पेज

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लॉग से कोई भी पोस्ट कहीं न लगाई जाये और न ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

मंगलवार, 2 जून 2020

मृत्यु का लॉकडाउन

दो जून की रोटी के लिए
एक जून को खुला देश
और सब आत्मनिर्भर हो गए

इसके बाद न प्रश्न हैं न उत्तर

ये है महिमा तंत्र की
जान सको तो जान लो ...अपनी परतंत्रता
नहीं माने तो क्या होगा ?
छोडो, क्या अब तक कुछ कर पाए ...जाने दो
तुम पेट भरो और मरो
बस यहीं तक है तुम्हारी उपादेयता


तुम्हें जो चाहिए तुम्हें मिला
उन्हें जो चाहिए उन्हें मिला
फिर कैसा गिला?
आप दोनों मिल मनाएं होली और दिवाली
बस संकट मुक्ति के यही हैं अंतिम उपाय


वक्त के हिसाब अब शापमुक्त हैं
दिन और रात अब कोरोनाग्रस्त हैं
और जीवन ...आडम्बरयुक्त
ऐसे देश में और ऐसे परिवेश में
वक्त की नागिनें नहीं डंसा करतीं


राजनीति की चौसर पर
धर्मपरायण शांतिपूर्ण देश में
महामारियां अवसर होती हैं अवसाद नहीं ...


फिर क्यों गाते हो शोकगीत
सब अच्छा है ...डम डम डिगा डिगा
आओ गायें ताल से ताल मिला
करें नृत्य
कि मृत्यु का उत्सव भी ज़िन्दगी की तरह होना चाहिए


तुम कल भी नगण्य थे, आज भी हो और कल भी रहोगे
फिर करो स्वागत निर्णय का
दो जून की रोटी के लिए एक जून को खुले देश का


ये मृत्यु का लॉक डाउन है
चढ़ा लो प्रत्यंचा गांडीव पर
क्योंकि
शिकार भी तुम हो और शिकारी भी
इति महाभारत कथा ...

गुरुवार, 21 मई 2020

कतार का अंतिम आदमी

बेशक
मैं कतार का अंतिम आदमी हूँ
लेकिन सबसे अहम हूँ

मेरे बिना तुम्हारे महल चौबारे नहीं
पूँजी के नंगे नज़ारे नहीं
फिर भी दृष्टि में तुम्हारी नगण्य हूँ

मत भूलो
स्वप्न तुम देखते हो
पूरा मैं करता हूँ
फिर भी मारा मारा
मैं ही यहाँ वहां फिरता हूँ

तुम तभी चैन से सोते हो
जब मैं धूप में तपता हूँ
तुम्हारी ख्वाहिशों का इकबाल बुलंद हो
इस खातिर
अपनी नींदों को रेहन रखता हूँ

भूख, बीमारी, लाचारी मेरे हिस्से आती है
फिर भी न शिकायत करता हूँ
सर्दी गर्मी वर्षा की हर मार मैं ही सहता हूँ
अर्थव्यवस्था के उत्थान में अपना योगदान देता हूँ
फिर न किसी कतार का हिस्सा हूँ
नगण्य ही सही,
फिर भी तुम्हारा हिस्सा हूँ

बुधवार, 20 मई 2020

ज़िन्दगी से एक युद्ध कर रहा हूँ



ज़िन्दगी से एक युद्ध कर रहा हूँ

इंसान होकर इंसान से ही लड़ रहा हूँ


ये किस तूफां से गुजर रहा हूँ

जब नब्ज़ छूटती जा रही है

ज़िन्दगी फिसलती जा रही है

अब भूख से भी इश्क कर रहा हूँ


ज़िन्दगी से एक युद्ध कर रहा हूँ ...


काली रातों की भस्म मल रहा हूँ

उम्मीद के सर्द मौसम से डर रहा हूँ

चिलचिलाती धूप में भी नंगे पाँव चल रहा हूँ

हर गली कूचे शहर में सिर्फ मैं ही मर रहा हूँ

ज़िन्दगी से एक युद्ध कर रहा हूँ ...



