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मंगलवार, 19 जून 2018

हसीनाबाद मेरी नज़र में



उपन्यास लेखन एक साधना है. सिर्फ शब्दों का खेल भर नहीं. ऐसे में जब कोई पहला उपन्यास लिखता है तो पाठकों को उम्मीद होती है कुछ नया मिलेगा. पहले उपन्यास में लेखक अपने आस पास के घटनाक्रमों से प्रभावित होता है तो उनका आना लाजिमी है. जरूरी नहीं वो उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा हों या उनकी दास्ताँ. पिछले दिनों कथाकार गीता श्री का उपन्यास ‘हसीनाबाद’ पढ़ा.
मुख्य पात्र गोलमी और उसकी माँ सुन्दरी हैं. जिन्हें लेखिका ने बहुत खूबसूरती से कथानक में ढाला है. ठाकुरों की निजी संपत्ति बनी सुंदरी के जीवन और उसके एक निर्णय से बदलती ज़िन्दगी का चिटठा है उपन्यास. बेशक खुद का जीवन कैसा ही बीते एक माँ यही चाहती है उसके बच्चे उसके जैसा जीवन जीने को विवश न हों. उसी सन्दर्भ में उठाया गया उसका कदम गोलमी के भविष्य की नींव बनता है. नाचना माँ का पेशा था तो माँ चाहे कितना ही दूर रखना चाहे कुछ गुण औलाद में जींस के माध्यम से पहुँच ही जाते हैं और ऐसा ही यहाँ होता है. जितना नाच गाने से सुंदरी दूर रखना चाहती है उतना ही गोलमी प्रतिरोध करती है और अपनी मनमानी भी क्योंकि कहीं न कहीं पिता के गुण भी आने ही होते हैं और फिर ठाकुरों में तो मनमानी कूट कूटकर भरी होती है.
ज़िन्दगी कभी सीधी राह नहीं चलती. उसकी सर्पीली डगर पर रपटन होती है जिसका पता इंसान को कदम कदम पर होता है. उपन्यास पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे लेखिका गोलमी के माध्यम से एक आग को रेखांकित कर रही हो जैसे खुद उस आग पर चल रही हों. जैसे लेखिका स्त्री की स्वतंत्रता की पुरजोर वकालत करती हैं वैसा ही चरित्र यहाँ पेश किया है. बेशक इसे कोई राजनितिक उपन्यास कह दे लेकिन आधे से ज्यादा उपन्यास तक तो राजनीती आई ही नहीं. बल्कि राजनीती के दखल ने गोलमी को ज़िन्दगी को समझने की समझ दी. विभिन्न मोड़ों से गुजरते हुए गोलमी को अपने परायों का भी पता चलता है तो ज़िन्दगी की हकीकतों का भी. सत्ता कितनी निरंकुश होती है उसका भी आभास होता है. खुद को ख्याति के आसमान पर देखने की चाह कैसे विभिन्न मोड़ों से गोलमी को गुजारती है और हकीकत का अक्स दिखाती है, उसी का चित्रण है हसीनाबाद, एक बदनाम बस्ती से राजनीती तक का सफ़र .
उपन्यास पढ़ते हुए कई जगह कुछ आभास हुए जिन्होंने कहीं तुलनात्मक अध्ययन को मजबूर किया तो कहीं सोचने को. पिछले दिनों ही मैत्रेयी पुष्पा का ‘इदन्मम’ पढ़ कर चुकी वहां भी मंदा और उसकी दादी और कुसुमा थे तो गाँव के जीवन की दुश्वारियों के साथ संघर्ष का सफ़र जिसमें भी राजनीती का दखल ऐसे ही होता है और फिर अंत में हाथ खाली ही रह जाते हैं, जाने कितना कुछ खोना पड़ जाता है मंदा को. फिर से संघर्ष को आमंत्रित कर देती है उसकी ज़िन्दगी......ऐसा ही कुछ हसीनाबाद में देखने को मिला. फर्क बस बदनाम बस्ती का था. वर्ना दांवपेंच और राजनीती ने ऐसा ही आकार लिया.
इसके अलावा लेखिका ने गोलमी के चरित्र को ऐसा लगा जैसे कई खाँचों में बांधना चाहा और पढ़ते हुए लगा जैसे कहीं स्मृति ईरानी का चेहरा सामने आ रहा है तो कहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल का. जो घटनाक्रम दिखाया है वो कहीं न कहीं इन्हीं दोनों नेताओं का चित्र सामने खींचता है. अब लेखिका क्योंकि स्वयं पत्रकार रही हैं तो राजनीति की बहुत जानकार भी रही हैं तो राजनितिक दांवपेंचों को बखूबी प्रयोग किया है. अच्छी खासी उठापटक के बाद भी लेखिका ने इदन्मम की तरह फिर संघर्ष की तरफ वापस मोड़ दिया गोलमी को, तोड़ दिया उसका मतिभ्रम. मानो कहना चाहती हों जीवन यदि सुखमय जीना हो तो अपनी भूमि पर ही आप जी सकते हैं, दूर के ढोल सुहावने ही होते हैं उस पर राजनीती तो ऐसा कीचड है जिसमे कमल नहीं खिला करते. यदि आपको अपनी पहचान बनानी है तो आपके लिए ये सड़क बंद है. नृत्य को आकाश की ऊंचाई तक ले जाने की उसकी चाह कहाँ से कहाँ ले गयी, कितना कुछ खोकर उसने हारकर जीवन का वास्तविक अर्थ समझा. वहीँ लेखिका खुद लोक की पैरोकार रही हैं तो गोलमी के माध्यम से लोक और संस्कृति को बचाने की कवायद को खूबसूरती से बयां किया है.
अधूरे सपने, टूटी ख्वाहिशों का नाम ही है जैसे ज़िन्दगी मानो यही निचोड़ निकल कर आता है उपन्यास का. वहीँ कुछ मुद्दे लेकर चलीं लेखिका मगर उन्हें कोई मोड़ न देकर अधूरा ही छोड़ दिया जिसका उत्तर एक पाठक जानना चाहता था जैसे रमेश, गोलमी का भाई, जिसे सुंदरी हसीनाबाद ही छोड़ आती है जो नागवार गुजरता है क्योंकि कोई भी माँ अपने दोनों बच्चों में फर्क नहीं करना चाहेगी. उसके लिए तो दोनों ही बच्चे उसकी दो आँख होते हैं मगर यहाँ सुंदरी को सिर्फ गोलमी की चिंता है कि कल वो भी सिर्फ ठाकुरों के भोग की वस्तु न बनकर रह जाए मगर उसने ये नहीं सोचा कि रमेश का क्या होगा? क्या वो भी ठाकुरों का लठैत बनकर ही नहीं रह जाएगा? क्या उसका जीवन ठाकुर की निजी मिलकियत बनकर नहीं रह जायेगा? वो तो ठाकुर ने ऐसा कुछ किया नहीं वर्ना हो सकता था सुन्दरी के भागने का बदला वो रमेश से उम्र भर लेता........संभावनाएं कई उठती हैं लेकिन लेखिका ने बीच बीच में रमेश और ठाकुर सजावल सिंह के पात्रों को तो माध्यम जरूर बनाया लेकिन वहीँ रमेश को अंत तक पता न चलने दिया अपना और गोलमी का रिश्ता बल्कि मिली भी नहीं उससे, देखा भी नहीं उसे, इतने आस पास होते हुए भी...यह खटकता है. लेखिका चाहती तो यहाँ पात्रों को खुला छोड़ सकती थीं और वो अपनी दुनिया बना सकते थे मगर लेखिका ने पात्रों की नकेल अपने हाथों में रखी तो पात्र लेखिका के हाथों की कठपुतली बने चलते चले क्योंकि लेखिका को पता था उसे क्या अंत देना है.
पहला उपन्यास पहले पहले प्यार की तरह होता है और लेखिका का वो प्यार उनके लेखन में झलक रहा है. खूबसूरत भाषा शैली से सजा उपन्यास पाठक को बांधे रखता है और वो जानना चाहता है आखिर गोलमी कौन सा आकाश अपने लिए चुनती है. रोचकता बराबर बनी रहती है. लेखिका को पहले उपन्यास के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं....
बस वाणी प्रकाशन से उपन्यास आया है तो उसमें प्रूफ की गलतियाँ थोडा खटकती हैं जिसके लिए प्रकाशन को ध्यान देना चाहिए था.

