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रविवार, 18 जून 2017

ब्रह्म वाक्य


दुःख दर्द आंसू आहें पुकार
सब गए बेकार
न खुदी बुलंद हुई
न खुदा ही मिला
ज़िन्दगी को न कोई सिला मिला 


यहाँ
रब एक सम्मोहन है
और ज़िन्दगी एक पिंजर
और तू
महज साँस लेती
भावनाओं से जकड़ी एक बदबूदार लाश 


ये जानते हुए
कि यहाँ कोई नहीं तेरा
चल फकीरा उठा अपना डेरा
और गुनगुनाता रह ज़िन्दगी के हर मोड़ पर
ये ब्रह्म वाक्य 


यहाँ मैं अजनबी हूँ ...मैं जो हूँ बस वही हूँ

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ये पोस्ट पूर्णतया कॉपीराइट प्रोटेक्टेड है, ये किसी भी अन्य लेख या बौद्धिक संम्पति की नकल नहीं है।
इस पोस्ट या इसका कोई भी भाग बिना लेखक की लिखित अनुमति के शेयर, नकल, चित्र रूप या इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रयोग करने का अधिकार किसी को नहीं है, अगर ऐसा किया जाता है निर्धारित क़ानूनों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
©वन्दना गुप्ता vandana gupta

मंगलवार, 13 जून 2017

ये जानते हुए कि ...

ये जानते हुए
कि
नहीं मिला करतीं खुशियाँ यहाँ
चाँदी के कटोरदान में सहेज कर
जाने क्यों
दौड़ता है मनवा उसी मोड़ पर

ये जानते हुए
कि
सब झूठ है, भरम है
ज़िन्दगी इक हसीं सितम है
जाने क्यों
भरम के पर्दों से ही होती है मोहब्बत

ये जानते हुए
कि
वक्त की करवट से बदलता है मौसम
और ज़िन्दगी क्षणभंगुर ही सही
जाने क्यों
ज़िन्दगी से ही इश्क होता है यहाँ

सिफ़र से शुरू सफ़र सिफ़र पर ही ख़त्म होता है जहाँ
फिर किस पाहुन की पहुनाई करूँ यहाँ ??


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©वन्दना गुप्ता vandana gupta

सोमवार, 5 जून 2017

विकास लील गया मेरी पीठ


मत ढूँढो छाँव के चौबारे
तुम ने ही तो उतारे वस्त्र हमारे
अब नहीं जन सकती जननी
बची नहीं उसमे शक्ति
पौधारोपण को जरूरी है बीज
और तुमने किया मुझे निस्तेज
बंजर भूमि में गुलाब नहीं उगा करते

जाओ ओढ़ो और बिछाओ
अब अपने विकास की मखमली चादरें
कि
कीमत तो हर चीज की होती है
फिर वो खोटा सिक्का ही क्यों न हो
फिर मैं तो तुम्हारे जीवन का अवलंब था
मगर
विकास की राह का सबसे बड़ा रोड़ा

खदेड़ दिया तुमने
कर लिया शहरीकरण
फिर क्यों बिलबिलाती हैं तुम्हारी अंतड़ियाँ
जो बोया है वही तो काटोगे
क्योंकि
'वृक्ष ही जीवन हैं' के स्लोगन को
कर दिया तुमने विस्थापित अपनी आकांक्षाओं से
तो अब क्यूँ कर रहे हो तर्जुमा
मेरी पीठ पर उगी विकास की खरपतवार का

अब कितनी दवा दारू करना
विकास के चश्मे से
नहीं किया जा सकता अहिल्या उद्धार
विश्व पर्यावरण दिवस पर
तुम्हारा विधवा विलाप
नहीं दे सकता मुझे मेरी खोयी आकृति
क्योंकि
विकास लील गया मेरी पीठ

(विश्व पर्यावरण दिवस)


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©वन्दना गुप्ता vandana gupta 
 

शुक्रवार, 2 जून 2017

दिल हूम हूम करे ......

तुम मेरे सपनो के
आखिरी विकल्प थे शायद
जिसे टूटना ही था
हर हाल में

क्योंकि
मुस्कुराहट के क़र्ज़ मुल्तवी नहीं किये जाते
क्योंकि
उधार की सुबहों से रब ख़रीदे नहीं जाते

एक बार फिर
उसी मोड़ पर हूँ
दिशाहीन ...

चलो गुरबानी पढो
कि
यही है वक्त का तक़ाज़ा
कहा उसने

और मैंने
सारे पन्ने कोरे कर लिए
और तोड़ दी कलम
कि
फिर से न कोई मुर्शिद
लिख दे कोई नयी आयत

दिल हूम हूम करे ......'


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