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सोमवार, 5 जून 2017

विकास लील गया मेरी पीठ


मत ढूँढो छाँव के चौबारे
तुम ने ही तो उतारे वस्त्र हमारे
अब नहीं जन सकती जननी
बची नहीं उसमे शक्ति
पौधारोपण को जरूरी है बीज
और तुमने किया मुझे निस्तेज
बंजर भूमि में गुलाब नहीं उगा करते

जाओ ओढ़ो और बिछाओ
अब अपने विकास की मखमली चादरें
कि
कीमत तो हर चीज की होती है
फिर वो खोटा सिक्का ही क्यों न हो
फिर मैं तो तुम्हारे जीवन का अवलंब था
मगर
विकास की राह का सबसे बड़ा रोड़ा

खदेड़ दिया तुमने
कर लिया शहरीकरण
फिर क्यों बिलबिलाती हैं तुम्हारी अंतड़ियाँ
जो बोया है वही तो काटोगे
क्योंकि
'वृक्ष ही जीवन हैं' के स्लोगन को
कर दिया तुमने विस्थापित अपनी आकांक्षाओं से
तो अब क्यूँ कर रहे हो तर्जुमा
मेरी पीठ पर उगी विकास की खरपतवार का

अब कितनी दवा दारू करना
विकास के चश्मे से
नहीं किया जा सकता अहिल्या उद्धार
विश्व पर्यावरण दिवस पर
तुम्हारा विधवा विलाप
नहीं दे सकता मुझे मेरी खोयी आकृति
क्योंकि
विकास लील गया मेरी पीठ

(विश्व पर्यावरण दिवस)


डिसक्लेमर
ये पोस्ट पूर्णतया कॉपीराइट प्रोटेक्टेड है, ये किसी भी अन्य लेख या बौद्धिक संम्पति की नकल नहीं है।
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©वन्दना गुप्ता vandana gupta 
 

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (06-06-2017) को
रविकर शिक्षा में नकल, देगा मिटा वजूद-चर्चामंच 2541
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

बहुत बढ़िया