वो देखो भूख से लड़ रहा है

ज़िन्दगी से बहस कर रहा है

ज़िन्दगी और भूख आमने सामने हैं

मगर न कोई जीत हार रहा है


ज़िन्दगी से एक युद्ध कर रहा हूँ ...


वक्त के अजीब पेचोखम हैं

किश्त-दर-किश्त ले रहा है

कल आज और कल के मनुज से

एक नया प्रश्न कर रहा है


ज़िन्दगी से एक युद्ध कर रहा हूँ ...

रविवार, 10 मई 2020

विकल्पहीन होती है माँ

विकल्पहीन होती है माँ 
बच्चों की हसरतों के आगे 
भूल जाती है दर्दोगम अपना 
कर देती है खुद को किनारे 
अपनी चाहतों को मारे 
कि 
खुद को मारकर जीना जो सीख चुकी होती है 

तो क्या हुआ 
जो उम्र एक अवसाद बन गयी हो 
और जीवन असरहीन दवा 

ममता का मोल चुकाना ही होता है 
अपनी चाहतों को दबाना ही होता है 
कि
घुट घुटकर जीना ही बचता है जिसके सामने अंतिम विकल्प 
किसे कहे और क्या ? 
कौन समझता है यदि कह भी दे तो ?

ये तकाजों का दौर है 
जिसका जितना बड़ा तकाज़ा 
उसका उतनी जल्दी भुगतान 
मगर माँ 
वो क्या करे ?
कैसे और किससे करे तकाज़ा 
सूखी रेत सा झरना ही जिसकी नियति हो 

तो क्या हुआ 
जो रोती हो सिसकती हो अकेले में 
कि 
जड़त्व के सिद्धांत से वाकिफ है 
इसलिए नहीं चाहती 
विकल्पहीनता उतरे उनके हिस्से में 

जी जाना चाहती है 
अपने बच्चों के हिस्से की भी विकल्पहीनता 
कि 
विकल्प ही होते हैं उम्मीद का नया कोण 

इससे ज्यादा और क्या दे सकती है एक माँ अपने बच्चों को ......


रविवार, 12 अप्रैल 2020

फिर जीने का क्या सबब?


सच ही तो है
मर चुके हैं मेरे सपने
और नए देखने की हिम्मत नहीं
अब बताये कोई वो क्या करे ?
हाँ , गुजर रही हूँ उसी मुकाम से
जहाँ कोई तड़प बची ही नहीं
एक मरघटी सन्नाटा बांह पसारे
लील रहा है मेरी रूह
कैसे पहुँचे कोई मेरे अंतस्थल तक
जबकि वक्त के अंतराल में तो बदल जाती हैं सभ्यताएं

मोहब्बत की भाप से अब
नहीं होती नम
मेरे दिल की जमीं
शून्य से नीचे जमी बर्फ
गवाह है
मेरी आँख के अंधेपन की
जो ठहर गयी है मेरी आँख में
जहाँ तस्वीर हो या घटना
घटती रहे मगर
हर असर से अछूती रहे
जिसमे भावनाओं के उद्वेलन
महज कोरे भ्रम भर हों
एक कटी पतंग सरीखा
हो गया हो अस्तित्व
खुद से खुद का विचलन संयोग नहीं
वर्तमान है ...

ये मेरी शून्यता का आईना ही तो है
जिसमे भरी गयी भावांजलि
एक सुलगती कटार के साथ
ये शब्दों की सुलगती देह
झुलसा तो रही है
मगर राह नहीं दिखा रही मुझे
जो लिपट जाऊं खुद से ही
और चूम लूँ अपनी ही रूह
क्योंकि
रस्मोरिवाज की कठपुतलियाँ इशारों की मोहताज हुआ करती हैं
और मेरी डोर
किसी अदृश्यता में ढूँढ रही है एक तिरछी नज़र

हुक्मरान
आज्ञा दो हुजूर
फतवों की साँसों पर लगे पहरे
घोंट रहे हैं मेरा गला
कि
सपनों की कूच नहीं छोडती निशान भी
फिर जीने का क्या सबब?




गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

खाली बैठी औरतें

सुनिए
अपनी नाराज़गी की पुड़िया बनाइये
और गटक जाइए
गए वो ज़माने
जब कोल्हू के बैल सी जुती दिखाई देती थी
दम भर न जो साँस लेती थी

साहेब
डाल लीजिये आदत अब
हर गली, हर मोड़, हर नुक्कड़ पर
दिख जायेंगी आपको खाली बैठी औरतें

जानते हैं क्यों?
जाग गयी हैं वो
न केवल अपने अधिकारों के प्रति
बल्कि अपने प्रति भी
पहचान चुकी हैं अपना अस्तित्व
और उसकी उपयोगिता भी

आपको अब सिर्फ शाहीन बाग़ ही नहीं
हर घर में मिल जायेंगी
खाली बैठी मौन विद्रोह करती औरतें
इनकी खामोशी की गूँज से
जो थरथरा उठा है आपका सीना
जाहिर कर रहा है
परिवर्तन की बयार ने हिलानी शुरू कर दी हैं चूलें

एक बात और नोट कर लें अपनी नोटबुक में
आने वाले कल में
होगी बागडोर इन्हीं खाली बैठी औरतों के हाथों में
फिर वो आपका घर हो या सत्ता

शायद तब जानें आप
खाली बैठी औरतों की शक्ति को
जब मंगल के सीने पर पैर रख करेंगी यही ब्रह्माण्ड रोधन एक दिन
तब तक सीख लो
अपने गणित के डिब्बे को दुरुस्त करना

आज खाली बैठी औरतों ने बो दिए हैं बीज ख़ामोशी के
प्रतिध्वनियों की टंकार से एक दिन
जरूर काँपेगाआसमां का सीना...जान चुकी हैं वो
ये बात अब तुम भी न सिर्फ जान लो बल्कि मान भी लो ...

इस बार


ये खाली बैठी औरतें खेल रही हैं पिट्ठू
तुम्हारे अहम के पत्थर से
जीत निश्चित है ......

सोमवार, 2 दिसंबर 2019

तुम्हारा स्वागत है

 1
तुम   कहती  हो  
" जीना है मुझे "
मैं कहती हूँ ………… क्यों ?
आखिर क्यों आना चाहती हो दुनिया में ?
 क्या मिलेगा तुम्हे जीकर ?
बचपन से ही बेटी होने के दंश  को सहोगी 
बड़े होकर किसी की निगाहों में चढोगी
तो कहीं तेज़ाब की आग में खद्कोगी
तो कहीं बलात्कार की  त्रासदी सहोगी 
फिर चाहे वो बलात्कार 
घर में हो या बाहर 
पति द्वारा हो या रिश्तेदार द्वारा या अनजान द्वारा 
क्या फर्क पड़ता है या पड़ेगा 
क्योंकि 
शिकार तो तुम हमेशा ही रहोगी 
जरूरी नहीं की निर्वस्त्र करके ही बलात्कार किया जाए 
कभी कभी  जब निगाहें भेदती हैं कोमल अंगों को 
बलात्कृत हो जाती है नारी अस्मिता 
जब कपड़ों के अन्दर का दृश्य भी 
हो जाता है दृश्यमान देखने वाले की कुत्सित निगाह में 
हो जाती है एक लड़की शर्मसार 
इतना ही नहीं कोई फर्क नहीं पड़ता 
तुम बच्ची हो , युवा या प्रौढ़ 
तुम बस एक देह हो सिर्फ देह 
जिसके नहीं होते हाथ, पैर या मन 
होती है तो सिर्फ शल्य चिकित्सा की गयी देह के कामुक अंग 
उनसे इतर तुम कुछ नहीं हो 
क्या है ऐसा जो तुम्हें कुलबुला रहा है 
बाहर आने को प्रेरित  कर रहा है 
क्या मिलेगा तुम्हें यहाँ आकर 
देखो तो ………….
 कितनी निरीह पशु सी 
शिकार हो चुकी हैं न्याय की आस में 
मगर यहाँ न्याय
एक बेबस विधवा के जीवन की अँधेरी गली सा शापित खड़ा है 
कहीं नाबलिगता की आड़ में तो कहीं संशोधनों के जाल में 
मगर स्वयं निर्णय लेने में कितना सक्षम है 
ये आंकड़े बताते हैं 
कि न्याय की आस में वक्त करवट बदलता है 
मगर न्याय का त्रिशूल तो सिर्फ पीड़ित को ही लगता है 
हो जाती है वो फिर बार- बार बलात्कृत 
कभी क़ानून के रक्षक द्वारा कटघरे में खड़े होकर 
तो कभी किसी रिपोर्टर द्वारा अपनी टी आर पी के लिए कुरेदे जाने पर 
तो कभी गली कूचे में निकलने पर 
कभी निगाह में हेयता तो कभी सहानुभूति देखकर 
तो कभी खुदी  पर दोषारोपण होता देखकर 
अब बताओ तो ज़रा ………… क्या आना चाहोगी इस हाल में 
क्या जी सकोगी विषाक्त वातावरण में 
ले सकोगी आज़ादी की साँस 
गर कर सको ऐसा तो आना इस जहान में ……………तुम्हारा स्वागत है 

