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सोमवार, 2 सितंबर 2019

आ अब लौट चलें

इस दौड़ती भागती दुनिया में
समय की धुरी पर ठहरा मन मेरा
कहता है
आ अब लौट चलें
एक बार फिर उसी दौर में
जहाँ पंछियों से रोज मुलाकात हो
मेरे आँगन में रोज उनकी आमद हो

मैं सितार सी बजती फिरूँ
उमंगों का संगीत रूह में बजता रहे
मन की अलंगनी पर
इक ख्वाब रोज नया सजता रहे

वो गली चौराहों पर
अपनेपन के ठहाके गूंजते मिलें
शहर शहर से गले मिल
किलकारियों से सजते मिलें
धर्म जाति से परे
भाईचारे के घुंघरू बजते मिलें

आमीन कहने की न दरकार रहे
यूँ आईनों के चेहरे शफ्फाक रहें
युद्ध के कान खींचकर
शांति बस यही कहे
आ अब लौट चलें
समय की धुरी पर इक नयी रौशन सभ्यता नर्तन करे


6 टिप्‍पणियां:

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत ही सुंदर भावाभिव्यक्ति.. ...बधाई

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में मंगलवार 03 सितम्बर 2019 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

kavita rawat ने कहा…

अच्छे दिन गाहे-बगाहे मुश्किल घडी में दिल की घंटी बजाने से बाज नहीं आते हैं
बहुत अच्छी रचना

Sagar ने कहा…

वाह बेहतरीन रचनाओं का संगम।एक से बढ़कर एक प्रस्तुति।
बेखयाली में भी तेरा ही ख्याल आये क्यूँ बिछड़ना है ज़रूरी ये सवाल आये

sudha devrani ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत मनभावनी रचना.....
मन तो सबका यही कहता है पर इसे सुनने की फुरसत किसे है....
वाह!!!!

मन की वीणा ने कहा…

बहुत सुंदर सृजन है भाव विकल है फिर पीछे लौटने को जहां सुकून था ।
वाह।