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बुधवार, 7 नवंबर 2012

क्रांति के बीज यूँ ही नहीं पोषित होते हैं

जिसने भी लीक से हटकर लिखा

परम्पराओं मान्यताओं को तोडा

पहले तो उसका दोहन ही हुआ

हर पग पर वो तिरस्कृत ही हुआ

उसके दृष्टिकोण को ना कभी समझा गया

नहीं जानना चाहा क्यूँ वो ऐसा करता है

क्यूँ नहीं मानता वो किसी अनदेखे वजूद को

क्यूँ करता है वो विद्रोह

परम्पराओं का

धार्मिक ग्रंथों का

या सामाजिक मान्यताओं का

कौन सा कीड़ा कुलबुला रहा है

उसके ज़ेहन में

किस बिच्छू के दंश से

वो पीड़ित है

कौन सी सामाजिक कुरीति

से वो त्रस्त है

किस आडम्बर ने उसका

व्यक्तित्व बदला

किस ढोंग ने उसे

प्रतिकार को विवश किया

यूँ ही कोई नहीं उठाता

तलवार हाथ में

यूँ नहीं करता कोई वार

किसी पर

यूँ ही नहीं चलती कलम

किसी के विरोध में

यूँ ही प्रतिशोध नहीं

सुलगता किसी भी ह्रदय में

ये समाज  में

रीतियों के नाम पर

होते ढकोसलों ने ही

उसे बनाया विद्रोही

आखिर कब तक

मूक दर्शक बन

भावनाओं का बलात्कार होने दे

आखिर कब तक नहीं वो

खोखली वर्जनाओं को तोड़े

जिसे देखा नहीं

जिसे जाना नहीं

कैसे उसके अस्तित्व को स्वीकारे

और यदि स्वीकार भी ले

तो क्या जरूरी है जैसा कहा गया है

वैसा मान भी ले

उसे अपने विवेक की तराजू पर ना तोले

कैसे रूढ़िवादी कुरीतियों के नाम पर

समाज को , उसके अंगों को

होम होने दे

किसी को तो जागना होगा

किसी को तो विष पीना होगा

यूँ ही कोई शंकर नहीं बनता

किसी को तो कलम उठानी होगी

फिर चाहे वार तलवार से भी गहरा क्यूँ ना हो

समय की मांग बनना होगा

हर वर्जना को बदलना होगा

आज के परिवेश को समझना होगा

चाहे इसके लिए उसे

खुद को ही क्यूँ ना भस्मीभूत करना पड़े

क्यूँ ना विद्रोह की आग लगानी पड़े

क्यूँ ना एक बीज बोना पड़े

जन चेतना , जन जाग्रति का

ताकि आने वाली पीढियां ना

रूढ़ियों का शिकार बने

बेशक आज उसके शब्दों को

कोई ना समझे

बेशक आज ना उसे कोई

मान मिले

क्यूँकि जानता है वो

जाने के बाद ही दुनिया याद करती है

और उसके लिखे के

अपने अपने अर्थ गढ़ती है

नयी नयी समीक्षाएं होती हैं

नए दृष्टिकोण उभरते हैं

क्रांति के बीज यूँ ही नहीं पोषित होते हैं

मिटकर ही इतिहास बना करते हैं

31 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

दोहन,शोषण के बाद लीक से परे की हर बात समझ में आ जाती है , जब लीक से परे ज़िन्दगी सामने खडी हो जाती है !!!

क्रांति के बीज यूँ ही नहीं पोषित होते हैं...

"अनंत" अरुन शर्मा ने कहा…

वंदना जी बेहद संवेदनशील रचना है.

Rohitas ghorela ने कहा…

वाह .. बेहद खुबसूरत ... :))

सही कहा है आपने ...
जन चेतना और जन जागृति करती कलम से वो सब कुछ मुम्किन हैं जो एक युद्ध या तलवार की नोक से नही हो सकता।
जन जागृति के लिए पहले पहल तमाम मुश्किले आएँगी ... लेकिन एक दिन वो इतिहास बनेगी और सब उस पर गर्व करेंगे।



मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत हैं ...

http://rohitasghorela.blogspot.in/2012/11/blog-post_6.html

Rohitas ghorela ने कहा…

वाह .. बेहद खुबसूरत ... :))

सही कहा है आपने ...
जन चेतना और जन जागृति करती कलम से वो सब कुछ मुम्किन हैं जो एक युद्ध या तलवार की नोक से नही हो सकता।
जन जागृति के लिए पहले पहल तमाम मुश्किले आएँगी ... लेकिन एक दिन वो इतिहास बनेगी और सब उस पर गर्व करेंगे।



मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत हैं ...

http://rohitasghorela.blogspot.in/2012/11/blog-post_6.html

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बिलकुल सही .... शुरू में तो विरोध ही सहना पड़ता है ... समय के साथ जब बदलाव होता है तो मान्य हो जाती हैं बातें ... बहुत अच्छी रचना

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सदियों से पोषित होती व्यथायों हैं ये ।

मनोज कुमार ने कहा…

रीतियां, ढकोसले और रूढ़ियों ने ही तो सर्वनाश कर रखा है।

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बेहद सटीक

सादर

इमरान अंसारी ने कहा…

बहुत ही सुन्दर ।

shikha varshney ने कहा…

क्या बात ...बहुत खूब.

