पेज

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

मंगलवार, 30 मई 2017

और देखो मेरा पागलपन

वो कह गए
"कल मिलते हैं "
मगर किसने देखा है कल
शायद कशिश ही नहीं रही कोई
जो ठहर जाता , जाता हुआ हवा का झोंका
या रही ही नहीं वो बात अब प्रेम में हमारे
जो रोक लेती सूरज को अस्ताचल में जाने से
या फिर बन गए हैं नदी के दो पाट
अपने अपने किनारों में सिमटे
तभी तो आज नहीं हुआ असर
मेरी सरगोशियों में
मेरी सर्द आवाज़ में
मेरी ज़र्द रूह में
जो बन जाती तुम्हारे पाँव की बेडी
जब मैंने कहा
थोड़ी देर और रुक जाओ
शायद तुम जान ही नहीं पाए
कितनी अकेली थी मैं उन लम्हों में
तुम्हारे साथ होते हुए भी ...........
ये मोहब्बत की दुनिया इतनी छोटी क्यों होती है ......जानां ?


और देखो मेरा पागलपन
मैंने तो आज की आस की देहरी पर ही उम्र बसर करने की ठान ली है .........

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज गुरूवार (01-06-2017) को
"देखो मेरा पागलपन" (चर्चा अंक-2637)
पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'