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सोमवार, 24 जुलाई 2017

'वो सफ़र था कि मुकाम था' - मेरी नज़र से


Maitreyi Pushpa जी की लिखी संस्मरणात्मक पुस्तक पर मेरे द्वारा लिखी समीक्षा "शिवना साहित्यिकी" के जुलाई-सितम्बर 2017 अंक में प्रकाशित हुई है ......जो चित्र में न पढ़ पायें उनके लिए यहाँ भी लगा रही हूँ....शिवना प्रकाशन की हार्दिक शुक्रगुजार हूँ जो उन्होंने मेरी प्रतिक्रिया को प्रकाशित किया :

‘वो सफ़र था कि मुकाम था’ मैत्रेयी पुष्पा जी द्वारा लिखी एक संस्मरणात्मक पुस्तक तो है ही शायद राजेंद्र यादव जी को दी गयी एक श्रद्धांजलि भी है और शायद खुद से भी एक संवाद है , प्रतिवाद है . 

मुझे नहीं पता कैसे सम्बन्ध थे मैत्रेयी जी और राजेन्द्र जी के और न जानने की उत्सुकता क्योंकि एक स्त्री होने के नाते जानती हूँ यहाँ तथ्यों को कैसे तोडा मरोड़ा जाता है . मुझे तो पढने की उत्सुकता थी कैसे किसी के जाने के बाद जो शून्य उभरता है उसे लेखन भरता है. इस किताब में शायद उसी शून्य को भरने की लेखिका द्वारा कोशिश की गयी है मगर शून्य की जगह कोई नहीं ले सकता. शून्य का कोई विलोम भी नहीं. यानि लेखिका की ज़िन्दगी में जो शून्य पसरा है अब उम्र भर नहीं भर सकता. जिस गुरु, पथप्रदर्शक, विचारक , दोस्त के साथ ज़िन्दगी के २०-२२ साल गुजरे हों तमाम सहमतियों और असहमतियों के बाद भी, क्या उसे किसी भी वस्तु, मनुष्य या अनर्गल संवाद से विस्थापित किया जा सकता है . ये रिश्ता क्या कहलाता है , ये जानने की उत्सुकता तो सभी को रही लेकिन ये रिश्ता कैसे निभाया जाता है शायद ही कोई समझ पाया हो. जहाँ भी स्त्री और पुरुष हों वहां उनके कैसे स्वच्छ सम्बन्ध हो सकते हैं ? ये हमारी मानसिकता में घोंट घोंट का ठूंसा गया है तो उससे अधिक हम सोच भी नहीं सकते जबकि रिश्ता कोई हो वो भरोसे की नींव पर ही टिक सकता है और शायद दोनों ने ही उस भरोसे को कायम रखने की कोशिश की तभी इतना लम्बा सफ़र तय कर पाया . हो सकता है राजेंद्र जी की छवि के कारण मैत्रेयी जी को भी वैसा ही माना गया हो क्योंकि कहते हैं ताड़ी के पेड़ के नीचे बैठकर गंगाजल भी पियो तो भी आपको शराबी ही समझा जाएगा और शायद उसी का शिकार ये सम्बन्ध भी रहा. 

