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मंगलवार, 25 सितंबर 2018

गौरतलब कहानियाँ मेरी नज़र में


कहानियां, हमारे जीवन का आधार रही हैं आदिम काल से. जैसे जैसे सभ्यता विकसित होती गयी, कहानियाँ उसी के अनुसार आकार लेती रहीं. वक्त के साथ कहानियों के स्वरुप में भी परिवर्तन आया लेकिन कहानियों का जो मुख्य स्वरुप है वो ही पाठक/श्रोता के जेहन पर मुख्यतः कब्ज़ा जमाये रहता है.

कहानी में मुख्य तत्व होता है – कहानी में कहानी का होना. कोई एक शुरुआत हो तो उसका कोई अंत भी हो. दूसरा तत्व होता है उसके कहन का तरीका. जब पाठक को ये दोनों तत्व मिल जाते हैं तो वो कहानी खुद को पढवा ले जाती है. ऐसा ही संग्रह इन दिनों पढ़ा जिसमें ये दोनों तत्व विद्यमान थे. कहानियाँ आधी अधूरी नहीं छोड़ी गयीं. सिर्फ दृश्यांकन भर नहीं रहीं बल्कि हर कहानी पढ़कर पाठक मन उसे देर तक गुनता रहा. ये है कहानी की सफलता का तीसरा तत्व, जब वो पाठक मन को सोचने पर विवश कर दे.

ये संग्रह पढने के लिए बहुत लम्बा इंतज़ार करना पड़ा. कुछ न कुछ मुश्किलें आतीं गयीं और संग्रह न खरीद पायी न मंगवा पायी. अभी पिछले दिनों कुछ किताबें ऑनलाइन मंगवाईं तो सबसे ऊपर लिस्ट में इसी का नाम था. अब जब पढ़ रही थी तो इसके बारे में एक दिन एक छोटा सा स्टेटस भी डाला था लेकिन उसके बाद एक महीने से परेशानियों में घिरी रही और लिखना मुल्तवी होता रहा. जाने क्यों कभी कभी हम कुछ पढना चाहते हैं, उस पर कहना चाहते हैं लेकिन हमारे चाहे सब नहीं हो पाता मगर आज इस संग्रह का नंबर आ ही गया. हिमाचल बुक्स से प्रकाशित “गौरतलब कहानियाँ” सुभाष नीरव जी की प्रतिनिधि कहानियों का संग्रह है जिसमें उनकी चुनिन्दा 17 कहानियाँ शामिल हैं.

कहानियों में आस पास का परिवेश, यादों के सरमाये, दिल की कहीं कचोट तो कहीं उलझन, समाज के अच्छे बुरे चेहरे सभी गुणक शामिल हैं जो किसी भी संग्रह को मुकम्मल बनाते हैं. संग्रह की कहानी ‘वेलफेयर बाबू’ समाज के चेहरे को उजागर करती है. कैसे मतलबपरस्त है दुनिया, उसका जीता जागता उदाहरण है. जरूरत पड़ने पर आप जिस कॉलोनी के लिए अपना तन मन धन लगा देते हैं वहां के ही लोग काम नहीं आते. वहीँ उसी कॉलोनी में रहने वाला वो शख्स जो है तो मुसलमान, ऊपर से उनका विरोधी या ये कहा जाए वो इंसानी फितरत को हरिदा से बेहतर जानता था, वो काम आता है. आप अपना पूरा जीवन जिन्हें समर्पित कर दें जरूरी नहीं उनमें इंसानियत बची भी हो और जिन्हें योग्य समझते रहे हों, वक्त पड़ने पर वो ही काम आ जाते हैं. एक संवेदनशील कहानी जहाँ भावनाएं जाने कितनी गलियों से गुजरती हैं और दिल पर एक छाप छोड़ जाती हैं.

‘इतने बुरे दिन’ कहानी यूँ तो पहले भी पढ़ी है लेकिन ये कहानी है ही ऐसी जो खुद को दोबारा पढवा ले जाती है. दो बूढ़े बूढ़ी, बूढ़ी बिस्तर की मोहताज तो बूढा उसकी सेवा में दिन रात एक किये रहता. दो बुजुर्ग जो उम्र के एक मोड़ पर आकर जब नितांत अकेले रह जाते हैं, तब कितना मुश्किल होता है जीना. जीने के लिए पैसों की आवश्यकता क्या कुछ करने को विवश कर देती है, ये कोई सोच भी नहीं सकता. आज के वक्त में जब लोग व्यावहारिक ज्यादा होते जा रहे हैं, ऐसे में ये कहानी मार्मिकता की तमाम सीमाओं को पार कर जाती है. ज़िन्दगी जीने के लिए अर्थ की कितनी जरूरत होती है, ये इसे पढ़कर जाना जा सकता है, जहाँ एक वक्त के लिए भी रोटी का जुगाड़ नहीं, ऐसे में इंसान कितना विवश हो जाता है उसका बेहद संवेदनशील चित्रण है. लेखक पाठक को अपनी ऊंगली पकड़ा अपने साथ चलने को मजबूर कर देता है, बस यहीं आकर लेखक सफल हो जाता है.

