसे कोई किस दृष्टि से देखता है
ये उसका नजरिया होता है
क्योंकि……उसकी नज़र में

सैक्स भी प्रेम के बिना कहाँ होता है
कुछ अंश तो उसमे भी प्रेम का होता है
और ज्यादातर दुनिया में
आम मानव ही ज्यादा मिलता है
और उसके लिए
उस तथाकथित प्रेम का
अन्तिम लक्ष्य तो सिर्फ़ सैक्स ही होता है…………

जबकि सैक्स में 
कहाँ प्रेम निहित होता है
वो तो कोरा रासरंग होता है
वक्ती जरूरत का सामान
आत्मिक प्रेम में सिर्फ़ 
प्रेम हुआ जाता है
वहाँ ना देह का भान होता है  
बस यही फ़र्क होता है 
एक आत्मिक प्रेम के लक्ष्य में
और कोरे  दैहिक प्रेम में
हाँ जिसे दुनिया प्रेम कहती है
वो तो वास्तव में प्यार होता है
और प्यार की परिणति तो सिर्फ़ सैक्स में होती है .........मगर प्रेम की नहीं 
बस सबसे  पहले तो 
इसी दृष्टिकोण को समझना होगा
फिर चयन करना होगा 
वास्तव में खोज क्या है
और मंज़िल क्या …………?

( सृजक पत्रिका के मई से जुलाई अंक में प्रकाशित मेरी कविता )

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

आओ कुछ शब्दों की चहलकदमी की जाये


ज्योतिपर्व प्रकाशन से प्रकाशित "शब्दों की चहलकदमी" काव्य संग्रह का  संपादन सत्यम शिवम के हाथों हुआ जिसमें उन्होने 40 कवियों के भावों को एक माला में पिरोया है और हर मोती इस माला में गुंथकर खास हो गया है । यूं तो ये सारा ब्रह्माण्ड शब्द की ही उपज है , शब्द ही बीज है ब्रह्मनाद का और उस पर शब्दों की चहलकदमी जब होती है तो संगीतमय रिदम अपने आप दिलों पर अपनी झंकार छोड़ जाती है बस वैसा ही इस संग्रह के लिए कहा जा सकता है .

आदर्शिनी श्रीवास्तव की "विनय पत्रिका बन जाऊं , तुम क्यों नहीं ,बंद करो ये मायाजाल , गाँव का गलियारा " कवितायेँ जैसे दिनकर की प्रथम उजास सी चेतना पर छा जाती हैं जहाँ शब्द स्वयं संगीत बन अंतस को भिगो जाती  हैं फिर चाहे प्रकृति हो या प्रेमी या ईश्वर  या शहर और गाँव के रहन सहन का अंतर सबका चित्रण बखूबी किया है .

अंजू चौधरी की हाँ मैं एक आम इंसान हूँ कविता आम इन्सान की जिजीविषा को ही दर्शाती है कैसे आम इन्सान बिना हिसाब किताब लगाये आगे बढ़ता जाता है अपने वक्त की सलीब पर लटका फिर चाहे ज़िन्दगी में कितनी ही दुश्वारियां क्यों न आयें और उन सबको लांघते हुए क्यों न एक लम्बा मौन धारण करना पड़े कभी अपने लिए तो कभी अपनों के लिए फिर चाहे वो नारी ही क्यों न हो और यही है जीवन की रीती , जीवन की गति सुर , लय , ताल कितनी अलग होती जाये मगर संगीत फिर भी रिदम में ही बजता है .

कविता विकास की ज़िन्दगी  ढूंढती है अपना ठिकाना कभी सपाट राहों पर तो कभी भंवर में फंसकर तो कभी ज़ख्म खाती अपने मायने बदल लेती है फिर भी मन का पंछी   अपनी बेचारगी में कैसे फ़डफ़डाता है और नए दिन की आस में सांझ  का भी एक एक पल सार्थकता से जीने को प्रेरित हो जाता है क्योंकि वो जानता है सत्य हमेशा अटल रहता है फिर चाहे सत्य की खोज में भटका प्राणी कितना जूझे आ ही जाता है एक दिन पुकार सुनकर सत्य का प्रणेता क्योंकि वह सर्वज्ञ है .