मैं ये मानती हूँ जो भी लेखक लिख रहा है वो सच लिख रहा है खासतौर से यदि वो संस्मरण हों या आत्मकथा जबकि कहते हैं आत्मकथा में भी थोड़ी लिबर्टी ले ली जाती है लेकिन जब श्रद्धांजलि स्वरुप कुछ लिखा जाए तो वहां कैसे किसी अतिश्योक्ति के लिए जगह होगी . वैसे भी मैंने न तो आज तक राजेन्द्र जी को पढ़ा न मैत्रेयी जी को इसलिए निष्पक्ष होकर पढने का अलग ही मज़ा है बिना कुछ जाने. किताब पढो तो लगता है सफ़र में हम साथ ही तो चल रहे हैं उन दोनों के फिर उसे मुकाम कैसे कहें. लेखिका ने अपनी भावनाओं के सागर में डुबकी लगा कैसे चुनिन्दा लम्हों को कैद किया होगा , ये आसान नहीं. खासतौर से तब जब जिसे श्रद्धांजलि आप दे रहे हैं उसके अच्छे और बुरे दोनों पक्षों से आप वाकिफ हो चुके हों. फिर भी उन्होंने अपने साहस का परिचय दिया . राजेंद्र जी सकारात्मक में नकारात्मक छवि और नकारात्मक में सकारात्मक छवि का अद्वितीय उदाहरण थे. लेखिका को उनके जीवन की कुंठा भी पता थी तो उनकी महत्वाकांक्षा भी . तभी संभव हो पाया उनके दोनों पक्षों से न्याय करना . राजेन्द्र जी कैसे व्यक्तित्व थे मुझे नहीं पता क्योंकि न कभी मिली न उन्हें जानती थी न कभी देखा. जितना जाना , पढ़ा उनके बारे में तो नेट पर किसी पोस्ट में या फिर अब इस किताब में तो मेरे अन्दर की स्त्री की छटी इंद्री यही कहती है कहीं न कहीं अपने पिता द्वारा तिरस्कृत व्यक्तित्व थे वो जो उपेक्षा का जब शिकार हुए तो उन्होंने उसे भी अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाने का फैसला कर लिया. यानि अपनी कमियों को अपनी ताकत बनाया और पिता का कहा एक वाक्य – ‘कौन इससे अपनी बेटी ब्याहेगा’ ने मानो उन्हें जीने की वजह दे दी. खुद से और ज़माने से लड़ने का विचार भी और इसके लिए उन्होंने मानो यही सोचा हो अब खुद को इतना बड़ा बनाओ कि ये कहावत सही सिद्ध हो जाए – खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है . इसे ज़िन्दगी का मूलमंत्र बना मानो उन्होंने पूरी तयारी के साथ साहित्य जगत में कदम रखा तो एक क्या जाने कितने ही नाम उनसे जुड़ते चले गए . मतलब अपनी अपनी गरज से जुड़ने वाले रिश्ते कितने खोखले होते हैं ये सभी जानते हैं और ऐसा ही यहाँ होता रहा और उनकी छवि मानो एक प्ले बॉय जैसी बन गयी . मानो एक धधकती आग को वहीँ विराम मिला कि देखो आज लाइन लगी है मेरे पास , मानो अपने पिता को वो एक जवाब देना चाहते हों कि यहाँ इंसान की कमी मायने नहीं रखती बस जरूरत है खुद को ऐसा बना लो कि दुनिया चरणों में झुकने लगे. इसका ये मतलब नहीं उन्होंने किसी का जबरदस्ती फायदा उठाया जैसा कि लेखिका ने कहा . जो जिस उद्देश्य से आया उसे वो सब मिला वहीँ राजेन्द्र जी के अन्दर एक सच्चे प्यार की प्यास का भी लेखिका ने दिग्दर्शन तो कराया वहीँ एक सच से भी जैसे पर्दा उठाया मानो इस बहाने कहना चाहती हों लेखिका कि उनके अन्दर बेशक चाहत तो थी लेकिन सबसे ऊपर था उनका स्वभाव जिसे वो किसी के लिए नहीं बदल सकते थे . मन्नू जी से शादी भी जैसे एक समझौता था दोनों के मध्य जैसा कि लेखिका ने कहा . कोई नहीं जानता किसने किस उद्देश्य से सम्बन्ध जोड़ा और फिर अलग हुए क्योंकि दोनों की अपनी अपनी अपेक्षाएं थीं एक दूसरे से जिस पर दोनों ही शायद खरे न उतरें हों. इस सन्दर्भ में भी लेखिका ने अपना पक्ष साथ साथ रखा जिससे यदि सिद्ध हुआ वो उनके मध्य नहीं थीं या वो कारण नहीं थीं उनके अलगाव का क्योंकि जो सम्बन्ध जरूरतों से बनते हैं वो एक मोड़ पर आकर अलग रास्ता अख्तियार ही कर लेते हैं फिर वो राजेन्द्र जी ही क्यों न हों जिन्होंने मानो खुद को और अपने पिता और ज़माने को दिखाना चाहा हो कि अपाहिज होने से ज़िन्दगी नहीं रुका करती. हम इस सम्बन्ध पर कुछ नहीं कह सकते कौन कितना सही था और कितना गलत क्योंकि पति पत्नी का रिश्ता तो होता ही विश्वास का है और यदि वो टूटा तो वहां सिवाय किरचों के कुछ नहीं बचता जो उम्र भर सिर्फ चुभने के लिए होती हैं . लोग कह सकते हैं औरत उनकी कमजोरी थी या ये भी कहा जा सकता था वो आगे बढ़ने की सीढ़ी थे लेकिन जो भी था वो सच हर कोई अपने अन्दर जानता है उसकी क्या पड़ताल की जाए . 