संग्रह में कई कहानियाँ हैं जिनमें जीवन के अंतिम पड़ाव में अकेले रह गए बुजुर्गों के दर्द को लेखक ने समेटा है जैसे ‘नए साल की धूप’ में भी ज़िन्दगी की दुश्वारियों के साथ बीमारियों से घिरे शरीर हैं लेकिन एक दूसरे का साथ वो संबल है जिसके सहारे वो अपनी जीवन नैया खेते रहते हैं और नकारात्मकता में भी सकारात्मकता बचाए रखते हैं. एक दूसरे का साथ कितना ऊर्जा से भर देता है ये पढ़कर जाना जा सकता है. ऐसे ही ‘बूढी आँखों का आकाश’ में भी दो अलग अलग घरों में बुजुर्गों की स्थिति का चित्रांकन है. पढ़ते हुए एक पुरानी फिल्म याद आ जाती है जिसमें राजेश खन्ना और शायद स्मिता पाटिल होते हैं. दो अलग अलग घरों में रहते हैं, शाम को पार्क में मिल बैठ लेते हैं तो दूसरे तो बाद में खुद घर के लोग ही उनके दुश्मन हो जाते हैं फिर घर में चाहे उन्हें दो रोटी के लिए भी न पूछें. लेकिन यहाँ कहानी एक मोड़ लेती है जहाँ उम्मीद सिरे चढ़ने लगती है वहीँ ज़िन्दगी दगा दे जाती है, पढ़ते हुए पाठक सोचता है – हाँ, ये ही सही रहेगा ऐसे रहने से तो मगर अंत एक बार फिर नियति अपने हाथ में ले लेती है और पाठक गहन उदासी में डूब जाता है. ऐसी ही कहानी ‘आखिरी पड़ाव का दुःख’ है जहाँ माँ बोझ बन जाती है और उसे वृद्धाश्रम भेजने का प्रबंध कर दिया जाता है.

‘रंग बदलता मौसम’ आज के युवाओं की सोच और व्यवहार का दस्तावेज है. जिनके लिए व्यावहारिकता ही मायने रखती है, भावनाएं नहीं. किस इंसान के दिल में किसी के लिए क्या है कोई नहीं जान सकता. कौन किसे प्रयोग कर रहा है ये भी पता नहीं चलता, प्रयोग होने वाले को. और जब पता चलता है तो खुद को ठगा पाता है मानो लेखक ये कहना चाहता हो – हर आदमी में हैं दस बीस आदमीं, जब भी देखना बार बार देखना.

‘भेड़िये’ कहानी इंसानी फितरत को बखूबी उजागर करती है. कैसे हर इंसान में एक भेड़िया छुपा होता है, जैसे ही मौका मिलता है घात लगा लेता है. वहीँ गाँव में जाति व्यवस्था के दंश से पीड़ित जब पलायन कर शहर आते हैं तो किन किन परिस्थितियों से गुजरते हैं उसका बहुत सूक्ष्म वर्णन यहाँ लेखक ने किया है. दूसरी तरफ ऑफिस में शोषण का शिकार होती स्त्रियों की दशा को भी बखूबी उकेरा है लेकिन शोषक के लिए हर मादा सिर्फ मादा ही होती है फिर वो ऑफिस में काम करने वाली हो या फिर किसी कामगार की बहन, बेटी या बीवी. लेखक ने एक कहानी में कई आयामों को समेटा है फिर समाज में फैले भेड़िये किसी भी रूप में मिलें, उम्र भर पीछा नहीं छोड़ते. शोषण उनका मुख्य हथियार होता है मानो यही कहना चाह रहा हो लेखक.

‘गोष्ठी’ कहानी साहित्य के संसार का कच्चा चिटठा है. जहाँ सच कहने वाला किनारे बैठा दिया जाता है और जुगाड़ करने वाला, झूठ बोलने वाला ही मलाई खाता है. लेखक ने पूरे साहित्यिक समाज की सच्चाई को इस कहानी में समेट दिया है जिससे आज हर कोई वाकिफ है लेकिन सच कहने की हिम्मत नहीं करते.

‘लड़कियों वाला घर’ एक ऐसी कहानी है जहाँ जिस घर में लडकियाँ होती हैं उस पर हर आते जाते की कैसे वक्र दृष्टि होती है उसका वर्णन है. ऐसे में डर डर कर जीने से काम नहीं चलता. उसके लिए जरूरी है अपने अन्दर आत्मविश्वास पैदा करना और सही निर्णय लेना. लडकियाँ हैं तो इंसान कमजोर नहीं हो जाता, बस जरूरत है तो युक्ति की ताकि आप सही तरह बिना किसी खौफ के जी सकें. ऐसा ही यहाँ समाधान दिया गया है. वहीँ दूसरी तरफ मानसिकता पर भी प्रहार है फिर वो समाज की हो या माता पिता की.