2
तुम कहती हो 
दुनिया  बहुत सुन्दर है 
देखना चाहती हो तुम 
जीना चाहती हो तुम 
हाँ सुन्दर है मगर तभी तक 
जब तक तुम " हाँ " की दहलीज पर बैठी हो 
जिस दिन " ना " कहना सीख लिया 
पुरुष का अहम् आहत हो जाएगा 
और तुम्हारा जीना दुश्वार 
तुम कहोगी …………क्यों डरा रही हूँ 
क्या सारी दुनिया में सारी स्त्रियों पर 
होता है ऐसा अत्याचार 
क्या स्त्री को कोई सुख कभी नहीं मिलता 
क्या स्त्री का अपना कोई वजूद नहीं होता 
क्या हर स्त्री इन्ही गलियारों से गुजरती है 
तो सुनो ……………एक कडवा सत्य 
हाँ ……………एक हद तक ये सच है 
कभी न कभी , किसी न किसी रूप में 
होता है उसका बलात्कार 
कभी  इच्छाओं का तो कभी उसकी चाहतों का 
तो कभी उसकी अस्मिता का 
होता है उस पर अत्याचार 
यूं ही नहीं कुछ स्त्रियों ने आकाश पर परचम लहराया है 
बेशक उनका कुछ दबंगपना  काम आया है 
मगर सोचना ज़रा ……ऐसी  कितनी होंगी 
जिनके हाथों में कुदालें होंगी 
जिन्होंने खोदा होगा धरती का सीना 
सिर्फ मुट्ठी भर …………… एक सब्जबाग है ये 
नारी मुक्ति या नारी विमर्श 
फिर चाहे विज्ञापन की मल्लिका बनो 
या ऑफिस में  काम  करने वाली सहकर्मी 
या कोई जानी मानी हस्ती 
सबके लिए महज  सिर्फ देह भर हो तुम 
फिर चाहे उसका मानसिक शोषण हो या शारीरिक 
दोहन के लिए गर तैयार हो 
प्रोडक्ट के रूप में प्रयोग होने को गर तैयार हो 
अपनी सोच को गिरवीं रखने को गर तैयार हो 
तो आना इस दुनिया में ………… तुम्हारा स्वागत है 

3
अभी जमीन उर्वर नहीं है 
महज ढकोसलों और दिखावों की भेंट चढ़ी है 
दो शब्द कह देना भर नहीं होता नारी विमर्श 
आन्दोलन  करना भर नहीं होता नारी मुक्ति 
नारी की मुक्ति के लिए नारी को  करना होता है 
जड़वादी ,   रूढ़िवादी सोच से खुद को मुक्त 
मगर अभी  जमीन उर्वर नहीं है 
अभी नहीं डाली गयी है इसमें उचित मात्र में खाद ,बीज और पानी 
फिर कैसे बहे बदलाव की बयार 
कैसे पाए नारी अपना सम्मान 
अभी संभव नहीं हवाओं के रुख का बदलना 
जानती हो क्यों ………… क्योंकि 
यहाँ है जंगलराज ……… न कोई डर है ना कानून 
चोर के हाथ में ही है तिजोरी की चाबी 
ऐसे में किस किस से और कब तक खुद को बचाओगी
कैसे इस माहौल में जी पाओगी 
ये सब सोच लेना तब आना इस दुनिया में ………… तुम्हारा स्वागत है 