यहाँ एक बात और उभर कर आई खासतौर से तब जब लेखिका स्त्री विमर्श के लिए खड़ी होती हैं और औरतों के लिए छिनाल शब्द का प्रयोग किया जाता है तब लेखिका की आँखों से जाने कितने परदे हटते हैं . जिस विश्वास के सहारे उनका रिश्ता आगे बढ़ता रहा वो एकदम दरक गया मानो लेखिका कहना चाहती हो जरूरी नहीं आप किसी के साथ अपना ज्यादा से ज्यादा वक्त गुजार लें फिर भी उसे पहचान लेने का दावा कर सकें . एक चेहरे में छिपे हैं कई कई आदमी जब भी देखना जरा गौर से देखना . लेखिका के साथ यही हुआ मानो कांच छन् से टूट गया. वो इंसान जिसने उन्हें कदम कदम पर स्त्रियों के हक़ के लिए लड़ना सिखाया हो, बोलना सिखाया हो, लिखना सिखाया हो यदि अचानक वो ही उन्हें ऐसे विमर्श से हटने को कहने लगे तो कैसा लग सकता है ये शायद लेखिका से बेहतर कोई नहीं जान सकता. शायद वो अब भी उतना नहीं कह पायीं जितना अन्दर रख लिया. किस अंदरूनी कशमकश से गुजरी होंगी वो उस दौर में इसका तो अंदाज़ा लगाना भी आसान नहीं . जिसे अपना गुरु, पथ प्रदर्शक माना हो , अपना सबसे अच्छा दोस्त माना हो जिससे आप अपने घर परिवार की , पति पत्नी के संबंधों की वो बातें भी कह सुन सकते हों जो शायद अपने पति से भी कोई पत्नी कभी न कह पाती हो, यदि वो ही आपको दबाने लगे, चुप रहने को कहने लगे और आपको बीच समंदर में अकेला छोड़ दे तो कैसा लगता होगा ये वो ही जानता है जिस पर गुजरी हो लेकिन इस किस्से से जो एक बात सामने आई वो ये कि राजेन्द्र जी चाहे जितना ऊँचा नाम रहे हों लेकिन उनके अन्दर के मर्द के अहम् को चोट लगती है , वो भी बाकी मर्दों से इतर नहीं क्योंकि कौन कह सकता है या कौन जान सकता है जो मर्दों की पार्टियाँ होती हैं या कहिये साहित्यकारों की पार्टियाँ होती हैं उसमे किस हद तक बातें होती हैं और फिर राजेंद्र जी जैसी शख्सियत हो सकता है बढ़ा चढ़ा कर कह देते हों अपने संबंधों के बारे में लोगों से सिर्फ अपना दबदबा दिखाने को , सबकी नज़र में चढ़ने को क्योंकि जो इंसान अपने पिता के शब्द बर्दाश्त न कर पाया हो वो किसी भी हद तक जा सकता है . कौन जानता है उन पार्टीज में महिलाओं और उनके लेखन के लिए कैसी बातें होती हों और शायद जो भी अच्छा या बुरा मैत्रेयी जी के बारे में कहा गया वो उन्ही का उड़ाया हो क्योंकि बिना आग के धुंआ नहीं होता जैसे वैसे ही बेपर की बातें ऐसे ही उडाई जाती हैं फिर ये साहित्य की दुनिया है यहाँ तो आज भी ऐसा हो रहा है फिर वो तो राजेंद्र यादव थे उनके बारे में तो विरोधियों को भी मसाला चाहिए होता होगा ऐसे में यदि वो कोई बात अपनी शेखी बघारने को हलके में भी कहते हों तो संभव है उसे नमक मिर्च लगाकर आगे फैलाया जाता रहा हो . होने को कुछ भी हो सकता है. लेकिन हम बात करते हैं लेखिका और राजेंद्र जी के सम्बन्ध की तो जब इस किताब को मैं पढ़ रही थी तो मुझे अपनी लिखी ही एक कहानी याद आ रही थी - ‘अमर प्रेम’ जहाँ पति , पत्नी और वो का त्रिकोण है जिसमे तीसरे कोण को स्वीकारा गया है पति द्वारा, जो कम से कम हमारे आज के समाज में फिलहाल तो संभव नहीं मगर मैत्रेयी जी और उनके परिवार के सम्बन्ध देखकर यही लगता है जैसे इन तीनों ने इस रिश्ते को जीकर मेरी कहानी को ही सार्थकता प्रदान की हो. यहाँ गुरु शिष्या का रिश्ता था , दोस्ती का रिश्ता था तो एक आत्मिक सम्बन्ध था जो दोस्ती या गुरु शिष्य के सम्बन्ध से भी ऊपर था जिसमे पूरी पवित्रता थी . जरूरी नहीं शारीरिक सम्बन्ध बनें ही यदि वो स्त्री और पुरुष हैं तो बिना सम्बन्ध बनाए भी किसी रिश्ते को कैसे जीया जाता है, कैसे निभाया जाता है ये शायद इन्ही के रिश्ते में देखने को मिलता है , अब कयास लगाने वाले चाहे जो कयास लगायें या कहें अपनी आत्मा के आईने में लकीर नहीं होनी चाहिए और यही तो लेखिका ने लिखकर साबित किया मानो उन सब बड़बोलों को चुप कराने को ही लेखिका ने अब अपने सम्बन्ध की पवित्रता उजागर की हो और कयासों को विराम दिया हो. किसी भी सम्बन्ध की सार्थकता उसकी गहराई में होती है और यहाँ अनेक असहमतियाँ होने के वाबजूद भी किसी ने किसी को नहीं छोड़ा. अंत तक निबाहा और शायद यही इस रिश्ते की सबसे बड़ी खूबसूरती है . 

आज साहित्यिक समाज जो चाहे सोचे जो चाहे कहे मगर लेखिका ने अपने सम्बन्ध की परत-दर-परत उधेड़ दी वर्ना चाहती तो राजेन्द्र जी की नकारात्मक छवि को छुपा भी सकती थीं लेकिन उन्होंने कहीं कुछ नहीं छुपाया बिना लाग लपेट के ज्यों का त्यों धर दिया , बस यही उनकी सच्चाई का प्रमाण है . लेखिका कितना द्वन्द में घिरी , कितनी छटपटाहट से गुजरी और फिर अपने अंतर्विरोधों से खुद को वापस मोड़ा ये पंक्ति दर पंक्ति सामने दीखता है फिर लेखन से न्याय करना आसान नहीं. अपनी बेचैनी और पीड़ा से एक युद्ध लगातार चलता रहा लेखिका का और उस सबके साथ हर रिश्ते के साथ न्याय करते चलना, अपने लेखन को भी जगह देते चलना आसान नहीं मगर लेखिका जैसे तलवार की धार पर चलीं सिर्फ अपने लेखन के जूनून के बलबूते . निजी और साहित्यिक जीवन के मध्य समन्वय स्थापित करना आसान नहीं होता ये वो दलदल है जिसमे एक बार धंसे तो कीच लगे बिना बाहर नहीं निकल सकते क्योंकि यहाँ ऊपर चढाने वाला यदि एक हाथ होगा तो खींचने वाले हजार . यहाँ तो बिन किसी प्रतिस्पर्धा के स्पर्धा होती है , उसकी लेखनी मेरी लेखनी से बेहतर कैसे की तर्ज पर सरकारें बनायी और मिटाई जाती हैं ऐसे में लेखिका ने संतुलन स्थापित करते हुए अपना सफ़र तय किया जिसमे राजेन्द्र जी जैसे पथ प्रदर्शक, गुरु, दोस्त ने उनका साथ दिया.