‘गोली दागो रामसिंह’ राजनीति के चेहरे से नकाब उतारती है. जिनके लिए सिर्फ अपनी कुर्सी ही महत्त्व रखती है अन्य सब सिर्फ एक टूल होते हैं और उन्हें कब कैसे और कहाँ प्रयोग करना है, वो जानते हैं. आपको सिर्फ सर झुककर हुक्म बजाना आना चाहिए तभी आप उनके साथ टिक सकते हैं अन्यथा आपके लिए कहीं कोई जगह नहीं.
ऊपर से चाहे कितना ही इंसान अच्छा , सत्चरित्र ईमानदार दिखे, जनता में कितनी ही अच्छी छवि क्यों न हो, अन्दर से सब कितने काइयाँ होते हैं मानो यही कहना चाहता है लेखक.

एक और उम्दा कहानी है ‘साँप’ जिसे तो पढ़कर ही उसका आनंद पाठक ले सकता है. समाज में किसकी नज़र कैसी है कौन जान सकता है. जाने कितने साँप इंसान के आस पास डोलते मिलेंगे जो जब मौका मिले डंसने की तैयार रहते हैं ऐसे में एक सीधा साधा इंसान कभी जान ही नहीं पाता कौन कैसा है मगर उस सीधे इंसान की शराफत का नाजायज़ फायदा नहीं उठाना चाहिए क्योंकि जब वो अपनी आई पर आता है तो सारे हिसाब किताब बराबर कर देता है वो भी इस तरह कि सामने वाला समझ भी नहीं पाता आखिर ये हुआ क्या, मानो इस कहानी के माध्यम से लेखक यही सन्देश दे रहा है .

‘थके पैरों का सफ़र’ कहानी एक बार फिर जात बिरादरी के पेंच में उलझी ज़िन्दगी का आइना है. कहने को इंसान उम्र भर अपनी जाति को सम्मान देता है लेकिन जब उसे जरूरत हो तो वो ही बिरादरी उसके काम नहीं आती. एक लड़की के पिता की क्या दशा होती है जब बेटी ब्याह योग्य हो जाए और अपनी बिरादरी में कोई अच्छा लड़का न मिले या मिले तो दहेज़ के नाम पर मुंह खुला मिले. ऐसे में उसके पास क्या रास्ता बचता है? मानो ये प्रश्न कर रहा है लेखक और साथ में जवाब भी दे रहा है कि अंतिम विकल्प तो बाहर की तरफ देखना ही बचता है फिर कोई कितना ही नाराज़ क्यों न हो. बदलाव की बयार इसी तरह बहती है मानो यही कहना चाह रहा है लेखक.

‘औरत होने का गुनाह’ शीर्षक ही पूरी मुकम्मल दास्ताँ है. जन्म से लेकर मरण तक वो सिवाय जागीर के होती क्या है? उस पर गैर धर्मी से विवाह कर ले तो कीमत तो उसे चुकानी ही पड़ेगी, मानो यही कहना चाहता है लेखक.

कुल मिलाकर सभी कहानियाँ ऐसी हैं जिन्हें पढ़कर पाठक रुकेगा, सोचेगा. छोटी छोटी कहानियाँ एक बड़ा कलेवर प्रस्तुत करती हैं. वहीं लेखक पाठक की नब्ज जानता है, उसे क्या चाहिए, उसी के अनुसार खुराक देता है. कहानियों की सबसे बड़ी खूबी ये है कि पाठक पढ़कर निराश नहीं होता, कहानी में कहानी मिलती है और अनावश्यक विवरणों से बचते हुए लेखक बहुत ही चतुराई से अपनी बात कह भी देता है. पठनीयता कहानियों सा सबसे बड़ा गुण होता है और उसमें कहानियाँ खरी उतरती हैं. भाषा शैली भी रोचक है. एक प्रवाह है जिसमें पाठक बहता जाता है. ऊब के लिए कहानियों में कोई स्थान नहीं है.



सुभाष नीरव जी किसी पहचान के मोहताज नहीं. उनके लेखन का हर कोई कायल है. बस पाठकों को आगे भी निरंतर उनकी कलम ऐसे ही लाभान्वित करती रहेगी, यही उम्मीद करती हूँ.

सोमवार, 27 अगस्त 2018

मृत्यु , वास्तव में जाना नहीं होती....

किसी के जाने के बाद
झरती हैं यादें रह रह
ये जाना वास्तव में जाना नहीं होता

जाने वाला भी तो समेटे होता है रिश्तों की धार
कराता है अहसास पल पल
मैं हूँ तुम्हारी ज़िन्दगी में उपस्थित
कभी बूँद की तरह
तो कभी नदी की तरह
कभी पतझड़ की तरह
तो कभी बसंत की तरह
कभी सावन की रिमझिम फुहारों की तरह
तो कभी जेठ की तपिश की तरह

मैं जा ही नहीं सकता कभी कहीं
मैं हूँ अब यादों के नीड़ में
कैसे मुझे भुला आगे बढ़ सकते हो
छोड़ी हैं मैंने अपनी निशानियाँ
रेशम की डोरियों में
माँ की गोदियों में
बच्चों की लोरियों में
पिया की शोखियों में

कोई कर ही नहीं सकता मुझे निष्कासित
फिर वो राखी हो या करवाचौथ
होली हो या दिवाली
या फिर हों जन्मदिन
आस पास ही रहता हूँ सबके
इक कसकती हूक बनकर

यूँ तो हो जाते हैं
जीते जीते ही रिश्ते मृत
तो वही होता है असलियत में जाना
हो जाना ख़ारिज रिश्तों से

मृत्यु , वास्तव में जाना नहीं होती....