4
और सुनो सबसे बडा सच 
नहीं हुयी मैं इतनी सक्षम 
जो बचा सकूँ तुम्हें 
हर विकृत सोच और निगाह से 
नहीं आयी मुझमें अभी वो योग्यता 
नहीं है इतना साहस जो बदल सकूँ 
इतिहास के पन्नों पर लिखी इबारतें 
पितृसत्तात्मक समाज के चेहरे से 
सिर्फ़ कहानियों , कविताओं ,आलेखों या मंच पर 
बोलना भर सीखा है मैनें 
मगर नहीं बदली है इक सभ्यता अभी मुझमें ही 
फिर कैसे तुम्हें आने को करूँ प्रोत्साहित 
कैसे करूँ तुम्हारा खुले दिल से स्वागत 
जब अब तक खुद को ही नहीं दे सकी तसल्लियों के शिखर 
जब अब तक खुद को नहीं कर सकी अपनी निगाह में स्थापित 
बन के रही हूँ अब तक सिर्फ़ और सिर्फ़ 
पुरुषवादी सोच और उसके हाथ का महज एक खिलौना भर 
फिर भी यदि तुम समझती हो 
तुम बदल सकती हो इतिहास के घिनौने अक्षर 
मगर मुझसे कोई उम्मीद की किरण ना रखना 
गर कर सको ऐसा तब आना इस दुनिया में ……तुम्हारा स्वागत है 


ये वो तस्वीर है  
वो कडवा सच है 
आज की दुनिया का 
जिसमें आने को तुम आतुर हो 
और कहती हो 
" जीना है मुझे " 


गुरुवार, 28 नवंबर 2019

दहल उठा है आसमां..

जाने किस मोड़ पर छोड़ आयी
आँसू, आहें और दर्द
अब जिद की नोक पर कर रही है नृत्य
प्रज्ञा उसकी
तुम्हारी भौंहों के टेढ़ेपन को बनाकर जमीन

यूँ ही चलते फिरते खींच रही है वो अपनी लकीर
न तुमसे छोटी और न ही तुमसे बड़ी

जाने क्यों गुनगुनाहट के घुंघरुओं से दहल उठा है आसमां...

सोमवार, 2 सितंबर 2019

आ अब लौट चलें

इस दौड़ती भागती दुनिया में
समय की धुरी पर ठहरा मन मेरा
कहता है
आ अब लौट चलें
एक बार फिर उसी दौर में
जहाँ पंछियों से रोज मुलाकात हो
मेरे आँगन में रोज उनकी आमद हो

मैं सितार सी बजती फिरूँ
उमंगों का संगीत रूह में बजता रहे
मन की अलंगनी पर
इक ख्वाब रोज नया सजता रहे

वो गली चौराहों पर
अपनेपन के ठहाके गूंजते मिलें
शहर शहर से गले मिल
किलकारियों से सजते मिलें
धर्म जाति से परे
भाईचारे के घुंघरू बजते मिलें

आमीन कहने की न दरकार रहे
यूँ आईनों के चेहरे शफ्फाक रहें
युद्ध के कान खींचकर
शांति बस यही कहे
आ अब लौट चलें
समय की धुरी पर इक नयी रौशन सभ्यता नर्तन करे


मंगलवार, 18 जून 2019

हम शर्मिंदा हैं


मरे हुए लोग हाय हाय नहीं करते
मरे हुए लोगों की कोई आवाज़ नहीं होती
मरे हुए लोगों की कोई कम्युनिटी नहीं होती
जो कोशिशों के परचम लहराए
और हरी भरी हो जाए धरा मनोनुकूल

आइये हम अपने लिए शांति पाठ करें
यूँ कहकर
हम शर्मिंदा हैं कि हम मर चुके हैं
बच्चों हम से कोई उम्मीद मत रखना
हम बस तुम्हारे लिए नहीं
स्वयं के लिए
स्वयं को साबित करने के लिए
दो शब्द लिखने को जिंदा होते हैं
और फिर मर जाते हैं

हम भूल चुके हैं
जब एक बच्चा मरता है
तब लाखों उम्मीदें मरती हैं
और करोड़ों संभावनाएं
मरे हुए लोगों को नहीं होता सरोकार किसी जीवित से
फिर एक मरे या सौ

