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रविवार, 29 मार्च 2009

काश !

काश ! दिल न होता
तो यहाँ दर्द न होता

काश ! आँखें न होती
तो इनमें आंसू न होते

काश ! ज़िन्दगी न होती
तो यहाँ कोई मौत न होती

काश ! दिन न होता
तो यहाँ कभी रात न होती

काश ! बसंत न होता
तो यहाँ कभी पतझड़ न होता

काश ! प्यार न होता
तो यहाँ कभी जुदाई न होती

काश ! हम न होते
तो यहाँ कुछ भी न होता

8 टिप्‍पणियां:

neeshoo ने कहा…

काश ये कलम न होती , जज्बात न होते , लोग न होते , न ये कविता होती । कल्पनाशीलता में नकारात्मक प्रभाव क्यों? जबकि अभिव्यक्ति अतिसुन्दर है ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

‘काश’ का प्रयोग,

मन को भा गया है।

दर्द का रिश्ता,

हृदय पर छा गया है।।

प्यार गर सच्चा,

जुदाई हो नही सकती।

दिल मिले हो तो,

विदाई हो नही सकती।।

रश्मि प्रभा ने कहा…

अच्छा हुआ जो ऐसा ना हुआ.......फिर ये नज़्म कैसे लिखी जाती !
बहुत ही बढिया.......

संगीता पुरी ने कहा…

काश , ये टिप्‍पणी बाक्‍स न होता ... तो हम टिप्‍पणी नहीं कर पाते ... बहुत अच्‍छा लिखा।

Prem Farrukhabadi ने कहा…

काश ! दिल न होता
तो यहाँ दर्द न होता

काश ! आँखें न होती
तो इनमें आंसू न होते

aapki israchna ne bhav vibhor kar diya.kaash!main bhi is tarah kii rachna kar paata.dilse badhaai.

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

vandana ji ,

bahut sundar kavita .. specially the effect of kaash ..

aap yun hi likhte rahe..

विनय ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना है और लगता है इसमें कई भेद छुपे हैं


---
तख़लीक़-ए-नज़र

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

ये " काश" शब्द दिल को बहुत बार तोड़ता है। पर आपने तो इसका इतना सुन्दर प्रयोग कर एक बेहतरीन रचना ही रच दी।