जब कोई सिर्फ एक पाठक के नाते इस किताब को निष्पक्ष होकर पढ़ेगा तभी उसकी सच्चाई या प्रमाणिकता को स्वीकार कर सकेगा लेकिन पूर्वाग्रह से ग्रस्त लोगों से कोई उम्मीद नहीं की जानी चाहिए.
अब लेखिका ने जो शीर्षक दिया है वो तो अपने आप में एक खोज का विषय है लेकिन उसके विषय में सिर्फ ये ही कहूँगी :
वो सफर था कि मुकाम था
ये तुझे पता न मुझे पता
फिर भी इक फलसफा लिखा गया

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मंगलवार, 18 जुलाई 2017

जन्मदिन के बहाने दर्द पिता का




साइटिका के दर्द से बोझिल पिता
नहीं रह पाते खड़े कुछ पल भी
मगर 

जब भी करते हैं बस में सफ़र
नहीं देते दुहाई किसी को
कि
बुजुर्गों के लिए होते हैं विशेष प्रावधान

अपनी जगह
बैठा देते हैं
जवान बेटी को
कि जानते हैं
ज़माने का चलन
आदिम सोच से टपकती बेशर्मी
करती है मजबूर खड़े रहने को
दर्द सहने को

तिलमिलाती है बेटी
पिता के दर्द से
कर ले कितनी अनुनय
मगर मानते नहीं पिता
जानते हैं
आदम जात की असली जात
कैसे स्पर्श के बहाने की जाती है
मनोविकृति पूजित

अपने अपने खोल में सिमटे
दोनों के वजूद
अपनी अपनी सीमा रेखा में कैद
एक दूसरे को दर्द से मुक्त
करने की चाह लिए
आखिर पहुँच ही जाते हैं
गंतव्य पर

दर्द की कोई भाषा नहीं
कोई परिभाषा नहीं
मगर फिर भी
अव्यक्त होकर व्यक्त होना
उसकी नियति ठहरी
मानो हो पिता पुत्री का सम्बन्ध

सफ़र कोई हो
किसी का हो
अंत जाने क्यों तकलीफ पर ही होता है
फिर दर्द पिता का हो या बेटी का

यादों के सैलाब में ठहरे हैं पिता
कि
आज जन्मदिन है आपका
तो क्या हुआ
नहीं हैं आप भौतिक रूप से
स्मृतियों में जिंदा हैं आप

और सुना है
जो स्मृति में जिंदा रहते हैं
वही तो अमरता का द्योतक होते हैं

सोमवार, 3 जुलाई 2017

शून्य

कुछ पन्ने हमेशा कोरे ही रह जाते हैं
उन पर कोई इबारत लिखी ही नहीं जाती
एक शून्य उनमे भी समाहित होता है

बिलकुल वैसे ही
जैसे
सामने टीवी चल रहा है
आवाज़ कान पर गिर रही है
मगर पहुँच नहीं रही
जहाँ पहुंचना चाहिए
एक शून्य उपस्थित है वहां भी

सब कुछ है
फिर भी कुछ न होने का अहसास तारी है
चाहे खुशियों के अम्बार हों या सफलता के
अक्सर छोड़ ही जाते हैं जाते जाते एक शून्य

और दिल हो या दिमाग
नहीं कर पाता खुद को मुक्त
शून्य की उपस्थिति से
तो पन्नों सा कोरा रहना स्वभाव है मन का भी

शून्य न कृष्ण पक्ष है न शुक्ल
चिंदियों के बिखरने का कोई मौसम नहीं होता

रविवार, 18 जून 2017

ब्रह्म वाक्य


दुःख दर्द आंसू आहें पुकार
सब गए बेकार
न खुदी बुलंद हुई
न खुदा ही मिला
ज़िन्दगी को न कोई सिला मिला 


यहाँ
रब एक सम्मोहन है
और ज़िन्दगी एक पिंजर
और तू
महज साँस लेती
भावनाओं से जकड़ी एक बदबूदार लाश 


ये जानते हुए
कि यहाँ कोई नहीं तेरा
चल फकीरा उठा अपना डेरा
और गुनगुनाता रह ज़िन्दगी के हर मोड़ पर
ये ब्रह्म वाक्य 


यहाँ मैं अजनबी हूँ ...मैं जो हूँ बस वही हूँ

मंगलवार, 13 जून 2017

ये जानते हुए कि ...

ये जानते हुए
कि
नहीं मिला करतीं खुशियाँ यहाँ
चाँदी के कटोरदान में सहेज कर
जाने क्यों
दौड़ता है मनवा उसी मोड़ पर

ये जानते हुए
कि
सब झूठ है, भरम है
ज़िन्दगी इक हसीं सितम है
जाने क्यों
भरम के पर्दों से ही होती है मोहब्बत

ये जानते हुए
कि
वक्त की करवट से बदलता है मौसम
और ज़िन्दगी क्षणभंगुर ही सही
जाने क्यों
ज़िन्दगी से ही इश्क होता है यहाँ

सिफ़र से शुरू सफ़र सिफ़र पर ही ख़त्म होता है जहाँ
फिर किस पाहुन की पहुनाई करूँ यहाँ ??


