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गुरुवार, 21 मई 2020

कतार का अंतिम आदमी

बेशक
मैं कतार का अंतिम आदमी हूँ
लेकिन सबसे अहम हूँ

मेरे बिना तुम्हारे महल चौबारे नहीं
पूँजी के नंगे नज़ारे नहीं
फिर भी दृष्टि में तुम्हारी नगण्य हूँ

मत भूलो
स्वप्न तुम देखते हो
पूरा मैं करता हूँ
फिर भी मारा मारा
मैं ही यहाँ वहां फिरता हूँ

तुम तभी चैन से सोते हो
जब मैं धूप में तपता हूँ
तुम्हारी ख्वाहिशों का इकबाल बुलंद हो
इस खातिर
अपनी नींदों को रेहन रखता हूँ

भूख, बीमारी, लाचारी मेरे हिस्से आती है
फिर भी न शिकायत करता हूँ
सर्दी गर्मी वर्षा की हर मार मैं ही सहता हूँ
अर्थव्यवस्था के उत्थान में अपना योगदान देता हूँ
फिर न किसी कतार का हिस्सा हूँ
नगण्य ही सही,
फिर भी तुम्हारा हिस्सा हूँ

7 टिप्‍पणियां:

Enoxo ने कहा…

स्वप्न तुम देखते हो
पूरा मैं करता हूँ
फिर भी मारा मारा
मैं ही यहाँ वहां फिरता हूँ

हृदयस्पर्शी रचना बहुत ही सुंदर

Enoxo multimedia
Eksacchai

Jyoti Singh ने कहा…

बेशक
मैं कतार का अंतिम आदमी हूँ
लेकिन सबसे अहम हूँ

मेरे बिना तुम्हारे महल चौबारे नहीं
पूँजी के नंगे नज़ारे नहीं
फिर भी दृष्टि में तुम्हारी नगण्य हूँ

मत भूलो
स्वप्न तुम देखते हो
पूरा मैं करता हूँ
फिर भी मारा मारा
मैं ही यहाँ वहां फिरता हूँ
अति उत्तम ,बहुत ही सुंदर कविता ,नमस्कार

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

कटु यथार्थ !

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

श्रमिकों को अपना हिस्सा माना ही नहीं जा रहा है, तभी तो आज यह हाल है कि सैकड़ों जाने चली गईं. सच है, इनके ही बल पर हम सभी जीते है. बहुत प्रभावपूर्ण रचना.

Anita ने कहा…

कतार के अंतिम आदमी को देख कर भी अनदेखा किया जाता रहा है

sunita shanoo ने कहा…

बिल्कुल सही कहा

Multi creation(Dr vasu deo yadav) ने कहा…

Bahut sundar