अभिषेक सिन्हा की मतवाले पथिक की तलाश नीम भी सार्थक कर गया यदि स्वाधीनता के रंग में रंगकर कलम कागज़ और स्याही ने प्रेम और सौहार्द का  नामाबर लिख दिया ।

देवेन्द्र शर्मा प्रेम पर अधिकार माँग रहे हैं तेरे बारे में प्रेयसी सोचते सो्चते तो दूसरी तरफ़ व्यंग्यात्मक लहजे में भ्रष्टाचार की मूल जड पर प्रहार करते दिखते हैं । समझ गये हैं इंसान के होने का महत्व तभी तो आज मैने ठान ली है के माध्यम से कब यथार्थ अमरत्व उपदेश देते कर्म का महत्व समझ गये हैं पता नहीं चलता क्योंकि दुनिया हम हों ना हों चलती ही रहेगी।

दिनेश गुप्ता एक सिपाही की शहादत के अंतिम क्षणों का चित्रण दीया अंतिम आस का के माध्यम से कर रहे हैं कि सिपाही के दिल में देश के लिये कैसा जज़्बा होना चाहिये कि वो बार बार उसी मिट्टी में जन्म लेकर फिर वतन के लिये मिटने को तैयार रहता है । तो दूसरी तरफ़ मोहब्बत का सागर ठाठें मार रहा है उनकी इन कविताओं में …कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ …सच तो है कैसे लिखा जा सकता है अपरिमित बहते दरिया की बूँद बूँद को तो दूसरी ओर तुमको देखे ज़माना बीत गया और मेरी आँखों में मोहब्बत के जो मंज़र हैं  वो खुद हाल-ए-दिल बयाँ कर रहे हैं।

गरिमा पाण्डेय विश्वास से लबरेज़ हौसलों को उडान भरने को कहती हैं साथ प्रेम जो एक विश्वास है, फ़ूल है, राधा है , मीरा है क्योंकि प्रेम से बढकर जग में कुछ नही । साथ ही नारी के प्रति संवेदनायें व्यक्त करती उनकी कलम पिता की स्नेहमयी धारा में डूब कर प्रश्न करती है पिता के ममत्व के प्रति जो विचारणीय है।

मनमोहन कसाना किसान और बरसात के संबंध पर दृष्टिपात करते हुये उनके हर्ष और शोक को व्यक्त कर रहे है कैसे किन परिस्थितियों से वो जूझा करता है तब निवाला उसके मूँह मे डलता है। बोहनी का महत्त्व इतनी संजीदगी से समझा रहे हैं कि पाठक रुक जाता है कुछ देर और सोचता है उस दर्द के बारे में तो दूसरी तरफ़ देश के हालात , अबलाओं पर अत्याचार , रिश्वतखोरी आदि के कारण नाउम्मीद हो रहे हैं ये कहते हुये उम्मीद अब कहाँ ? । सभी रचनायें दर्द को उँडेलती सोचने को विवश करती हैं।आज फिर से के माध्यम से एक सच्चाई की कालिख को समेटती रचना दिल में उतर जाती है।


मुकेश कुमार सिन्हा ने मैया के माध्यम से एक ज़िन्दगी को जी लिया तो दूसरी तरफ़ अखबार की सुर्खियाँ कैसे एक इंसान को व्यथित करती हैं उसका चित्रण किया है । फिर प्रेम गीत गाते हुये कैसे एक मकान के माध्यम से संवेदनाओं के ताबूत पर आखिरी कील जडी है वह पठनीय है जो अन्तस को भिगो जाती है।

नीलिमा शर्मा ने एक ज़माना था के माध्यम से एक स्त्री जो माँ भी है उसके जीवन को दर्शाया है कि समय बदलने से उसके जीवन या दिनचर्या पर कोई फ़र्क नहीं पडता । साथ ही भावुक मन प्रभु से भक्ति का दान लेने के लिये प्रार्थना करता है तो दूसरी तरफ़ बिस्तर की सिलवटें भी एक कहानी कह्ती हैं को अपने संवेदी भावों से संजोया है और रविवार का कहो या प्रियतम का जीवन मे क्या महत्त्व है इसे दर्शाया है इस कविता के माध्यम से अरे, आज रविवार है।