शुक्रवार, 25 मई 2018

वक्त की नदी में

मैं वक्त की नदी में तैरती इकलौती कश्ती ...दूर दूर तक फैले सूने पाट और ऊपर नीला आकाश...गुनगुनाऊं गीत तो तैरता है नदी की छाती पर हिलोर बनकर तो कभी हवाएं बेशक ले जाती हैं बहाकर अपने संग...शायद पहुँचे किसी मीत तक फ़रियाद बन ...तन्हाइयों के शहर में बेबसी की आवाज़ बन....शायद दर्द बह जाए टूटते तारे का रुदन बन ...सुना है जो भी कहा जाता है ब्रह्माण्ड में घूमता रहता है अनंतकाल तक ...मेरे मीत! अनंतकाल में कोई काल तो मेरा होगा न जिसमें हो जाएगी सिन्दूरी मेरी पूरी उम्र ...एक रुके हुए फैसले की अर्जी ख़ारिज मत कर देना...तन्हाइयों से बौखलाया शहर सिसक रहा है, दम तोड़ रहा है ...कि कहीं कोई सितार तो बजे और रूह हो जाए अलमस्त कलंदर सी

बुधवार, 25 अप्रैल 2018

बिछड़े सभी बारी बारी :




जाने कैसा ये साल आया है एक के बाद एक सभी छोड़ कर जा रहे हैं. Vijay Kumar Sappatti पिछले कई सालों से एक के बाद एक मुश्किलों से गुजर रहे थे...हम ब्लॉग के वक्त से मित्र रहे और उसी दौरान उनके जीवन में पहले नौकरी की समस्या शुरू हुई जो कई सालों तक लगातार चलती रही. उसके बाद उनकी पत्नी बीमार रहीं और उन्हें आर्थिक तंगी के चलते मकान बेचना पड़ा और एक फ्लैट में आ गए ...मगर रहे जीवन्तता से भरपूर...हम भी कहते विजय ये वक्त भी गुजर जाएगा...वो कहते आखिर कब तक वंदना तो मैं यही कहती बस ये आखिरी है लेकिन जब उनके कैंसर की खबर सुनी तो स्तब्ध रह गयी थी लेकिन कुछ वक्त पहले जब बात हुई तो उन्होंने कहा - अब पूरी तरह ठीक हो गया - जानकर ख़ुशी हुई थी और सोचा था शायद अब ईश्वर मेहरबान हो गया और उनकी सभी परीक्षाएं पूर्ण हो गयीं ...लेकिन मैं गलत थी ....जाने क्या जरूरत आ पड़ी ईश्वर को जो अभी उन्हें अपनी जिम्मेदारियां भी पूरी नहीं करने दीं.....अभी तो बच्चे भी सेटल नहीं हुए और उम्र सिर्फ 52 साल ......ये क्या जाने की उम्र होती है ?

ब्लॉग के माध्यम से हम सब जुड़े थे. अक्सर एक दूसरे की रचनाओं पर गंभीरता से विमर्श करते और प्रोत्साहित भी और विजय कई बार ऐसी कविता लिखते जो दिल को छू जाती तो उसके प्रयुत्तर में मेरी तरफ से भी एक कविता आ जाती ...वो एक ऐसा दौर था जहाँ कितना अपनापन था, सम्मान था.अपनी छोटी छोटी खुशियों को सबसे बाँटना उनका प्रिय शगल रहा...एक बच्चे की तरह ...हमेशा पॉजिटिव थिंकिंग रही.........हर बार गिरकर उठना उसी उत्साह से जैसे कुछ हुआ ही न हो ........बहुत कुछ करना चाहते थे विजय वैसे भी एक ऑल राउंडर थे फिर वो फोटोग्राफी और चित्रकारी हो, कवितायेँ या कहानियां हों, या फिर अध्यात्म ...यहाँ तक कि पिछले दिनों उनकी बनायीं एक लघु फिल्म पर वो पुरस्कृत भी हुए .......जाने क्या कुछ करना चाहते थे और कितना कुछ अधूरा छोड़कर चले गए .

शुरू शुरू में जब ब्लॉग बनाया था तो किसी को जानती नहीं थी तो किसी से अपना नंबर शेयर नहीं करती थी न किसी से फ़ोन पर बात करती थी लेकिन जब हम सबने एक दूसरे को अच्छे से जाना , एक दूसरे पर विश्वास हुआ तब नंबर शेयर किया....तब भी सालों में बात होती थी तभी एक बार बात हुई थी तो विजय ने कहा हम देखो कितने सालों से मित्र हैं लेकिन अब तक मिले नहीं तो जो जवाब मैंने दिया आज सोचती हूँ तो लगता है किसी होनी ने ही वो जवाब दिलवाया होगा लेकिन आज वो ही टीस भी रहा है

हम कभी नहीं मिलेंगे
इस ज़िन्दगी में
कहा था मैंने
मिलने से भ्रम टूट जाते हैं

रु-ब-रु होने पर
एक ठंडापन
एक अजनबियत
एक औपचारिकता की त्रिवेणी में
जब डुबकी लगाओगे
नजर और दिल
खेलने चले जायेंगे गुल्ली डंडा
और तुम करते रह जाओगे
खानाबदोशी से गुफ्तगू

थोडा तो रुक जाते
इतनी भी जल्दी क्या थी जाने की
दोस्तों की बात का इतना भी क्या बुरा मानना भला
कहा था मैंने
और तुमने मान लिया
सच कर दिखाया

ये तब कहा था जब कई लोगों से मिलने पर भ्रम टूटे थे तो सोचा था जो दोस्ती बनी हुई है बनी रहे फिर हम चाहे कभी न मिलें ......लेकिन आज लग रहा है कितना गलत कहा था ....अक्सर कहा करती थी इस आभासी दुनिया ने मुझे बस सच्चे मित्र तो दो चार दिए हैं और विजय उनमे से एक थे ...हम आपस में अपने दुःख सुख शेयर कर लेते थे फिर वो लेखन से सम्बंधित हों या फिर ज़िन्दगी से ...बस अब और नहीं कुछ कह पाऊँगी ......बस तुम जहाँ भी हो ईश्वर अब विजय को अपना प्यार देना, बहुत तकलीफ से गुजरे थे .... 
 