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बढिया

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 08 - 11 -2012 को यहाँ भी है

.... आज की नयी पुरानी हलचल में ....
सच ही तो है .... खूँटे से बंधी आज़ादी ..... नयी - पुरानी हलचल .... .

madhu singh ने कहा…

samaji vidroh ke ankuran ki gambhir prastuti,sabhi panktiya bejod

madhu singh ने कहा…

samajik vidroh ke ankuran me chupi jwala ki nayab abhivyakti, Aziz Junpuri ki "mukhagni 1,2 aur 3 me kuch aisa hi padha hai, KAVITA KI PRATYEK PANKTI JORDAR 'यूँ ही प्रतिशोध नहीं

सुलगता किसी भी ह्रदय में

ये समाज में

रीतियों के नाम पर

होते ढकोसलों ने ही

उसे बनाया विद्रोही

आखिर कब तक

मूक दर्शक बन

भावनाओं का बलात्कार होने दे

आखिर कब तक नहीं वो

खोखली वर्जनाओं को तोड़े

जिसे देखा नहीं

जिसे जाना नहीं

कैसे उसके अस्तित्व को स्वीकारे

और यदि स्वीकार भी ले

तो क्या जरूरी है जैसा कहा गया है

वैसा मान भी ले

उसे अपने विवेक की तराजू पर ना तोले

कैसे रूढ़िवादी कुरीतियों के नाम पर

समाज को , उसके अंगों को

होम होने दे

किसी को तो जागना होगा

किसी को तो विष पीना होगा

यूँ ही कोई शंकर नहीं बनता

किसी को तो कलम उठानी होगी

poonam ने कहा…

itni sunder aur man ki baat kahti rachna ke liye badhai...

Rajesh Kumari ने कहा…

बहुत खूब क्रांतियों से ही इतिहास बदले हैं सही सोच अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए एक नन्हा पौधा भी आँधियों से बगावत करता है

सदा ने कहा…

बेहद सशक्‍त लेखन ....

Anita ने कहा…

सही है ! सोचना तो चाहिए ही ना ! ऐसे ही धीरे धीरे सब सोचने लगेंगे...तो क्रांति आ ही जाएगी...-बढ़िया प्रस्तुति !
~सादर !

मनोज बिजनौरी ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना !
बहुत बहुत आभार !
मेरी नयी पोस्ट - नैतिकता और अपराध पर आप सादर आमंत्रित है

मनोज बिजनौरी ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना !
बहुत बहुत आभार !
मेरी नयी पोस्ट - नैतिकता और अपराध पर आप सादर आमंत्रित है

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

लीक से हट कर लिखना ...हर कोई नहीं लिख सकता ..........(शायद मैं भी नहीं)

आमिर दुबई 2692 ने कहा…

आप ''इंडियन ब्लोगर्स वर्ल्ड ''की सदस्य हैं.आज आपका ब्लॉग इंडियन ब्लोगर्स वर्ल्ड के भारतीय रचना मंच पर सबमिट कर दिया गया है.अब आपकी हर नयी पोस्ट का लिंक यहाँ भी दिखाई देगा.इंडियन ब्लोगर्स वर्ल्ड पर आपका स्वागत है.


इंडियन ब्लोगर्स वर्ल्ड

Amrita Tanmay ने कहा…

हर काल-गर्भ में ऐसे बीज पोषित होते रहते हैं..अच्छी लगी रचना..

Aditya Tikku ने कहा…

utam-***

मनोज कुमार ने कहा…

ख़्याल अच्छे हैं।

नादिर खान ने कहा…

दिल मेन असर करती गंभीर रचना, बहुत खूब..

Asha Saxena ने कहा…

क्रान्ति के बीज सरल नहीं जंक लेते |अच्छी और भाव पूर्ण रचना |
आशा

Tarang Sinha ने कहा…

A powerful composition indeed! Good to see your so many published books:)

सतीश सक्सेना ने कहा…

आपको दीपावली पर मंगल कामनाएं !

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

अच्छी कविता |दीपावली की शुभकामनाएँ |

राकेश कौशिक ने कहा…

"क्रांति के बीज यूँ ही नहीं पोषित होते हैं
मिटकर ही इतिहास बना करते हैं"

नायाब प्रस्तुति - बधाई