पिछले साल 20 दिसंबर को छोटी उम्र में ही मेरी ननद इस संसार से विदा हो गयी थीं. अब राखी आने वाली थी तो दिल बहुत उदास था. रह रह उनकी कमी का अहसास होता रहा तकरीबन आठ दस दिन से बहुत शिद्दत से याद आ रही थी. तब जाकर अहसास हुआ जाने वाले कहाँ जाते हैं. वो खुद अपनी उपस्थिति का अहसास हमें कराते रहते हैं और होते हैं हमारे साथ ही जिन्हें वो छोड़कर गए हैं उनके रूप में.......कल उनके बच्चों और पति को भी बुलाया हमेशा की तरह ताकि लगे वो हैं हमारे आस पास ही ... क्या हुआ जो राखी का धागा नहीं क्योंकि स्नेह का धागा तो वो हमारे बीच छोड़ कर गयी हैं जो हमेशा बना रहेगा...बस जो इतने दिनों से महसूस रही थी आज इस रूप में बाहर आया ...



गुरुवार, 26 जुलाई 2018

और मैं .... शर्मिंदा हूँ

मेरे चेहरे पर एक जंगल उगा है
मतलबपरस्ती का
मेरी दाढ़ों में माँस अटका है
खुदगर्जी का
आँखों पर लगा है चश्मा
बेहयाई का

मारकाट के आईने में
लहू के कतरे
सहमा रहे हैं पूरी सभ्यता को
भूख के ताबीज चबा रही हैं
आने वाली पीढ़ियाँ
कोहराम और ख़ामोशी के मध्य
साँसों की आवाजाही
ज़िन्दगी की बानगी नहीं

क्या दिखाई देते हैं तुम्हें इसमें
जीवन के चिन्ह
आज पूछ रहा है देश मेरा

और मैं .... शर्मिंदा हूँ



©वन्दना गुप्ता vandana gupta

बुधवार, 11 जुलाई 2018

फिर भी जिंदा हूँ

मेरे पास उम्मीद की
कोई सड़क नहीं
कोई रास्ता नहीं
कोई मंजिल नहीं
फिर भी जिंदा हूँ

मेरे पास मोहब्बत का
कोई महबूब नहीं
कोई खुदा नहीं
कोई ताजमहल नहीं
फिर भी जिंदा हूँ

मेरे पास जीने की
कोई वजह नहीं
कोई आस नहीं
कोई विश्वास नहीं
फिर भी जिंदा हूँ

मेरे पास खोने को
कोई दिल नहीं
कोई दुनिया नहीं
कोई ख्वाब नहीं
फिर भी जिंदा हूँ

दीवानगी के शहर का इससे हसीन मंज़र भला और क्या होगा...

©वन्दना गुप्ता vandana gupta

शनिवार, 30 जून 2018

'ठहरना एक खामोश क्रिया है'

मेरी ये कविता शनिवार 16 जून को जयपुर से प्रकाशित होने वाले पेपर 'बुलेटिन टुडे' में प्रकाशित कविता हुई और आज @kusum kapoor जी के पति सुरेन्द्र नाथ कपूर जी द्वारा उसका अंग्रेजी में अनुवाद कर दिया गया ........दोनों साथ में लगा रही हूँ :) :) 


ठहरना एक खामोश क्रिया है
****************************          
मुझे 
न कहीं जाना है न आना है 
मुझे तो यहीं कहीं ठहरना है 
जैसे ठहरती है धूप आँगन में 
जैसे ठहरती है उम्मीद मन में 
जैसे ठहरती है आशा जीवन में 

नैराश्य के गह्वरों से 
दूर बनाया है मैंने अपना आशियाना 
यहाँ सुबह है 
सांझ है 
हवा है 
बारिश है 
मिटटी की सौंधी खुशबू है 
कण कण में व्याप्त है जीवन 

जीवन वो नहीं जो जीया जा रहा है 
जीवन वो है जिसने बताया तुम्हें 
कहाँ ठहरना है
कहाँ छोडनी है अपनी छाप 
कि 
कायनात के अंत के बाद भी 
बचे रहें मेरी मुस्कराहट के बीज 
कि 
रक्तबीज सी उगूँ 
और कण कण में बिखेर दूँ 
खिलखिलाहट का बीज 
हर चेहरे की मुस्कराहट के ताबीज में मिलूँ 
तो जान लेना 
मैंने जान लिया है ठहरना 
मैंने पा लिया है अपना होना 
शंखनाद सी गूंजूं और हो जाए ज़िन्दगी मुकम्मल 

जहाँ आने और जाने में शोर है 
वहीं ठहरना एक खामोश क्रिया है 
जो किसी प्रतिक्रिया की मोहताज नहीं 
करके आने जाने से मुक्त ...मुझे ठहरने दो 
क्योंकि 
मुसाफिर नहीं जो दो घूँट जल पी जल दूँ गंतव्य पर ...