अभी कमेंट में गिरिराज शरण जी ने सूचना लगाईं है विजय की नयी कहानी की किताब अमृत वृद्धाश्रम उनके प्रकाशन से प्रकाशित हुई है तो हम सबकी तरफ से यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी यदि हम सब उस किताब को पढ़ें और प्रकाशक उस किताब को साहित्य की दुनिया में पहचान दिलवाए क्योंकि 'एक थी माया' भी उन्ही के  प्रकाशन  से  प्रकाशित  हुई और बहुत  प्रसिद्द भी . 
विनम्र श्रद्धांजलि .........ईश्वर उनके परिवार को ये दुःख सहने की शक्ति दे :( :(

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

स्त्रियों के शहर में आज जम के बारिश हुई है

कृष्णपक्ष से शुक्लपक्ष तक की यात्रा है ये
आकाशगंगाओं ने खोल लिए हैं केश और चढ़ा ली है प्रत्यंचा
खगोलविद अचम्भे में हैं
ब्रह्माण्ड ने गेंद सम बदल लिया है पाला

ये सृष्टि का पुनर्जन्म है
लिखी जा रही है नयी इबारत मनु स्मृति से परे
ये न इतिहास है न पुराण
चाणक्य की शिखा काट कर टांग दी गयी है नभ पर
प्रतीकों को नहीं बनाना हथियार इस बार
भेस बदलने के चलन को कर निष्कासित
खिल रहा है स्वरूप धरती का

खामोशी की कंटीली डगर एक दुस्वप्न सरीखी
चाहे जितना करे स्यापा
चहक, महल, लहक की उजास से द्विगुणित हो गया सौन्दर्य

मंडप में विराजमान है आदिम सत्ता की राख
नृत्यरत है रक्कासा
देवियाँ बजा रही हैं दुन्दुभी और यक्षिणी फूल 

वहाँ रागों के बदल गए हैं सुर
पहले ख्वाब की पहली मोहब्बत सा
ये है उजास का पहला चुम्बन

स्त्रियों के शहर में आज जम के बारिश हुई है

शनिवार, 14 अप्रैल 2018

सुनो देवी

सुनो देवी
तुम तो नहीं हिन्दू या मुसलमान
फिर कैसे देखती रहीं अन्याय चुपचाप
क्यों न काली रूप में अवतरित हो
किया महिषासुर रक्तबीज शुम्भ निशुम्भ का नाश

सुनो देवी
क्या संभव है तुम्हें भी तालों में बंद रखना?
फिर क्यों नहीं खोले तुमने
चंड मुंडों के दिमाग
क्यों नहीं दुर्गा रूप में अवतरित हो
किया अत्याचारियों का विनाश

सुनो देवी
क्या मान लें अब हम
तुम्हारा अस्तित्व भी महज कपोल कल्पना है
क्या जरूरी है
इंसानियत और मानवता से उठ जाये सबका विश्वास
और आस्था हो जाए पंगु

देखो देवी देखो
चहुँ ओर मच रहा कैसा हाहाकार
जब ईश्वरीय अस्त्तिव भी प्रश्चिन्ह के कटघरे में खड़ा हो गया
और कोई राजनीतिज्ञ
राम और रहीम के नाम पर
अपनी रोटी सेंक गया
क्या महज उन्हीं के हाथ की कठपुतली हो तुम
या फिर
उन्हीं तक है तुम्हारी भी प्रतिबद्धता?

उठो देवी उठो
करो जागृत खुद को
करो सुसज्जित स्वयं को दिव्य हथियारों से
सिर्फ एक बार
कर दो वो ही भीषण रक्तपात
मिटा दानवों को दो मनुष्यता को आधार

गर न कर सको ऐसा
तो कर दो देवी पद का त्याग
जो भ्रम से तो बाहर आ जाए इंसान

ईश्वर सबसे संदेहात्मक दलील है ...

#आसिफा

रविवार, 8 अप्रैल 2018

बचे रहेंगे रंग मेरी नज़र में


जीवन का उल्लास हैं रंग. ज़िन्दगी में इंसान चाहता ही क्या है सिवाय रंगों के होने के. बिना रंगों के कैसा जीवन? कितना नीरस होता जीवन यदि उसमें रंग न होते. यहाँ तक कि प्रकृति भी समेटे हुए है जाने कितने रंग और शायद यही है कारण इंसान ने रंगों के महत्त्व को जाना , समझा और अपनाया. ऐसा ही एक रंग लिए आये हैं कवि-चित्रकार कुंवर रविन्द्र जी बोधि प्रकाशन से प्रकाशित अपने नए कविता संग्रह ‘बचे रहेंगे रंग’ के साथ.

कवि होने के साथ चित्रकार हैं या चित्रकार होने के साथ कवि ये तय करना जरूरी नहीं क्योंकि दोनों ही विधाओं में रविन्द्र जी की जबरदस्त पकड़ है. जब उनकी कलाकृति देखते हैं तो वो खुद बोलती है और जब उनकी कविता पढ़ते हैं तो वो अन्दर उतरती है, आपको पिन चुभाती रहती है. सहज सरल भाषा में बेहद साफगोई के साथ रविन्द्र जी अपनी बात रखते हैं. शब्दों की मितव्ययिता कोई उनसे सीखे लेकिन कम शब्दों में बड़ी बात कहना आसान नहीं होता. गागर में सागर भरती कवितायेँ पढने वाले के जेहन पर तीखा प्रहार करती हैं. जो कहते हैं वो तो आप पढ़ लेते हैं लेकिन जो अनकहा रह जाता है वो ही देर तक आपको सोचने पर विवश किये रहता है और यही कविता की सार्थकता है जो बाद तक आपको उद्वेलित करती रहे.

रंगों के चितेरे रंग ही जीवन में उतारते हैं फिर वो कैनवस हो या किताब. यहाँ कवि का अभिप्राय समझने की जरूरत है. यहाँ आखिर रंगों से कवि का क्या आशय है ये सोचना जरूरी है. यूँ तो ज़िन्दगी रंगों बिना अजाब है मगर इसी ज़िन्दगी में जब भ्रष्टाचार, असमानता, वैमनस्य , जातिवाद, राष्ट्रवाद आदि के स्याह रंग घुलते हैं तब जीवन कैसे दूभर हो जाता है तब एक कवि उद्वेलित हो कह उठता है और शायद यही उसकी दृष्टि है जो अन्धकार में भी प्रकाश खोज लेती है, उम्मीद का दामन कवि नहीं छोड़ता और कह उठता है – बचे रहेंगे रंग लेकिन कौन से रंग बचाना चाहता है कवि? ये भी सोचना जरूरी है और जब कवितायें पढो तो पता चलता है कवि कौन से रंग चाहता है ज़िन्दगी में. कवि चाहता है इंसानियत, मानवीयता, समानता, अपनेपन का रंग. यदि ये रंग बचे रहेंगे तो जीवन सहज हो जाएगा और कवि आशा का वाहक है. निराशा से आशा की ओर प्रस्थान करना ही संग्रह का उद्देश्य है. तभी कह उठता है – ‘मैं अँधेरे से नहीं डरता/ अँधेरा मुझसे डरता है/ मैं उजाला अपने हाथ में लेकर चलता हूँ’

कवि की चिंताएं हैं देश और समाज के प्रति, जहाँ विकास का झुनझुना सबको पकडाया गया है मगर एक जागरूक इंसान जानता है महज खोखली बातों से, सब्जबागों से कोई देश तरक्की नहीं कर सकता तभी तो गहरा कटाक्ष करता है ये कहकर तो साथ में मन की पीड़ा भी उभर कर आती है जो बताती है जागरूक है कवि – ‘एक दिन जब तुम सुबह सोकर उठाओगे/ तो देखोगे तुम्हारा गाँव स्मार्ट सिटी बन चूका है /बुलेट ट्रेन तुम्हारे गाँव के बीच से होकर गुजर रही है/ और तुम खुद को स्मार्ट सिटी के / किसी फुटपाथ पर भीख मांगते पाओगे/ तब समझ लेना विकास हो चूका है/ और तुम एक विकसित देश के /सभी व् सम्माननीय नागरिक हो’