नीरज द्विवेदी ने अपने रचना संसार में एक बेटी के मन के भावों को माँ , इसमें मेरा दोष ना देख के माध्यम से व्यक्त किया है देशभक्ति से ओत-प्रोत रचना मै अगस्त बनना चाहता हूँ , रात भर जलता रहा चाँद गज़ल दिल को छूती है। राष्ट्र की जिजीविषा एक प्रश्न करती है।


प्रदीप तिवारी ने आम आदमी के माध्यम से आज के हालात पर कटाक्ष किया है तो दूसरी तरफ़ बिटिया के माध्यम से बेटी का ज़िन्दगी में क्या औचित्य है उसे उकेरा है साथ में एक मुलाकात के माध्यम से इंसानी सोच को दर्शाया है और साथ में ज़िन्दगी कैसे जीनी चाहिये ये बताया है।

डाक्टर प्रीत अरोडा माँ -एक मधुर अहसास के माध्यम से माँ के महत्त्व को दर्शा रही हैं तो दूसरी तरफ़ बचपन से पोषित संस्कारों की जीत कैसे नियति को सहने को मजबूर करती है , बता रही हैं । मिलजुल कर रहने का संदेश देती नव चेतना और आशा और कर्म की शिक्षा देती सफ़लता का मंत्र कवितायें पढने योग्य हैं।

पुरुषोत्तम वाजपेयी ने जीवन साथी के जाने की पीडा को उकेरा है तू चली गयी के माध्यम से । कौन से मजहब से ,गीत मेरे आज तक और इश्क के गाँव अलग अलग स्वाद से सराबोर रचनायें मन को छूती हैं।

घुमक्कड आगन्तुक ने ज़िन्दगी के उतार चढावों के साथ जीने की जिजीविषा को बयान किया है यूँ तन्हा कब तक घूमोगे बंजारा में । तो दूसरी तरफ़ मोहब्बत के बाज़ार मे खडा मैं दीवाना दीवानगी बेचता हूँ एक शानदार रचना है साथ ही सज़दे आवारा हो गये गज़ल भी मन को मोहती है।ज़िन्दगी का तमाशा हो गया सभी रचनायें पठनीय हैं।


रविन्द्र सिंह की कल रात …मन का कोना एक भीगे दर्द का अहसास कराती रचना दिल मे उतर सी जाती है।मोहब्बत के भीने अहसास से लबरेज़ कविता पहली बारिश सच में अपने साथ भिगो जाती है मन की वादियों को । ज़िन्दगी तन्हा है और कतआत रचनायें भी पठनीय हैं ।

रेखा किरोन तो बचपन के झूले में पींगें भरने लगीं और सोच में डूब गयीं कि बचपन हमेशा यादों की वादियों में वैसा ही तरोताज़ा रहता है। नारी की वेदना को महसूसती हैं आँसुओं की वेदना से तो दूसरी तरफ़ एक अजन्मी बेटी के दर्द को पिरोया है नन्ही सी प्यारी सी में साथ ही रात थी ऐसी एक अन्दर की खोज को उकेरती रचना है।

रोशी अग्रवाल की दशानन का वध एक प्रश्नचिन्ह लगाती रचना है जो आज के हालात पर दृष्टिपात करते हुये हल भी सुझाती है ।इंसानी रिश्ते में रिश्तों के बखिये उधेडती दिखती हैं तो दूसरी तरफ़ स्त्री की पीडा में उस दर्द को बेहद संजीदगी से सहेजा है । कपट के बहुरंग अपने नाम को सार्थक कर रही है कि कैसे इंसान कभी रिश्तों के तो कभी दूसरों के कपट में घिरकर तबाह हो जाता है।

सरस दरबारी बता रही हैं अपने चाहे कितने टुकडे हो जायें फिर भी जीने के लिये अपना सहारा आप ही बनना पडता है । मौन भी बोलता है विस्तार पाता जाता है चाहे कितने ही मोडों से गुजरे । इंसान आम आदमी है कैसे लेखा जोखा रख सकता है अपने आप ही किसी के  गुनाहों का इसलिये छोड देता है अपने आप को उसके न्याय पर । माँ के प्रति संवेदना व्यक्त करती रचना माँ की महिमा का गुणगान करती है।