Kusum Kapoor इस सुंदर रचना का अनुवाद।

I have neither to go nor come 

from anywhere.

Iam
like sunshine which stays in courtyard,
hope,which dwells in heart and life.

I have made my abode
far away from the realm of despair.
Where,
there is
dawn
evening
breeze
rain 
sweet fragrance of earth
and
Life in every atom.

Life is not just being alive

.
Life is,what tells you where to stay
and
where to leave your footprints.

So that,
the seeds of my smile may stay alive
And sprout all over
in everybody's laughter.

It is then,you realize,
that 
you have found your destination and
Your self.

I would like to sound like a counch shell
and
complete the meaning of life.

Coming and going
produce noise
whereas stillness is Silence
free from all reactions
and the cycle of coming and going.

Let me stay.

I am not a traveller
who only stops on way
to take a gulp of water.

मंगलवार, 19 जून 2018

हसीनाबाद मेरी नज़र में



उपन्यास लेखन एक साधना है. सिर्फ शब्दों का खेल भर नहीं. ऐसे में जब कोई पहला उपन्यास लिखता है तो पाठकों को उम्मीद होती है कुछ नया मिलेगा. पहले उपन्यास में लेखक अपने आस पास के घटनाक्रमों से प्रभावित होता है तो उनका आना लाजिमी है. जरूरी नहीं वो उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा हों या उनकी दास्ताँ. पिछले दिनों कथाकार गीता श्री का उपन्यास ‘हसीनाबाद’ पढ़ा.
मुख्य पात्र गोलमी और उसकी माँ सुन्दरी हैं. जिन्हें लेखिका ने बहुत खूबसूरती से कथानक में ढाला है. ठाकुरों की निजी संपत्ति बनी सुंदरी के जीवन और उसके एक निर्णय से बदलती ज़िन्दगी का चिटठा है उपन्यास. बेशक खुद का जीवन कैसा ही बीते एक माँ यही चाहती है उसके बच्चे उसके जैसा जीवन जीने को विवश न हों. उसी सन्दर्भ में उठाया गया उसका कदम गोलमी के भविष्य की नींव बनता है. नाचना माँ का पेशा था तो माँ चाहे कितना ही दूर रखना चाहे कुछ गुण औलाद में जींस के माध्यम से पहुँच ही जाते हैं और ऐसा ही यहाँ होता है. जितना नाच गाने से सुंदरी दूर रखना चाहती है उतना ही गोलमी प्रतिरोध करती है और अपनी मनमानी भी क्योंकि कहीं न कहीं पिता के गुण भी आने ही होते हैं और फिर ठाकुरों में तो मनमानी कूट कूटकर भरी होती है.
ज़िन्दगी कभी सीधी राह नहीं चलती. उसकी सर्पीली डगर पर रपटन होती है जिसका पता इंसान को कदम कदम पर होता है. उपन्यास पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे लेखिका गोलमी के माध्यम से एक आग को रेखांकित कर रही हो जैसे खुद उस आग पर चल रही हों. जैसे लेखिका स्त्री की स्वतंत्रता की पुरजोर वकालत करती हैं वैसा ही चरित्र यहाँ पेश किया है. बेशक इसे कोई राजनितिक उपन्यास कह दे लेकिन आधे से ज्यादा उपन्यास तक तो राजनीती आई ही नहीं. बल्कि राजनीती के दखल ने गोलमी को ज़िन्दगी को समझने की समझ दी. विभिन्न मोड़ों से गुजरते हुए गोलमी को अपने परायों का भी पता चलता है तो ज़िन्दगी की हकीकतों का भी. सत्ता कितनी निरंकुश होती है उसका भी आभास होता है. खुद को ख्याति के आसमान पर देखने की चाह कैसे विभिन्न मोड़ों से गोलमी को गुजारती है और हकीकत का अक्स दिखाती है, उसी का चित्रण है हसीनाबाद, एक बदनाम बस्ती से राजनीती तक का सफ़र .
