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मंगलवार, 22 सितंबर 2015

आओ जश्न मनाएं

 
 
थोडा सा रूमानी होने को जरूरी थी
एक वाकफियत दिल की दिल से
और अब जब
किस्सों सी किश्तों में सिसकती रही मोहब्बत
तुमने डाल दी अपनी हसरतों की चादर

यूँ भरमाने के दौर तो नहीं थे
फिर भी हमने खुद को भरमा लिया
सोच , शायद मिल जाए मुझे मेरे हिस्से की दौलत

मगर किस्से कहानियों के
कब किसने तर्जुमे किये हैं
और कालखंड की
किसने सिसकारी सुनी है
जानते हुए भी
रूमानियत को जिंदा रखने को भरा है मैंने मोहब्बत का खामोश घूँट

जिस्म , न नीला पड़ा न पीला और न ही सफ़ेद
देख , रूमानियत के अहसास का असर
गुलाबों की खेती से सुर्खरू है राख भी मेरी

ये प्रेम की अद्यतन ख़ामोशी है 
आओ जश्न मनाएं

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

पखवारे भर का खेल


आज के हमारा मेट्रो में प्रकाशित आलेख :


चलिए एक बार फिर कर लें कोरम पूरा आखिर यही तो है औचित्य . इससे आगे न राह है न मंजिल . सिर नवाओ और आगे बढ़ जाओ यहीं तक हैं हमारी चिंताएं .

 चिंतित होना हमारा स्वभाव जो ठहरा तो कैसे गरियाए बिना रह जायेंगे . हर बार की तरह इस बार फिर मौका हाथ लगा है तो क्यों पीछे रहें , क्यों न बहती गंगा में हाथ क्या पूरी तरह नहा - धो हम भी पवित्र हो जाएँ . आखिर हम ही तो हैं खैरख्वाह और खुद को खैरख्वाह सिद्ध करने का इससे बढ़कर भला और क्या उपाय होगा जहाँ हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा आ जाए .

एक दिन या है फिर तो वो ही आम दिन आम बातें हैं तो मौका भी है और दस्तूर भी इसलिए हो जाते हैं सभी स्यापा पीटने को तैयार अपने दल बल के साथ . जो जितना जोर से स्यापा पीटेगा उतना ही उस पर ध्यान जाएगा तो खैरख्वाह खुद ही सिद्ध  हो जाएगा और इसके लिए करना ही क्या है जहाँ भी किसी को कोई भी अंग्रेजी शब्द कहते देखो वहीँ फटकारना शुरू कर दो , " आज तुम्हारी ही वजह से ये हाल है हिंदी का , कैसे गिटर पिटर विदेशी भाषा में करते हो लेकिन अपनी ही भाषा से मुंह फेरकर कौन सा महान काम करते हो , भले आदमी अपनी भाषा का सम्मान करना सीख वर्ना ........ निष्कासित कर दिए जाओगे हमारे समाज से , हम तुम्हें चैन से रहने नहीं देंगे , तुम्हारा वो मखौल उड़ायेंगे कि साँस भी लोगे तो हिंदी में ही लोगे फिर ज़िन्दगी भर " . बस फिर देखो कैसे तुम ही हिंदी के महान शुभचिंतकों में गिने जाओगे फिर चाहे तुम्हारे घर में हिंदी के नाम से ही बीवी बच्चे नाक भौं सिकोड़ते हों या फिर तुम्हारे घर की कामवाली बाई भी अंग्रेजी में ही बात क्यों न करती हो . कौन जांच पड़ताल करने जायेगा भला ? मगर तुम्हारी तो निकल ही पड़ेगी न .........तुमसा शुभचिंतक पा आस पड़ोस हो या दफ्तर या साहित्य सब धन्य हो जायेंगे . आखिर कोई तो है जो हिंदी के बारे में सोचता है .........

दो चार विचार गोष्ठियां कर लो , दो चार आलेख अख़बारों आदि में छपवा दो , दो चार आन्दोलन कर लो ,बस इसी में निकल जाएगा पखवारा उसके बाद तू कौन मैं कौन . सब अपनी अपनी राह पकड़ लेंगे मगर उससे पहले तुम जरूर सबकी निगाह में आ जाओगे और अपना एक मुकाम पा जाओगे . हिंदी के महान खैरख्वाह सिद्ध हो जाओगे .