क्योंकि कवि मन है तो व्यथित होना लाजिमी है. संवेदनशील होना ही कवि होने की पहली निशानी होती है तभी तो कविताओं के माध्यम से धर्म से परे इंसानियत को तरजीह देता है कवि ये कहते हुए- ‘मुझे दुःख नहीं होता / ईसाईयों के मारे जाने पर/ मुसलामानों या हिन्दुओं/ या फिर यहूदियों के मारे जाने पर/ मुझे दुःख नहीं होता/ मुझे बहुत दुःख होता है/ सिर्फ / इंसानों के मारे जाने पर’

वहीँ लोकतंत्र का अर्थ यही कोई जानना चाहे तो ‘माली हुई तम्बाकू’ कविता पढ़े तो जानेगा सच्चाई...कम शब्दों में गहरी मार करती कविता न केवल कटाक्ष करती है बल्कि हमारी कमजोरियों को भी उजागर करती है तो साथ ही बताती है कैसे हम अपने अधिकारों और कर्तव्यों का दुरूपयोग करते हैं. इसी तरह जंग लगा लोकतंत्र भी कवि को गंवारा नहीं तभी उम्मीद का दामन थामे है, आशा की किरण तमाम अन्धकार को मिटाने को काफी है फिर चाहे कितना भी वो असंवेदनशीलता दिखाएँ. व्यवस्था से व्यथित कवि सिवाय कटाक्ष के और कर क्या सकता है और वो अपनी कलम की धार से कहीं भी वार करने को नहीं चूकता. तभी तो कहने में संकोच नहीं करता कि बेशक कुएं सूखे, बच्चे मरें और तुम यानि शासक कितना भी पुरजोर कोशिश करे मिटाने की, हम नहीं मिटने वाले क्योंकि बाकी है अभी जिजीविषा. शायद यही है एक इंसान के अन्दर का जज्बा जो उसे हर कड़वा घूँट भरने के बाद भी बचाए रखता है. वहीँ ‘बनैले सूअर’ कविता के माध्यम से सोये हुओं को जगाने का आह्वान करता है कवि. इसी तरह कैसे आदिवासियों को सिर्फ वोट बैंक की तरह प्रयोग किया जाता है ये छोटी सी कविता द्वारा जाना जा सकता है जहाँ शहर और जंगल का फर्क ही ख़त्म हो चुका है तो आदमी एक प्रश्नचिन्ह बन चुका है जो वोट बैंक में तब्दील हो चुका है.

देश के प्रति कवि की चिंता हर दूसरी कविता में प्रगट हो रही है जहाँ हम सब जानते हैं, देखते हैं लेकिन कहने की हिम्मत नहीं कर पाते. वहीँ कवि सच्चाइयों को एक के बाद एक प्रस्तुत करता जाता है जब कहता है –‘लोगों के दिमाग निकाल कर/ किनारे रख दिए गए हैं/किस्से-कहानियों और मिथकों के बल पर/ उनके देखने, सोचने और समझने की शक्ति/ बड़ी सफाई से छीन ली गयी है/ झूठ और अफवाहों के बल पर/ एक ही लाठी से / गधे-घोड़े, गाय-भैंस और इंसान को हांका जा रहा है’ विचारणीय यहीं है आखिर क्यों ऐसा किया जा रहा है? क्या सिर्फ इसलिए कि शासक चाहते हैं किसी भी तरह खुद की वाहवाही फिर इसके लिए चाहे किसी भी हद को तोडा जाए, फिर इससे चाहे विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश किसी हिटलर के ख़्वाबों की भेंट चढ़ जाए और देश लोकतान्त्रिक ‘है’ से ‘था’ हो जाए. यही कटाक्ष फिर अगली कविता में अलग ढंग से उभरता है जब कवि फिर शासक के खिलाफ एक और दलील पेश करता है जहाँ शासक की दिखाई लोलीपोप से जनता सम्मोहित है और वो खुद ऐश कर रहा है वहीँ आम जनता यानि किसान आत्महत्या कर रहा है वहां एक कटाक्ष काफी है हकीकत बयां करने को – ‘ध्यान रहे/ देश की क़ानून व्यवस्था/ मृतकों के लिए नहीं होती’

‘यदि तुम चीख नहीं सकते’ कविता में मानो कवि यही कहना चाहता है उठो, खड़े हो, लड़ो अपने अधिकारों के लिए, सत्ता के रौब में मत रहो. जो डरता है , दबता है वो मारा जाता है इसलिए कर रहा है कवि आह्वान कि करो अपना ज़मीर जिंदा वर्ना मार दिए जाओगे किसी भी दिन या त्यौहार पर फिर वो होली दिवाली हो या ईद या चुनाव

कितनी कविताओं का जिक्र करूँ और किन्हें छोडूँ, दुविधा उत्पन्न हो जाती है जब जगह जगह कवि मन की व्याकुलता प्रकट होती है और ये सिर्फ कवि मन की ही व्याकुलता नहीं है, ये हम सबकी व्याकुलता है, हम सबके व्यथित ह्रदय की पुकार है जो कवि ने कविताओं के माध्यम से उकेरी है. एक जलता अलाव सीने में ज्वालामुखी सा धधक रहा है और कवि उसकी कुछ बूँद ही मानो अभी छींट पाया है, नहीं उंडेल पाया पूरा लावा वर्ना तहस नहस हो जाए सभ्यता. सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा कविता ने तो इस सच्चाई को साबित कर दिया है कि यदि आपकी जेब भरी है तभी आप इस देश के नागरिक कहलाने लायक हैं, ये देश आपका है और सबसे बड़ी बात आप इस देश के हुक्मरान हैं, आप उन पर भी राज कर सकते हैं जो शासक हैं क्योंकि न्याय उन्हीं के लिए होता है पैसे के बल पर ख़रीदा हुआ और अन्याय आम आदमी के संग, ऐसे में मान लो यदि नहीं जाग सकते कि ये देश अब तुम्हारा नहीं रहा. मानो कवि कहना चाहता है जिसकी जेब भारी देश उसी का बस इतने तक रह गयी है आज देशप्रेमी होने की परिभाषा. तार तार कर देती हैं कविताएँ राजनीति के रेशे रेशे को. एक एक बंद को खोल रही है कवि की कलम. कवि कम शब्दों में गहरी मार कर रहा है और जो नहीं कह रहा वो ही ज्यादा सुनाई दे रहा है. हत्यारे हों या पद्म सम्मान से किन्हें नवाज़ा जाता है आज या फिर अच्छे दिन या सीमा पर मरते जवान कोई शय नहीं जो कवि के कटाक्ष का माध्यम न बनी हो. कवि के मन की बेचैनी कविताओं के माध्यम से उभरती हुई हमारी बेचैनियों को पोषित करती है.

‘उसने कहा/देश मेरे इशारों पर चलेगा /यदि नहीं चला / तो मैं देश को बर्बाद कर दूंगा/ देश पहले से ही अपाहिज था/ उसके इशारों पर नहीं चल पाया/ और अंततः उसने देश बेच दिया/ मूर्खों की बस्ती में जश्न था/ बुद्धिजीवी कर रहे थे विलाप’ क्या इस कविता के बाद भी कहने को कुछ बचता है? कवि की निगाह हर विसंगति पर है और कहने से उसकी कलम चूकती नहीं.