सोमवार, 5 जून 2017

विकास लील गया मेरी पीठ


मत ढूँढो छाँव के चौबारे
तुम ने ही तो उतारे वस्त्र हमारे
अब नहीं जन सकती जननी
बची नहीं उसमे शक्ति
पौधारोपण को जरूरी है बीज
और तुमने किया मुझे निस्तेज
बंजर भूमि में गुलाब नहीं उगा करते

जाओ ओढ़ो और बिछाओ
अब अपने विकास की मखमली चादरें
कि
कीमत तो हर चीज की होती है
फिर वो खोटा सिक्का ही क्यों न हो
फिर मैं तो तुम्हारे जीवन का अवलंब था
मगर
विकास की राह का सबसे बड़ा रोड़ा

खदेड़ दिया तुमने
कर लिया शहरीकरण
फिर क्यों बिलबिलाती हैं तुम्हारी अंतड़ियाँ
जो बोया है वही तो काटोगे
क्योंकि
'वृक्ष ही जीवन हैं' के स्लोगन को
कर दिया तुमने विस्थापित अपनी आकांक्षाओं से
तो अब क्यूँ कर रहे हो तर्जुमा
मेरी पीठ पर उगी विकास की खरपतवार का

अब कितनी दवा दारू करना
विकास के चश्मे से
नहीं किया जा सकता अहिल्या उद्धार
 
विश्व पर्यावरण दिवस पर
तुम्हारा विधवा विलाप
नहीं दे सकता मुझे मेरी खोयी आकृति
क्योंकि
विकास लील गया मेरी पीठ

(विश्व पर्यावरण दिवस)

शुक्रवार, 2 जून 2017

दिल हूम हूम करे ......

तुम मेरे सपनो के
आखिरी विकल्प थे शायद
जिसे टूटना ही था
हर हाल में

क्योंकि
मुस्कुराहट के क़र्ज़ मुल्तवी नहीं किये जाते
क्योंकि
उधार की सुबहों से रब ख़रीदे नहीं जाते

एक बार फिर
उसी मोड़ पर हूँ
दिशाहीन ...

चलो गुरबानी पढो
कि
यही है वक्त का तक़ाज़ा
कहा उसने

और मैंने
सारे पन्ने कोरे कर लिए
और तोड़ दी कलम
कि
फिर से न कोई मुर्शिद
लिख दे कोई नयी आयत

दिल हूम हूम करे ......

मंगलवार, 30 मई 2017

और देखो मेरा पागलपन

वो कह गए
"कल मिलते हैं "
मगर किसने देखा है कल
शायद कशिश ही नहीं रही कोई
जो ठहर जाता , जाता हुआ हवा का झोंका
या रही ही नहीं वो बात अब प्रेम में हमारे
जो रोक लेती सूरज को अस्ताचल में जाने से
या फिर बन गए हैं नदी के दो पाट
अपने अपने किनारों में सिमटे
तभी तो आज नहीं हुआ असर
मेरी सरगोशियों में
मेरी सर्द आवाज़ में
मेरी ज़र्द रूह में
जो बन जाती तुम्हारे पाँव की बेडी
जब मैंने कहा
थोड़ी देर और रुक जाओ
शायद तुम जान ही नहीं पाए
कितनी अकेली थी मैं उन लम्हों में
तुम्हारे साथ होते हुए भी ...........
ये मोहब्बत की दुनिया इतनी छोटी क्यों होती है ......जानां ?


और देखो मेरा पागलपन
मैंने तो आज की आस की देहरी पर ही उम्र बसर करने की ठान ली है .........

सोमवार, 15 मई 2017

उम्मीद से ज्यादा है

ये मेरे लिए उम्मीद से ज्यादा है :) :)
 
अभी दो दिन पहले मैंने सच्ची आलोचना पर ये पंक्ति लिखी थी (सच्ची आलोचना सहना अच्छा लेखक बनने की दिशा में पहला कदम है)और आज उसका नमूना यहाँ उपस्थित है ........ऐसे की जाती है सच्ची आलोचना :

यश पब्लिकेशन से प्रकाशित "प्रश्नचिन्ह...आखिर क्यों?" पर Ashutosh Pandey द्वारा हर कविता पर उनके विचार उनके मुख से इस विडियो में सुनिए ......एक कवि हो या लेखक यही जानना चाहता है जो उसने कहा वो कितना पहुँचा और क्या अच्छाई या कमी रही ताकि आगे वो अपने लेखन में उसी के हिसाब से सुधार कर सके. अब ये उस पर निर्भर करता है वो प्रतिक्रिया को कितना सकारात्मक लेता है और कितना नकारात्मक




विडियो इस लिंक पर क्लिक करके सुन सकते हैं :

https://www.facebook.com/sushma.cheshta/videos/1432601016778647/

गुरुवार, 9 मार्च 2017

ये है सरकारी होली :)

