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सोमवार, 21 मार्च 2016

न बाँची गयी कविता

स्त्री होने से पहले और स्त्री होने के बाद भी 
बचती है एक अदद कविता मुझमे 

अब बाँचनी है वो कविता 
जिसमे मैं कहीं न होऊँ 
फिर भी मिल जाऊँ 
पेड़ों की छालों पर ,
गली के नुक्कड़ पर 
ख्वाब के डैने पर 
साँझ की पायल में 
सुबह की झंकार में 
एक राग पूरब से पश्चिम तक के सफर का बनकर 
एक संगीत का अबूझा स्वर बनकर 
खुले केशों पर गिरती शबनम बनकर 
किसी आस की थिरकन बनकर 
नृत्य गायन और वादन के 
सभी नियमों में ढलकर 
चन्दन के पालने में झूलते शिशु की लोरी बनकर 
आल्हाद का आखिरी स्वर बनकर 
रेशम के कीड़े का रेशा बनकर 
किसी किशोरी की जीभ का चटकारा बनकर
क्या संभव होगा 
मेरे न होने में मेरा होना 
और एक न बाँची गयी कविता का पढ़ा जाना बिना शब्दों के …… 

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (22-03-2016) को "शिकवे-गिले मिटायें होली में" (चर्चा अंक - 2289) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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रंगों के महापर्व होली की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Anurag Choudhary ने कहा…

अति उत्तम प्रस्तुति।

Vaanbhatt ने कहा…

सुंदर कथ्य व कविता...