संग्रह में कवि की धारदार कलम ने सत्ता के खिलाफ मानो बिगुल बजा दिया है और मानो यही कहना चाहता हो या कहो यही है कवि का आह्वान – ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’, मानो इसी के माध्यम से सोई जनता को उठाना चाहता है कवि, जगाना जरूरी है और ये काम कवि ही कर सकता है वो वक्त आने से पहले कि एक बार फिर देश विकास के नाम पर अदृश्य गुलामी की जंजीरों में जकड जाए. कवि की छटपटाहट बेशक कितनी हो लेकिन उन्हीं के बीच उम्मीद का दीया जलाया हुआ है जो चिन्हित करता है कितनी ही दुश्वारियां क्यों न हों राह में, कितने ही अंधेरों के बीहड़ हों, आशा का मद्धम सा जलता दीया काफी है जीवन की खूबसूरती को बचा सकने में, उम्मीदों, उमंगों, उल्लास और ख़ुशी के रंगों से जरूर रंगे रहेगा जीवन फिर चाहे हताश, निराश, कंटकाकीर्ण मार्ग ही क्यों न हो और यही तो हैं ज़िन्दगी के सच्चे रंग. एक चित्रकार से ज्यादा कौन रंगों के महत्त्व को समझ सकता है फिर वो कैनवस पर हों या ज़िन्दगी में.

रविन्द्र जी की बेबाक लेखनी के लिए उन्हें साधुवाद. उम्मीद है कवि जीवन के सभी रंगों को बचा ले जायेगा जब तक आशा की एक भी किरण बाकी है.

वंदना गुप्ता





बुधवार, 4 अप्रैल 2018

एक लड़की की डायरी के अंतिम पन्ने 2

लड़की बोल रही है चट्टान, लिख रही है दूब...लड़की खोज रही है संसार, पा रही है खार...वाकिफ नहीं हकीकत के प्रवाह से ...लड़की बह रही है नदी सी समय के चक्रव्यूह में...नहीं जानती, तोड़ी जायेगी, मरोड़ी जाएगी, काटी जायेगी, छिली जायेगी, तपाई जायेगी तब बनेगी बांसुरी जिस पर गुनगुनायी जायेगी कोई एकतरफा प्रेमधुन...प्रेम, वो ही जिसके पलड़े कभी सम नहीं होते, एक तरफ झुकाव ही जिसकी नियति होती है, जिसमे देह बजे सितार सी उनके हाथों, उनकी धुन पर नाचे ता थैया थैया थैयी ...और वो रात और दिन के क्रम बदल दें उसके लिए..ये वक्त की खामोशियाँ हैं, कौन सुनता है? बस चुप रहो और छू सको तो छू लो अंतर्मन के ख्याली पुलाव तक है तुम्हारी नियति!!!

दिन बदलने से बदलते हैं...सुन रही हो न? हाँ, तोड़ो अपने पैर में पहना तोडा, गर तोड़ सको...लड़की छूमंतर कर दो डर के कबूतर और उड़ जाने दो आसमां में...गूंगा बहरा होना नहीं है अंतिम विकल्प...यहाँ देह वो अजायबघर है जिसमे गुनगुना रहा है आदिम संगीत, निकलो देह से बाहर, तोड़ो चौखट, करो लड़की प्रयाण...महाप्रयाण से पहले!!!

फिर स्वप्न! आह कितने स्वप्न! कितनी बेड़ियाँ! कितनी कहानियाँ, कितने जन्म, कितनी मौत...साँस साँस मौत, फिर भी जिंदा है लड़की...आखिर क्यों?
स्वप्न गुनाह नहीं, स्वप्न भोर का वो तारा है जो रखता है तुममें तुम्हें जिंदा... लड़की...बचा लो खुद को...बचा लो स्वप्न को...बचा लो उम्मीद की अंतिम टिमटिमाती लौ को !!!


आकाश के कदली स्तम्भ पर टिकी है तुम्हारी सृष्टि...लड़की मत हिलाओ नींव कि दरकने पर दरक जाए तुम्हारे शहर का समूचा लहलहाता ढाँचा जो भरता है रंग इन्द्रधनुषी तुम्हारी ख्वाबगाह में...और तुम लपेट लेती हो सम्पूर्ण धरा को अपनी देह पर...धानी रंग से भर लेती हो मांग और हो जाती हो सुहागन !!!

लड़की मत मिटने दो न सृष्टि के अंतिम विकल्प को...तुम हो तो सृष्टि है...जिंदा रखो अपने पहले स्वप्न को, बनाओ उसे अंतिम स्वप्न...
आस के दरीचों में करो बागवानी...जहाँ उम्र निठल्ली बैठी रहे और तुम संवार लो ज़ुल्फ़ का उलझा बल 

ये उम्र की परछाइयाँ चुकाने का वक्त है!!!


लड़की जिंदा हो रही है फलसफों में ...
©vandana gupta

शनिवार, 31 मार्च 2018

एक लड़की की डायरी के अंतिम पन्ने-1

आशा की देह से उतार दी है चमड़ी और निराशा को दी हो ऐसा भी नहीं...साजन के प्यार का तबस्सुम घूँघट की ओट में ज्यादा खिलता है...जाना जब से, खुमारी है कि उतरती ही नहीं, सोच लड़की खिल उठी. किताबी ज्ञान ही उसकी प्रथम गुरु...

दिन सोने की सान चढ़ाए उगता और रातें चाँदी के केश फैला करती पदार्पण ...लड़की उमंग के घोड़े पर सवार कर रही थी यात्रा...दिल किसी परीलोक की यात्रा में मिलता अपने प्रियतम से...आह! बस सुखद स्वप्न कभी टूटे न!!!

वो स्वप्न ही क्या जो टूटे न? फिर तो स्वप्न देखा ही नहीं...स्वप्न का भी अपना विज्ञान होता है लेकिन समझे कौन? स्वप्न जो साकार हो बस वहीँ तक चाहना, विपरीत स्वर मान्य नहीं...मगर चाहत का बाज़ार कब स्वर्ण की सीढ़ी चढ़ा है...तुम करते रहो अजान या जपते रहो राम राम रावण तो आएगा ही यदि राम ने जन्म लिया है तो...फिर वो स्वप्न क्या जो टूटे ही नहीं फिर स्वप्न सुखद हो या दुखद!!!

और टूट गया स्वप्न जब हकीकत की आँच पर सुलगी लड़की की चाहतें, हसरतें, इच्छाएं...ब्याह किया था उसने अपनी चाहतों से, नहीं पता था कल के हाथ में है उसकी जीवन की डोर, जिसमे जब चाहे रोक लगा दी जाए और लगा दी गयी...लड़की मौन के गह्वर में सूख गयी...चुप की डोर जो पकड़ी तो उम्र भर निभाई...लड़की खुद को भूल गयी...अपना नाम भी...विस्मृति के घने जंगल में छूट गया उसका लड़कपन, वो ख्वाबों का घरौंदा, वो तितली के पंखों पर सवार अरमानों की डोली में विहार करती थी...स्मृति की स्लेट से मिट गया...अब मत पूछना उससे-वो कौन? 

एक लड़की की डायरी का अंतिम पन्ना पढना कभी...वो कहीं मिलेगी ही नहीं...टूट गया डाल से पत्ता, झडा, उड़ा और कहाँ गया किसने जाना...लड़की जान चुकी थी अपना भविष्य...ढल चुकी थी उस साँचे में जिसमें ढाली गयी...अब न अवशेष हैं न शेष, चाहे कितना चूलों में तेल डालो अब, जंग लगी चूलें फिर रवां नहीं हुआ करतीं...शून्य कितना बड़ा होता है उनका नहीं जान सकते, समा सकता है उसमे पूरा ब्रह्माण्ड, बस देखना कभी उस लड़की की आँख में उलझे उस शून्य को...खुद को न भुला दो तो कहना, फिर कभी आँख नहीं उठा सकोगे.