उपन्यास पढ़ते हुए कई जगह कुछ आभास हुए जिन्होंने कहीं तुलनात्मक अध्ययन को मजबूर किया तो कहीं सोचने को. पिछले दिनों ही मैत्रेयी पुष्पा का ‘इदन्मम’ पढ़ कर चुकी वहां भी मंदा और उसकी दादी और कुसुमा थे तो गाँव के जीवन की दुश्वारियों के साथ संघर्ष का सफ़र जिसमें भी राजनीती का दखल ऐसे ही होता है और फिर अंत में हाथ खाली ही रह जाते हैं, जाने कितना कुछ खोना पड़ जाता है मंदा को. फिर से संघर्ष को आमंत्रित कर देती है उसकी ज़िन्दगी......ऐसा ही कुछ हसीनाबाद में देखने को मिला. फर्क बस बदनाम बस्ती का था. वर्ना दांवपेंच और राजनीती ने ऐसा ही आकार लिया.
इसके अलावा लेखिका ने गोलमी के चरित्र को ऐसा लगा जैसे कई खाँचों में बांधना चाहा और पढ़ते हुए लगा जैसे कहीं स्मृति ईरानी का चेहरा सामने आ रहा है तो कहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल का. जो घटनाक्रम दिखाया है वो कहीं न कहीं इन्हीं दोनों नेताओं का चित्र सामने खींचता है. अब लेखिका क्योंकि स्वयं पत्रकार रही हैं तो राजनीति की बहुत जानकार भी रही हैं तो राजनितिक दांवपेंचों को बखूबी प्रयोग किया है. अच्छी खासी उठापटक के बाद भी लेखिका ने इदन्मम की तरह फिर संघर्ष की तरफ वापस मोड़ दिया गोलमी को, तोड़ दिया उसका मतिभ्रम. मानो कहना चाहती हों जीवन यदि सुखमय जीना हो तो अपनी भूमि पर ही आप जी सकते हैं, दूर के ढोल सुहावने ही होते हैं उस पर राजनीती तो ऐसा कीचड है जिसमे कमल नहीं खिला करते. यदि आपको अपनी पहचान बनानी है तो आपके लिए ये सड़क बंद है. नृत्य को आकाश की ऊंचाई तक ले जाने की उसकी चाह कहाँ से कहाँ ले गयी, कितना कुछ खोकर उसने हारकर जीवन का वास्तविक अर्थ समझा. वहीँ लेखिका खुद लोक की पैरोकार रही हैं तो गोलमी के माध्यम से लोक और संस्कृति को बचाने की कवायद को खूबसूरती से बयां किया है.
अधूरे सपने, टूटी ख्वाहिशों का नाम ही है जैसे ज़िन्दगी मानो यही निचोड़ निकल कर आता है उपन्यास का. वहीँ कुछ मुद्दे लेकर चलीं लेखिका मगर उन्हें कोई मोड़ न देकर अधूरा ही छोड़ दिया जिसका उत्तर एक पाठक जानना चाहता था जैसे रमेश, गोलमी का भाई, जिसे सुंदरी हसीनाबाद ही छोड़ आती है जो नागवार गुजरता है क्योंकि कोई भी माँ अपने दोनों बच्चों में फर्क नहीं करना चाहेगी. उसके लिए तो दोनों ही बच्चे उसकी दो आँख होते हैं मगर यहाँ सुंदरी को सिर्फ गोलमी की चिंता है कि कल वो भी सिर्फ ठाकुरों के भोग की वस्तु न बनकर रह जाए मगर उसने ये नहीं सोचा कि रमेश का क्या होगा? क्या वो भी ठाकुरों का लठैत बनकर ही नहीं रह जाएगा? क्या उसका जीवन ठाकुर की निजी मिलकियत बनकर नहीं रह जायेगा? वो तो ठाकुर ने ऐसा कुछ किया नहीं वर्ना हो सकता था सुन्दरी के भागने का बदला वो रमेश से उम्र भर लेता........संभावनाएं कई उठती हैं लेकिन लेखिका ने बीच बीच में रमेश और ठाकुर सजावल सिंह के पात्रों को तो माध्यम जरूर बनाया लेकिन वहीँ रमेश को अंत तक पता न चलने दिया अपना और गोलमी का रिश्ता बल्कि मिली भी नहीं उससे, देखा भी नहीं उसे, इतने आस पास होते हुए भी...यह खटकता है. लेखिका चाहती तो यहाँ पात्रों को खुला छोड़ सकती थीं और वो अपनी दुनिया बना सकते थे मगर लेखिका ने पात्रों की नकेल अपने हाथों में रखी तो पात्र लेखिका के हाथों की कठपुतली बने चलते चले क्योंकि लेखिका को पता था उसे क्या अंत देना है.
पहला उपन्यास पहले पहले प्यार की तरह होता है और लेखिका का वो प्यार उनके लेखन में झलक रहा है. खूबसूरत भाषा शैली से सजा उपन्यास पाठक को बांधे रखता है और वो जानना चाहता है आखिर गोलमी कौन सा आकाश अपने लिए चुनती है. रोचकता बराबर बनी रहती है. लेखिका को पहले उपन्यास के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं....
बस वाणी प्रकाशन से उपन्यास आया है तो उसमें प्रूफ की गलतियाँ थोडा खटकती हैं जिसके लिए प्रकाशन को ध्यान देना चाहिए था.

