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गुरुवार, 19 जुलाई 2012

मैं आग पहन कर निकली हूँ

मैं आग पहन कर निकली हूँ
मगर ना झुलसी हूँ ना जली हूँ
जो सीने में था बारूद भरा
चिंगारी से भी ना विस्फोट हुआ
जब आग को मैंने लिबास बनाया
तब बारूद भी मुझसे था शरमाया
ये कैसी आग की आँख मिचौली है
जो जलाती है ना रुलाती है 
ना भड़कती है ना सिसकती है
पर मुझमे ऐसे बसती है
गोया सांसों की माला पर 
कोई सुमरता हो पी का नाम 
उफ़ ..........................
देखा है कभी सिसकती रूहों पर आग का मरहम 

22 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

सिसकती रूहें आग का मरहम और सिसकता सन्नाटा - देखा है , जिया है ....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कभी कभी आग ही मरहम का काम करती है ॥बहुत खूब

अरुन शर्मा ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
(अरुन शर्मा = arunsblog.in)

Maheshwari kaneri ने कहा…

वाह: क्या बात है भड़कती अभिव्यक्ति..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत गहरी बात कही है आपने..

सदा ने कहा…

गहन भाव लिए ... ये शब्‍द ... आभार

Rakesh Kumar ने कहा…

बाप रे बाप!

पढकर सोच रहा हूँ,कैसी दिखतीं
होंगीं आप आग पहिनकर.

उफ......... जलन हो रही है.

कमाल है आपका,वन्दना जी

इमरान अंसारी ने कहा…

वंदना जी हैट्स ऑफ ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

हमसे दूर ही रहना।
हमारे पास आग बुढाने के उपकरण नहीं हैं।
वैसे रचना बहुत बढ़िया है।

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

गंभीर कविता... आग पहन के निकलना एक नया विम्ब है...

Shanti Garg ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन रचना....
मेरे ब्लॉग

विचार बोध
पर आपका हार्दिक स्वागत है।

Sunil Kumar ने कहा…

बहुत ही सुंदर भावाव्यक्ति बधाई

सतीश सक्सेना ने कहा…

बधाई , प्रभावी अभिव्यक्ति के लिए !

rashmi ravija ने कहा…

बहुत ही आक्रोश भरी रचना...पर कभी कभी ये जरूरी भी होता है

शिवनाथ कुमार ने कहा…

यह आग भी कितनी अच्छी होती है
आज पता चला :-)
भावनाओं की सुंदर प्रस्तुति ...

Vinay Prajapati ने कहा…

गहरे भाव!

sushma 'आहुति' ने कहा…

बहुत ही गहरे भावो की अभिवयक्ति......

Dr. shyam gupta ने कहा…

पता नहीं चल रहा कि वह कौन सी आग है जो आप पहन कर निकली हैं...और क्यों ...

-- इस प्रकार अस्पष्ट और गहरी कविता का क्या लाभ जिसमें स्पष्ट भाव-सम्प्रेषण न हो ....बात निकले ही नहीं दूर तलक की बात तो दूर रही...

Pallavi saxena ने कहा…

संगीता आंटी की बात से सहमत हूँ।

anjana dayal ने कहा…

wah! garma garam rachna! ummid hai rooh ko kuch araam aaya hoga...

Satish Chandra Satyarthi ने कहा…

सुन्दर कविता...

Suresh kumar ने कहा…

सुन्दर रचना ....