बस इतनी सी कहानी है उसकी जिसके रोम रोम में एक हाहाकार है, एक ज्वाला है, एक दर्द का चीत्कार है, एक लावा है, एक ज्वालामुखी है मगर भीतर से, बाहर का ठंडापन मात कर देगा उत्तरी ध्रुव को भी...फिर कहाँ खोजते हो अब पहचान चिन्ह? लड़की एक खोज का विषय भर रह गयी अब..पुरातत्ववेत्ता खोज में लगे हैं सदियों से!!!

युग बीते मगर
एक लड़की की डायरी का अंतिम पन्ना किसी ने कभी पढ़ा ही नहीं...अट्टहास कर रही है लड़की, सुनना कभी उसका अट्टहास, फट जायेंगे कान के परदे या फिर नष्ट हो जाएगी तुम्हारी सारी सभ्यता!!!


लड़की ख्वाब की दहलीज पर बैठी है आज भी...
©vandana gupta

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव
हम नमन के सिवा तुम्हें कुछ नहीं दे सकते
बदल चुकी है हवा
बदल चुकी हैं प्रतिबद्धताएं

वो दौर और था
ये दौर और है
बस इतने से समझ लेना सार
आज नहीं पैदा होती वो मिटटी
जिससे पैदा होते थे तुमसे लाल

और सुनो
ये नमन भी बस कुछ सालों तक चलेगा
आने वाला दौर शायद ऐसा भी हो जाए
पूछ ले नयी पौध
कौन भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव ?
क्यों लकीर पीट रहे हो
आगे क्यों नहीं देख रहे हो

आजकल कर्ज लेने और देने की परिभाषाएं बदल चुकी हैं
फिर तुम्हारे कर्ज का क्या मोल समझेंगे
जिस दौर में कर्ज ले भाग जाने का रिवाज़ है

उम्मीद के दीये में तेल ख़त्म होने की कगार पर है
बस कर सको तो कर लेना
नमन पर ही सब्र ...
 
दर्द का चेहरा बदल चुका है !!!



शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

बिजूका पर मेरी कवितायेँ

आपका लिखा कभी जाया नहीं होता इसका उदाहरण है ये कि हिंदी समय पर मेरी कवितायें शामिल हैं. वहाँ प्रोफ़ेसर संजीव जैन जी ने पढ़ीं और बिजूका समूह जो व्हाट्स एप पर बनाया गया है उस पर शेयर कीं. उसके बाद मुझसे 10 नयी कवितायें मांगी गयीं जिन्हें आज 'बिजूका' ब्लॉग पर स्थान मिला है. Satya Patel जी आपकी हार्दिक आभारी हूँ जो आपने कविताओं को इस लायक समझा और बिजूका पर जगह देकर मान बढाया.
आपका स्नेह मेरी कविताओं को यहाँ भी प्राप्त होगा ऐसी आशा करती हूँ. 

 https://bizooka2009.blogspot.in/2017/12/1.html?m=1


कवितायें सिर्फ लगाईं ही न जाएँ बल्कि उन का गहन अध्ययन कर उस पर अपनी पड़ताल भी प्रेषित की जाए तो लिखने वाला बहुत प्रेरित होता है. ऐसा ही यहाँ हुआ है. ऐसे में लगता है लिखना सार्थक हुआ. बिजूका का ये प्रयास बेहद सराहनीय है . एक बार फिर से हार्दिक आभार Satya Patel जी और अनिल कुमार पाण्डेय जी .
बिजूका ब्लॉग पर अनिल कुमार पाण्डेय जी ने कविताओं की पड़ताल भी की है और उस पर गहन व विस्तृत विवेचना भी की है.

https://bizooka2009.blogspot.in/2017/12/blog-post_8.html?m=1

सोमवार, 27 नवंबर 2017

सच कुछ और था - मेरी नज़र से

 
सुधा ओम ढींगरा जी का कहानी संग्रह 'सच कुछ और था' मिले तो शायद २ महीने बीत गए. पढ़ भी लिया गया था बस लिख नहीं पायी क्योंकि बीच में एक महीना मैं खुद लिखने पढने से दूर रही. आज वक्त और मूड दोनों ने साथ दिया तो कलम चल निकली.

लेखिका का लेखन ही उसकी पहचान का सशक्त हस्ताक्षर है इसलिए बिना किसी भूमिका के सीधे कहानियों पर अपना दृष्टिकोण रखती हूँ.

संग्रह की पहली ही कहानी 'अनुगूंज' एक साथ कई सन्दर्भों और समस्याओं को समेटे है. जहाँ लेखिका ने अपने लेखकीय कौशल से गागर में सागर भर दिया है. ये सच है भारतियों में बाहर खासतौर से अमेरिका में बेटी ब्याहना जैसे किसी स्वप्न के सच होने जैसा है लेकिन उसके साथ अनेक प्रश्न लेखिका उठाती चलती हैं कि क्यों भारतीय उसके सुखद भविष्य को अपने स्वप्न आकाश में ही देखते हैं बिना असलियत जाने समझे वहीँ कैसे वहां रहने वाले भारतीय भी अपनी उसी सोच से मुक्त नहीं हैं फिर चाहे किसी भी देश में रहा जाए. शराबी ऐय्याश पति और पूरा घर सास ससुर सहित उनके लिए भारतीय लड़की एक नौकरानी से इतर नहीं होती. और इसी मुद्दे को आकार देते हुए गुरप्रीत को जब मार दिया जाता है तो देवरानी मनप्रीत पर दबाव बना उनके पक्ष में गवाही देने के लिए मजबूर करना और फिर मनप्रीत का सूझबूझ से काम लेते हुए सत्य का साथ देना और खुद को भी उनके चंगुल से कैसे आज़ाद करना है इस पर भी लेखिका ने बहुत कुशलता से प्रकाश डाला है. एक साथ अनेक समस्याएं और उन सबको एक सूत्र में पिरोना आसान नहीं होता लेकिन लेखिका इसमें सिद्धहस्त हैं.

'उसकी खुशबू' कहानी पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे ऐसी ही कहानी पहले भी पढ़ी हों. जैसे किसी वक्त हम जासूसी नावेल पढ़ते थे तब ऐसे ही चरित्र आकार लेते थे वहीँ रहस्य और रोमांच से भरपूर कहानी में जूली नामक पात्र का अपनी खुशबू से मदहोश कर देना साथ ही उसके जीवित होने पर भी संदेह होना आदि ऐसे मोड़ हैं जो कहानी को रहस्यमयी बनाते हैं. वहीँ जैसे एक तरफ लेखिका ने रहस्य की चादर बनाया है जूली को जो मानो कहना चाहती हों वो मर चुकी है और अब उसकी आत्मा अपना बदला ले रही है. जब प्रेम असफल हो जाता है तब वो हिंसक हो जाता है और हिंसक प्रेम का मानो यही रूप होता है उसको दिग्दर्शित कर रही हों. एक कहानी अपने में जाने कितने आयाम समेटे हुए है.

शीर्षक कहानी 'सच कुछ और था' प्रेम त्रिकोण के चौथे कोण का मानो एक ऐसा वर्णन है जहाँ प्रेम तो उसे नहीं कहा जायेगा बल्कि एक जिद और एक काम्प्लेक्स इंसान को कैसे बर्बाद कर देता है, पूरी कहानी उसी का फलसफा है. कैसे एक इंसान जब उम्र भर काम्प्लेक्स में जीवन व्यतीत करता है . एक कुंठाग्रस्त इंसान कैसे अपना और सबका जीवन बर्बाद करता है , उसे लेखिका ने इस तरह लिखा है लगता है जैसे उन्होंने खुद अपनी आँखों के सामने ये सब घटित होते देखा हो. सच है, जो सच दुनिया जानती है और वास्तव में जो हकीकत होती है उसमे जमीन आसमान का अंतर होता है लेकिन ये दुनिया का दस्तूर है वो उसी पर विश्वास करती है जो सामने आता है, जबकि सत्य कई बार सात पर्दों की ओट में छुपा सिसक रहा होता है.
'तलाश जारी है' कहानी में एक बार फिर भारतीयों की मानसिकता और जुगाड़ की फितरत को लेखिका ने उजागर किया है तो वहीँ अमेरिका की पुलिस की मुस्तैदी और कैसे कानून पालन किये और करवाए जाते हैं, उन पर भी बखूबी प्रकाश डाला है.