सतीश मापतपुरी की रचनायें ज़िन्दगी थक गयी ऐसे हालात से और ह्रदय की कोमलता मत खो देना दोनों ही आम आदमी की जद्दोजहद भरी ज़िन्दगी से शिकायत करती तो कहीं खुद को समेटती रचनायें हैं । आँख कविता में आँखो के महत्त्व को दर्शाया है तो जाने क्यों तेरी याद आती एक प्रेमी मन की मनोदशा को उकेरती रचना है। 

शैल सिंह की मर्मस्पर्शी गीत एक सिपाही की पत्नी रचना एक ऐसी पत्नी की वेदना को व्यक्त कर रही है जिसकी अभी शादी हुयी है और सुहाग की सेज़ छोड पति देश को समर्पित हो गया है तो दूसरी तरफ़ एक प्रेमी का प्रथा पर प्रहार कविता में प्रेमिका का दूसरे की हो जाने पर भी मन के तारों से ना दूर होने का खूबसूरत चित्रण है । मैं सीपी के मोती जैसी और मीत रचनायें मन को लुभाती हैं।


श्यामल सुमन अपनी गज़लों से अपने आप पहचाने वाली शख्सियत हैं जिनकी चारों गज़लें अलग ही समाँ बनाती हैं …बात कहने की धुन में सब कुछ कह देना ,पूछो तो भगवान है क्या में असलियत पर प्रहार कर रहे हैं , खार में भी प्यार है में बता रहे हैं कि ये तो देखने वाले की नज़र पर है वो क्या देखता है और राम तुम्हें बनवास मिलेगा के माध्यम से बता दिया कि आज यदि तुम इस धरती पर आ गये तो कुछ भी वैसा ना मिलेगा और तुम्हारा उपहास ही उडेगा अगर अपनी उन परिपाटियों पर चले तो क्योंकि बहुत बदल चुका है आज आदमी, उसका चरित्र , उसकी सोच्……हालात पर कडा प्रहार करती सशक्त रचना है। 

सोनल रस्तोगी ने मिथ्या देव में आज के मानव के चरित्र का सटीक चित्रण किया है तो दूसरी तरफ़ देश के हालात का जिक्र किया है गूंगे बहरे लोग के माध्यम से जिनके ज़मीर तक बिक चुके हैं पता नहीं ज़िन्दा भी हैं या ज़िन्दा लाश ही चल फिर रही है। फिर आये रूठते मनाते दिन और मै आ रही हूँ प्रेम रस से सराबोर रचनायें मन को मोहती हैं 


सुमन मिश्रा प्रेम की धूप छांव में ज़िन्दगी के रंगों को गुन रही है और निशा निमन्त्रण पर चाँद को चाहने की इच्छा कर बैठीं मैने चाँद को चाहा था में मगर स्वप्न सरीखी ज़िन्दगी में स्वप्न को आवाज़ मत दो कह रही हैं क्योंकि जरूरी तो नहीं ना स्वप्नों का साकार होना कुछ हकीकतों को कर्म की रेख से ही बुनना पडता हैं।

क्या बताएं क्या मज़ा है आलस की ज़िन्दगी में बता रहे है सुमित तिवारी और चाहते हैं वैसे ही चलने दो चाहे बिखरे हों या संवरे ज़िन्दगी जैसी है वैसी ही चलने दो नयनों में प्रेम भर कर स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए , मानवता के लिए , अत्याचार के विरोध के लिए हे वीर तुझे जगाने आया हूँ का आहवान कर रहे हैं . प्रेम के साथ कर्तव्य को भी बखूबी  निबाह रहे हैं .

सुषमा वर्मा आज ख्वाब लिख रही हैं खुली आँखों के ख्वाब और साथ में प्रेमी का हर पल दीदार हो रहा हो जिसे हर शय में वो ही दीखता हो जिसे तभी तो कह रही  हैं कहीं होऊं मैं मगर  तुम्ही को ढूंढती हूँ मैं क्योंकि तुम पर विश्वास करती हूँ प्रेम और समर्पण के भावों से सराबोर एक स्त्री मन के भावों को यूँ बयां करती हैं और अपने ख्वाब औरख्वाहिशें रख दी हैं जो एक किताब में बंद हैं कहीं तब तक जब तक कोई पढने वाला ,उन पंक्तियों को गुनने वाला न मिल जाए . 

