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शुक्रवार, 2 जून 2017

दिल हूम हूम करे ......

तुम मेरे सपनो के
आखिरी विकल्प थे शायद
जिसे टूटना ही था
हर हाल में

क्योंकि
मुस्कुराहट के क़र्ज़ मुल्तवी नहीं किये जाते
क्योंकि
उधार की सुबहों से रब ख़रीदे नहीं जाते

एक बार फिर
उसी मोड़ पर हूँ
दिशाहीन ...

चलो गुरबानी पढो
कि
यही है वक्त का तक़ाज़ा
कहा उसने

और मैंने
सारे पन्ने कोरे कर लिए
और तोड़ दी कलम
कि
फिर से न कोई मुर्शिद
लिख दे कोई नयी आयत

दिल हूम हूम करे ......

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