संग्रह की कहानी 'विकल्प' यूँ तो आम कहानी जैसी लगेगी लेकिन विकल्प की तलाश कहो या विकल्प लेखिका ने कहाँ से खोजा, ये सोचने का विषय है क्योंकि अक्सर होता यही है यदि पति बच्चा पैदा करने योग्य नहीं तो ज्यादातर बच्चा गोद ले लेते हैं या जोर जबरदस्ती से सम्बन्ध बनवाकर बच्चा पैदा कर दिया जाता है य फिर आजकल तो वैज्ञानिक तकनीक डेवलप हो गयी हैं आर्टिफिशल इन्सैमिनेशन तो उनका प्रयोग कर बच्चा पैदा किया जा सकता है. लेकिन यहाँ पर लेखिका ने जो विकल्प खोजा है आज तक तो ऐसा कहीं सुना नहीं, पढ़ा नहीं. हो सकता है विदेश में ऐसा होता हो. जहाँ पूरे खानदान के ही मर्द बच्चा पैदा करने में सक्षम नहीं होते यानि जेनेटिक प्रॉब्लम. जहाँ स्पर्म शरीर छोड़ते ही कमजोर पड़ने लगते हैं वहां यदि कोई स्त्री अपना बच्चा चाहे यानि खुद माँ बनना चाहे और अपनी ही वंशबेल को बढ़ाना चाहे वहां यही विकल्प बचता है कि अपने ही घर के उस मर्द से संसर्ग करे जिसमे ये समस्या न हो या कम हो और यही विकल्प यहाँ अपनाया जाता है. जो पाठक के हलक से भी जल्दी नीचे नहीं उतरता. लेकिन लेखिका एक ऐसी कंट्री में रहती हैं जहाँ सब कुछ संभव है और हो सकता है ऐसा कुछ उन्होंने देखा या सुना हो और जिसने इस तरह कहानी के रूप में आकार लिया हो क्योंकि लेखक कोई हो बेशक अपनी कल्पना से पात्रों को गढ़ता है मगर कहीं न कहीं जमीन अपना या आस पास का अनुभव ही होती है.

'काश ऐसा होता' एक संवेदनशील छोटी से कहानी अपने आप में एक बड़ा कैनवस लिए है. वृद्धावस्था खुद में एक समस्या सी आजकल दिखती है ऐसे में दो देशों की सोच और संस्कृति का फर्क लेखिका ने कहानी के माध्यम से व्यक्त किया है. जहाँ बच्चे अपने परिवारों में व्यस्त हो जाते हैं वहां बुजुर्ग उपेक्षित. ऐसे में जरूरी है जीवन में आगे बढ़ना और कहानी के माध्यम से लेखिका ने वही दर्शाया है. कैसे विदेश में दो बुजुर्ग अपने एकाकीपन को आपस में विवाह का फैसला कर दूर करते हैं वहीँ अपने देश में यदि कोई ऐसा सोचे भी तो जाने कितनी तोहमतों का शिकार हो जाए. बेशक कोई उनके एकाकीपन को समझे नहीं और उनके लिए कुछ करे भी नहीं लेकिन यदि वो यहाँ ऐसा कदम उठाये तो जैसे समाज से ही निष्कासित सा हो जाता है. यही दो देशों की सोच का फर्क इंगित होता है.

'क्यों ब्याही परदेस' एक बार फिर देश और विदेश की संस्कृति की भिन्नता के साथ वहां जाने पर जो लडकियाँ महसूस करती हैं उसका मार्मिक चित्रण है, जिस पर अक्सर ध्यान ही नहीं दिया जाता. कैसे विश्वासघात होते हैं, कैसे सब अपनी ज़िन्दगी में मस्त रहते हैं तो वहीँ खान पान, नियम कानून आदि सब का दर्शन एक पत्र के माध्यम से लेखिका कराती चलती हैं.

'और आंसू टपकते रहे' ऐसी कहानी जो या तो निचले तबके के हर चौथे घर में दिखाई पड़ेगी या फिर मजबूरी के मारे के घर में. लड़की होना जैसे गुनाह. स्त्री है तो केवल देह. बस इससे इतर उसका अस्तित्व ही नहीं. कैसे एक माँ का साया सर से उठ जाए तो बेटी का जीवन देह की दलदल में झोंक दिया जाता है उसका चित्रण है कहानी. वहीं यदि कोई समय रहते साथ दे दे तो निकल सकती हैं ये लड़कियां उस दलदल से लेकिन आज की आपाधापी वाली ज़िन्दगी में शायद इतनी मानवीय संवेदनाएं ही नहीं बचीं जो किसी और के दर्द को उस हद तक महसूस कर सकें. और यदि किसी में जागृत भी हो जाएँ तो जरूरी नहीं वक्त रहते जागृत हो सकें, फिर पछतावे के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता मानो यही लेखिका कहना चाह रही हैं. अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत वाली उक्ति यहीं चरितार्थ होती है मानो लेखिका कहना चाहती हैं कि यदि तुम समाज को साफ़ सुथरा देखना चाहते हो तो जरूरी है अपने सब जरूरी कामों को पीछे कर मानवीयता के पक्ष को आगे रखना ताकि किसी का जीवन संवर सके क्योंकि पैसा ज़िन्दगी भर कमा सकते हो लेकिन किसी का जीवन बचाने के लिए जरूरी है संवेदना का होना.

बेघर सच, विषबीज और पासवर्ड ये पहले भी कहानी संग्रहों में शामिल कहानियाँ हैं जिन पर पहले ही काफी बात हो चुकी है.

कुल मिलाकर संग्रह की ग्यारह कहानियों में स्त्री जीवन, प्रेम , छल, विश्वासघात और दो देशों का तुलनात्मक अध्ययन कर लेखिका ने आज मानव जीवन की विडम्बनाओं को रेखांकित किया है कैसे मानव कहीं रहे लेकिन अपनी नेचर नहीं छोड़ता. लेखिका अपनी कहानियों में मनोवैज्ञानिक स्तर तक पहुँचती हैं और फिर पात्रों और घटनाओं के माध्यम से कहानी को न केवल आयाम देती हैं बल्कि हर विसंगति पर उनकी नज़र पड़ती है और उसकी गहरी पड़ताल करती चलती हैं और यही एक लेखक का काम होता है. बस जरूरत है हर अच्छाई और बुराई पर प्रकाश डालते चलना शायद किसी का जीवन सुधर जाए और लेखन सफल हो जाए, कहानियां पढ़ ऐसा महसूस होता है मानो यही लेखिका का असल मंतव्य है कहानी लेखन का. लेखिका बधाई की पात्र हैं. आशा है हमें आगे भी उनकी लेखनी इसी प्रकार धन्य करती रहेगी. शुभकामनाओं के साथ .....