शुभम त्रिपाठी की ग़ज़ल जीत की दहलीज से चलती है तो जानती है आगाज़ तो हुआ मगर अंजाम खाली था मगर फिर  भी दिल के किसी कोने में मेरी इतनी सी हसरत है जो यादों को किसी कब्र में दफ़न कर दिया जाए क्योंकि अब डंसने लगी तन्हाइयां जब से किसी की यादों ने बेइंतेहा घेरा  है और सिर्फ एक ही चाह में प्रेमी मन उलझा है इक बार मुझे अपना कह दे उफ़ प्रेम जो न कराये कम ही है .

डॉ प्रियंका जैन यादों के पन्ने पलट रही हैं और प्रीत की लड़ियाँ बुन रही हैं जहाँ प्रेमी से रु-ब-रु हो रही हैं .

अर्चना नायडू की माँ का आँचल महादेवी वर्मा को समर्पित है उस नीर भरी दुःख की बदरी को भिगोना चाहती हैं ममत्व से क्योंकि जानती हैं मैं तेरी सर्जनिका  हूँ तू मान न मान . अप्रतिम सौन्दर्य की मल्लिका हूँ न केवल बाहरी बल्कि आंतरिक सौंदर्य से लबालब भरी हूँ क्योंकि मैं हूँ स्वयं नारायणी एक ऐसी स्त्री जिसमे तू चाहे तो हर रूप देख सकता है सिर्फ अबला के स्वरुप को छोड़कर  . एक सृष्टि को जन्म देने वाली कैसे न अप्रितम सौन्दर्य की मल्लिका होगी . 

गौरव सुमन ने तो आँखों में तेरी सूरत बसा रखी है जब इतना प्रेम हो तो आँखों में ही रात गुजर जाती है फिर चाहे विरह वेदना कितना सताती है क्योंकि सब्र की न इन्तहा ली जाए जीने का मौका तो दे ज़िन्दगी फिर जीकर भी दिखा देंगे और फूल को शाख पर सजा देंगे . प्रेम का जज्बा तो जो न कराये कभी पागल तो कभी आशिक बनाये .

हेमंत कुमार दुबे उसे कहाँ ढूँढें जो अंतर में हो प्रगट , अव्यक्त को व्यक्त करने की कोशिश में उसी में समाना चाहते हैं क्योंकि अनामिका के प्यार की कोई जुबान नहीं होती फिर चाहे खोज में वर्षों गुजरें या युगों खोज जारी रहती है और आस का दीप टिमटिमाता रहता है मौन के गह्वर में फिर चाहे शब्दों की चहलकदमी हो या नहीं वैसे भी प्रेम कब शब्दों का मोहताज हुआ है .


लक्ष्मी नारायण लहरे फुर्सत के क्षणों में कुछ खट्टी मीठी यादों के साथ नए सवेरे के इंतज़ार में आशाएं संजो रहे हैं मगर ज़िन्दगी की तल्खियाँ , सच्चाइयां अपना कहने वालों के प्रति दुःख से चूर हो रहा है कवि मन क्योंकि उम्र भर जिनके लिए खटता रहा आज उनके पास दो पल नहीं देने को आखिर वो भी इंसान है उसकी भी कोई चाह है उम्र भर की जिसे संजोये वो जी रहा है मगर ये बात वो कैसे बताये की कुछ आशाएं उसने भी संजोयी हैं और किसे ?

नीरज विजय सोच के संसार में विचरते   तन्हा ज़िन्दगी के लम्हों से रु-ब -रु होते आज़ादी का अनुभव करना चाहते हैं उनकी यादो से जो एक टीस उत्पन्न कर रही हैं .


डॉ रागिनी मिश्र पुकार रही हैं आज के हालात से व्यथित होकर राम अब आ ही जाओ एक नहीं अनेक अहिल्याओं का उद्धार करने हेतु . आज के हालत में  हर घर में चाहिए एक विभीषण ताकि जो सही सलाह दे जन कल्याण के लिए क्योंकि हर और ज़िन्दगी में आज विद्यमान हैं अनेकों रावण . फिर भी प्रेम रस से भीगा मन कह ही देता है सिर्फ तुम हो मेरे फिर चाहे ए ज़िन्दगी तुझे कितना संभाला मैंने चाहे उसमे फूल रहे या खार .