मरना हमारे समय का सबसे सुभीता शब्द है
आइये मरने को राष्ट्रीय शब्द घोषित करें

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

मैं बस इक जलता अलाव हूँ

न जाने किस पर गुस्सा हूँ
न जाने क्यों उदास हूँ
खोज के बिंदु चुक गए
मौसम सारे रुक गए
फिर किस चाह की आस में हूँ

जब कोई कहीं नहीं
अपना पराया भी नहीं
मृग तृष्णा की किस फाँस में हूँ
किस जीवन की तलाश में हूँ
यूँ लगता है कभी कभी
मैं बस इक जलता अलाव हूँ

किसी दिशा का भान नहीं
अब बचा कोई ज्ञान नहीं
जब जीवन रीता बीत गया
सुख दुःख का भान छूट गया
और तरकश सारा खाली हुआ


तब सोचूँ ये किस पड़ाव में हूँ

सोमवार, 5 नवंबर 2018

तुम खुदा नहीं हो

मैं सो रहा था
मुझे सोने देते
चैन तो था

अब न सो पाऊंगा
और न जागा रह पाऊँगा
मझधार में जैसे हो नैया कोई
एक विशालकाय प्रेत की मानिंद
हो गया हूँ अभिशप्त
तुम्हारी बनायीं मरुभूमि में

शापित बना दिया
नहीं सोचा तुमने
अपनी महत्वाकांक्षा से ऊपर
अब झेलना है मुझे
शीत ताप और बरसात
यूँ ही सदियों तक

निर्जन में भटकता
अँधेरे से लड़ता
खड़ा हूँ निसहाय
संभव नहीं अब मुक्ति
जानता हूँ

पढ़ सको तो पढना कभी
मेरी आँखें, उनकी ख़ामोशी, उनका दर्द
जिनमें ठहर गया है पतझड़ किसी बनवास सा

देख सको तो देखना मेरा चेहरा
जिस पर वेदना का संगीत फूट रहा है
और तुम उसे बना रहे हो अपना सुगम संगीत

झाँक सको तो झांकना मेरे ह्रदय में
जिसमें तिल तिल मरता देश पूछ रहा है प्रश्न
क्या औचित्य है इस गगंचुम्बियता का
जब एक तरफ जल रही हैं श्वांसें
जब फिर टुकड़ों में बाँट रहा है देश
जब सब अपना मजहब ढूंढ रहे हैं
सब अपनी जाति पूछ रहे हैं
अबलाओं की कातर पुकार छिन्न भिन्न कर रही है
सभ्यता की अंतड़ियाँ
क्या जवाब दूं भाई .......बताओ तो जरा

सुनो कर्ज सर पर रख कर
महल नहीं बनाए जाते
छद्म राग नहीं सुनाये जाते
आडम्बर के ढोल नहीं बजवाये जाते
मगर जानता हूँ
तुम न सुनोगे
न समझोगे
न देखोगे
अहंकार के रथ पर सवार रथी को
नहीं दिखाई देती विनाशलीला
कुछ कहना बेमानी है

अच्छा सुनो
तुमने सब कुछ तो मनचाहा कर दिया
एक काम और कर देते
और कुछ नहीं तो
मेरी पीड़ा का ख्याल ही कर लेते
एक विशालकाय छतरी तो और बनवा देते
जिस पर सीधे लैंड कर जाता तुम्हारा प्लेन
तो इतिहास में थोडा और दर्ज हो जाते
इसके साथ
शायद हो जाता बचाव कुछ तो
तुम्हारी बनायीं इस महत्वाकांक्षा का
पंछियों की बीट से, आंधी धूल और मिटटी से

मेरा क्या है
मुझे तो चढ़ा ही दिया तुमने सलीब पर
पीड़ा ही मेरा प्रायश्चित है अब शायद

आह ! नहीं जानता था
एक नयी लकीर खींचने से ज्यादा जरूरी है
वर्तमान को इतिहास से साफ़ करना

खुदा खैर करे
मैं और मेरा बीहड़
अब मोहताज हैं तुम्हारे हाथ की जुम्बिश के

मगर जान लो एक सत्य
तुम खुदा नहीं हो !!!