सरकार आपको होली तक फ्री राइड करवाएगी फिर वो बस हो ऑटो टैक्सी या फिर मेट्रो क्योंकि यदि नोट लेकर निकले और किसी ने रंग भरा गुब्बारा मार दिया तो आपकी तो बल्ले बल्ले हो जाएगी न ........अब खाली जेब खाली हाथ निकालिए और काम पर चलिए ........होली है भई , सरकार को भी मौका चाहिए था रंग डालने का तो देखिये किस खूबी से डाला है .......अपने हाथ रंगे बिना रंग डालना कोई उनसे सीखे .......देखिये उन्हें पता है उनके नोट का रंग छूटता है अब यदि पानी में गीला हुआ और आपने रगड़ दिया और रंग हट गया तो जिम्मेदार कौन ? आप ही न , आप ही न ........देखिये सबका साथ सबका विकास यूँ ही नहीं होता उसके लिए खुद भी जिम्मेदार बनना होता है .......तो क्या साहेबान आप इतना सा उनका साथ नहीं दे सकते जो वो सीधे आपकी जेब पर डाका डालें और किसी के हलक से जुबान भी बाहर न निकले ........बहुत नाइंसाफी है ये , क्या हुआ जो वो रूप बदल बदल कर रंग डाल रहे हैं , आपकी जेब हलकी कर रहे हैं और रोज नए फरमान गढ़ रहे हैं ........आखिर माई बाप चुना है आपने उन्हें और देखिये माई बाप तो एक होते हैं , वो बदले थोड़े जाते हैं तो उनकी ज्यादती हो या मेहरबानी सहनी ही होगी .......अब ये क्या कम मेहरबानी है कि इस बार उन्होंने आपको पहले सूचित कर दिया . खुदा न खास्ता पहले की तरह २०००/५०० के नोट बंद करने की सूचना की तरह सूचित करते जब आप आधी होली खेल चुके होते तो भला क्या कर सकते थे आप ........है न मेहरबान .......अब देखो , तुम्हारे घर कोई बीमार पड़े या तुम्हारी ऐसी तैसी ही क्यों न हो रही हो , कुछ दिनों के लिए मरना जीना सब छोड़ देना कम से कम होली तक ........अरे क्या चार छः दिन ऐसा नहीं कर सकते .....बहुत जरूरी कहीं जाना है तो क्या अपनी ग्यारह नंबर की गाडी से नहीं जा सकते क्या हुआ जो १०-२० किलोमीटर पैदल चलना पड़ जाए , क्या हुआ जो कोई बुजुर्ग इसी चलने में दुनिया से ही निकल जाए ,ये तो होता रहा है पहले भी अब भी हो जायेगा तो क्या फर्क पड़ेगा......अब देखो बहुत ही जरूरत हो तो नोट की जगह वो कहते हैं कार्ड का प्रयोग करो तो क्या हुआ जो तुम्हारे पास कार्ड ही न हो , वो तो कब से अलाप लगाए हैं और एक आप हैं कान बंद करे बैठे हैं ........उन्होंने तो सब अगला पिछला सोचकर ही फरमान दिया है ......देखो तुम्हें उनसे पूछने का हक़ नहीं कि विमुद्रीकरण के वक्त आपने कैसे वो नोट भी जनता को दिए जो इतने खस्ताहाल थे कि लंगड़ी टांग भी नहीं खेल सकते थे तो क्या हुआ माई बाप जो ठहरे ........उनके निर्णय पर आप ऊंगली उठाने वाले भला हैं कौन ? तो होली है , रंग हैं , तुम हो , पैसे हैं .......खेलो होली झूम झूम के
रंग डालो घूम घूम के... दुश्मन पर तो ख़ास रंग उड़ाना... इसी बहाने दुश्मनी निभाना ........देखा कितना अच्छा मौका दिया उन्होंने आपको ......तो सरकार को हर बात का दोष न देकर खुद को कटघरे में खडा करो.......ऐसी होली न कभी खेली होगी जब सरकार ने ही जेब ढीली की होगी .........यादों के बखिये खूब उघाड़ो .....कितना चीखो चिंघाडो ..........अब के न पापे तुम बच पाओगे ........सरकार के रंग में ही रंग जाओगे .........तो आपको अपना पैसा प्यारा है कि नहीं , आपको अपना पैसा बचाना चाइये कि नहीं चाइये .........चाइये , चाइये , चाइये ........बस इसीलिए तो फरमान दिया है देखा तुम्हारे भले में ही हमारा भला है ........ये होता है सबका साथ सबका विकास ...........और होली पर होता है ख़ास  .......तो बच्चा लोग ये है सरकारी होली ......बिन रंग पिचकारी सरकार ने खेली :)

बुधवार, 1 मार्च 2017

मेरे फुफकारने भर से

मेरे फुफकारने भर से 
उतर गए तुम्हारी 
तहजीबों के अंतर्वस्त्र 
सोचो 
यदि डंक मार दिया होता तो ?

स्त्री 
सिर्फ प्रतिमानों की कठपुतली नहीं 
एक बित्ते या अंगुल भर नाप नहीं 
कोई खामोश चीत्कार नहीं 
जिसे सुनने के तुम 
सदियों से आदि रहे 
अब ये समझने का मौसम आ गया है 
इसलिए 
पहन लो सारे कवच सुरक्षा के 
क्योंकि 
आ गया है उसे भी भेदना तुम्हारे अहम् की मर्म परतों को…… ओ पुरुष !

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

ये चुके हुए दिनों की दास्ताँ है

ये चुके हुए दिनों की दास्ताँ है

जहाँ चुक चुकी थीं संवेदनाएं
जहाँ चुक चुकी थीं वेदनाएं
जहाँ चुक चुकी थीं अभिलाषाएं
तार्रुफ़ फिर कौन किसका कराये

जहाँ चुक चुके थे शब्द
जहाँ चुक चुके थे भाव
जहाँ चुक चुके थे विचार
उस सफ़र का मानी क्या ?

एक निर्वात में गोते खाता अस्तित्व
किसी चुकी हुई डाल पर बैठे पंछी सा
न कहीं जाने की चाह
न कुछ पाने की चाह
न कोई कुंठा
न कोई दंभ
किसी भभकी हुई सिगड़ी पर
कोई लिख रहा हो प्रेमगीत

न अजान न प्रार्थना न गुरवाणी
समय के दुर्भिक्ष में फँसा
चुकने की कीमत अदा करता
कोई पीर पैगम्बर नहीं
कोई मुर्शिद नहीं
एक आम आदमी था वो

समय अपनी कौड़ियाँ वहीं फेंकता है जहाँ जमीन नम होती है
कि
चुकना समय की जीत का सबसे बड़ा पुरस्कार जो ठहरा 
 
आओ जश्न मनाएं ...

