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सोमवार, 8 अक्तूबर 2012

शुभ मुहुर्त

ना जाने कैसे रिवाज़ हैं
निकलवाते हैं हम तारीखें
कभी मुंडन की तो कभी ब्याह की
कभी गृहप्रवेश की तो कभी शुभ लग्न की
चिन्ता रहती है हमेशा
सब शुभ होने की
सब कार्य ठीक से सम्पन्न होने की
मगर भूल जाते हैं आवश्यक कार्य को
जिस कारण जन्म लिया
जिस कारण मानव तन मिला
कभी नही सोचा उस बारे मे
नही की कोई चिन्ता
नही चाहा कुछ ऐसा करना
आखिर क्यों?
क्या जरूरी नही है
मानव तन का सदुपयोग
क्या जरूरी नही है
हर पल का उपयोग
क्यों नही विचार किया
क्यों नही निकलवाया
वो शुभ मुहुर्त कभी
जब प्रस्थान करना होगा
मगर हाथ मे ना कुछ होगा
उससे पहले जो जरूरी
कर्म खुद के प्रति करना है
क्यों ना उसका विचार किया
क्यों नही निकलवाया
वो शुभ मुहुर्त कभी
जिसमे खुद से साक्षात्कार कर सकें
कुछ आत्मविचार कर सकें
आखिर कैसे भूल जाते हैं हम
अपने परम कर्तव्य को
गर जिसे यदि साध लें
तो ना जरूरत पडे
कोई भी शुभ मुहुर्त निकलवाने की
फिर हर पल , हर दिन , हर मुहुर्त शुभ ही शुभ हो………

18 टिप्‍पणियां:

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

अच्छी रचना
अच्छा दर्शन

Amrita Tanmay ने कहा…

अति शुभ भाव से सराबोर रचना.

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

शुभ कविता...

Maheshwari kaneri ने कहा…

अति शुभ भाव...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सार्थक संदेश देती रचना ... अब तो लोग जन्म भी शुभ मुहूर्त निकलवा कर देने लगे हैं :):)

इमरान अंसारी ने कहा…

बहुत ही सुन्दर लगी पोस्ट।

Anupama Tripathi ने कहा…

शुभ सार्थक ...सुंदर रचना ....!!
शुभकामनायें वंदना जी ...!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

वहुत सुन्दर प्रस्तुति!

shikha varshney ने कहा…

इतना ही सोच लें तो क्या बात ..अब तो बच्चे को जन्म भी मुहूर्त देखकर दिया जाता है.दुनिया आगे जा रही है या पीछे समझ में नहीं आता.

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रस्तुति की चर्चा कल मंगलवार ९/१०/१२ को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी

रश्मि प्रभा... ने कहा…

मृत्यु भी एक उत्सव है,आत्मा परमात्मा का मिलन...मुहूर्त तो निकालना ही चाहिए

devendra gautam ने कहा…

दुर्गुणों से मुक्ति और सदगुणों का विकास आत्म साक्षात्कार के जरिये ही किया जा सकता है. इसके बगैर अपने जीवन के मकसद को नहीं समझा जा सकता. बहुत अहम् सन्देश दिया है आपने इस कविता के जरिये. आप बधाई का पात्र हैं.

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

बहुत सशक्त रचना है लेकिन अनुनासिक की अनदेखी ने फिर रुला दिया हर जगह नहीं कहीं नहीं नहीं ,नहीं नहीं नहीं .....नही न लिखो प्लीज़ !कर्म की और सहज प्रेरित करती सोच को धक्का देती रचना .

ram ram bhai
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मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012
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प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

शुभविचार हों, सब दिन शुभ हों।

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

har muhurat shbh hee hota hai....hum log hee usey ashubh bana dete hain....andhvishvaason mein pad ke!

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

बहुत अच्छी विचारणा है !

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

शुभ समय पर पढ़ी गई कविता


अपनी दुनिया अपने ही लोग बस वहम में जीते और वहम में दम थोड़ देते है :)))

मनोज कुमार ने कहा…

्मन चंगा तो कठौती में गंगा
उसके लिए हर मुहूर्त शुह है।