रेखा श्रीवास्तव जान गयी हैं दोहरा सत्य ज़िन्दगी का जहाँ रोने वाले के ग़मों में कोई उसका साथी नहीं होता फिर भी ज़िन्दगी के दोराहे पर समझ नहीं पा रही क्या भूलूँ क्या करूँ क्योंकि इंसान का आखिरी मुकाम तो एक ही जगह जाकर ख़त्म होता है और शमशान तक का ही साथ होता है फिर चाहे कोई आपकी प्रशंसा करे या बुराई उसे निराश मत कीजिये .

संध्या जैन एक अलग अन्दाज़ मे अपने भावों को पिरो रही हैं जहाँ शीर्षक की जरूरत ही नहीं लगती …………बस एक कसक है प्रियतम के लिये , एक भाव है , एक मौसम है जो गुनगुना रहा है अपने रेशमी अन्दाज़ में , एक सहर है जो बैठी है उदय होने के ख्याल में , एक मोहब्बत है जो प्यास को भी चुल्लू भर पीना चाहती है और प्यास है कि और बलवती हुयी जाती है । 

संजय भास्कर ज़िन्दगी के चौराहे  पर अनाम रिश्ते बना रहे हैं जहाँ पता नहीं कौन कहाँ कब और कैसे मिल और बिछड़ रहा है और ज़िन्दगी का कारवां चल रहा है क्योंकि खुद को बांधा है शब्दों के दायरे में तब जाना कुछ खो जाने की चुभन का अहसास .

विभोर गुप्ता शिक्षा का दलालीकरण कैसे हो रहा है उस पर अपने दिल का दर्द बयां कर रहे हैं . आज तो वो कहते हैं देख बापू देख तेरे देश में क्या हो रहा है , क्या हाल बना दिया है जहाँ कुछ भी असली नहीं रहा और जब ऐसे हालात होंगे तो वो जानते है इन हालातों में दशरथ नंदन अवतार नहीं धरता इसलिए आह्वान कर रहे हैं दानवों का संहार करने के लिए और पुकार रहे हैं क्योंकि और कोई रास्ता नहीं सूझ रहा  माँ भवानी अवतार धरो और दुष्टों का संहार करो .

विश्वजीत सपन रोटी के माध्यम से बेटी की दशा पर चिंतित होने के साथ सन्देश भी दे रहे हैं तो दूसरी तरफ ईश्वर और सरकार में क्या सामंजस्य है वो बता रहे हैं एक बेहद उम्दा व्यंग्य बाण के साथ प्रेम गीत भी गुनगुना रहे हैं साथ ही भाई के फ़र्ज़ को भी निभा रहे हैं रक्षा बंधन का गीत गाकर और उसकी अहमियत बताकर .

और अंत में मेरी रचनायें भी इसमें शामिल हैं 

ऊष्ण कटिबंधीय प्रदेशों मे मौसम नही बदला करते 
कौन से सितारे मे लपेटूँ बिखरे अस्तित्व को ? 
 फिर लाशों का तर्पण कौन करे ? 
क्या ढूँढ सकोगे मुझे ? 


एक ऐसा काव्य संग्रह जिसमें जीवन के प्रत्येक पहलू पर शब्दों एक माध्यम से कवियों ने चहलकदमी की है कोई भी पहलू अछूता नहीं रहा चाहे जीवन के उतार चढाव हों , खुशी या गम हो या ईश्वर और इंसान हो सभी को सभी ने अपने अपने विचारों और भावों की माला में इस तरह गूँथा है कि माला का कोई भी पुष्प अलग नहीं लगता । यदि आप इस संग्रह को प्राप्त करना चाहते हैं तो सत्यम या ज्योतिपर्व प्रकाशन से सम्पर्क कर सकते हैं  

ज्योतिपर्व प्रकाशन 
m: 9811721147


SATYAM SHIVAM 
EMAIL : satyamshivam95@gmail.com
m: 9031197811, 9934405997