सोमवार, 2 जनवरी 2017

मुझे गुजरना था

मुझे गुजरना था
मैं गुजर गयी
वक्त की नुकीली पगडण्डी से 


तुम्हें ठहरना था
तुम ठहर गए
रेत के ठहरे सागर से 


अब
हाशियों के चरमराते पुलों से
नहीं गुजरती
कोई रेल धडधडाती सी
क्योंकि
सूखे समन्दरों से मोहब्बत के ताजमहल नहीं बना करते ...

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

जाते हुए साल को सलाम

अभी अभी प्राप्त सूचना के अनुसार मनोरमा इयर बुक 2017 में मेरा उपन्यास "अँधेरे का मध्य बिंदु" भी शामिल है जो APN Publication से प्रकाशित है . 2016 की शुरुआत उपन्यास के आगमन से हुई तो जाता हुआ साल मेरी झोली में ये छोटी सी ख़ुशी डाल गया ...खुश होने के लिए छोटी-छोटी वजहें भी काफी होती हैं .....अपने प्रकाशक निर्भय कुमार जी की हार्दिक आभारी हूँ . 





वहीँ  (25-12-2016) जनसत्ता के रविवारीय संस्करण में ‘साहित्य इस बरस’ के अन्तर्गत हिन्दी के सुपरिचित कथाकार एवं आलोचक महेश दर्पण जी ने जिन किताबों का उल्लेख किया, उनमें इस वर्ष मेरा उपन्यास "अँधेरे का मध्य बिंदु" भी शामिल है जो ए पी एन पब्लिकेशन से प्रकाशित है। Mahesh Darpan जी की हार्दिक आभारी हूँ जो उन्होंने उपन्यास को इतना मान दिया :)
चित्र : सुभाष नीरव जी के सौजन्य से उपलब्ध
बड़ा दिन सही में बड़ा हो गया :)

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

देश बदल रहा है ..........

चलिए
देश बदल गया
विकास हो गया
अब और क्या चाहिए भला ?

जो जो आप सबने चाहा
उन्होंने दिया
अब जो भी विरोध करे
देशद्रोही गद्दार की श्रेणी का रुख करे

आइये गुणगान करें
क्योंकि
अच्छे दिन की यही है परिभाषा

आँख पर लगा काला चश्मा प्रतीक है
हमारी निष्ठा और समर्पण का

शुभ है
लाभ है
उसके बाद जो कहा
सब बकवास है

नतमस्तक होना आदत है हमारी
फिर चाहे हर बार रेती जाए गर्दन ही हमारी

चलो
खुश रहो
और उन्हें भी रहने दो
देश बदल रहा है ...........अब मान भी लो 
 
ज़िन्दगी और मौत का खेल तो नियति है

बुधवार, 2 नवंबर 2016

आ जाओ या बुला लो

आ जाओ या बुला लो
इन्ही रूई के फाहों सम
कि
पिघल न जाऊँ
गुजरे वक्त के साथ
फिर तुम आवाज़ दो तो भी आ न सकूँ


कि
यादों के आगोश में
इक बर्फ अब भी पिघलती है
क्या नम नहीं हुईं तुम्हारी हथेलियाँ


यूँ कि ये
बर्फ के गिरने का समय है
या
तुम्हारी यादों का कहर
गोया अनजान तो नहीं होंगी तुम
जानता हूँ मैं


आ जाओ या बुला लो
वक्त के फिसलने से पहले ...


पहली पंक्ति विजय सपत्ति से साभार

बुधवार, 28 सितंबर 2016

दुनिया कभी खाली नहीं होती .........

सोचती हूँ
सहेज दूँ ज़िन्दगी की बची अलमारी में
पूरी ज़िन्दगी का बही खाता
बता दूँ
कहाँ क्या रखा है
किस खाने में कौन सा कीमती सामान है

मेरे अन्दर के पर्स में कुछ रूपये हैं
जो खर्च करने के लिए नहीं हैं
लिफाफों में हैं
निकालती हूँ हमेशा सबके जन्मदिन पर एकमुश्त राशि
करुँगी प्रयोग किसी जरूरतमंद के लिए

ऐसे ही कुछ रूपये
तुम सबकी सैलरी के हैं हरी डिब्बी में
वो भी इसीलिए निकाले हैं
जो किये जा सकें प्रयोग
किसी अनाथाश्रम में या वृद्ध आश्रम में

बाकी तो बता दूँगी तुम्हे लॉकर का नंबर भी
पता है मुझे
नहीं याद होगा तुम्हें
निश्चिन्त रहे हो मुझ पर सब छोड़कर
सुनो
मोह नहीं मुझे उसका भी
जैसे चाहे प्रयोग करना
बच्चों को पसंद आये तो उन्हें देना
न आये तो नए बनवा देना
जब शरीर ही नहीं बचेगा
तो ये तो धातु है , इससे कैसा प्रेम ?

बाकी और कौन सी चाबी कहाँ रखी है
जानते हो तुम
कभी तुम से या बच्चों से कुछ छुपाया जो नहीं
इसलिए बताने को भी ज्यादा कुछ है भी नहीं
तुम सोच रहे होंगे
तुमसे कुछ नहीं कहा
एक उम्र के बाद कहने को कुछ नहीं बचता
दोनों या तो एक दूसरे को इतना समझने लगते हैं
या फिर .....?

