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मंगलवार, 17 अगस्त 2010

सावन कितना बरस ले ............

बरसते मौसम में 
भीगता तन 
मन को ना
भिगो पाया 
मन के आँगन 
की धरती 
तो कब की
सूखे की
भयावह मार से
फट चुकी है 
अब अहसासों 
की खेती ना
कर सकोगे
तमन्नाओं की
फसल ना 
उगा सकोगे
भाव ना कोई
जगा सकोगे
सावन कितना 
बरस ले 
कुछ आँगन
कभी नहीं 
भीगते 

25 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

रिम-झिम सावन बरसता,मगर न भीगा अंग।
सब आँगन नही भीगते, श्याम घटा के संग।।

Deepak Shukla ने कहा…

वंदना जी...

बेशक सावन न ला पाए...
जीवन में वो बहार....
भावों की फसलें भी होंगी...
गर मन में हो प्यार...

मन के आँगन की धरती भी...
सरस पयार से भीग उठेगी .
अपनेपन से उसे पुकारें...
गाकर मेघ मल्हार....

सुन्दर कविता...

दीपक....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत संज़ीदगी से लिखी रचना ...सच है मन का आँगन जब तक न भीगे तो कैसा सावन ..

राजेश उत्‍साही ने कहा…

पढ़ ली। सचमुच मन का आंगन नहीं भीगा।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

पढ़ ली। सचमुच मन का आंगन नहीं भीगा। पता नहीं मन की गड़बड़ है या सावन की।

मनोज कुमार ने कहा…

सावन कितना
बरस ले
कुछ आँगन
कभी नहीं
भीगते
कविता मन से संबंधित कड़वे सच को बयान करती है।

Vandana ! ! ! ने कहा…

bahut hi sundar kavita ... mann ko chhu gayi.....

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

kuch aaangan kabhi bheegte nahi!

sundar rachnaa!

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

अखियाँ भीगी
मन भीगा
तन न भीगा हाय
सावन जब तुम आये ......!!

Rajendra Swarnkar ने कहा…

रिम झिम गिरे सावन
सुलग सुलग जाए मन
भीगे आज इस मौसम में
लगी कैसी ये अगन !


वंदना जी
बहुत ख़ूब !
सावन कितना बरस ले
कुछ आंगन कभी नहीं भीगते … !


शस्वरं पर सदैव आपका हार्दिक स्वागत है , आइए और आते रहिए …

- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

दीपक 'मशाल' ने कहा…

यहाँ भी आपने काफी सुन्दर प्रतीक इस्तेमाल किये.. बधाई एक और अच्छी कविता के सृजन के लिए..

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

ek bhayank sacchayi , is post me jhalakti hai ...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

शायद इसी लिया कहते हैं मन सूना नही होना चाहिए ... अच्छी रचना है ...

khushi ने कहा…

सचमुच
कुछ आँगन
किसी सावन में भी
नहीं भीग पाते वन्दना जी!!!
प्यारा अहसास है.....

बेनामी ने कहा…

सचमुच
कुछ आँगन
किसी सावन में भी
नहीं भीग पाते वन्दना जी!!!
प्यारा अहसास है.....

khushi ने कहा…

सचमुच
कुछ आँगन
किसी सावन में भी
नहीं भीग पाते वन्दना जी!!!
प्यारा अहसास है.....khushi

khushi ने कहा…

सचमुच
कुछ आँगन
किसी सावन में भी
नहीं भीग पाते वन्दना जी!!!
प्यारा अहसास है.....khushi

बेनामी ने कहा…

सचमुच
कुछ आँगन
किसी सावन में भी
नहीं भीग पाते वन्दना जी!!!
प्यारा अहसास है.....

Gourav Agrawal ने कहा…

मन है धरती
भावनाएं फसल
कैसे शब्दों से
कर दी आपने
उलझी हुई बात सरल

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

भावों की बरसात में कुछ हृदय रुक्ष रह जाते हैं।

राजभाषा हिंदी ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति!

हिन्दी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है।

boletobindas ने कहा…

खूबसूरत भाव.....सही कहा है कई बार सावन में कुछ आंगन सुखे रह जाते हैं...

arun c roy ने कहा…

वंदना जे सावन का यह गीत बहुत सारगर्भित और गंभीर बन पड़ा है.. सावन जो मन को ना भिगो दे. वो कैसा सावन... मन की धरती बहुतिक बूंदों से कहा भीगती है... सुंदर गीत !

मेरे भाव ने कहा…

सावन कितना
बरस ले
कुछ आँगन
कभी नहीं
भीगते ...gahri vedna liye achhi rachna.....

PASHA ने कहा…

bhut sundar prastuti hai

kuch aangan nahi bhigate

such kaha aapane

kuch aangan nahi bhigate
kuch aangan nahi khilate
kuch aangan yuu hote banzar
un me gam ke phool bhi nahi khilate