शुक्रवार, 25 मई 2018

वक्त की नदी में

मैं वक्त की नदी में तैरती इकलौती कश्ती ...दूर दूर तक फैले सूने पाट और ऊपर नीला आकाश...गुनगुनाऊं गीत तो तैरता है नदी की छाती पर हिलोर बनकर तो कभी हवाएं बेशक ले जाती हैं बहाकर अपने संग...शायद पहुँचे किसी मीत तक फ़रियाद बन ...तन्हाइयों के शहर में बेबसी की आवाज़ बन....शायद दर्द बह जाए टूटते तारे का रुदन बन ...सुना है जो भी कहा जाता है ब्रह्माण्ड में घूमता रहता है अनंतकाल तक ...मेरे मीत! अनंतकाल में कोई काल तो मेरा होगा न जिसमें हो जाएगी सिन्दूरी मेरी पूरी उम्र ...एक रुके हुए फैसले की अर्जी ख़ारिज मत कर देना...तन्हाइयों से बौखलाया शहर सिसक रहा है, दम तोड़ रहा है ...कि कहीं कोई सितार तो बजे और रूह हो जाए अलमस्त कलंदर सी

बुधवार, 25 अप्रैल 2018

बिछड़े सभी बारी बारी :




जाने कैसा ये साल आया है एक के बाद एक सभी छोड़ कर जा रहे हैं. Vijay Kumar Sappatti पिछले कई सालों से एक के बाद एक मुश्किलों से गुजर रहे थे...हम ब्लॉग के वक्त से मित्र रहे और उसी दौरान उनके जीवन में पहले नौकरी की समस्या शुरू हुई जो कई सालों तक लगातार चलती रही. उसके बाद उनकी पत्नी बीमार रहीं और उन्हें आर्थिक तंगी के चलते मकान बेचना पड़ा और एक फ्लैट में आ गए ...मगर रहे जीवन्तता से भरपूर...हम भी कहते विजय ये वक्त भी गुजर जाएगा...वो कहते आखिर कब तक वंदना तो मैं यही कहती बस ये आखिरी है लेकिन जब उनके कैंसर की खबर सुनी तो स्तब्ध रह गयी थी लेकिन कुछ वक्त पहले जब बात हुई तो उन्होंने कहा - अब पूरी तरह ठीक हो गया - जानकर ख़ुशी हुई थी और सोचा था शायद अब ईश्वर मेहरबान हो गया और उनकी सभी परीक्षाएं पूर्ण हो गयीं ...लेकिन मैं गलत थी ....जाने क्या जरूरत आ पड़ी ईश्वर को जो अभी उन्हें अपनी जिम्मेदारियां भी पूरी नहीं करने दीं.....अभी तो बच्चे भी सेटल नहीं हुए और उम्र सिर्फ 52 साल ......ये क्या जाने की उम्र होती है ?

ब्लॉग के माध्यम से हम सब जुड़े थे. अक्सर एक दूसरे की रचनाओं पर गंभीरता से विमर्श करते और प्रोत्साहित भी और विजय कई बार ऐसी कविता लिखते जो दिल को छू जाती तो उसके प्रयुत्तर में मेरी तरफ से भी एक कविता आ जाती ...वो एक ऐसा दौर था जहाँ कितना अपनापन था, सम्मान था.अपनी छोटी छोटी खुशियों को सबसे बाँटना उनका प्रिय शगल रहा...एक बच्चे की तरह ...हमेशा पॉजिटिव थिंकिंग रही.........हर बार गिरकर उठना उसी उत्साह से जैसे कुछ हुआ ही न हो ........बहुत कुछ करना चाहते थे विजय वैसे भी एक ऑल राउंडर थे फिर वो फोटोग्राफी और चित्रकारी हो, कवितायेँ या कहानियां हों, या फिर अध्यात्म ...यहाँ तक कि पिछले दिनों उनकी बनायीं एक लघु फिल्म पर वो पुरस्कृत भी हुए .......जाने क्या कुछ करना चाहते थे और कितना कुछ अधूरा छोड़कर चले गए .

शुरू शुरू में जब ब्लॉग बनाया था तो किसी को जानती नहीं थी तो किसी से अपना नंबर शेयर नहीं करती थी न किसी से फ़ोन पर बात करती थी लेकिन जब हम सबने एक दूसरे को अच्छे से जाना , एक दूसरे पर विश्वास हुआ तब नंबर शेयर किया....तब भी सालों में बात होती थी तभी एक बार बात हुई थी तो विजय ने कहा हम देखो कितने सालों से मित्र हैं लेकिन अब तक मिले नहीं तो जो जवाब मैंने दिया आज सोचती हूँ तो लगता है किसी होनी ने ही वो जवाब दिलवाया होगा लेकिन आज वो ही टीस भी रहा है

हम कभी नहीं मिलेंगे
इस ज़िन्दगी में
कहा था मैंने
मिलने से भ्रम टूट जाते हैं

रु-ब-रु होने पर
एक ठंडापन
एक अजनबियत
एक औपचारिकता की त्रिवेणी में
जब डुबकी लगाओगे
नजर और दिल
खेलने चले जायेंगे गुल्ली डंडा
और तुम करते रह जाओगे
खानाबदोशी से गुफ्तगू