फिर भी मेरी यादों के तिलिस्म में मत उलझना
वैसे भी सफ़र कहीं न कहीं ठहरता ही है
उम्र का ढलान गवाह है
और मैंने ऐसा कुछ किया ही नहीं
जिसके लिए याद रखा जाए
विवाह की वेदी पर
साथ रहने को मजबूर कर दिए गए अस्तित्वों में
असंख्य छेदों के सिवा और बचता ही क्या है ?
चलो छोडो ये सब
विदाई की बेला में बस इसे मेरी इल्तिजा समझना
बच्चों पर अपनी इच्छाएं मत थोपना
उन्हें उड़ान भरने देना
कभी जबरदस्ती मत करना
बस कर सको तो इतना कर देना

और हाँ बिटिया
अब जिम्मेदारी तुझ पर होगी
लेकिन
तुम्हीं एक बात समझनी होगी
खुद की ज़िन्दगी से न कोई समझौता करना
वर अपने मन का ही पसंद करना
दबाव और डर से न ग्रस्त होना
मैं नहीं होऊँगी तुम्हारे साथ
तुम्हारे लिए लड़ने को
अपनी लड़ाई तुम्हें खुद लड़नी होगी
अपनी पहचान खुद बनानी होगी
यहाँ आसानी से कुछ नहीं मिलता
जानती हूँ
गिव अप की तुम्हारी आदत को
तुम्हारे बदलने से ही दुनिया बदलेगी 

न को न और हाँ को हाँ समझाना
अब तुम्हारा काम है बच्ची
बेटा
तू भी एक मर्द है
लेकिन
तू नामर्द न बनना
इंसानियत की मिसाल बनना
स्त्री का न अपमान करना
वो भी इंसान है तुम सी ही
बस इतनी सी बात याद रखना
उसके अस्तित्व पर न प्रश्नचिन्ह रखना
जिस दिन जीवन में उतार लोगे
अपनी सोच से दुनिया को बदल दोगे

बाकी
हवा , मिटटी , पानी का क़र्ज़ तो
साँस देकर भी न चुका पाऊँगी
चाहे मिटटी में दबाना या अग्निस्नान कराना
या पानी में बहाना
देखना मिलूंगी मिटटी में ही मिटटी बनकर
फिर खिलूंगी इक फूल बनकर
और बिखर जाऊँगी फिजाओं में खुशबू बनकर
बस हो जाउंगी कर्जमुक्त

बाकी
जो यहाँ से पाया यही छोड़ कर जाना है
अटल सत्य है ये
इसलिए
मेरे सामान में अब मेरी किताबें हैं
जो शायद तुम में से किसी के काम की नहीं
मेरा लेखन है
जिससे तुम सभी उदासीन रहे
तो मत करना परवाह मेरी अनुभूतियों की
कोई मांगे दे देना
खाली हाथ आये खाली जाना है
तो फिर किसलिए दरबार लगाना है
रहना कुछ नहीं
फिर किसलिए इतनी लाग लपेट 

मुक्त हो जाना चाहती हूँ हर बंधन से
और ये भी एक बंधन ही तो है


ये मेरी न वसीयत है न अंतिम इच्छा
जानती हूँ
जाने के बाद कोई वापस नहीं आता
जानती हूँ
कुछ समय रोने के बाद कोई याद नहीं रखता
आगे बढ़ना प्रकृति का नियम है
फिर भी
अंतिम फ़र्ज़ निभाने जरूरी होते हैं
कल याद कभी आऊँ तो
गिले शिकवे से न आऊँ
यही सोच
कह दी मन की बात
वर्ना
मुझसे तो रोज जन्मते और मरते हैं
दुनिया कभी खाली नहीं होती .........

बुधवार, 21 सितंबर 2016

ये कैसा हाहाकार है

ये कैसा हाहाकार है

कुत्ते सियार डोल रहे हैं
गिद्ध माँस नोंच रहे हैं
काली भयावह अंधियारी में
मचती चीख पुकार है
ये कैसा हाहाकार है

चील कौवों की मौज हुई है
तोता मैना सहम गए हैं
बेरहमी का छाया गर्दो गुबार है
ये कैसा हाहाकार है

काल क्षत विक्षत हुआ है
धरती माँ भी सहम गयी है
उसके लालों पर आया 
संकट अपार है
ये कैसा हाहाकार है

अत्याचार का सूर्य उगा है
देख , दिनकर का भी शीश झुका है
दहशतगर्दों ने किया अत्याचार है
ये कैसा हाहाकार है

शेर चीते सो रहे हैं
गीदड़ भभकी से क्यों डर रहे हैं
कैसी चली उल्टी बयार है
ये कैसा हाहाकार है 
 
धरती माँ के उर में उरी का दंश उगा है

बुधवार, 24 अगस्त 2016

मोहब्बत का पीलापन

मेरी मोहब्बत के अश्क
जज़्ब ही हुए
बहने को जरूरी था
तेरी यादों का कारवाँ

लम्हे ख़ामोशी से समझौता किये बैठे हैं
इंतज़ार की कोई धुन होती तो बजाती

इतनी खाली इतनी उदास मोहब्बत
ये मोहब्बत का पीलापन नहीं तो क्या है ?

और ये है मोहब्बत का इनाम
कि
अब तो आह भी नहीं निकलती

मेरी मोहब्बत के रुसवा होने का अंदाज़ ज़माने से कुछ जुदा ही रहा 
फिर उस इश्क का इकतारा कैसे बजाऊँ
जिसके सब तार टूट चुके हों 
 
आमीन कहने को जरूरी है कोई इक दुआ .........