बस इतना भर ही तो है औचित्य हिंदी दिवस कहो या हिंदी पखवारे का , कौन सा तुम्हारे शोर मचाने से सत्ता बदलेगी या सोच . कौन से हर सरकारी काम हिंदी में होने लगेगा , कौन सा तुम्हारे कहने से प्रधानमंत्री हो या विदेश मंत्री या राष्ट्रपति हिंदी में बात करने लगेगा और दुभाषिये का प्रयोग करेंगे विदेशों में या फिर कौन सा वो हिंदी को संसार की भाषा बनाने के लिए संकल्प ले एक अभियान छेड़ देंगे क्योंकि जब अपने देश में ही सर्वमान्य नहीं है तो और किससे और क्या उम्मीद की जा सकती है , अपने देश में ही अलग अलग प्रान्त की अलग अलग भाषा है वहां भी हिंदी ऑप्शनल है तो कैसे संभव है तस्वीर का रुख पलटना वर्ना उनका वोट बैंक खतरे में न आ जाएगा , ऐसे निर्णय सोच समझकर लिए जाते हैं भावनाओं में बहकर नहीं तभी अभी तक हिंदी राजभाषा है राष्ट्रभाषा नही .........यहाँ न कुछ बदला है न बदलेगा . बस स्यापा करने वालों का नाम जरूर रौशन हो जाएगा और फिर अगले बरस तक के लिए विराम लग जाएगा .

ये तो नफीरी ढोल ताशे बजा हिंदी को बचाने का मौसम आया है
जिसके बाद तो बस पतझड़ का साया ही उसके हिस्से आया है

सोमवार, 7 सितंबर 2015

अच्छे से जानते हैं वो ..........

सूखे खेत चिंघाड़ते ही हैं
निर्विवाद सत्य है ये
फिर क्यों शोर मचा रही हैं
आकाश में चिरैयायें

यहाँ चौपायों पर चला करती हैं सत्ताएं
साम दाम दंड भेद की तरह
फिर क्यों हलाक हुई जा रही हो
क्या होगा आन्दोलन से
जब तक तुममे सच से आँख मिलाने की सामर्थ्य न हो

कथनी और करनी में फर्क है तुम्हारी
तुम सिर्फ शोर के उस तरफ बजाती हो बांसुरी
ताकि घायल भी न हो और बिगुल भी बजे
जबकि सत्य ये है कि
छाती पर वार झेलने वालों को ही मिला करते हैं तमगे

फिर क्यों बेवजह
ये शोर के बिगुल बजा मचा रखा है आसमां में हल्ला

किंचित फ़िक्र नहीं है तुम्हारी किसी को
क्योंकि
वो जानते हैं कैसे किये जाते हैं आन्दोलन निरस्त
अनुभवी हैं
और तुमने तो अभी रखा ही है कदम चारागाह में

मत जोड़ना इस उद्बोधन को किसी खास घटनाक्रम से
क्योंकि
देश का कोई कोना हो
या राजनीति का अघोषित युद्ध हो
या अभिव्यक्ति पर प्रहार हो
या फिर साहित्य का बिछावन हो
एक अराजकता ने लील लिया है यहाँ सभी का विवेक

सिर्फ चिमटे बजाने से नहीं पलटा करती हैं यहाँ सत्ताएं
जरा सा हुश करने भर से
जो उड़ जाया करती हैं
उनका शोर महज भोर का शोर भर ही सिद्ध हुआ करता है
अच्छे से जानते हैं वो ............

ये महज बौद्धिक विलाप के सिवा और कुछ नहीं है !!!

बुधवार, 2 सितंबर 2015

मेरा इश्क थोडा नकचढ़ा है ......

मुझे रूठने की
और तुम्हें मनाने की
आदत रही ता - उम्र

जानते हो न
जो मज़ा रूठने में होता है
वो मनाने में कहाँ

मैं तो बस
चुस्की भरती रही
बर्फ के गोले सी
और बूँद बूँद स्वाद चखती रही
कभी तीखा तो कभी फीका
कभी मीठा तो कभी नमकीन

और तुम
कोशिशों के तमाम पुल चढ़ते रहे
और मैं
उन कोशिशों की डोर
कभी ढीली छोडती रही
तो कभी खींचती रही
यूं ज़िन्दगी निकलती रही

मगर सोचती हूँ अब
अगर उल्टा होता तो
क्या मैं डाल सकती थी
इसी तरह इश्क की नाक में नकेल
क्योंकि
मेरा इश्क थोडा नकचढ़ा है ......