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बुधवार, 30 जुलाई 2008

कश्ती

तूफानों को सीने में दबाये रहते हैं
हर पल भंवर में फंसे रहते हैं
आदत सी हो गई है अब तो
डूब डूब कर पार उतरने की
यह कश्ती है जज्बातों की
आंसुओं का अथाह सागर है
भावनाओं के तूफानों में
कश्ती जिंदगी की बार बार
तूफानों से लड़ते हुए
कभी भंवर में फंसते हुए
तो कभी बाहर नीकलते हुए
साहील तक पहुँचती है

1 टिप्पणी:

विनय प्रजापति 'नज़र' ने कहा…

शब्द प्रयोग काफ़ी अच्छा है किन्तु शब्दों के हेर फेर पर थोड़ा ध्यान देना होगा! काव्य की रोचकता महत्वपूर्ण है! आशा है आप मेरी बात को अन्यथा नहीं लेगीं!