थोडा तो रुक जाते
इतनी भी जल्दी क्या थी जाने की
दोस्तों की बात का इतना भी क्या बुरा मानना भला
कहा था मैंने
और तुमने मान लिया
सच कर दिखाया

ये तब कहा था जब कई लोगों से मिलने पर भ्रम टूटे थे तो सोचा था जो दोस्ती बनी हुई है बनी रहे फिर हम चाहे कभी न मिलें ......लेकिन आज लग रहा है कितना गलत कहा था ....अक्सर कहा करती थी इस आभासी दुनिया ने मुझे बस सच्चे मित्र तो दो चार दिए हैं और विजय उनमे से एक थे ...हम आपस में अपने दुःख सुख शेयर कर लेते थे फिर वो लेखन से सम्बंधित हों या फिर ज़िन्दगी से ...बस अब और नहीं कुछ कह पाऊँगी ......बस तुम जहाँ भी हो ईश्वर अब विजय को अपना प्यार देना, बहुत तकलीफ से गुजरे थे .... 
 
अभी कमेंट में गिरिराज शरण जी ने सूचना लगाईं है विजय की नयी कहानी की किताब अमृत वृद्धाश्रम उनके प्रकाशन से प्रकाशित हुई है तो हम सबकी तरफ से यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी यदि हम सब उस किताब को पढ़ें और प्रकाशक उस किताब को साहित्य की दुनिया में पहचान दिलवाए क्योंकि 'एक थी माया' भी उन्ही के  प्रकाशन  से  प्रकाशित  हुई और बहुत  प्रसिद्द भी . 
विनम्र श्रद्धांजलि .........ईश्वर उनके परिवार को ये दुःख सहने की शक्ति दे :( :(

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

स्त्रियों के शहर में आज जम के बारिश हुई है

कृष्णपक्ष से शुक्लपक्ष तक की यात्रा है ये
आकाशगंगाओं ने खोल लिए हैं केश और चढ़ा ली है प्रत्यंचा
खगोलविद अचम्भे में हैं
ब्रह्माण्ड ने गेंद सम बदल लिया है पाला

ये सृष्टि का पुनर्जन्म है
लिखी जा रही है नयी इबारत मनु स्मृति से परे
ये न इतिहास है न पुराण
चाणक्य की शिखा काट कर टांग दी गयी है नभ पर
प्रतीकों को नहीं बनाना हथियार इस बार
भेस बदलने के चलन को कर निष्कासित
खिल रहा है स्वरूप धरती का

खामोशी की कंटीली डगर एक दुस्वप्न सरीखी
चाहे जितना करे स्यापा
चहक, महल, लहक की उजास से द्विगुणित हो गया सौन्दर्य

मंडप में विराजमान है आदिम सत्ता की राख
नृत्यरत है रक्कासा
देवियाँ बजा रही हैं दुन्दुभी और यक्षिणी फूल 

वहाँ रागों के बदल गए हैं सुर
पहले ख्वाब की पहली मोहब्बत सा
ये है उजास का पहला चुम्बन

स्त्रियों के शहर में आज जम के बारिश हुई है

शनिवार, 14 अप्रैल 2018

सुनो देवी

सुनो देवी
तुम तो नहीं हिन्दू या मुसलमान
फिर कैसे देखती रहीं अन्याय चुपचाप
क्यों न काली रूप में अवतरित हो
किया महिषासुर रक्तबीज शुम्भ निशुम्भ का नाश

सुनो देवी
क्या संभव है तुम्हें भी तालों में बंद रखना?
फिर क्यों नहीं खोले तुमने
चंड मुंडों के दिमाग
क्यों नहीं दुर्गा रूप में अवतरित हो
किया अत्याचारियों का विनाश

सुनो देवी
क्या मान लें अब हम
तुम्हारा अस्तित्व भी महज कपोल कल्पना है
क्या जरूरी है
इंसानियत और मानवता से उठ जाये सबका विश्वास
और आस्था हो जाए पंगु

देखो देवी देखो
चहुँ ओर मच रहा कैसा हाहाकार
जब ईश्वरीय अस्त्तिव भी प्रश्चिन्ह के कटघरे में खड़ा हो गया
और कोई राजनीतिज्ञ
राम और रहीम के नाम पर
अपनी रोटी सेंक गया
क्या महज उन्हीं के हाथ की कठपुतली हो तुम
या फिर
उन्हीं तक है तुम्हारी भी प्रतिबद्धता?

उठो देवी उठो
करो जागृत खुद को
करो सुसज्जित स्वयं को दिव्य हथियारों से
सिर्फ एक बार
कर दो वो ही भीषण रक्तपात
मिटा दानवों को दो मनुष्यता को आधार

गर न कर सको ऐसा
तो कर दो देवी पद का त्याग
जो भ्रम से तो बाहर आ जाए इंसान

ईश्वर सबसे संदेहात्मक दलील है ...

#आसिफा