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सोमवार, 16 मार्च 2009

दोहरी ज़िन्दगी

दोहरी ज़िन्दगी जीते हम लोग
हर पल चेहरे बदलते हैं
अपने लिए एक चेहरा
और दुनिया के लिए
दूसरा रखते हैं
अपने मापदंड अलग रखते हैं
अपने ख्वाबों के लिए
अपनी हर चाहत के लिए
हर हथकंडा अपनाते हैं
मगर जब वो ही ख्वाब
कोई दूसरा देखे तो
मापदंड बदल जाते हैं
फिर भी दुनिया
ना जान पाती हैं
चेहरे के पीछे छिपे चेहरे को
ना पहचान पाती हैं
हम अपने लिए जो चाहते हैं
क्यूँ दुनिया को ना दे पाते हैं
दूसरे का ख्वाब आते ही
क्यूँ हमारे अर्थ बदल जाते हैं
कब तक हम चेहरे बदल पाएंगे
दोहरी ज़िन्दगी की आग में
इक दिन ख़ुद ही जल जायेंगे
उस दिन ना हम
दुनिया के रह पाएंगे
और ना ही अपने आप के
फिर किस भुलावे में
जिए जाते हैं
दोहरी ज़िन्दगी की आग से
क्यूँ ना निकल पाते हैं
दोहराव कब टिका हैं
एक दिन तो आख़िर
मिटा ही हैं
हम भी कब तक
टिक पाएंगे
इक दिन इस दोजख से
शायद निकल पाएंगे

11 टिप्‍पणियां:

kuhasa ने कहा…

फॉण्ट थोडा बड़ा कर दिया करें तो पढने में आसानी होगी
अच्छी कविता

ashabd ने कहा…

दोहरापन के दोराहे पर तो न जाने कितनी जिंदगियां बरबाद हो गई। सुंदर अभिव्‍यक्ति।

ashabd ने कहा…

दोहरापन के दोराहे पर न जाने कितनी ही जिंदगियां बरबाद हो गई। सुंदर अभिव्‍यक्ति। बधाई।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

वन्दना जी!

धूप के संसार में सब,
लोग मोम जैसे बन गये हैं।
हर चेहरा,
सुबह को कुछ और है,
जाना पहचाना सा लगता है,
परन्तु शाम तक,
पिघल जाता है और,
बदसूरत हो जाता ह,ै
वह अपना रूप, आकृति
सब कुछ बदल लेता है।
शायद,
यही इस दुनिया की नियति है,
इसी का नाम तो विडम्बना है।

अच्छे विरह श्रंगार के लिए
बधाई स्वीकार करें।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

वन्दना जी!

धूप के संसार में सब,
लोग मोम जैसे बन गये हैं।
हर चेहरा,
सुबह को कुछ और है,
जाना पहचाना सा लगता है,
परन्तु शाम तक,
पिघल जाता है और,
बदसूरत हो जाता है,
वह अपना रूप, आकृति
सब कुछ बदल लेता है।
शायद
यही इस दुनिया की नियति है,
इसी का नाम तो विडम्बना है।

अच्छे विरह श्रंगार के लिए
बधाई स्वीकार करें।

विनय ने कहा…

बहुत सुन्दर मनोभिव्यक्ति है

---
गुलाबी कोंपलें

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना...सार्थक और प्रेरक...
नीरज

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

kya baat hai vandana ji ,

nazm to bahut tez hai .. lekin , sahi hai .. zindagi ke rang ko darshati hui ..

badhai

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

आपकी इस रचना को पढकर एकदम कई चीजों याद आ गई। आपने इस मुखोटे के भाव को बहुत ही उम्दा तरीके से लिखा है। और यह सच भी है आज के समय का। मैं कल परसो बोलने ही वाला था कि कुछ थोडा अलग लिखे। और आज आपने लिख दिया। और वो भी इतना बेहतरीन कि पढकर आनंद आ गया। मैंने भी इस मुखोटे पर कभी लिखा था अपने ब्लोग पर, पर आपने उससे भी बहुत अच्छा लिखा है।

अनुपम अग्रवाल ने कहा…

ज़िन्दगी के नज़रिये को खूबसूरती से दर्शाती रचना

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

अपनी हर चाहत के लिए
हर हथकंडा अपनाते हैं
मगर जब वो ही ख्वाब
कोई दूसरा देखे तो
मापदंड बदल जाते हैं


एकदम सटीक लिखा है, पर आजके अर्थतंत्र में मुद्रा अर्जन की इससे बेहतर और कोई तकनीक है ही नहीं.
आज संस्कार, सत्त्यता, इमानदारी, आदि दूसरों से चाहते तो सब है पर अपनी आने पर यही मूल्य मुद्रा प्राप्त करने के चक्कर में भूल जाते हैं.

सुन्दर, सटीक और भावपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए आभार.