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शनिवार, 23 जनवरी 2016

दस्तकें

तुम्हारे आश्वासनों की दहलीज पर
बैठी रही आस मेरी ताकते हुए
दरवाज़ा खुला रखा था मैंने

तुमने नहीं आना था
तुम नहीं आये
और अब
आस की गुलाबी दहलीज पर
सन्नाटों के शहर में
लगी आग से
कौतुहल में मत पड़ना
रिवाज़ है अपने अपने शहर का
रस्मों को जिंदा रखने का

हाँ , रस्म है ये भी
आस के बिलबिलाते पंछी को सांत्वना देने की
कर लो तुम भी दरवाज़ा बंद
कि
पहर पिछले हों या अगले
दस्तकें , बंद दरवाज़ों पर ही हुआ करती हैं

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (23-01-2016) को "कुछ सवाल यूँ ही..." (चर्चा अंक-2231) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ajay yadav ने कहा…

आस बनी रहनी चाहियें |

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

गहन, आशान्वित बन जीवन जीना।