शनिवार, 9 सितंबर 2017

अँधा युग

गोली और गाली
जो बन चुके हैं पर्यायवाची
इस अंधे युग की बनकर सौगात
लगाते हैं ठिकाने
बडबोली जुबान को

तुम , तुम्हारी जुबान और तुम्हारी कलम
रहन है सत्ता की
नहीं बर्दाश्त सत्ता को कलम का अनायास चल जाना
बन्दूक की निकली गोली सा
गर करोगे विद्रोह तो गोली मिलेगी
और मरने के बाद गालियों के फूलों से सजेगी तुम्हारी राख

आमूलचूल परिवर्तन आ चुका है हवाओं में
अब नहीं बहा करती हवा
पूरब से पश्चिम या उत्तर से दक्षिण
अब हवाएँ बहती हैं ऊपर से नीचे
आग उगलती हुईं, झुलसाती हुईं , मिटाती हुईं

ये नया युग है
नाम है अँधा युग
यहाँ जरूरत है ऐसे ताबेदारों की
जो फूँक से पहाड़ उड़ा दें
जो दस्तावेजों से हकीकत मिटा दें
जो देशभक्त को गद्दार बता दें
आओ , नवाओ सिर
कि कलम हो जाओ उससे पहले...
तुम थोथे चने हो
निराश हताश जंगल के बिखरे तिनके
कोई संगठित बुहारी नहीं
जो बुहार ले कूड़े करकट के ढेर को

सांत्वना के शब्द ख़त्म हो चुके हैं शब्दकोशों से
अब तुम तय करो अपना भविष्य
प्रतिमाएं स्थापित करने का युग है ये
शब्दों के कोड़ों से अक्सर उभर आते हैं नीले निशान
बच सको तो बच के रहना
ये वक्त न प्रतिशोध का है न प्रतिरोध का

दानव मुँह फाड़े खड़ा है
दाढ़ों में फँसने को हो जाओ सज्ज



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©वन्दना गुप्ता vandana gupta  

रविवार, 3 सितंबर 2017

हारे हुए सपनों की सनक

सपनों की लुगदी बनाओ 
और चिपका लेना ज़िन्दगी का फटा पन्ना 
उसने कहा था ......
और मैंने ब्रह्म्वाक्य मान किया अनुसरण 

आज हारे हुए सपनों की भीड़ में खड़ी
पन्ना पन्ना अलग कर रही हूँ 
तो हर पन्ना मुंह चिढ़ा रहा है 
मानो कह रहा है 
सपने भी कभी सच होते हैं ...........
और मेरे हारे हुए सपनों की सनक तो देखिये 
अनशन पर बैठ गए हैं 


जबकि जानते हैं ये सत्य सपनो के आकाश कभी नीले नहीं हुआ करते ..........

बुधवार, 16 अगस्त 2017

बातें हैं बातों का क्या .......

अम्बुआ की डाली पर
चाहे न कुहुके कोयल
किसी अलसाई शाम से
चाहे न हो गुफ्तगू
कोई बेनामी ख़त चाहे
किसी चौराहे पर क्यों न पढ़ लिया जाए
ज़िन्दगी का कोई नया
शब्दकोष ही क्यों न गढ़ लिया जाये
अंततः
बातें हैं बातों का क्या ...

अब के देवता नहीं बाँचा करते
यादों की गठरी से ... मृत्युपत्र

न दिन बचना है न रातें
फिर बातों का भला क्या औचित्य ?

श्वेत केशराशि भी कहीं लुभावनी हुआ करती हैं
फिर
क्यों बोझिल करें अनुवाद की प्रक्रिया

जाओ रहो मस्त मगन
मेरे बाद न मैं , मेरे साथ भी न मैं
बस सम ही है अंतिम विकल्प समस्त निर्द्वंदता का

कौन हल की कील से खोदे पहाड़ ?




डिसक्लेमर :
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©वन्दना गुप्ता vandana gupta  

रविवार, 13 अगस्त 2017

देश में सब ठीक ठाक है

चलिए शोक मनाईये ... दो मिनट का मौन रखिये ... एक समिति गठित कीजिये और विभागीय कार्यवाही करिए ...... बस इतना करना काफी है उनके घावों पर मरहम लगाने को और पूरा घाव ठीक करने को २०-२५ लाख दे कर कर दीजिये इतिश्री अपने कर्तव्य की .....आखिर सरकार माई बाप हैं आप और माई बाप को सिर्फ एक को ही थोड़े देखना है .....पूरा देश उनके बच्चों सरीखा है और हर बच्चे का ध्यान रखना जरूरी है ऐसे में यदि दो चार उपेक्षित भी हो जाएँ तो फर्क नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि अगस्त में बच्चे तो मरते ही रहते हैं ........माई बाप हम अनपढ़ गंवार कहाँ जान सकते हैं और समझ सकते हैं आपकी देशभक्ति. आपकी सुरक्षा चाक चौबंद होनी जरूरी है बच्चों का क्या है ये तो पैदा होते ही मरने के लिए हैं जैसे आम जनता. क्या देशहित में इतना बलिदान नहीं कर सकती जनता. आप तिरंगा फहराइए 15 अगस्त पर जनाब .....लाल किले से भाषण जरूरी है आखिर स्वतन्त्रता का उत्सव जो ठहरा तो क्या हुआ जो कुछ घरों के चिराग बुझ गए और वो मातम मनाते रहें उस दिन , हर दिन , सालों साल, उम्र भर ...... अनुशासन तो अनुशासन ठहरा. कर्तव्य है आपका देश को संबोधित करना, उन्हें बताना सब ठीक है, आपने सब ठीक कर दिया है, देश विकास कर रहा है तो क्या हुआ जो कोई माँ बौरा ही गयी हो रोते रोते. किसी पिता की चीख नहीं पहुंचेगी आपके कान तक. विकास की दिशा में जनता की आहुति होती रहनी चाहिए आखिर आपने भ्रष्टाचार ख़त्म कर दिया, विदेशी धन वापस ले आये, इनकम टैक्स चोरी ख़त्म कर दी, गायों की रक्षा की, किसान सुखी हो चुका, उसने आत्महत्या करनी बंद कर दी, लड़कियां देखिये कितने सुरक्षित हैं आधी रात भी निकलें तो मजाल है कोई निगाह भी उठा ले उनके बलात्कार होने बंद हो चुके ये तो विपक्ष या मीडिया हल्ला मचाता है वर्ना आपने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, यहाँ तक कि पाठ्यक्रम में बदलाव कहाँ किसी ने किया वहाँ प्रेमचंद, टैगोर , ग़ालिब आदि को हटाने की जुर्रत भला किसी में थी आपने वो भी करने की ठान ली ...भला और कोई कहाँ कर पाया इतना पिछले 70 सालों में जो आपने 3 साल में कर दिखाया ......नतमस्तक है हुजूर जनता आपके चरणों में ......बंदगी करने को जरूरी है खुद को देशभक्त दिखाना क्योंकि यही है आज की सच्ची परिभाषा ....गर करोगे विद्रोह या नहीं कहेंगे आपके पक्ष में तो देशद्रोही करार दिए जाते हैं ........तो हुजूर , आप हैं तो हम हैं वर्ना हममें भला कहाँ दम है ......न हुजूर ये आप पर न व्यंग्य है न तोहमत ..... आपका इस्तकबाल करती है जनता. आपने इतना कुछ दिया जनता को कि आँखें डबडबा जाती हैं, मुंह से बोल नहीं फूट रहे, कलेजा फटा जा रहा है आपकी दरियादिली से ... बहुत बहुत शुक्रिया सरकार आपका , वाकई रामराज्य आ गया और अगले दो सालों में तो शायद जनता वैकुण्ठ दर्शन कर ले .... जय हिन्द , १५ अगस्त की आपको शुभकामनाएं जनता की तरफ से .......देश में सब ठीक ठाक है आप अपना भाषण और भ्रमण जारी रखिये